राष्ट्रीय आन्दोलन
478. भारत के भाग्य का निर्णय
1947
वह निर्णायक 2 जून का दिन आ ही गया। लॉर्ड माउंटबेटन लंदन से एक तीन-सूत्रीय रणनीति लेकर लौटा
था। सबसे पहले, वह भारतीय दलों को 'कैबिनेट मिशन योजना' स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का एक और प्रयास करेगा। वह जानता था कि इसकी
सफलता की संभावना बहुत कम थी। यदि इसमें सफलता नहीं मिलती, तो वह उनके सामने 'महामहिम की सरकार' (ब्रिटिश सरकार) की
विभाजन योजना प्रस्तुत करेगा। अंत में, यदि इन दोनों में से
कोई भी समाधान उन्हें स्वीकार्य नहीं होता, तो उसने मौजूदा
संविधान के आधार पर सत्ता-हस्तांतरण की एक योजना तैयार रखी थी, जिसके तहत प्रांतीय
विषय मौजूदा प्रांतीय सरकारों को और केंद्रीय विषय मौजूदा केंद्रीय सरकार को सौंप
दिए जाएंगे। यह एकतरफ़ा कार्रवाई होगी, जिसके विरुद्ध कोई
अपील नहीं की जा सकेगी।
2 जून, 1947 को, योजना की घोषणा की पूर्व संध्या पर, हर्बर्ट एल. मैथ्यूज ने 'न्यूयॉर्क टाइम्स' को तार भेजते हुए कहा, "मिस्टर गांधी एक बहुत
बड़ी चिंता का विषय हैं, क्योंकि यदि वे 'आमरण अनशन' पर बैठने का निर्णय
लेते हैं, तो इससे पूरी योजना ही
चौपट हो सकती है।" अगले दिन, प्रधानमंत्री एटली ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इस योजना
की घोषणा की और माउंटबेटन ने नई दिल्ली रेडियो पर इसका खुलासा किया। अपने प्रसारण
में, अंतिम वायसराय ने साफ़-साफ़ कहा, 'बेशक, मैं प्रांतों के
बँटवारे के उतना ही ख़िलाफ़ हूँ, जितना कि मैं ख़ुद
भारत के बँटवारे के ख़िलाफ़ हूँ।' वह जानते थे कि यह योजना अधूरी थी, खासकर पंजाब के पाँच
मिलियन योद्धा सिखों पर पड़ने वाले इसके असर की वजह से। उस प्रांत से गुज़रने वाली
कोई भी संभावित रेखा कुछ सिखों को उनकी इच्छा के विरुद्ध पाकिस्तान में छोड़ देती।
1 जून को वायसराय के दिल्ली लौटने के साथ ही, माहौल उम्मीदों से भरा और तनावपूर्ण हो गया। H.M.G. (महामहिम की सरकार) की घोषणा में शामिल विभाजन के प्रस्तावों पर कांग्रेस और
लीग के नेताओं के साथ चर्चा की गई। लेकिन यह तय किया गया कि 3 जून को घोषणा होने
तक कोई भी बात बाहर नहीं जानी चाहिए।
2 जून को, 10 बजे वायसराय भवन में भारत
के भाग्य का निर्णय लेने के लिए नेताओं का ऐतिहासिक सम्मेलन हुआ। इसमें सात नेताओं
ने भाग लिया। कांग्रेस की ओर से नेहरू, पटेल और कांग्रेस अध्यक्ष कृपलानी थे। लीग की
तरफ़ से जिन्ना, लियाक़त अली ख़ां और रब निश्तर थे। सरदार बलदेव सिंह सिक्खों के प्रतिनिधि
थे। वायसराय ने कैबिनेट मिशन की योजना को मनवाने का आख़िरी प्रयत्न किया, जिसे जिन्ना
ने ठुकरा दिया। इसके बाद लॉर्ड माउंटबेटन ने उनके सामने अपनी विभाजन
की योजना पेश की। इस योजना पर कांग्रेस और लीग की सम्मिलित स्वीकृति
प्राप्त करने के लिए समझौता-वार्ताओं में वायसराय को पूरे दस हफ्ते और अपना समस्त बुद्धि-कौशल लगा देना पडा था। यह योजना कांग्रेस
और लीग के बीच समझौते का ऐसा
लघुतम अंश थी, जिसपर दोनों पक्ष
सहमत हो सके थे, यद्यपि अंतिम
फैसला तो जनवादी तरीके
से अर्थात प्रांतीय काउंसिलों के सदस्यों के मतदान अथवा मत-संग्रह के द्वारा ही किया जाना था, लेकिन भारत और पंजाब
एवं बंगाल के बँटवारे की बात पक्की हो गई थी। इसके अनुसार
1.
अगर भारत की राजनीतिक पार्टियां सहमत हों, तो भारत का विभाजन भारतीय संघ और पाकिस्तान
में कर दिया जाए,
2.
इनकी सीमा तय किए जाने के पूर्व पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत और असम के सिलहट ज़िले में
जनमत संग्रह द्वारा यह तय करना था कि वहां की जनता पाकिस्तान में रहेगी या भारत में,
3.
सिंध विधानसभा को ख़ुद यह निर्णय करना था कि वह किधर रहेगी,
4.
पंजाब और बंगाल में हिंदू-मुसलमान बहुल ज़िलों के प्रांतीय विधायक यदि प्रांत का
विभाजन चाहें, तो कर दिया जाएगा,
5.
हिंदुस्तान की संविधान-सभा दो भागों में विभक्त हो जाएगी और अपने-अपने देश के लिए
संविधान तैयार करेगी,
6.
दोनों राज्यों को डोमिनियन स्टेट्स प्रदान किया जाएगा, और
7.
देशी रियासतों को यह स्वतंत्रता होगी कि वे जिसके साथ चाहें, मिल जाएं या स्वतंत्र
अस्तित्व बनाए रखें।
8.
विभाजन के अंतिम स्वरूप का निर्णय इसी काम के लिए नियुक्त एक सीमा-आयोग करे,
9.
देश का विभाजन होने तक अन्तरिम सरकार में कोई परिवर्तन न हो। विभाजन के बाद दो
अलग सरकारें स्थापित की जाएंगी।
नेता लोग विदा हुए।
2 को जून को नेताओं के जाने के कुछ ही देर बाद, ठीक 12:30 बजे, गांधीजी वायसराय से अपनी मुलाक़ात के लिए पहुँचे। माउंटबेटन
की तरफ़ से यह मुलाक़ात ज़्यादातर एक शिष्टाचार-मात्र थी; और गांधीजी ने भी इसे इसी रूप में लिया। माउंटबेटन गांधीजी का बेचैनी से इंतज़ार
कर रहा था। उसे चिंता थी कि यह अबूझ महात्मा अब कौन-सी चाल चलेगा? गांधीजी का देश के
विभाजन के प्रति विरोध किसी छिपा नहीं था। माउंटबेटन के मन में सवाल यह था कि विभाजन
की योजना को असफल करने के लिए गांधीजी किस सीमा तक जाएंगे? गांधीजी माउंटबेटन के मन
की शंकाओं को भांपते हुए, एक पुराने लिफ़ाफ़े की पीछे लिखा, “आज मेरा साप्ताहिक मौनव्रत
का दिन है।” यह पढ़कर वायसराय ने राहत की सांस ली। गांधीजी ने दूसरे टुकड़े पर लिखा, “क्या मैंने कभी अपने भाषणों
में आपके ख़िलाफ़ एक शब्द भी कहा है?” मुलाक़ात जब समाप्त हुई
तो माउंटबेटन ने काग़ज़ के उन टुकड़ों को उठा लिया जिसका उपयोग गांधीजी ने वार्तालाप के
दौरान किया था। उसने कहा था, “ये मेरे सबसे अधिक ऐतिहासिक
महत्त्व वाली वस्तु होंगी। गांधीजी की इस निराली कार्य पद्धति के पीछे राजनीतिक संन्यास
का, आत्म निषेध का और आत्म नियंत्रण का एक महान कृत्य छिपा हुआ है।” भारत के विभाजन का विचार
भारत देश की एकता में गांधीजी की भावनात्मक आस्था के ख़िलाफ़ था।
वापस आने के बाद गांधीजी
ने कहा था, “मैं विभाजन के बाद ख़ून की नदियां बहते हुए साफ देख रहा हूं।” मिलने आया एक व्यक्ति
ने पूछा, “फिर आपने लड़ाई क्यों नहीं की?” व्यथित स्वर में गांधीजी
ने जवाब दिया, “काश कि मेरे पास समय होता! मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व को मैं तब तक चुनौती नहीं दे
सकता जब तक कि मैं एक वैकल्पिक नेतृत्व तैयार नहीं कर लेता। पर ऐसा कोई विकल्प तैयार
करने का वक़्त मेरे पास नहीं है। ऐसी दशा में मौजूदा नेतृत्व को कमज़ोर करना ग़लत होगा।
इसीलिए मैं यह कड़वा घूंट पी रहा हूं।” संभवतः अपनी भावनाओं और
विचारों की क़ुर्बानी के मूल्य पर भी वे कांग्रेस संगठन में फूट नहीं पड़ने देना चाहते
थे। प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने विभाजन को इसलिए स्वीकार किया क्योंकि
लोग ऐसा चाहते थे। लोगों की इस चाह ने गांधीजी को असहाय बना दिया था। वे तो जन नेता
थे। अब उनका जन ही उनका अनुसरण करने इंकार कर रहा था। उनके अपने ही लोगों में साम्प्रदायिकता
का प्रवेश हो चुका था। चाह कर भी वे साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ कोई आन्दोलन खड़ा नहीं
कर पाए। निर्मल कुमार बोस ने जब उनसे बड़े पैमाने पर कुछ करने के लिए कहा, तो गांधीजी
ने जवाब दिया था, “मैं अपनी सहज वृत्ति से
यह जान जाता हूं कि लोगों के हृदय को क्या मथ रहा है? जो चीज़ पहले से लोगों के दिलों
में मौज़ूद रहती थी, मैं उसको एक आकार देता था। आज मुझे इस प्रकार की स्वस्थ भावना का
कहीं कोई चिह्न दिखाई नहीं देता। अतएव उपयुक्त समय आने तक मुझे इंतज़ार करना पड़ेगा।”
सामूहिक हिंसा के तांडव
मुस्लिम लीग के दुष्प्रचार
के कारण जो सामूहिक हिंसा के तांडव हो रहे थे और उस हिंसा के प्रति जो हिंसा और क्रूरता
हो रही थी उससे गांधीजी बहुत ही आहत थे। लेकिन इसके बावज़ूद भी वे न तो इसके लिए कभी
तैयार नहीं हुए कि एक राष्ट्र का सिद्धांत छोड़कर मुस्लिम लीग द्वारा प्रतिपादित दो
राष्ट्रों का सिद्धांत स्वीकार कर लिया जाए और न ही इस बात के लिए कि दंगों को दबाने
के लिए सेना की सहायता ली जाए। उनका मानना था कि दंगों का नियंत्रण जन नेताओं द्वारा
सब जातियों और धर्मों के लोगों की सद्भावना जाग्रत करके किया जाना चाहिए। अगर ज़रूरत
पड़े तो इस पागलपन को दबाने के लिए अपने को मिटा कर भी कोशिश किया जाना चाहिए। उन्हें
पूरा विश्वास था कि ग़लत सिद्धांत पर आधारित और आपत्तिजनक उपायों से किया गया देश का
विभाजन हिंदुओं और मुसलमानों को, भारत और पाकिस्तान दोनों को ऐसी हानि पहुंचाएगा, जिसकी
भरपाई कभी नहीं हो सकती। फिरभी जो नेता सरकार में रहकर देश का शासन चलाते थे, उन्हीं
की निर्णय-शक्ति पर गांधीजी ने इस प्रश्न को छोड़ दिया। और एक बार जब उन लोगों ने विभाजन
के पक्ष में निर्णय कर लिया तो गांधीजी ने उनका विरोध नहीं किया।
माउंटबेटन
की सत्ता हस्तांतरण योजना
2 जून 1947 को पेश की गई माउंटबेटन की सत्ता हस्तांतरण योजना को कांग्रेसी नेताओं द्वारा स्वीकार
कर लिया गया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया गाया कि स्वीकृति जिन्ना और मुसलिम लीग द्वारा
अपनाए गए रुख़ पर निर्भर करेगी। सिक्खों के
नेताओं से उसी दिन शाम को लिखित रूप में अपना अंतिम निर्णय बता दिया। सिख नेताओं ने विभाजन स्वीकार कर लिया। जिन्ना ने कहा कि लीग
की पूरी परिषद ही इस विषय में निर्णय कर सकती है और उसकी बैठक कई दिनों तक नहीं हो
सकती। आधी रात को माउंटबेटन और जिन्ना फिर मिले। लॉर्ड इस्मे भी मौज़ूद था। जिन्ना ने कटे-छंटे
पाकिस्तान की निंदा तो की, लेकिन इसे स्वीकार कर
लिया। उसे सारे मुस्लिम बहुल इलाक़े मिल रहे थे, पश्चिमोत्तर प्रान्त भी, वहां जनमत संग्रह का
परिणाम उसके पाकिस्तान के पक्ष में आया था। माउन्टबेटन ने जिन्ना से कहा था, “या तो आप कटा-छंटा पाकिस्तान लो या फिर मेरे पास एकमात्र दूसरा विकल्प भारत को
एक रखना ही है।” जिन्ना ने कहा था, “नहीं पाकिस्तान से तो बेहतर है काना पाकिस्तान।” जब उसे लिखित रूप से
यह बात कहने के लिए कहा गया तो जिन्ना ने कुछ भी लिखित
रूप से देने से साफ इंकार कर दिया। माउंटबेटन ने जिन्ना से कहा, “यदि आपकी ज़िद बनी रहती है, तो सत्ता का हस्तांतरण
वर्तमान संविधान के आधार पर किया जा सकता है।” जिन्ना जानता था कि यह निरी धौंस है। उसने उपेक्षित
स्वर में कहा, “जो होना है, वह तो होगा ही।” अंत में माउंटबेटन ने अपना अंतिम ‘गुप्त शस्त्र’
का प्रयोग किया। वह चर्चिल का भेजा एक संदेश था। इसका उपयोग अंतिम आश्रय के रूप में
किए जाने की सलाह थी। उसमें कहा गया था कि यदि जिन्ना ने इस योजना को स्वीकार नहीं
किया, तो उसका पाकिस्तान का सपना सदा के लिए नष्ट हो जाएगा। यह सुन कर भी जिन्ना ने
सिर्फ़ सिर हिलाया। जिन्ना का सिर हिलाना उसकी स्वीकृति मान ली गई। जिन्ना नहीं झुका। जिन्ना ने दस्तख़त तो नहीं किया, लेकिन उसकी हामी ही काफी थी।
माउंटबेटन का फ़ॉर्मूला
लीग की काउंसिल की बैठक जिन्ना की अध्यक्षता में
9 जून को दिल्ली में हुई। उसमें पंजाब और बंगाल के विभाजन पर खेद प्रकट किया गया,
लेकिन एक प्रस्ताव द्वारा ‘अमन और शांति के हित में समझौते के रूप में’ ब्रिटिश
सरकार की योजना को स्वीकार कर लिया गया। सवाल यह था कि भारत और पाकिस्तान—दोनों की दोस्ती कैसे सुनिश्चित की जाए? माउंटबेटन का फ़ॉर्मूला यह था कि भारत को विभाजित तो किया जाए, लेकिन उसकी एकता को भी ज़्यादा से ज़्यादा हद तक बनाए रखा जाए। देश का बँटवारा
तो होगा ही, साथ ही पंजाब और बंगाल का भी बँटवारा किया जाएगा; ताकि जो सीमित आकार का पाकिस्तान अस्तित्व में आए, वह कांग्रेस और लीग, दोनों के ही पक्ष को कुछ हद तक संतुष्ट कर सके। पाकिस्तान
के मुद्दे पर लीग की बात इस हद तक मान ली गई कि पाकिस्तान का निर्माण तो होगा ही; लेकिन एकता के मुद्दे पर कांग्रेस के पक्ष को भी ध्यान में रखा जाएगा, ताकि पाकिस्तान का आकार जितना हो सके, उतना छोटा रखा जा सके।
चूंकि कांग्रेस से उनकी मुख्य मांग, यानी एक एकजुट भारत, को छोड़ने के लिए कहा गया
था, इसलिए उनकी बाकी सभी मांगों को मान लिया गया। चाहे वह
रियासतों को आज़ादी न देने का फ़ैसला हो, या बंगाल की एकता का
मुद्दा हो, या फिर हैदराबाद का भारत के बजाय पाकिस्तान में शामिल
होने का मामला हो, इन सभी मुद्दों पर माउंटबेटन ने कांग्रेस का पूरी मज़बूती से
समर्थन किया। उन्होंने ‘हिज़ मैजेस्टीज़ गवर्नमेंट’ (HMG ब्रिटिश सरकार) को इस बात पर राज़ी कर लिया कि यदि भारत को कॉमनवेल्थ में बनाए
रखना है, तो कांग्रेस का सद्भाव और समर्थन बेहद ज़रूरी है।
भगवान उन्हें
सद्बुद्धि दें
3 जून को घोषणा के रूप में वह
योजना सामने आई, जिसके अनुसार 15 अगस्त, 1947 को दो उत्तराधिकारी
राज्यों को सत्ता सौंपने की बात तय हुई। यही योजना इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट का आधार
बनी। सुबह की सैर के समय गांधीजी ने राजेन्द्र प्रसाद से कहा, “क्या अब मैं बिहार लौट सकता हूं?” प्रसाद ने कहा, “अभी तो इसका प्रश्न ही नहीं उठ सकता।” नहाने के टब में लेटे-लेटे गांधीजी बोल पड़े, “भारत के बंटवारे से देश के भविष्य को हानि पहुंच
सकती है। विभाजन की योजना में मुझे बुराई के सिवा कुछ नहीं दिखाई देता।” शाम को राजकुमारी अमृत कौर गांधीजी से मिलने आईं।
उन्होंने सूचना दी, “कांग्रेस, मुसलिम लीग
और सिक्ख, तीनों दलों ने माउंटबेटन की योजना पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। ... लीग और कोई
स्वीकार करने को तैयार नहीं थी, इसलिए कांग्रेस के पास झुकने के सिवा कोई चारा नहीं
था।” गांधीजी ने कोई टीका नहीं की। गांधीजी ने गहरी
श्वास ली और धीमे स्वर में बोले, “भगवान उनकी रक्षा करें और उन्हें सद्बुद्धि दें।” उनके चेहरे पर दुख के भाव थे।
जिस बात का गांधीजी को भय था, वह हो ही गई। भारत का बंटवारा होने को था, लेकिन विभाजन ऊपर से लादा नहीं जा रहा था। पं. जवाहरलाल
नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल
और कांग्रेस कार्य-समिति के सदस्यों के बहुमत ने उसे स्वीकार किया था। इस बार की वार्ताओं
में गांधीजी ने भाग नहीं लिया था, लेकिन विभाजन के
विरुद्ध वह थे, इसे सभी जानते थे। गांधीजी
को इस निर्णय की बुद्धिमत्ता में गंभीर संशय था। जिन उत्पातों के डर के कारण
कांग्रेसी नेताओं और ब्रिटिश सरकार के लिए विभाजन नितान्त आवश्यक हो गया था, उन्हीं उत्पातों और हिंसा के कारण गांधीजी
विभाजन का दृढ़ता से विरोध कर रहे थे। उन्होंने कहा कि देश में गृह-युद्ध के खतरे
की वजह से विभाजन स्वीकार करने का अर्थ होगा, “इस बात को मान लेना कि यदि उन्मत्त होकर हिंसा
और उत्पात का यथेष्ट मात्रा में सहारा लिया जाए तो हर चीज प्राप्त की जा सकती है।”
6 जून को
प्रार्थना सभा को संबोधित करते हुए, वायसराय के घर
से लौटने के ठीक बाद, गांधीजी ने कहा
कि लोग उनसे पूछ सकते हैं कि वे वायसराय से क्या लेकर आए हैं। वे कुछ भी लेकर नहीं
आए थे, क्योंकि वायसराय के पास देने के लिए अपनी
सेवाओं के अलावा कुछ भी नहीं था, बशर्ते उनकी ज़रूरत हो। वायसराय ने उनसे
साफ़-साफ़ कह दिया था कि उनका एकमात्र उद्देश्य भारत से जल्द-से-जल्द चले जाना है, और पूरे भारत में शांति और व्यवस्था कायम रखना
है। उन्होंने जून 1948 में जाने का फ़ैसला किया था, लेकिन अब वे शायद इसी साल 15 अगस्त तक चले जाएंगे।
उन्होंने जाने का फ़ैसला क्यों किया? वे हमारे अहिंसक
संघर्ष से प्रभावित थे। भारत का मानना था कि ब्रिटिश शासन एक बुराई है। फिर भी, उसने अंग्रेजों को मारने की कोशिश नहीं की।
भारत ने बस उस बुराई के साथ असहयोग करने की कोशिश की, न कि बुराई करने वाले के साथ।
विभाजन के बारे
में इतना कडा रुख होने से यह खयाल किया जाता था कि शायद गांधीजी माउंटबेटन-योजना
का विरोध करेंगे। खुद वायसराय को भी यही आशंका थी। लेकिन जिस समझौते को
कांग्रेस और लीगी नेताओं एवं ब्रिटिश सरकार ने मंजूर कर लिया था, उसमें अडंगा डालने का गांधीजी
का कोई इरादा नहीं था। कांग्रेस की महासमिति जब माउंटबेटन-योजना पर विचार करने
बैठी तो गांधीजी ने विभाजन के विपक्ष में अपनी राय साफ-साफ बता दी, लेकिन पूरा ज़ोर लगाया योजना
को मंजूर कर लेने के पक्ष में। अपनी स्वतंत्र राय को अक्षुण्ण रखते हुए भी इस आत्मत्याग
के द्वारा गांधीजी ने उस समय कांग्रेस को फूट से बचा लिया। नेहरू, पटेल और कार्यसमिति ने इस योजना को मंज़ूरी दे
दी थी; उनकी यह मंज़ूरी
तब औपचारिक हो गई, जब 15 जून को नई
दिल्ली में बैठी अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस योजना के पक्ष में 153 और विरोध
में 29 वोट दिए, जबकि कुछ सदस्यों
ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
कांग्रेस ने गांधी का साथ क्यों छोड़
दिया
प्रस्ताव पारित
होने के बाद, कांग्रेस के
अध्यक्ष प्रोफ़ेसर जे. बी. कृपलानी ने एक संक्षिप्त भाषण दिया, जिसमें उन्होंने समझाया कि कांग्रेस ने गांधी
का साथ क्यों छोड़ दिया। कृपलानी ने कहा, 'हिंदू और मुस्लिम 'समुदायों' ने हिंसा की सबसे भयानक वारदातों में एक-दूसरे
से होड़ की है... मैंने एक कुआँ देखा है, जहाँ महिलाओं ने अपने बच्चों के साथ, कुल 107
लोगों ने, अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए उसमें कूदकर जान दे दी। एक दूसरी जगह, जो एक पूजा-स्थल था, पचास युवतियों को इसी कारण से उनके अपने ही
पुरुषों ने मार डाला... इन भयानक अनुभवों ने निस्संदेह इस मुद्दे के प्रति मेरे
दृष्टिकोण को प्रभावित किया है। कुछ सदस्यों ने हम पर आरोप लगाया है कि हमने यह
फ़ैसला डर के मारे लिया है। मैं इस आरोप की सच्चाई स्वीकार करता हूँ, लेकिन उस अर्थ में नहीं जिस अर्थ में यह लगाया
गया है। यह डर उन जानो के लिए नहीं है जो चली गईं, न ही विधवाओं के विलाप के लिए, न अनाथों की चीख के लिए, और न ही जलाए गए अनगिनत घरों के लिए। यह डर इस
बात का है कि अगर हम इसी तरह चलते रहे, एक-दूसरे से बदला लेते रहे और एक-दूसरे को
अपमानित करते रहे, तो हम धीरे-धीरे खुद को नरभक्षी जैसी स्थिति में, या उससे भी बदतर हालत में पहुँचा देंगे। हर नई
सांप्रदायिक लड़ाई में, पिछली लड़ाई के सबसे क्रूर और घिनौने कृत्य ही 'सामान्य' बात बन जाते हैं।' यही सारी हिंसा का कड़वा सच है। 'मैं पिछले तीस
सालों से गांधीजी के साथ हूँ,' कृपलानी ने आगे कहा। 'मैं चंपारण में
उनके साथ जुड़ा था। उनके प्रति मेरी वफ़ादारी कभी नहीं डिगी। यह कोई निजी वफ़ादारी
नहीं, बल्कि एक राजनीतिक
वफ़ादारी है। यहाँ तक कि जब मैंने उनसे असहमति जताई, तब भी मैंने उनकी
राजनीतिक सूझ-बूझ को अपने विस्तृत तर्कों से ज़्यादा सही माना। आज भी मुझे लगता है
कि अपनी असीम निडरता के साथ वे सही हैं और मेरा पक्ष कमज़ोर है। तो फिर मैं उनके
साथ क्यों नहीं हूँ? ऐसा इसलिए है क्योंकि मुझे लगता है कि उन्होंने
अभी तक इस समस्या से बड़े पैमाने पर निपटने का कोई रास्ता नहीं ढूँढ़ा है।' देश, गांधीजी की शांति
और भाईचारे की अपील पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था।
गांधीजी यह जानते
थे। 'अगर सिर्फ़
गैर-मुस्लिम भारत मेरे साथ होता,' उन्होंने कहा, 'तो मैं प्रस्तावित
बँटवारे को रोकने का रास्ता दिखा सकता था... कई लोगों ने मुझे विरोध का नेतृत्व
करने के लिए बुलाया है। लेकिन विरोध के अलावा, उनमें और मुझमें
कुछ भी एक जैसा नहीं है... क्या प्यार और नफ़रत एक साथ मिल सकते हैं?' गांधीजी को मिलने
वाले 95 प्रतिशत पत्र
अपमानजनक और नफ़रत भरे होते थे। हिंदुओं के पत्रों में पूछा जाता था कि वे
मुसलमानों के प्रति पक्षपाती क्यों हैं, और मुसलमानों के पत्रों में यह माँग की जाती थी
कि वे पाकिस्तान के निर्माण में बाधा डालना बंद करें।
आकाशवाणी
से विभाजन के प्रस्ताव की घोषणा
3 जून की रात को आकाशवाणी ने इस समाचार को प्रसारित
किया। उसके बाद नेताओं के भाषण प्रसारित किए गए। लॉर्ड माउंटबेटन ने रेडियो पर
लोगों को संबोधित किया; उनके बाद नेहरू ने अपनी बात कही। उसके बाद जिन्ना
और अंत में बलदेव सिंह बोले। इस प्रकार उस नाटक का पटाक्षेप हुआ जिसकी शुरुआत मुसलिम
लीग के सदस्यों के कैबिनेट मिशन की योजना के साथ जुड़ी शर्तों को पूरा किए बिना ही अन्तरिम
सरकार में शामिल होने के साथ हुई थी। घोषणा पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ मिली-जुली
थीं। ज़्यादातर हिंदू दुखी थे। नेहरू का संबोधन सबसे ज़्यादा मार्मिक था। उन्होंने
कहा कि वे सभी भारत के बँटवारे को नापसंद करते थे, लेकिन वे भारत को लगातार लहूलुहान होते नहीं
देख सकते थे। इन परिस्थितियों में, एक शल्य-चिकित्सा (सर्जिकल ऑपरेशन) को ही
प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। गांधीजी ने विभाजन को 'एक आध्यात्मिक त्रासदी' माना। उन्होंने खूनी संघर्ष की तैयारियों को
देखा। उन्होंने 'सैनिक तानाशाही' की संभावना देखी और उसके बाद 'आज़ादी को अलविदा'। उन्होंने कहा, 'मेरे जो सबसे करीबी दोस्त हैं, उन्होंने जो किया है या कर रहे हैं, मैं उससे सहमत नहीं हूँ।' प्यारेलाल के अनुसार,
“साधनों” ने एक बार फिर “शुभ आशयों” को निगल लिया और साध्य को विफल बना दिया। गांधीजी
ने कहा कि बत्तीस वर्षों की मेहनत का 'एक दुखद अंत' हुआ है। 15 अगस्त, 1947 को भारत आज़ाद हो जाएगा। लेकिन यह जीत एक
बेजान, राजनीतिक समझौता
मात्र थी: जहाँ पहले अंग्रेज बैठते थे, अब वहाँ भारतीय बैठेंगे; यूनियन जैक की जगह तिरंगा लहराएगा। यह आज़ादी
का एक खोखला ढाँचा भर था। यह एक ऐसी जीत थी जिसमें त्रासदी भी छिपी थी, एक ऐसी जीत, जिसमें सेना ने अपने ही सेनापति को हरा दिया
था।
माउंटबेटन ने 6 अक्टूबर, 1948 को रॉयल एम्पायर सोसाइटी को बताया कि भारत
में गांधी की तुलना 'रूज़वेल्ट या
चर्चिल जैसे किसी महान राजनेता से नहीं की जाती थी। लोग अपने मन में उन्हें
सीधे-सीधे मोहम्मद और ईसा मसीह की श्रेणी में रखते थे।' लाखों लोग महात्मा की पूजा करते थे; असंख्य लोग उनके पैरों को या उनके पैरों की धूल
को चूमने की कोशिश करते थे। वे उन्हें श्रद्धांजलि देते थे, लेकिन उनकी शिक्षाओं को नकार देते थे। वे उनके
शरीर को पवित्र मानते थे, लेकिन उनके व्यक्तित्व को अपवित्र करते थे। वे
उनके बाहरी रूप का गुणगान करते थे, लेकिन उनके मूल तत्व को पैरों तले रौंद देते
थे। वे उन पर तो विश्वास करते थे, लेकिन उनके सिद्धांतों पर नहीं।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
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