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मंगलवार, 7 जुलाई 2026

492. भारत के राजा वर्ग – देसी रियासतें

राष्ट्रीय आन्दोलन

492. भारत के राजा वर्ग – देसी रियासतें

1947

ग़ुलाम भारत के दो हिस्से थे – ब्रिटिश इंडिया और देसी रियासतें। ये रियासतें क़ानूनी तौर पर पूरी तरह स्वतंत्र थीं। पर ये अंग्रेज़ी प्रभुसत्ता को स्वीकारती थीं। उपमहाद्वीप में 565 देशी रियासतें थीं, जो कुल क्षेत्रफल का 48% थीं। ये प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के अधीन नहीं थीं, बल्कि स्थानीय राजाओं (जैसे- राजा, नवाब, महाराजा) द्वारा शासित थीं, जिन पर ब्रिटिश सर्वोच्चता (Paramountcy) का नियंत्रण था। 1857 की आज़ादी की लड़ाई में भारत के राजाओं ने कंपनी सरकार के ख़िलाफ़ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। लेकिन उसके बाद ये लोग सल्तनत के हाथ की कठपुतली बन गए थे। एक तरफ़ ये लोग वायसराय को सलामी ठोकते दूसरी तरफ़ प्रजा का शोषण करते।

राजाओं के शासन वाले इलाकों में हैदराबाद, मैसूर और कश्मीर जैसी भारतीय रियासतें शामिल थीं, जो आकार में कई यूरोपीय देशों के बराबर थीं, और साथ ही कई छोटी रियासतें भी थीं जिनकी आबादी हज़ारों में थी। इन सभी में एक बात समान थी कि चाहे वे बड़ी रियासतें हों या छोटी, सभी ने ब्रिटिश सरकार की सर्वोच्चता को स्वीकार किया था। इसके बदले में, अंग्रेज़ों ने राजाओं को उनकी निरंकुश सत्ता पर आने वाले किसी भी अंदरूनी या बाहरी ख़तरे से सुरक्षा का भरोसा दिया।

अधिकांश रियासतों में राजाओं और नवाबों का निरंकुश शासन था। जनता को सरकार चुनने या अपने विचार रखने का कोई अधिकार नहीं था। यहां की जनता की हालत बहुत ख़राब थी। जनता को सभा करने, संगठन बनाने या नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) जैसे बुनियादी अधिकार प्राप्त नहीं थे। यह धार्मिक, आर्थिक, सांस्कृतिक शोषण का शिकार थीं। आज़ादी के समय ये राजा लोग सरकार बहादुर के सहायक थे, ताकि इनका सामंतवाद टिका रहे। इन रियासतों में से कुछ जैसे हैदराबाद, मैसूर, कश्मीर का आकार तो काफ़ी बड़ा था, लेकिन कई रियासतें ऐसी थीं जिनकी कुल आबादी महज़ कुछ हज़ार रही होगी। इन रियासतों को अंग्रेज़ों का साथ मिलता था और यह उनकी सुरक्षा की गारंटी थी। अधिकांश जगह निरंकुश शासक थे। सारी सत्ता राजाओं या उनके एजेंटों के हाथ में केन्द्रीत थी। ब्रिटिश भारत की तुलना में रियासतों में किसानों का अधिक शोषण होता था। यहां पर ज़मीन पर लगने वाला टैक्स (लगान) अक्सर ब्रिटिश भारत के मुक़ाबले ज़्यादा होता था और वहाँ कानून का राज और नागरिक आज़ादी भी बहुत कम थी। अपनी विलासिता के लिए राजा-महाराजा राजकोष का मनमाना इस्तेमाल करते थे। राज्य के खजाने और राजस्व का एक बड़ा हिस्सा जनता के कल्याण के बजाय राजाओं के निजी शौक और ऐशो-आराम पर खर्च किया जाता था। जनता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक दृष्टि से काफी पिछड़ी थी। रियासतों में शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन और संचार की सुविधाएं ब्रिटिश प्रांतों की तुलना में बहुत कम थीं। अधिकांश राज्य आधुनिकीकरण से अछूते रह गए। सामंती व्यवस्था (Feudal System) के कारण किसानों को बेगार (बिना मजदूरी के काम) और अन्य उत्पीड़न का सामना करना पड़ता था।

बीसवीं सदी में भारतीय रियासतों की जो हालत हुई, उसके लिए ब्रिटिश सरकार ही ज़िम्मेदार थी। अंग्रेज़ों ने इन राजाओं को राष्ट्रीय आंदोलन को कमज़ोर करने के हमेशा इस्तेमाल किया। अंग्रेज़ों के दबाव में रियासतों में प्रायः कोई सुधार कार्यक्रम लागू ही नहीं किया जाता। समय के साथ राष्ट्रीय चेतना ने देसी रियासतों की जनता को भी प्रभावित किया। 1920 में छिड़े असहयोग आंदोलन के प्रभाव के कारण मैसूर, हैदराबाद, बड़ौदा, काठियावाड़, दक्कन, जामनगर, इंदौर आदि रियासतों में प्रजामंडल (स्टेट पीपुल्स कांफ़्रेस/रियासती जन सम्मेलन) का गठन हुआ। दिसंबर 1927 में इनका अखिल भारतीय सम्मेलन भी हुआ, जिसमें रियासतों के 700 राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इस पहल के लिए मुख्य रूप से बलवंतराय मेहता, मणिलाल कोठारी और जी.आर. अभ्यंकर ज़िम्मेदार थे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी 1920 सी. विजयराघवाचार्य की अध्यक्षता में हुए नागपुर सत्र में, प्रस्ताव पारित कर रियासतों के राजाओं से तुरंत उत्तरदायी सरकार के गठन की मांग की। कांग्रेस ने रियासतों की जनता को कांग्रेस का सदस्य बनने की अनुमति दे दी। हां कांग्रेस के सदस्य के रूप में रियासत के अंदर उन्हें राजनीतिक गतिविधियां शुरू करने की अनुमति नहीं थी। कांग्रेस चाहती थी कि रियासत की जनता ख़ुद संघर्ष के लिए संगठित हों। इस तरह कांग्रेस और देसी रियासतों के बीच कोई संपर्क नहीं था। 1929 में लाहौर कांग्रेस में अपने अध्यक्षीय भाषण में नेहरू ने घोषणा की, देसी रियासतें शेष भारत से अलग नहीं रह सकतीं। इन रियासतों की तकदीर का फैसला सिर्फ़ वहां की जनता ही कर सकती हैं। बाद के वर्षों में कांग्रेस ने राजाओं से रियासतों की जनता के मौलिक अधिकारों की बहाली की मांग की।

1935 के भारत सरकार अधिनियम ने संविधानिक रूप से देसी रियासतों को शेष भारत (ब्रिटिश इंडिया) से जोड़ा। विधानमंडल में रियासतों को प्रतिनिधित्व दिया गया। लेकिन रियासतों से प्रतिनिधि चुनने का अधिकार केवल राजाओं, महाराजाओं को ही दिया गया। अंग्रेज़ राजाओं के इन एजेंटों को राष्ट्रीय आंदोलन के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करते थे। कांग्रेस ने मांग की कि रियासतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए जनता ख़ुद अपना प्रतिनिधि चुने। 1937 में अनेक प्रांतों में कांग्रेस की सरकार गठित होने से रियासतों की जनता में एक नया आत्मविश्वास जगा, नई उम्मीदें जगीं और राजनीतिक गतिविधियां तेज़ हुईं। कांग्रेस अब सिर्फ़ विपक्ष की पार्टी नहीं रह गई थी, बल्कि सत्ताधारी पार्टी बन गई थी और उसमें आस-पास की भारतीय रियासतों में हो रही घटनाओं को प्रभावित करने की क्षमता थी।

जयपुर, कश्मीर, राजकोट, पटियाला, हैदराबाद, मैसूर, ट्रावणकोर, उड़ीसा आदि कई रियासतों में उत्तरदायी सरकार और सुधारों की मांग को लेकर रियासतों में कई आंदोलन छिड़े। अब कांग्रेस भी रियासतों में जनता से संघर्ष की अपील करने लगी थी। गांधीजी ने भी इसका समर्थन करते हुए 24 जनवरी, 1939 को 'टाइम्स ऑफ़ इंडिया' को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, मेरी राय में रियासतों में हस्तक्षेप न करने की कांग्रेस की नीति सही थी, क्योंकि तब जनता जागरूक नहीं हुई थी। अब जबकि जनता राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुकी है और संघर्ष के लिए तैयार है, पुरानी नीति पर चलना कायरता होगी। इसके बाद, मार्च 1939 में त्रिपुरी में कांग्रेस ने अपनी नई नीति बताने वाला एक प्रस्ताव पास किया: ‘रियासतों के लोगों में जो बड़ी जागृति आ रही है, उससे कांग्रेस द्वारा खुद पर लगाई गई पाबंदियों में ढील दी जा सकती है या उन्हें पूरी तरह हटाया जा सकता है, जिससे कांग्रेस और रियासतों के लोगों के बीच जुड़ाव और बढ़ेगा।’ साथ ही 1939 में, AISPC ने लुधियाना अधिवेशन के लिए जवाहरलाल नेहरू को अपना अध्यक्ष चुना, जिससे रियासती भारत और ब्रिटिश भारत के आंदोलनों के विलय पर मुहर लग गई। 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से रियासतों में भी आंदोलन का शंखनाद हुआ। रियासतों को भारतीय राष्ट्र का अभिन्न अंग मानने की मांग उठी।

जब देश स्वतंत्र हुआ, तो उस समय देश की 25 प्रतिशत जनता यानी 10 करोड़ लोग इन देसी राज्यों के अधीन थे। वैधानिकता की आड़ में अंग्रेज़ इन देसी राज्यों को पूर्ण आज़ादी देने की योजना बना रहे थे। यह नीति लागू हो जाती तो देश के दो नहीं बीसियों टुकड़े हो जाते। त्रावणकोर के राजा ने अपने राज्य में भाषण देने और जुलूस निकालने पर प्रतिबंध लगा रखा था। कश्मीर के महाराजा ने नेशनल कॉन्फ्रेन्स के नेताओं को जेल में बन्द कर रखा था और सार्वजनिक सभाओं पर रोक लगा दिया था। ऐसे कई राजा-महाराजा थे, जिनकी मंशा थी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद ये लोग स्वतंत्र हो जाएंगे और तब ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के सदस्य बनेंगे। गांधीजी का स्पष्ट मानना था कि स्वतंत्र भारत में जागीरदारी प्रथा का स्थान नहीं है। ये राजा चाहें तो लंदन, पेरिस में ऐश कर सकते हैं, लेकिन उनके मातहत प्रजा को ग़ुलाम रखने का उन्हें हक़ नहीं है। प्रजा का सार्वभौमत्व स्वीकार करना उन्हें अनिवार्य होगा।

देशी राज्यों की समस्या भारतीय नेताओं के सामने बहुत गंभीर थीं। भारतीय स्वाधीनता एक्ट में यह कहा गया था कि वे सारी संधियां और परंपराएं, जिनके द्वारा ब्रिटिश सरकार देशी राज्यों पर अपनी सार्वभौम सत्ता भोगती थीं, इस एक्ट से रद्द हो जाएंगी। राजाओं के राजकीय परिषद नरेन्द्र-मंडल का अध्यक्ष नवाब भोपाल सर हमीदुल्ला खान था। उसका इरादा था कि देश के विभाजन की अवस्था में 450 देसी राज्य अपनी हस्ती को प्रशस्त करेंगे। कुछ विचारशील राजाओं को भोपाल के नवाब का अभिभावक बनना बुरा लगा। मार्च 1947 तक 16 में से 10 बड़े राजाओं ने, जिन्हें यह लगा कि अलग-थलग रहकर स्वाधीन रहने में हमारा भविष्य उज्ज्वल बहीं है, संविधान सभा में अपने प्रतिनिधि भेज दिए। कुछ महत्वाकांक्षी राजाओं ने देखा कि भारत के दो भाग हो रहे हैं, तो उन्होंने सोचा कि अपने स्वेच्छाचारी शासन को बनाए रखने का एक और अवसर हमें मिल रहा है। उन्होंने घोषणा की कि चूंकि ये भाग सांप्रदायिक आधार पर बन रहे हैं इसलिए हम किसी में नहीं मिलेंगे। 11 जून को त्रावणकोर के दीवान सर सी.पी. रामस्वामी अय्यर ने 15 अगस्त को त्रावणकोर के स्वाधीन हो जाने के निर्णय की घोषणा की। 12 जून को हैदराबाद के निज़ाम ने घोषणा कर दी कि सार्वभौम सत्ता के अंत होते ही हैदराबाद भी स्वतंत्र हो जाएगा। त्रावणकोर में लोकतांत्रिक वैधानिक अधिकार पाने के लिए जनांदोलन चल रहा था। गांधीजी ने कहा, ज्यों ही सत्ता भारतीय हाथ में आई त्रावणकोर के दीवान चाहने लगे हैं कि वे भारतीय संघ में शरीक न हों। यह स्थिति असहनीय है। समय बदल गया है। यदि राजा लोग न चेते तो मिट जाएंगे। स्वाधीनता आ रही है। स्वतंत्र भारत में ये राजागण प्रभु या स्वामी बनकर नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के सेवक और संरक्षक बनकर ही रह सकते हैं। उन्हें भारतीय जनता की सार्वभौम सत्ता स्वीकार करनी होगी। रियासत अपने को स्वतंत्र घोषित कर सकें, सरदार पटेल की राजनीति और दूरदर्शिता के कारण ऐसी नौबत नहीं आ पाई। लॉर्ड माउंटबेटन ने भी घोषणा कर दी, कोई देशी राज्य अलग उपनिवेश के रूप में ब्रिटिश राष्ट्र-मंडल में प्रवेश नहीं कर सकता। इसका राजाओं पर अच्छा असर हुआ। भोपाल के नवाब ने नरेन्द्र मंडल के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके स्थान पर महाराजा पटियाला चुन लिए गए। उनके नेतृत्व में नरेन्द्र मंडल की स्थायी समिति ने यह प्रस्ताव पास किया कि नरेन्द्र मंडल का अब कोई उपयोग नहीं रहा, इसलिए उसका अंत कर देना चाहिए।

राजाओं को जुलाई, 1947 तक का समय दिया गया था, ताकि वे भारत या पाकिस्तान में सम्मिलित हो सकें। नेहरू ने घोषणा की कि जो रजवाड़े संविधान सभा में शामिल होने से इंकार करते हैं, उन्हें शत्रुतापूर्ण माना जाएगा। पटेल ने राजनीतिक विभाग के स्थान पर रियासतों का नया विभाग संभाल लिया था और वी.पी. मेनन उनके सचिव थे। भारतीय भूभाग के साथ रियासतों के एकीकरण का काम तेज़ी से शुरू कर दिया गया। छोटी-छोटी रियासतें पास वाले प्रान्तों में विलीन कर दी गईं। अलग से ये अपने प्रशासन के ख़र्च का बोझ नहीं उठा सकती थीं। राजाओं को अपनी पदवियां और प्रतिष्ठा में अपने महल और निजी सम्पत्ति रखने की अनुमति दे दी गई। उनके ख़र्च की रकम नियत कर दी गई। भारत में सम्मिलित होने वाले राजाओं ने संविधान समिति में अपने प्रतिनिधि भी भेजे। जुलाई के अंतिम सप्ताह में त्रावणकोर के महाराजा ने भारतीय संघ में मिल जाने का निर्णय सुना दिया।

यह राष्ट्रीय नेतृत्व, खासकर सरदार पटेल की ही काबिलीयत थी कि ब्रिटिश सर्वोच्चता के खत्म होने से बनी बेहद जटिल स्थिति — जिसने रियासतों को कानूनी रूप से स्वतंत्र बना दिया था — को इस तरह से संभाला गया कि तनाव काफी हद तक कम हो गया। ज़्यादातर रियासतें कूटनीतिक दबाव, ज़बरदस्ती, जन-आंदोलनों और इस एहसास के कारण कि आज़ादी कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है, विलय-पत्र (Instruments of Accession) पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार हो गईं। 14 अगस्त, 1947 तक लगभग सभी राजाओं ने निर्णय कर लिया था कि वे किस देश में सम्मिलित होंगे। अधिकांश राजाओं ने ‘विलय दस्तावेज़’ 'इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन' पर दस्तख़त कर दिए। तीन राजा अपवाद थे। जूनागढ़ के नवाब, कश्मीर के महाराजा हरिसिंह और हैदराबाद के निजाम ने किसी निर्णय का ऐलान नहीं किया था। वे एक वर्ष का समय चाहते थे।

हैदराबाद और राजकोट के मामले इस बात के अच्छे उदाहरण हैं कि कैसे संघर्ष के तरीके ब्रिटिश भारत की स्थितियों के हिसाब से विकसित हुए थे। साथ ही हम पाते हैं कि देसी रियासतों में अहिंसक सामूहिक सविनय अवज्ञा या सत्याग्रह जैसे तरीकों की वैसी उपयोगिता या प्रभावशीलता नहीं थी। नागरिक स्वतंत्रता और प्रतिनिधि संस्थाओं की कमी का मतलब था कि राजनीतिक गतिविधियों के लिए बहुत कम जगह थी। ब्रिटिश सरकार से मिलने वाली सुरक्षा ने रियासतों के शासकों को काफी हद तक जनता के दबाव का सामना करने में सक्षम बनाया। परिणाम यह हुआ कि इन रियासतों में आंदोलनों द्वारा हिंसक विरोध के तरीकों को अपनाने की प्रवृत्ति बहुत अधिक थी। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में, अंततः राज्य कांग्रेस ने भी हमले के हिंसक तरीकों का सहारा लिया, और आखिरकार, भारतीय सेना द्वारा ही निज़ाम को काबू में किया जा सका।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर

 

सोमवार, 29 जून 2026

491. गांधीजी का अंतिम जन्म दिवस

राष्ट्रीय आन्दोलन

491. गांधीजी का अंतिम जन्म दिवस

1947

गांधीजी के निरंतर प्रयास से, कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर, दिल्ली में शांति स्थापित हुई। लेकिन इस प्रयास में गांधीजी ख़ुद बीमार पड़ गए। 26 सितम्बर से वे जुकाम, कुक्कुर खांसी और ज्वर से पीड़ित थे। डॉक्टर ने आराम करने के लिए कहा, तो कहने लगे, आराम लेकर क्या करना? लोग इतने कष्ट में हो तो मैं कैसे काम रोक सकता हूं? 2 अक्तूबर को उनका 78वां, उनके जीवन का अन्तिम और आज़ाद भारत में पहला, जन्मदिन था।

मीराबहन ने उनके बैठने की जगह को सजा कर रखा था। फूलों के द्वारा उन्होंने ‘राम’ और ‘ओम’ बनाया था। पटेल, नेहरू और घनश्यामदास बिरला मौज़ूद थे। लेडी माउंट्बेटन भी आ गईं। उनके हाथ में बधाइयों वाले तार और पत्र थे। दुनिया भर से बधाई के संदेश आ रहे थे। गांधीजी ने पूछा, क्या शोक-संदेश भेजना अधिक उपयुक्त नहीं होता? सब जगह यही शोर मचा हुआ है कि हम मुसलमानों को भारतीय संघ में नहीं रहने देंगे। इसलिए मैं आपकी कोई भी बधाई स्वीकार करने में सर्वथा समर्थ हूं। बधाई किसलिए? क्या संवेदना प्रकट करना अधिक उपयुक्त नहीं होगा?

उस दिन उन्होंने उपवास रखा था। उनके अंदर न कोई उमंग, न उल्लास था। मन दुखी, और उनके बोल थे, भगवान से प्रार्थना करें कि बंटवारे की क़ौमी आग सदा के लिए बुझ जाए। अन्यथा दूसरा जन्म दिवस देखने की इच्छा नहीं है। अपने शुभचिंतकों को उन्होंने कहा, आप सब ईश्वर से प्रार्थना करें कि इस मौजूदा तबाही का ख़ात्मा हो या वह मुझे उठा ले। मैं नहीं चाहता कि भारत जब जल रहा हो, तो मेरा एक और जन्मदिन आए। ईश्वर की ऐसी लीला हुई कि वे दूसरा जन्म दिवस देख भी नहीं पाए। उन्होंने स्वीकार किया, इस निरंतर मातृघात के फलस्वरूप मेरी 125 साल जीने की इच्छा पूरी तरह मर चुकी है। मैं इसका असहाय साक्षी नहीं बनना चाहता। यह असहनीय पीड़ा उनकी नैतिक संवेदना की, अपनी जनता के प्रति उनके प्रेम की और उनकी आध्यात्मिक धरोहर के प्रति उनके गर्व की भावना की सूचक थी। सभी पिछली लड़ाइयों को जीतने के बाद वे इस आखिरी लड़ाई को हार रहे थे। इसने उनकी पीड़ा को और बढाया था।

आज़ाद हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी एक ही वर्षगाँठ देखी उस दिन प्रार्थना सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, मेरे लिए तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िंदा पड़ा हूँ। इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता है। शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूँ जिसकी जुबान से एक चीज निकलती तो करोडो मानते थे लेकिन आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं करेंगेऐसा कहते हैं। ऐसी हालत में हिन्दुस्तान में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िंदा रह कर क्या करूँगा?…..”

जीवन भर हर विषम परिस्थितियों में जीतने वाले गांधीजी अपनी इस  आख़िरी लड़ाई को हार रहे थे। उन्होंने कहा था, मेरी सत्य और अहिंसा की धारणा और व्यवहार में कोई सूक्ष्म दोष अवश्य है, जिसका यह नतीजा है। मैंने कमज़ोरों की अहिंसा को, जो किसी भी तरह अहिंसा नहीं है, सच्ची अहिंसा समझा। मैं अंधा था। मैं देख नहीं सकता था। सरदार से उन्होंने कहा, मैंने ऐसा कौन सा पाप किया होगा कि ईश्वर ने मुझे ये तमाम भयंकर घटनाएं देखने के लिए ज़िन्दा रखा है? आकाशवाणी ने गांधीजी  की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक विशेष कार्यक्रम रखा था। किसी ने पूछा आप रेडियो नहीं सुनेंगे? गांधीजी ने कहा, नहीं, मुझे ‘रेडियो’ से ‘रेंटियो’ अधिक पसंद है। चरखे की गूंज मुझे अधिक मीठी लगती है। उसमें मुझे मानवता का शान्त और करुणापूर्ण संगीत सुनाई देता है। गुजराती में चरखे को रेंटियो कहते हैं। गांधीजी ने जन्मदिन का कोई संदेश देने से इंकार कर दिया।

आगे बढ़ने से पहले एक मज़ेदार वाकए पर एक नज़र डाल ली जाए। हिन्दू पंचांग के अनुसार गांधीजी का जन्म दिन 11 अक्तूबर को पड़ रहा था। दिल्ली के गुजरातियों ने इस दिन गांधीजी का न सिर्फ़ जन्मदिन मनाने की ठानी बल्कि उन्हें उनके स्वागत समारोह में थैली भेंट करने का भी आयोजन किया था। हालांकि गांधीजी अभी भी खांसी और ज्वर से पीड़ित थे, फिरभी उन्होंने उस आयोजन में जाने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया। सरदार उन्हें सभा में ले जाने के लिए आए। उस समय गांधीजी पर खांसी का दौरा आ रहा था। सरदार ने विनोद किया, आपके लोभ का कोई अन्त नहीं है! थैली लेने के लिए आप मृत्युशय्या भी छोड़कर चले जाएंगे! आप अपनी खांसी ठीक कर लेंगे, तो सब बातें अपने आप ठीक हो जाएंगी। लेकिन आप सुनते कहां हैं? सभा में सरदार से भाषण देने के लिए कहा गया, तो उन्होंने फिर विनोद किया। यह क्या मेरा जन्मदिन है जो मैं बोलूं? आपकी थैली गांधीजी लें और बोलने का काम मैं करूं – यह बड़े अन्याय की बात है! देखिए इस बूढ़े में बीमारी के बावज़ूद आपका रुपया छीनने के लिए फिर से शक्ति आ गई है। अब आप इन पर दया कीजिए और इन्हें आराम करने दीजिए। गांधीजी भी कहां चुप रहने वाले थे, बोले, सरदार फांसी के तख़्ते पर चढ़ते समय भी हंसी से बाज़ नहीं आएंगे।

कलकत्ता से गांधीजी की मदद करने के लिए सुहरावर्दी आए थे। लेकिन दिल्ली में उनका कोई खास प्रभाव नहीं था। गांधीजी ने उससे कहा, अगर तुम भारतीय नागरिक हो, तो पाकिस्तान जाकर जिन्ना से कहो हिन्दुओं के दुखों का प्रतिकार करे। ऐसे अत्याचारों का सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हिंदू सिंधियों के ऊपर आतंक मचा था। वे वहां से पलायन कर रहे हैं। सुहरावर्दी कराची गए। 21 सितंबर को पाकिस्तान के नेताओं से लाहौर में चर्चा की। दूसरी वार वे अक्तूबर में भी पाकिस्तान गए और जिन्ना से बातचीत की। बहुत कुछ लाभ तो नहीं हुआ, फिर भी कोशिश तो ज़रूर की गई। वस्तुस्थिति तो यह थी कि नवजात पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना के वायदे कि ‘पाकिस्तान मुसलमानों की मातृभूमि होगी’ के विपरीत वहां के प्रधानमंत्री ने यह घोषणा की कि ‘पूर्व पंजाब  के सिवा भारत के किसी भाग के मुसलमानों को पाकिस्तान में घुसने नहीं दिया जाएगा।’ जिन्ना अब अवसरवादियों की दया पर निर्भर रहने लगा था। उदार और प्रगतिशील विचारों वाला जिन्ना शरीअत पर आधारित धार्मिक राज्य का जनक बना। वह धर्मान्ध मुल्लाओं के हाथ की कठपुतली बन गया था। गवर्नर जनरल जिन्ना बीमार रहने लगा था।

एक दिन तो प्रार्थना सभा में गांधीजी ने यहां तक कह दिया, अगर ऐसा चलता रहा तो दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाएगा। लोगों को गांधीजी के मुंह से युद्ध की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। किसी विदेशी पत्रकार ने गांधीजी से कहा, आपको मज़ाक़ में भी युद्ध का उल्लेख नहीं करना चाहिए था। गांधीजी ने कहा, युद्ध गंभीर विषय है। मैंने मज़ाक़ किया ही नहीं था। ऐसी गंभीर स्थिति में युद्ध की संभावना को अनदेखा करना अपराध हो जाएगा। मैं अहिंसा का पुजारी हूं, लेकिन हिंसा में भी सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय, औचित्य-अनौचित्य के पक्ष होते ही हैं। और अन्याय का विरोध करना मेरा कर्त्तव्य है।

शरणार्थियों की सेवा करना इन दिनों उनका प्रमुख उद्देश्य था। उन्होंने डॉ. सुशीला नय्यर को कुरुक्षेत्र भेज दिया जहां वे लोगों को चिकित्सीय सुविधा देतीं। सर्दियों के दिन आ रहे थे। शरणार्थियों को खुले आकाश के नीचे या तंबुओं में क्या दशा होगी उससे गांधीजी काफी चिन्तित थे। उन्होंने समाज से अपील की कि कंबल, गरम कपड़े और अन्य चीज़ों का दान करे। लोगों ने दिल खोलकर दान किए। गांधीजी की उचित व्यवस्था से दान की वस्तुएं सही हाथों में पहुंची। पानीपत के शरणार्थी शिविर की कुव्यवस्था देखकर उन्हें काफी धक्का पहुंचा। उन्होंने इसे सरकारी निकम्मेपन की निशानी कहा और वहां की सरकार को खूब फटकार लगाई।

लॉर्ड माउंटबेटन कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर जाने वाला था। लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन को राजकुमारी एलिजाबेथ की शादी, जो उनके भतीजे से होने वाली थी, में भाग लेने लंदन जाना था। जाने से पहले वे 9 नवंबर, 1947 को गांधीजी से मिले। गांधीजी को लगा कि नवदंपती के लिए उन्हें कुछ सौगात भेजनी चाहिए। उन्होंने अपने हाथ के कते सूत से एक टेबुल क्लॉथ बनवाया और माउंटबेटन को दिया। माउंटबेटन दंपत्ति ने बकिंघम पैलेस में जाकर गांधीजी की भेंट उन्हें दी। महारानी एलिजाबेथ ने उस मेजपोश को सहेजकर रखा। उन्होंने माउंटबेटन के द्वारा कहलवाया, गांधीजी द्वारा दिए गए इस सम्मान से मैं कृतज्ञ हूं। यह उनका मेरे प्रति हार्दिक स्नेह है। मैं इसे सदा सुरक्षित स्थान पर रखूंगी। चाय के मेज़पोश की तरह इसका इस्तेमाल नहीं करूंगी। यह एक मूल्यवान भेंट है। उससे भी ज़्यादा बहुमूल्य इसका ऐतिहासिक संदर्भ है।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का यह कितना अच्छा चरमोत्कर्ष था! इसने कटुता और ज़हर नहीं फैलाया बल्कि मित्रता और सद्भावना की सुगंध फैलाई।

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मनोज कुमार

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संदर्भ : यहाँ पर

 

बुधवार, 24 जून 2026

490. दिल्ली में उपद्रवों का वहशियाना तांडव

राष्ट्रीय आन्दोलन

490. दिल्ली में उपद्रवों का वहशियाना तांडव

1947

कलकत्ता और बंगाल में वातावरण अब शांत था। अपने शांति-मिशन के काम को ज़ारी रखने के लिए वे पंजाब यात्रा के लिए निकल पड़े। पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत और सिंध में आग की भीषण लपटें उठ रही थीं। रावलपिंडी में हिन्दू क़त्लेआम के समाचार आ रहे थे। अमृतसर आदि शहरों में मुसलमानों के साथ मार काट शुरू हो गया और फिर लाहौर में यही सब होने लगा। पंजाब के दोनों तरफ मुख्य रूप से यह सिखों और मुसलमानों के बीच उन्माद का चरमोत्कर्ष था। लगभग एक करोड़ लोग अपना घर-बार छोड़ कर आसरा ढूँढने के लिए सरहद के इस पार आ रहे थे। भीषण आपाधापी थी। कैम्पबेल ने अपनी डायरी में लिखा था, मैं पतली सड़कों पर रेंगते हुए, शरणार्थियों की साठ मील से अधिक लंबी कतारों के ऊपर से उड़ा जिसमें परिवार अपना सब-कुछ गाड़ियों पर लादे चले जा रहे थे।

7 सितंबर, 1947 को गांधीजी रात को नौ बजे बेलूर स्टेशन से विदा हुए। उन्हें विदा करने मुख्यमंत्री प्रफुल्ल घोष और सुहरावर्दी आए थे। जब ट्रेन छूटी तो सुहरावर्दी की आंखों से अश्रु की धारा बह रही थी। जाना तो वे पंजाब चाह रहे थे लेकिन जा न पाए। उनकी इच्छा थी कि पंजाब में सांप्रदायिक घृणा की कौंधती लपटों पर ‘पानी की एक बाल्टी डाल सकें’। लेकिन जब 9 सितंबर को कलकत्ता मेल से गांधीजी दिल्ली पहुंचे तो उन्हें पता चला कि पंजाब को हिला देने वाले पागलपन का केन्द्र अब दिल्ली था। स्टेशन पर सरदार पटेल उन्हें लेने आए थे। सरदार ने रास्ते में गांधीजी को बताया, उच्छृंखल हिंसा और भीषण उपद्रवों का वहशियाना तांडव दिल्ली को अपनी जकड़ में लिया हुआ है और इसके कारण वहां का कामकाज ठप्प हो गया है। देश की राजधानी दिल्ली सुलग रही है। नेहरू के नेतृत्व में सरकार ने निष्पक्षता से और बड़ी फुर्ती से काम किया है। सेना के ज़ोर पर शहर में श्मशान सी निर्जीव शांति छाई हुई है।

बिरला भवन

4 सितम्बर से राजधानी में साम्प्रदायिक दंगे फूट पड़े थे। शहर में 24 घंटे का कर्फ़्यू लगा हुआ था। सेना बुला ली गई थी। सड़कों पर लाशें बिछी हुई थीं। इस बार गांधीजी को भंगी बस्ती की झोंपड़ी में नहीं लाया गया। भंगी कॉलोनी का उनका घर शरणार्थियों को दे दिया गया था, इसलिए कलकत्ते से लौटने के बाद गांधी जी को घनश्यामदास बिरला के नई दिल्ली के बिरला भवन ले जाया गया। सरकार की सारी सुख-सुविधाओं से लैस बिरला भवन में गांधीजी ख़ुद को कलकत्ते से अधिक असहाय महसूस कर रहे थे। दिल्ली पर पुलिस और सेना द्वारा थोपी गयी शांति से गांधीजी भला कैसे संतुष्ट हो सकते थे। वह हिन्दू और मुसलमानों के दिल से हिंसा को दूर करना चाहते थे। काम बड़ा ही दुसाध्य था। राजधानी में कई शरणार्थी कैम्प थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान से भाग कर आये हिन्दू और सिख शरणार्थी भरे थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान सीमा के पार जाने की प्रतीक्षा में पड़े थे।

मुसीबत की जो कहानियां गांधीजी ने सुनी, उनसे उनकी अन्तरात्मा को भारी आघात पहुंचा। अन्न की दुकानें लूट ली गई थीं। खाने-पीने का सामान मिलना मुश्किल हो गया था। डॉ. जोशी जैसे मशहूर सर्जन, जो एक मुसलमान पेशेण्ट देखने जा रहे थे, को एक मुसलमान घर से गोली चलाकर मार दिया गया था। समाज-विरोधी तत्वों का बोलबाला था। हिंसा अचानक शुरू हुई थी और कुछ ही दिनों में इसने इतना विकराल रूप धारण कर लिया था कि जब तक कुछ हो पाता तब तक मानवीयता के तमाम मूल्य ताक पर रख कर बर्बरता ने दोनों तरफ के कमजोर अल्पसंख्यकों के साथ नंगा नाच खेला था। पश्चिम पंजाब से आने वालों शरणार्थियों का तांता लगा हुआ था। वे भयंकर कहानियां लेकर आए थे। गांव के गांव बरबाद कर दिए गए थे। औरतों की बेइज़्ज़ती कर दी गई थी और उन्हें लूट के माल की तरह बांटा गया था। कभी-कभी तो खुले आम बेचा गया था। शिशुओं को भाले से गोद-गोद कर मार डाला गया था। ज़बरदस्ती धर्म-परिवर्तन किया गया था। निराश्रितों के काफिले और ट्रेनों पर हमले किए गए थे। दिल्ली में जो कुछ हुआ, वह सीधे-सीधे इन्हीं कहानियों का परिणाम था। साम्प्रदायिक ज़हर पुलिस और सेना में भी घुस गया था। गांधीजी का दिल आर्तनाद कर उठा, क्या दिल्ली के नागरिक पागल हो गए हैं? क्या उनमें कुछ भी इंसानियत नहीं बची है?

संयुक्त रक्षा परिषद की सलाह पर पंजाब बाउंड्री फ़ोर्स को 31 अगस्त की रात से समाप्त कर दिया गया था। सीमा पर शांति बहाली के लिए अब दोनों देशों की कानून-व्यवस्था का उत्तरदायित्व था। माउंटबेटन की भी सारी जिम्मेदारियां समाप्त हो गई थीं, और वह शिमला में विश्राम करने चला गया था। दिल्ली की घटनाओं के कारण उसने अपनी छुट्टियां रद्द कर दी और 5 सितम्बर को दिल्ली आ गया। माउंटबेटन की अध्यक्षता में आपातकालीन समिति की बैठक हुई। दिल्ली को अशान्त क्षेत्र घोषित कर दिया गया। दंगाइयों को देखते ही गोली मार देने के आदेश दिए जा चुके थे। दिल्ली में हर चौथा आदमी शरणार्थी था। लिखित इतिहास में सबसे बड़ा पलायन हो रहा था। पंजाब की दोनों सीमाओं के पार कोई एक करोड़ लोग इधर से उधर आ-जा रहे थे। शरणार्थियों के आवागमन के लिए लगभग सभी प्रकार के यातायात संसाधनों का उपयोग किया जा रहा था। 27 अगस्त से 6 नवम्बर के बीच 673 ट्रेनें चलाई गईं, जिन्होंने 27,99,000 लोगों को अपने गन्तव्य तक पहुंचाया था। 4,27,000 से अधिक ग़ैर-मुसलमान और 2,17,000 से अधिक मुसलमानों को 1,200 मोटर वाहनों से ढोया गया था। 963 हवाई जहाजों द्वारा 27,000 लोगों को सीमा पार कराया गया। लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। इससे कहीं अधिक लोग सड़क के रास्ते पैदल आए। साफ-सफाई की पर्याप्त सुविधा न रहने के कारण महामारी का ख़तरा बना हुआ था। सामने आते और विपरीत दिशा में जाते शरणार्थियों के कारवां पर हिंसक वारदात होने की संभावना बनी रहती थी। सीमा के दोनों ही तरफ़ अल्पसंख्यकों के ऊपर भीषण अत्याचार हो रहे थे। सरकार और कांग्रेस के नेताओं के सामने सिर्फ़ एक आशा की किरण थीमहात्मा गांधी! क्या वो कलकत्ता वाला कोई चमत्कार कर दिखाएंगे?

दिल्ली को सांप्रदायिक आग की लपटों में जलता छोड पंजाब जाने का कोई तुक गांधीजी की समझ में न आई। सरकार ने स्थिति को संभालने में काफी मुस्तैदी दिखाई थी। लेकिन पुलिस और सेना के ज़ोर से थोपी हुई शांति से गांधीजी भला कैसे संतुष्ट हो सकते थे! लोगों के दिलों से ही हिंसा और घृणा को मिटाना होगा। काम बहुत ही कठिन था। राजधानी में कई शरणार्थी कैंप थे। कुछ में पश्चिमी पाकिस्तान से भागकर आए हुए हिन्दू और सिख शरणार्थी भरे हुए थे और कुछ में दिल्ली से भागने वाले मुसलमान सीमा के पार जाने के इंतज़ार में पडे थे। गांधीजी के लिए यहां जख्मों पर करुणा का मरहम लगाने के सिवा कुछ नहीं बचा था। दिल्ली में अपने पहले सार्वजनिक वक्तव्य में गांधीजी ने कहा, मुझे मुस्लिम, सिख या हिंदू नेताओं में कोई नज़र नहीं आता है जो मुझे अपने-अपने समुदाय के शरारती तत्त्वों पर नियंत्रण करने में सहायता दे सके। लेकिन उनका यह विश्वास अडिग बना रहा कि विद्वेष और हिंसा की उत्तरोत्तर वृद्धि का अन्त केवल प्रेम और अहिंसा से ही हो सकता है। उन्होंने कहा, जब तक दिल्ली में फिर से शांति बहाल नहीं हो जाती, तब तक मैं इस स्थान को नहीं छोड़ सकता।

10 सितम्बर से गांधीजी ने शहर के उपद्रव पीड़ित भागों का दौरा करना शुरू कर दिया। पहले ही दिन उन्होंने इकतालीस मील का दौरा किया। उस दिन का आरंभ उन्होंने हुमायूं मक़बरे के पास अरब की सराय से किया। वहां पर अलवर और भरतपुर से आए मुसलमान पाकिस्तान ले जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। मुसलमानों ने कहा, हममें से कोई भारत से जाना नहीं चाहता। गांधीजी ने उनकी सहायता करने का वचन दिया। फिर वे ओखला स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय गए। आसपास के गांवों के मुसलिम लोगों ने वहां शरण ले रखी थी। वहां के उपकुलपति डॉ. ज़ाकिर हुसैन थे। कुछ दिनों पहले ही उनपर भी जालंधर में भीड़ का जानलेवा हमला हुआ था। गांधीजी ने कहा, यदि डॉ. ज़ाकिर हुसैन जैसे पुरुष भी सुरक्षित नहीं हैं, तो भारत में जीकर क्या करना? यहां के बाद वे दीवान हॉल गए जहां हिन्दू निराश्रितों का शिविर था। लोगों ने गांधीजी को कठोर हृदय का व्यक्ति कहा और आरोप लगाया कि आपको हिन्दुओं की अपेक्षा मुसलमानों से अधिक सहानुभूति है। मुसलमान नंबर एक कह कर उन पर लांछन लगाया गया कि उनको पीड़ित हिन्दुओं की चिंता कम थी बनिस्बत उन लोगों की जिन्होंने जानबूझकर इस पीड़ा को जन्म दिया था। वे हिन्दू ‘पंचमांगी’ हैं, मोहनदास गाँधी नहीं बल्कि मुहम्मद गांधी हैं। कुछ दिनों पहले तक उनके देशवासी ने उनके ‘सनकीपन के बावजूद ख़ुशी से उनका अनुसरण किया था। अब आज़ादी मिल चुकी थी। अब इस बूढ़े को क्यों बर्दाश्त किया जाए? वह अपनी उपयोगिता खो चुका था।

गांधीजी ने कहा, आपको नाराज़ होने का हक़ है। लोग कितने भी नाराज़ हो जाएं, उन्हें मालूम था, यह बूढ़ा सबका दोस्त है, किसी का दुश्मन नहीं। फिर गांधीजी रेलवे स्टेशन के पास वेवेल कैन्टीन के शिविर में गए। यहां मुसलमान निराश्रित थे। अन्त में गांधीजी किंग्सवे के निराश्रित शिविर गए। किंग्सवे कैंप की प्रार्थना सभा में जब कुरान की आयतें पढी जाने लगी तो लोग उग्र हो गये क्योंकि कुरान और इस्लाम के नाम पर ही मुस्लिम गुंडों ने वहाँ महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था। गांधीजी की कार पर पथराव भी हुआ था।

11 सितंबर को गांधीजी राजकुमारी अमृत कौर और सुशीला नायर के साथ इर्विन अस्पताल गए। दिन रात वहां मरीज़ों का तांता लगा हुआ था। डॉक्टर और कर्मचारी बुरी तरह थके हुए थे। गांधीजी ने हर बेड के पास खड़े होकर रोगी और उसके रिश्तेदारों को शांति और सांत्वना दी। गांधीजी के लौटते ही उस अस्पताल पर गोलियों से हमला हुआ। अस्पताल के चारों तरफ़ मुसलमानों की बस्तियां और दफ़्तर थे। दिल्ली की ज़्यादातर पुलिस मुसलिम थी। उनके बहुत से सिपाही हथियार लेकर भाग गए थे। बंगाल और मध्यप्रदेश से पुलिस बुलाई गई। मुसलमानों के घरों से छापे में बड़ी भारी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद मिले। ऐसे ही अस्त्र-शस्त्र हिन्दुओं के घरों से भी बरामद हुए। कट्टरपंथियों का खुला खेल चल रहा था, लोग बहकावे में आ रहे थे।

12 सितम्बर को शुक्रवार का दिन था। गांधीजी जामा मस्जिद देखने गए। वहां पर बहुत गंदगी थी। चप्पल उतारकर गांधीजी सीढ़ियों पर नंगे पैर चले। उस दिन जुम्मे की नमाज़ थी। बहुत से लोग जमा हुए थे। इसके अलावा उस मस्जिद में 5,000 निराश्रित भी थे। गांधीजी ने गंदगी की ओर उनका ध्यान दिलाया। शाम को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अधिकारी गांधीजी से मिलने आए। यह बात बहुत प्रचलित थी कि शहर के विभिन्न भागों में हुए हत्याकांडों में आर.एस.एस. का प्रमुख हाथ था। जो व्यक्ति गांधीजी से मिलने आया था, गांधीजी से बोला, हमारा संघ किसी का शत्रु नहीं है। वह हिन्दुओं की रक्षा के लिए है, मुसलमानों को मारने के लिए नहीं। हम शांति के समर्थक हैं। गांधीजी ने कहा, आपको एक सार्वजनिक वक्तव्य निकालना चाहिए और अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का खंडन करना चाहिए। साथ ही मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों की निन्दा करनी चाहिए। कुछ दिनों के बाद आर.एस.एस. का एक सम्मेलन भंगी बस्ती में हो रहा था। संघ की ओर गांधीजी को वहां जाने का निमंत्रण मिला। गांधीजी गए। गांधीजी का स्वागत करते हुए संघ के नेता ने कहा, गांधीजी हिन्दू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष हैं। जवाब में गांधीजी ने कहा, मुझे हिन्दू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिन्दू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कार वादी है। हिन्दू धर्म की विशिष्टता यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। ... मुझे आपके आश्वासन से ख़ुशी है कि आपकी नीति इस्लाम के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं है।

गांधीजी ने साफ कहा कि हम यहाँ के मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं भेज सकते। हम वैसा नहीं करेंगे जैसे पाकिस्तान ने किया। गांधीजी की इच्छा थी कि यदि यहां के हालात सुधरे तो वे पाकिस्तान जाकर जिन्ना से पूछेंगे कि तुम्हारे उस वादे का क्या हुआ जिसमें तुमने पाकिस्तान में हिन्दुओं के समान अधिकार की बात कही थी। नित्य संध्या समय अपनी प्रार्थना-सभा में वह इस प्रश्न की चर्चा करते। वह इस बात पर जोर देते कि बदला लेने से समस्या हल नहीं होगी। लोगों को शिक्षित करने के प्रयास में उन्होंने अपने को थका डाला। वे रोज लोगों की शिकायतें सुनते, दुख दूर करने के उपाय सुझाते, रोज के अनगिनत मिलने वालों में किसी की पीठ ठोंकते, किसी को झिड़कते, शरणार्थी कैम्पों का चक्कर लगाते और स्थानीय अधिकारियों से भी मिलते रहते थे। भाग दौड़ और मानसिक पीड़ा के कारण गांधीजी बीमार पड़ गये थे। उन्होंने पैंसिलीन तो क्या देशी दवा भी नहीं ली और आराम भी नहीं किया। कहते थे- जब जनता कष्ट से है तब मैं कैसे आराम कर सकता हूं।

मुस्लिम शरणार्थी कैम्प में जाते और वहां की प्रार्थना सभाओं में गांधीजी कहते, जो हुआ सो हो गया, उसे भूल जाओ। अब दोस्ती का हाथ बढ़ाओ। भारत में रहने वाले मुसलमान भी देश के उतने ही नागरिक हैं। उन लोगों को हथियार लौटा देने चाहिए और तिरंगे का सम्मान कर शांति से रहना चाहिए। पाकिस्तान भेजे जाने का इंतज़ार कर रहे मुसलमानों से मिलते, उन्हें भारी दुख झेल रहे दृश्यों का सामना करना पड़ता। लोगों की बदले की भावना का परिणाम देख कर उनका दिल आर्तनाद करता, क्या दिल्ली के नागरिक पागल हो गए हैं? क्या उनमें कुछ इंसानियत नहीं बची है? पाकिस्तान चाहे कुछ करे, दिल्ली को सभ्य व्यवहार का झंडा ऊपर ही रखना होगा। लेकिन लगता था उनकी वाणी में वह पहले वाला जादू नहीं रह गया था।

हिंदू शरणार्थी कैम्प में भी जाते। लेकिन राजधानी में ही शरणार्थियों की आपत्तियों के कारण उनकी सभाएँ अस्त-व्यस्त होने लगीं। बहुत सारे शरणार्थियों को उनकी सभाओं में कुरान की आयतों को पढ़ने की प्रथा पर आपत्ति थी। इन्हीं आयतों के साथ हिंदू महिलाओं पर बलात्कार हुआ था। हम आपको क़ुरान पढ़ने नहीं देंगे। आप मुसलमान नंबर एक हैं। आपको पीड़ित हिंदुओं की चिंता ही नहीं है। बल्कि आपको उनकी चिंता अधिक है जिन्होंने जानबूझकर इन पीड़ाओं को जन्म दिया है। आप मोहनदास गांधी नहीं, आप मुहम्मद गांधी हैं। गांधी मुर्दाबाद के नारे लगते। गांधीजी ने उन लोगों से कहा, कोई धर्म बुरा नहीं होता। उनके अनुयायिओं की दुर्मति के कारण धर्म का द्रोह करना ठीक नहीं है। आज़ादी मिल जाने के बाद क्या लोगों को यह लग रहा था कि गांधी अपनी उपयोगिता खो चुका?

साम्प्रदायिकता का ज़हर इतना फैला था कि उसको निरस्त करना कठिन था। कई लोग इस बात पर नारे लगाने लगते थे कि गाँधीजी उन हिंदुओं और सिखों की पीड़ा के बारे में बात क्यों नहीं करते जो अभी भी पाकिस्तान में फँसे हुए हैं। डी.जी. तेंदुलकर के शब्दों में, गाँधी जी पाकिस्तान में भी अल्पसंख्यक समुदाय के कष्टों के बारे में समान रूप से चिंतित थे। उन्हें राहत प्रदान करने के लिए वे वहाँ भी जाना चाहते थे। लेकिन वहाँ वे किस मुंह से जा सकते थे जबकि दिल्ली में ही वे मुसलमानों को पूरी सुरक्षा का आश्वासन नहीं दे पा रहे थे।

एक कैम्प के मुस्लिम शरणार्थी से जब गांधीजी मिलने गए तो वहां की भीड़ बिफर गई। लोग मरने-मारने पर उतारू हो गए। लेकिन निर्भय, करुणा की मूर्ति गांधीजी ने उन उत्तेजित लोगों को शांत किया, समझाया मैं तो इन मुसलमानों को बचाने या फिर यहीं मर जाने के लिए ही दिल्ली आया हूं। लोगों का रोष पिघला। लेकिन इन सब घटनाओं के बीच कई ऐसे भी वाकयात हुए जिनमें कई मुसलमानों ने हिंदू-सिखों को बचाया, वैसे ही अनेक हिंदुओं ने मुसलमान पड़ोसियों की रक्षा की। लेकिन अव्यवस्था अधिक फैली हुई थी। इस सारी अव्यवस्था में पुलिस की क्रूरता और अनुशासनहीनता और भी भयानक थी। वह आग में घी डालने का काम कर रही थी।

13 सितम्बर को साम्यवादी नेता पी.सी. जोशी गांधीजी से मिलने आए थे। साम्यवादी गांधीजी की लगातार निन्दा करते रहते थे। उन पर यह आरोप लगाते थे कि गांधीजी क्रांति को शुरू करके अपने मूल ‘पूंजीवादी दृष्टिकोण’ के कारण अहिंसा का सहारा लेकर क्रांति को उसके ‘तर्क-संगत’ अन्तिम परिणाम तक नहीं आने देते थे। साम्यवादियों का कहना था कि यदि  वे इसे अंतिम परिणाम तक आने देते तो पूंजीपतियों को हानि होती। इसलिए वे इसे बीच में ही रोक देते। ऐसी मान्यता रखने वाले समूह के नेता जोशी गांधीजी से बोले, लोकतांत्रिक शक्तियां साम्प्रदायवाद से लड़ने के लिए तैयार हैं। आप हमें कूच का हुक्म दीजिए। हम आपके आदेशों का पालन करेंगे। गांधीजी ने कहा, मैं तो अपने को बिना सेना का सेनापति मानता हूं। मैं किसे कूच का हुक्म दूं? जोशी बोले, यहां सौगुना अधिक ख़राब हालत वाले कलकत्ते में आपने चमत्कार कर दिखाया। वहां आपके साथ शांति सेना थी, हम यहां आपको होमगार्ड देंगे। आपने राष्ट्र को बनाया है, अब इसे आगे बढ़ाइए।  गांधीजी बोले, मैंने ही राष्ट्र को बनाया और मैंने ही इसे बिगाड़ा भी है। मैं आपकी सलाह से लाभ उठाने का प्रयत्न करूंगा। हमेशा गांधीजी की नीतियों की आलोचना करने वाले उनसे नेतृत्व का आग्रह क्यों कर रहे थे? ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के समय अंग्रेज़ों का साथ देकर साम्यवादियों ने अपनी लोकप्रियता खो दी थी। उसे फिर से प्राप्त करने के लिए वे गांधीजी के नाम का उपयोग करना चाहते थे। लेकिन मौक़ापरस्तों को गांधीजी ख़ूब पहचानते थे।

उस दिन गांधीजी पुराने क़िले का मुसलिम निराश्रित शिविर गए। वहां क़रीब 75,000 मुसलिम पाकिस्तान ले जाये जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वहां राशन की भारी कमी थी। लीगी नेता राशन का गुप्त व्यापार कर रहे थे। पुलिस वाले की इसमें मिली-भगत थी। गांधीजी के पहुंचते ही भीड़ ने गांधीजी को घेर लिया। उनके विरोध में नारे लगाए जाने लगे। लोगों ने गाड़ी पर आक्रमण कर दिया। गांधीजी गाड़ी से बाहर निकल आए। लोगों को दूब के मैदान में बैठ जाने के लिए कहा। गांधीजी ने पीड़ितों के प्रति सहानुभूति प्रकट की। अपना दुख जताया। लोगों ने अपने दुखों और कष्टों की कहानी गांधीजी को सुनाई। गांधीजी ने उनके प्रति अपना भरसक प्रयास करने का वचन दिया। जो ख़ून के प्यासे थे, अब मित्र बन चुके थे। गांधीजी ने हाथ जोड़कर लोगों से विदाई ली। इसके बाद गांधीजी दो और शिविर गए, एक मोतिया ख़ान और दूसरा ईदगाह। शाम होते-होते ख़बर आई कि एक राष्ट्रवादी मुसलिम नेता डॉ. अंसारी की बेटी और दामाद को उनके घर से ज़बरन निकाल दिया गया और मज़बूरी में उन्हें होटल में शरण लेनी पड़ी है। गांधीजी बहुत निराश हुए और शाम की प्रार्थना सभा में इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा, यह बड़े शर्म की बात है कि डॉ. अंसारी जैसे राष्ट्र-भक्त और हिन्दू-मुसलिम एकता के हिमायती के परिवार वालों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हुआ है।

18 सितंबर को गांधीजी दरियागंज गए और वहां के मुसलमानों की व्यथा-कथा सुनी। वहां पर मुसलमानों की रक्षा करने के बजाए पुलिस ही उन्हें उत्पीड़ित कर रही थी। उन दिनों सरदार का भी अंदेशा था कि भारत के मुसलमानों का विशाल बहुमत भारतीय संघ के प्रति वफ़ादार नहीं है। ऐसे लोगों के लिए पाकिस्तान चले जाना बेहतर होगा। गांधीजी ने प्रश्न किया, मैं पूछता हूं कि भारत की सबसे बड़ी मस्जिद जामा मस्जिद या पश्चिम पंजाब का गुरुद्वारा ननकाना साहब और पंजा साहब का क्या होगा, अगर कोई भी मुसलमान भारत में और कोई भी सिक्ख पाकिस्तान में नहीं रह सकता? क्या इन पवित्र स्थानों का और कोई उपयोग किया जाएगा? हरगिज़ नहीं।

कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि मुसलमानों द्वारा परित्यक्त घर में शरणार्थियों को बसाया जाए। गांधीजी को यह सुझाव उपयुक्त नहीं लगा। उन्होंने कहा कि अगर यह सिद्धान्त अपना लिया गया, तो इसका परिणाम बहुत घातक होगा। तब एक भी ग़ैरमुसलिम पाकिस्तान में और एक भी मुसलिम हिन्दुस्तान में नहीं बचेंगे। इसलिए बेहतर है कि सरकार इन घरों की तब तक देखभाल करे जब तक इसका मालिक वापस आकर इसे अपनाता नहीं।

जब वे पुल बंगश, बड़ा हिन्दू राव, खरी बाओली और चांदनी चौक जैसे मुसलिम बहुल क्षेत्रों की तंग गलियों से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने पूरा इलाक़ा वीरान पाया। बचे-खुचे मुसलमानों ने उनका दिल से स्वागत किया जबकि कुछ हिन्दू भाइयों ने उनकी कार पर हमला किया और वापस जाओ के नारे लगाए।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां-  राष्ट्रीय आन्दोलन

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