राष्ट्रीय आन्दोलन
488. आज़ादी का दिन और गांधीजी
1947
देश स्वतंत्र हो चुका था। सारा कलकत्ता ख़ुशी से
झूम रहा था। गांधीजी के अनुरोध पर अर्धरात्रि से उनके निवास-स्थान का सशस्त्र पहरा
उठा लिया गया। उसकी जगह उस घर की पहरेदारी उन्हीं नवयुवकों में से कइयों ने की थी,
जो कुछ देर पहले तक गांधीजी के विरुद्ध नारे लगा रहे थे। गांधीजी के मुसलिम मेजबान
के हैदरी मैंशन पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज लहरा था। 14 अगस्त की रात जब देश आज़ाद हो रहा
था, सारा देश ख़ुशी से झूम रहा था, चिल्ला रहा था, नाच रहा था, मगन था, जब नेहरू संसद के केंद्रीय हॉल में अपना भाषण दे रहे थे, तब जो व्यक्ति
पिछले तीस वर्षों से इस आज़ादी को पाने की लड़ाई लड़ रहा था, वह कलकत्ते के सबसे गंदे
इलाक़े के एक टूटे-फूटे घर के एक अंधेरे कमरे की फर्श पर गहरी नींद सो रहा था। दिल्ली
में उसके सहयोगी अधिकारिक कार्यक्रम में व्यस्त थे। 15 अगस्त 1947 को राजधानी में हो रहे उत्सवों में महात्मा गाँधी नहीं थे। माउंटबेटन और नेहरू
दोनों ने गांधीजी से आज़ादी के दिन दिल्ली में रहने का अनुरोध किया था लेकिन गांधीजी
ने ये कहते हुए उस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया था कि कलकत्ता में उनकी ज़्यादा
ज़रूरत है।
गाँधीजी उस दिन 24 घंटे के उपवास पर थे। उन्होंने इतने दिन तक जिस स्वतंत्रता के लिए
संघर्ष किया था वह एक अकल्पनीय कीमत पर उन्हें मिली थी। उनका राष्ट्र विभाजित था
हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे की गर्दन पर सवार थे। उनके जीवनी लेखक डी.जी. तेंदुलकर ने लिखा है कि सितंबर और
अक्तूबर के दौरान गाँधीजी पीड़ितों को सांत्वना देते हुए अस्पतालों और शरणार्थी
शिविरों के चक्कर लगा रहे थे। उन्होंने सिखों, हिंदुओं और मुसलमानों से आह्वान किया कि वे अतीत को भुला कर अपनी
पीड़ा पर ध्यान देने की बजाय एक-दूसरे के प्रति भाईचारे का हाथ बढ़ाने तथा शांति से
रहने का संकल्प लें।
15 अगस्त, 1947 भारत के करोड़ों लोगों
के लिए एक ऐतिहासिक दिन था लेकिन गांधीजी के लिए भी दूसरे कारण से वो दिन बहुत
ख़ास था। पांच वर्ष पूर्व, इसी दिन महादेव देसाई का देहावसान
हुआ था। अपने निकटतम सहयोगी रहे महादेव देसाई की पुण्यतिथि पर गांधीजी तब से इस दिन उपवास रखते थे और गीता पाठ
करते थे। यह क्रम उस दिन भी ज़ारी रहा। आज़ादी की पहली सुबह गांधीजी 2 बजे ही जग गए थे। प्रमोद कपूर अपनी
किताब 'गांधी ऐन इलस्ट्रेटेड बायोग्राफ़ी' में लिखते हैं, 'उस दिन गांधीजी हैदरी मंज़िल में जागने के अपने नियत समय से एक घंटा पहला दो
बजे उठ गए। पिछले पाँच सालों के 15 अगस्त की तरह उस दिन
भी उन्होंने उपवास रखा और अपने सचिव की याद में पूरी गीता पढ़वाई।
उस दिन कलकत्ता में
आज़ादी के स्वागत में हर जगह रोशनी की गई थी लेकिन गांधीजी इस सबसे दूर ही रहे। गांधीजी के मुस्लिम
मेज़बानों ने पूरे घर को तिरंगे झंडे से सजा रखा था। भोर होने के पहले
ही रबींद्रनाथ टैगोर के गीत गाता हुआ युवा लड़कियों का एक जत्था वहाँ आया। उस दिन हैदरी मंज़िल में गांधीजी से मिलने वालों का ताँता लगा रहा। सुबह से ही लोगों का
दल आता और गांधीजी के दर्शन करता। बंगाल के मुख्यमंत्री भी आए। गांधीजी ने उनसे कहा,
“आज से आप कांटों भरा ताज पहनेंगे। सत्य-अहिंसा का
पालन करें। सत्ता के मद से दूर रहें। आपकी सत्ता ग़रीबों की सेवा के लिए है, यह कभी
न भूलें।” सारे शहर में हिंदू-मुस्लिम एकता की लहर दौड़ रही
थी। राजाजी बंगाल के गवर्नर नियुक्त हुए थे। वे भी गांधीजी से मिलने आए। गांधीजी के
सम्मान में उन्होंने अपना चप्पल द्वार के बाहर ही खोल दिया था। राजाजी की पुत्री लक्ष्मी
से गांधीजी सबसे छोटे पुत्र देवदास का विवाह हुआ था। गांधीजी ने मीरा बहन को पत्र लिखा,
“भीड़ ख़ुशियां मना रही है, लेकिन मेरे अंदर संतुष्टि
का कोई भाव नहीं है। क्या मेरे अंदर किसी वस्तु की कमी है? हिंदू-मुस्लिम एकता इतनी
आकस्मिक लगती है कि सच्ची नहीं हो सकती।”
कलकत्ता शहर का कार से दौरा
दोपहर को गांधीजी की बेलियाघाट में एक मैदान में प्रार्थना सभा हुई। उस दिन प्रार्थना सभा में तीस हज़ार लोग उपस्थित
थे। वहाँ हिंदु, मुस्लिम और समाज के हर तबके के लोग शामिल हुए। सबने एक स्वर में
नारा लगाया, 'हिंदू- मुस्लिम एक हों।‘ गांधीजी ने उम्मीद जताई कि यह भाईचारा क्षणिक
नहीं होगा। कलकत्ता का सदाचार सारे देश को प्रभावित करेगा। अपनी प्रार्थना सभा
में गांधीजी ने कलकत्ता में लोगों के दिलों में हो रहे बदलाव पर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर
की और लाहौर से आ रही पागलपन की ख़बरों और
चटगाँव में जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका था, अचानक आई बाढ़ पर अपनी चिंता प्रकट की। उन्होंने कलकत्ता के
लोगों से भारत में रहने का फ़ैसला करने वाले अंग्रेज़ों से उसी तरह का व्यवहार
करने का अनुरोध किया जैसा व्यवहार वो अपने प्रति करने की अपेक्षा करते हैं। फिर उन्होंने
असामान्य फ़रमाइश की कि उन्हें कलकत्ता की सड़कों पर कार से घुमाया जाए ताकि वो
अपनी आँखों से देख सकें कि कलकत्ता के लोगों के दिलों में आया बदलाव वाकई एक
चमत्कार है या दुर्घटना। सुहरावर्दी ने कहा,
महात्माजी की मेहनत और भगवान की कृपा से दो दिन में चमत्कार हुआ है। आज हम सब जय
हिंद का नारा लगाएंगे। उसने अपना भाषण जय हिंद के नारे से समाप्त किया। गांधीजी के
साथ-साथ सुहरावर्दी ने उपवास रखा हुआ था। रात में सुहरावर्दी ने ख़ुद गाड़ी चलाकर गांधीजी
को सारा शहर घुमाया। चारों तरफ़ अमन-चैन और हर्ष-उल्लास छाया हुआ था।
ब्रिटिश लोगों को अपना प्यार भेजा
गांधीजी के पास पटना से टेलिफ़ोन संदेश आया कि कलकत्ता के जादू का असर वहाँ
भी महसूस किया जा रहा है। उसी शाम उन्होंने इंग्लैंड में अपनी दोस्त अगाथा हैरिसन को एक पत्र
लिखा, 'प्रिय अगाथा, मैं चर्खा कातते हुए ये पत्र डिक्टेट करा रहा हूँ। तुम्हें पता है कि आज जैसे बड़े अवसरों को मेरा मनाने का अपना तरीका
है, प्रार्थना कर ईश्वर को धन्यवाद देना। इसके बाद उपवास का समय है अगर आप फल के रस पीने को उपवास मानें तो। और फिर गरीबों के साथ अपना जुड़ाव दिखाने के लिए चर्खा कातना। ब्रिटेन में मेरे सारे दोस्तों को प्यार।' इस तरह ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे बड़े दुश्मन ने अपने देश की आज़ादी
के दिन सभी ब्रिटेनवासियों को अपना प्यार भेजा। उसी दिन गांधी ने
राजकुमारी अमृत कौर को भी एक पत्र लिखा, 'मैं एक मुस्लिम के घर में रह रहा हूँ। वो सब बहुत अच्छे हैं. मुझे जितनी भी मदद की ज़रूरत है वो मुझे अपने
मुस्लिम दोस्तों से मिल रही है। मुझे दक्षिण अफ़्रीका में बिताए और ख़िलाफ़त के दिन याद आ रहे हैं। हिंदू और मुसलमान एक दिन के अंदर दोस्त बन गए हैं। मुझे नहीं पता कि ये कब तक चलेगा ? ऐसा लगता है कि सुहरावर्दी भी अब बदल गए हैं।'
लॉर्ड माउंटबेटन ने भी
महात्मा गाँधी को पत्र लिख कर कहा, 'पंजाब में हमारे पास 55,000 सैनिक हैं, तब भी वहाँ दंगे जारी हैं। बंगाल में हमारे पास
सिर्फ़ एक शख़्स है, आप और वहाँ दंगे पूरी
तरह से रुक गए हैं। एक प्रशासक के तौर पर
क्या मुझे एक सदस्यीय सीमा बल और उसके नंबर 2 सुहरावर्दी को अपना सम्मान प्रकट करने की अनुमति है? आपको 15 अगस्त को संविधान सभा में गूँजी तालियों की आवाज़ सुननी चाहिए थी जो आपका नाम
आने के बाद वहाँ गूँजी थी। उस समय हम सब आपके
बारे में सोच रहे थे।'
अगले दिन यानि 16 अगस्त को गांधी ने 'हरिजन' के अंक में लिखा, 'कलकत्ता के लोगों के
दिलों में हुए परिवर्तन का हर जगह श्रेय मुझे दिया जा रहा है जिसके कि मैं लायक
नहीं हूँ, न ही शहीद सुहरावर्दी
इसके हकदार हैं। ये बदलाव एक या दो
व्यक्तियों की कोशिश से नहीं आ सकता। हम लोग ईश्वर के हाथ
के खिलौने हैं, वो हमें अपनी धुन पर
नचाता है।'
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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