राष्ट्रीय आन्दोलन
491. गांधीजी का अंतिम जन्म दिवस
1947
गांधीजी के निरंतर प्रयास से, कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर, दिल्ली
में शांति स्थापित हुई। लेकिन इस प्रयास में गांधीजी ख़ुद बीमार पड़ गए। 26 सितम्बर
से वे जुकाम, कुक्कुर खांसी और ज्वर से पीड़ित थे। डॉक्टर ने आराम करने के लिए कहा, तो कहने लगे, आराम लेकर
क्या करना? लोग इतने कष्ट में हो तो मैं कैसे काम रोक सकता हूं? 2 अक्तूबर
को उनका 78वां, उनके जीवन का अन्तिम और आज़ाद भारत
में पहला, जन्मदिन था।
मीराबहन ने उनके बैठने की जगह को सजा
कर रखा था। फूलों के द्वारा उन्होंने ‘राम’ और ‘ओम’ बनाया था। पटेल, नेहरू और घनश्यामदास
बिरला मौज़ूद थे। लेडी माउंट्बेटन भी आ गईं। उनके हाथ
में बधाइयों वाले तार और पत्र थे। दुनिया भर से बधाई के संदेश आ रहे थे। गांधीजी ने
पूछा, “क्या शोक-संदेश
भेजना अधिक उपयुक्त नहीं होता? सब जगह यही शोर मचा हुआ है कि हम मुसलमानों को भारतीय
संघ में नहीं रहने देंगे। इसलिए मैं आपकी कोई भी बधाई स्वीकार करने में सर्वथा समर्थ
हूं। बधाई किसलिए? क्या संवेदना प्रकट करना अधिक उपयुक्त नहीं होगा?”
उस दिन उन्होंने उपवास रखा था। उनके
अंदर न कोई उमंग, न उल्लास था। मन दुखी, और उनके बोल थे, “भगवान से प्रार्थना करें कि बंटवारे
की क़ौमी आग सदा के लिए बुझ जाए। अन्यथा दूसरा जन्म दिवस देखने की इच्छा नहीं है।” अपने शुभचिंतकों को उन्होंने कहा,
“आप सब
ईश्वर से प्रार्थना करें कि इस मौजूदा तबाही का ख़ात्मा हो या वह मुझे उठा ले। मैं नहीं
चाहता कि भारत जब जल रहा हो, तो मेरा एक और जन्मदिन आए।” ईश्वर की ऐसी लीला हुई कि वे दूसरा
जन्म दिवस देख भी नहीं पाए। उन्होंने स्वीकार किया, “इस निरंतर मातृघात के फलस्वरूप
मेरी 125 साल जीने की इच्छा पूरी तरह मर चुकी है। मैं इसका असहाय साक्षी नहीं बनना
चाहता।” यह असहनीय पीड़ा उनकी नैतिक संवेदना
की, अपनी जनता के प्रति उनके प्रेम की और उनकी आध्यात्मिक धरोहर के प्रति उनके
गर्व की भावना की सूचक थी। सभी पिछली लड़ाइयों को जीतने के बाद वे इस आखिरी लड़ाई को
हार रहे थे। इसने उनकी पीड़ा को और बढाया था।
आज़ाद हिंदुस्तान में उन्होंने अपनी
एक ही वर्षगाँठ देखी उस दिन प्रार्थना सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा, “मेरे लिए
तो आज मातम मनाने का दिन है। मैं आज तक ज़िंदा पड़ा हूँ। इस पर मुझको खुद आश्चर्य होता
है। शर्म लगती है, मैं वही शख्स हूँ जिसकी जुबान से एक
चीज निकलती तो करोडो मानते थे लेकिन आज तो मेरी कोई सुनता ही नहीं है। मैं कहूँ कि
तुम ऐसा करो, ‘नहीं, ऐसा नहीं
करेंगे’ ऐसा कहते हैं। ऐसी हालत में हिन्दुस्तान
में मेरे लिए जगह कहाँ है और मैं उसमें ज़िंदा रह कर क्या करूँगा?…..”
जीवन भर हर विषम परिस्थितियों में जीतने
वाले गांधीजी अपनी इस आख़िरी लड़ाई को हार रहे
थे। उन्होंने कहा था, “मेरी सत्य और अहिंसा की धारणा और व्यवहार
में कोई सूक्ष्म दोष अवश्य है, जिसका यह नतीजा है। मैंने कमज़ोरों की अहिंसा को, जो
किसी भी तरह अहिंसा नहीं है, सच्ची अहिंसा समझा। मैं अंधा था। मैं देख नहीं सकता था।” सरदार से उन्होंने कहा, “मैंने ऐसा कौन सा पाप किया होगा कि
ईश्वर ने मुझे ये तमाम भयंकर घटनाएं देखने के लिए ज़िन्दा रखा है?” आकाशवाणी ने गांधीजी की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक विशेष कार्यक्रम
रखा था। किसी ने पूछा आप रेडियो नहीं सुनेंगे? गांधीजी ने कहा, “नहीं, मुझे ‘रेडियो’ से ‘रेंटियो’ अधिक
पसंद है। चरखे की गूंज मुझे अधिक मीठी लगती है। उसमें मुझे मानवता का शान्त और करुणापूर्ण
संगीत सुनाई देता है।” गुजराती में चरखे को रेंटियो कहते हैं।
गांधीजी ने जन्मदिन का कोई संदेश देने से इंकार कर दिया।
आगे बढ़ने से पहले एक मज़ेदार वाकए पर
एक नज़र डाल ली जाए। हिन्दू पंचांग के अनुसार गांधीजी का जन्म दिन 11 अक्तूबर
को पड़ रहा था। दिल्ली के गुजरातियों ने इस दिन गांधीजी का न सिर्फ़ जन्मदिन मनाने की
ठानी बल्कि उन्हें उनके स्वागत समारोह में थैली भेंट करने का भी आयोजन किया था। हालांकि
गांधीजी अभी भी खांसी और ज्वर से पीड़ित थे, फिरभी उन्होंने उस आयोजन में जाने का निमंत्रण
स्वीकार कर लिया। सरदार उन्हें सभा में ले जाने के लिए आए। उस समय गांधीजी पर खांसी
का दौरा आ रहा था। सरदार ने विनोद किया, “आपके लोभ का कोई अन्त नहीं है! थैली
लेने के लिए आप मृत्युशय्या भी छोड़कर चले जाएंगे! आप अपनी खांसी ठीक कर लेंगे, तो सब
बातें अपने आप ठीक हो जाएंगी। लेकिन आप सुनते कहां हैं?” सभा में सरदार से भाषण देने के लिए
कहा गया, तो उन्होंने फिर विनोद किया। “यह क्या मेरा जन्मदिन है जो मैं बोलूं?
आपकी थैली गांधीजी लें और बोलने का काम मैं करूं – यह बड़े अन्याय की बात है! देखिए
इस बूढ़े में बीमारी के बावज़ूद आपका रुपया छीनने के लिए फिर से शक्ति आ गई है। अब आप
इन पर दया कीजिए और इन्हें आराम करने दीजिए।” गांधीजी भी कहां चुप रहने वाले थे,
बोले, “सरदार
फांसी के तख़्ते पर चढ़ते समय भी हंसी से बाज़ नहीं आएंगे।”
कलकत्ता से गांधीजी की मदद करने के
लिए सुहरावर्दी आए थे। लेकिन दिल्ली में उनका कोई खास प्रभाव नहीं था। गांधीजी ने उससे
कहा, “अगर तुम
भारतीय नागरिक हो, तो पाकिस्तान जाकर जिन्ना से कहो हिन्दुओं के दुखों का प्रतिकार
करे। ऐसे अत्याचारों का सार्वजनिक विरोध होना चाहिए। पाकिस्तान के सिंध प्रांत में
हिंदू सिंधियों के ऊपर आतंक मचा था। वे वहां से पलायन कर रहे हैं।” सुहरावर्दी कराची गए। 21 सितंबर
को पाकिस्तान के नेताओं से लाहौर में चर्चा की। दूसरी वार वे अक्तूबर में भी पाकिस्तान
गए और जिन्ना से बातचीत की। बहुत कुछ लाभ तो नहीं हुआ, फिर भी कोशिश तो ज़रूर की गई।
वस्तुस्थिति तो यह थी कि नवजात पाकिस्तान के संस्थापक जिन्ना के वायदे कि ‘पाकिस्तान
मुसलमानों की मातृभूमि होगी’ के विपरीत वहां के प्रधानमंत्री ने यह घोषणा की कि ‘पूर्व
पंजाब के सिवा भारत के किसी भाग के मुसलमानों
को पाकिस्तान में घुसने नहीं दिया जाएगा।’ जिन्ना अब अवसरवादियों की दया पर निर्भर
रहने लगा था। उदार और प्रगतिशील विचारों वाला जिन्ना शरीअत पर आधारित धार्मिक राज्य
का जनक बना। वह धर्मान्ध मुल्लाओं के हाथ की कठपुतली बन गया था। गवर्नर जनरल जिन्ना
बीमार रहने लगा था।
एक दिन तो प्रार्थना सभा में गांधीजी
ने यहां तक कह दिया, “अगर ऐसा
चलता रहा तो दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ जाएगा।” लोगों को गांधीजी के मुंह से युद्ध
की बात सुनकर आश्चर्य हुआ। किसी विदेशी पत्रकार ने गांधीजी से कहा, “आपको मज़ाक़ में भी युद्ध का उल्लेख नहीं
करना चाहिए था।” गांधीजी
ने कहा, “युद्ध
गंभीर विषय है। मैंने मज़ाक़ किया ही नहीं था। ऐसी गंभीर स्थिति में युद्ध की संभावना
को अनदेखा करना अपराध हो जाएगा। मैं अहिंसा का पुजारी हूं, लेकिन हिंसा में भी सत्य-असत्य,
न्याय-अन्याय, औचित्य-अनौचित्य के पक्ष होते ही हैं। और अन्याय का विरोध करना मेरा
कर्त्तव्य है।”
शरणार्थियों की सेवा करना इन दिनों
उनका प्रमुख उद्देश्य था। उन्होंने डॉ. सुशीला नय्यर को कुरुक्षेत्र भेज दिया जहां
वे लोगों को चिकित्सीय सुविधा देतीं। सर्दियों के दिन आ रहे थे। शरणार्थियों को खुले
आकाश के नीचे या तंबुओं में क्या दशा होगी उससे गांधीजी काफी चिन्तित थे। उन्होंने
समाज से अपील की कि कंबल, गरम कपड़े और अन्य चीज़ों का दान करे। लोगों ने दिल खोलकर दान
किए। गांधीजी की उचित व्यवस्था से दान की वस्तुएं सही हाथों में पहुंची। पानीपत के
शरणार्थी शिविर की कुव्यवस्था देखकर उन्हें काफी धक्का पहुंचा। उन्होंने इसे सरकारी
निकम्मेपन की निशानी कहा और वहां की सरकार को खूब फटकार लगाई।
लॉर्ड माउंटबेटन कुछ दिनों के लिए छुट्टी
पर जाने वाला था। लॉर्ड और लेडी माउंटबेटन को राजकुमारी एलिजाबेथ की शादी, जो उनके
भतीजे से होने वाली थी, में भाग लेने लंदन जाना था। जाने से पहले वे 9 नवंबर,
1947 को गांधीजी
से मिले। गांधीजी को लगा कि नवदंपती के लिए उन्हें कुछ सौगात भेजनी चाहिए। उन्होंने
अपने हाथ के कते सूत से एक टेबुल क्लॉथ बनवाया और माउंटबेटन को दिया। माउंटबेटन दंपत्ति
ने बकिंघम पैलेस में जाकर गांधीजी की भेंट उन्हें दी। महारानी एलिजाबेथ ने उस मेजपोश
को सहेजकर रखा। उन्होंने माउंटबेटन के द्वारा कहलवाया, “गांधीजी द्वारा दिए गए इस सम्मान से
मैं कृतज्ञ हूं। यह उनका मेरे प्रति हार्दिक स्नेह है। मैं इसे सदा सुरक्षित स्थान
पर रखूंगी। चाय के मेज़पोश की तरह इसका इस्तेमाल नहीं करूंगी। यह एक मूल्यवान भेंट है।
उससे भी ज़्यादा बहुमूल्य इसका ऐतिहासिक संदर्भ है।”
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का यह कितना
अच्छा चरमोत्कर्ष था! इसने कटुता और ज़हर नहीं फैलाया बल्कि मित्रता और सद्भावना की
सुगंध फैलाई।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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