शनिवार, 25 अप्रैल 2026

2.सूफ़ीमत ..... भूमिका

 सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


2. भूमिका


जो समझते हैं कि उन्हें अपने पालनहार से मिलना है और उन्हें फिर उसी की ओर  जाना है। (क़ुरआन : 2/46)

इंसान को अपनी हक़ीक़त की तलाश है। वह जानना चाहता है कि मैं कौन हूं और मैं इस दुनिया में क्यों हूं?

इंसान ने इस कौन और क्यों की तलाश में सदियों तलाश और जुस्तजू की है। उसने ज़ाहिरी दुनिया में इन सवालों का जवाब खोजने की कोशिश की तो वह साइंटिस्ट बन गया और जब उसने इन सवालों का जवाब अपने अंदर तलाश किया तो वह सूफ़ी बन गया।

कोई सूफ़ी रास्ते में ही रह गया और कोई मंज़िल तक पहुंच गया। जो मंज़िल तक पहुंच गया, वह अपने पैदा करने वाले पालनहार तक पहुंच गया। अपनी हक़ीक़त की तलाश में निकले हुए जो इंसान अपने रब तक जा पहुंचते हैं, वही सच्चे सूफ़ी और कामिल दरवेश कहलाते हैं। सबक़ा मालिक एक है और सब उसी के बंदे हैं, सबसे प्यार करो। यही इनका पैग़ाम है।

आधुनिक भारत में यह पैग़ाम हर तरफ़ फैला हुआ है, तो केवल इसी वजह से कि भारत में हर तरफ़ सूफ़ियों की ख़ानक़ाहें मौजूद हैं। उनका संदेश हर दिशा में फैला और वह खूब फला-फूला भी। जनमानस में व्याप्त ऊँच-नीच, छुआछूत, भेदभाव और संकीर्णता ख़त्म हुई और एक नए भारत का उदय हुआ। भारत के संविधान में भी उनके दिए मूल्य (values) बुनियाद की हैसियत रखते हैं। आज भारत पूरी दुनिया को यह संदेश दे रहा है।

भारत हमेशा से ही एक आध्यात्मिक देश रहा है। सूफ़ियों के आने से उसमें इज़ाफ़ा भी हुआ और उसके कलेवर और फ़्लेवर दोनों में बदलाव भी आया है। विकास के लिए परिवर्तन एक आवश्यक शर्त है। यह सब सैंकड़ों साल में धीरे-धीरे हुआ।

आदरणीय श्री मनोज कुमार जी इस आध्यात्मिक विकास यात्रा के साक्षी बने। उन्होंने अपने साक्षात्कार को शब्द दिए तो एक विशाल ग्रन्थ तैयार हो गया।

सूफ़ी मत के विभिन्न आयाम

इस ग्रन्थ के रूप में उन्होंने पाठकों के लिए मानों एक टाइम मशीन तैयार कर दी है। जिसके ज़रिए पाठक सैकड़ों सालों और दर्जनों देशों की संस्कृति का साक्षात दर्शन करते हैं। यह अनुभव सचमुच रोमांचित करने वाला है। श्री मनोज कुमार जी को इस पर आश्चर्य है कि उन्होंने यह पुस्तक किसी योजनाबद्ध प्रयास के तहत नहीं लिखी है, बल्कि ऐसा लगता है कि किसी अदृश्य शक्ति ने उनसे लिखवाई है।

पुस्तक-लेखक हिंदी ब्लॉग जगत के एक प्रतिष्ठित ब्लॉगर हैं। अपने ब्लॉग्स (blogs) पर वह बहुत से विषयों पर लिखते ही हैं। इसी क्रम में उन्होंने सूफ़ियों के जीवन-दर्शन पर केवल एक शोध पूर्ण लेख लिखा था।

बस, केवल एक लेख।

.... लेकिन मानों उसी लेख ने इच्छा की हो कि ‘एको अहम्‌ बहुस्यामि’ और बहुत से लेख अनायास ही आकार लेते चले गए। एक लेख से पूरी किताब बनने की घटना के हम स्वयं साक्षी हैं। हमारे ‘ब्लॉग की खबरें’ पर भी उनके कुछ लेखों को बहुत ज़्यादा सराहा गया। हिंदी ब्लॉगर्स एक लम्बे अरसे से इस बेशक़ीमती किताब का इन्तेज़ार कर रहे हैं।

सूफ़ी दर्शन पर हिन्दी में ज़्यादा किताबें नहीं हैं और जो कुछ हैं भी तो उनमें प्रामाणिकता का अभाव है। उन किताबों के लेखकों को न तो इसलाम की मान्यताओं की सही जानकारी है और न ही वे सूफ़ियों के रहस्यवाद और प्रतीकवाद को ठीक तरह से समझ पाए हैं। कुछ किताबों में नासमझी के साथ पूर्वाग्रह भी साफ़ झलकता है।

इस किताब की रचना के दौरान श्री मनोज कुमार जी ने सूफ़ियों के अनुभव को ख़ुद भी जीने की कोशिश की है। अपने लेखन को भी वह उनसे चेक कराते रहे जो सूफ़ियत का व्यावहारिक अनुभव रखते हैं। इस तरह यह किताब हिंदी दुनिया की शायद अपनी तरह की  पहली और सबसे ज़्यादा प्रामाणिक किताब बन गई है।

यह किताब सूफ़ियों के बारे में जानकारी का भंडार है। जिस इंसान को अपनी हक़ीक़त की तलाश है उसे इस किताब से अपनी मंजिल का पता ज़रूर मिल जाएगा। एक सही सोच की कमी के चलते आज हरेक ज़िन्दगी उलझकर रह गई है। समस्याओं के कारण लोगों को जीने के मुक़ाबले मरना आसान लगने लगा है। इंसान और इंसान के बीच इंसानियत का रिश्ता रोज़-ब-रोज़ कमज़ोर पड़ रहा है। लालच, नफ़रत, हिंसा, अश्लीलता और नशा हमारी पीढ़ी को बर्बाद कर रहा है। सूफ़ियों के सद्‌-विचार इन सबक़ा बेहतरीन हल हैं।

सूफ़ी बनना बहुत आसान है। दिल को साफ़ कर लीजिए। बस बन गए सूफ़ी। यह सिरा हाथ आ जाए तो उलझी हुई हरेक जिन्दगी को सुलझाया जा सकता है। दिल को साफ़ करता है एक मालिक का ध्यान और मौत की याद। मेरा मालिक मेरे हर विचार, भावना और कर्म का साक्षी है। वह मेरे दिल की बातें भी जानता है। मुझे मौत आनी है और केवल अपना अस्तित्व ही मेरा रह जाएगा। वही मेरी वास्तविक पूंजी है। जैसे जैसे इस सच्चाई का यकीन इंसान के दिल में बैठता चला जाता है, उसका दिल साफ़ होता चला जाता है। इसी से चेतना का परिष्कार और उत्थान होता है। पूरा जीवन शांति, आनन्द और तृप्ति के साथ गुज़रता है।

ऐसे आदमी को बाहरी जगत में भी सम्मानित जीवन गुज़ारने के सभी साधन आसानी से मिलते चले जाते हैं क्योंकि इंसान की भीतरी अवस्था ही उसकी बाहरी व्यवस्था के रूप में प्रकट होती है। ‘द लॉ ऑफ़ कॉरेस्पॉन्डेंस’ (The Law of Correspondence) यही है। इसे हमने अपने जीवन में भी देखा है और पिछले 30 वर्षों में अपने पास दुआ के लिए आने वाले बेशुमार लोगों के जीवन में भी। ये सभी डिप्रेशन, कैंसर, मुक़द्दमें, घरेलू कलह, विवाह के लिए उचित जीवन साथी न मिलना, ग़रीबी और घरेलू झगड़ों की भंवर से निकल पाए हैं तो आप भी अपने जीवन को ज़्यादा बेहतर और चिन्ता-मुक्त अवश्य बना सकते हैं।

मौत भी जीवन का अंत नहीं है बल्कि क्षणिक जीवन से अनन्त जीवन में प्रवेश करना है। सूफ़ियों ने इस हक़ीक़त से सबको आगाह किया है। उन्होंने यह भी बताया है कि अमर जीवन की तैयारी में लगाना ही, अर्थात एक सम्पूर्ण नज़रिए को पाना, ही इस जीवन की सार्थकता है।

अपने जीवन को सार्थक बनाने वाले बेशुमार सूफ़ियों की जीवन-गाथाएं अब आपके हाथ में है। आपको जिस अमृत-ज्ञान की प्यास बेचैन रखती है, आप वह पा चुके हैं। अब आपका काम शुरू होता है।

अपने मन में डूब कर पा जा सुरागे-ज़िन्दगी

तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन

                            -डॉ. अनवर जमाल नक़्शबंदी

लाइफ़ डीलर

देवबन्द, उत्तर प्रदेश

        email:dr.anwerjamal@gmail.com

facebook:https://www.facebook.com/anwerjamal.khan.7

मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर

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