सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
“हे पैग़म्बर, जो कुछ आप पर आपके पालनहार की ओर से उतारा गया है, आप इस आदेश को पहुंचा दें जो आपके ईश्वर की ओर से उतरा है और यदि आपने यह न किया तो जैसे उसके संदेश को नहीं पहुंचाया और अल्लाह विरोधियों से आपकी रक्षा करेगा, निश्चय अल्लाह
काफ़िरों को मार्गदर्शन नहीं देता।” (क़ुरआन : 5/67)
सूफ़ीवाद अपने स्वभाव से ही एक ऐसा विषय था जो
औसत लोगों के लिए नहीं बल्कि उनके लिए था जो हमेशा औसत से ऊपर की चीज़ के लिए महत्वाकांक्षी
होते थे। मुस्लिम धर्माचार्यों के अनुसार परम सत्ता तक पहुंचने के दो मार्ग हैं।
एक फ़रिश्ते द्वारा प्राप्त ईश्वरीय आदेश और नबियों की शिक्षा से गुज़रता है और
दूसरा इल्हाम (आत्मज्ञान) और औलिया (सिद्ध पुरुषों) की परम
सत्तात्मक मनःस्थिति (सिद्धि) का है। शरीअत बाहरी और व्यावहारिक मार्ग है।
इसमें कुरान और हदीस के अनुसार बताए गए धार्मिक नियमों (जैसे नमाज, रोजा, जकात आदि) का पालन करना शामिल होता है। तरीक़त आंतरिक
और आध्यात्मिक मार्ग है। इसे सूफी मार्ग भी कहा जाता है, जिसमें दिल की शुद्धि, अहंकार (नफ्स) को मिटाने और ईश्वर के सीधे प्रेम व
ज्ञान (मारेफत) को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। धर्माचार्यों के
अनुसार ये दोनों मार्ग एक-दूसरे के पूरक हैं। आंतरिक ज्ञान (तरीक़त) की प्राप्ति
के लिए बाहरी नियमों (शरीअत) का पालन करना अनिवार्य माना गया है।
मुस्लिम धर्माचार्यों के एक वर्ग ने
सूफ़ियों में ‘क़ुतुब’ की उपाधि से याद किए जाने वालों को हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़
रज़ि. का बदल सिद्ध करने का प्रयास किया है। अबूतालिब मक्की कहते हैं कि
सिद्दीक़ और रसूल के बीच केवल नबूबत का अन्तर होता है। इस दृष्टि से क़ुतुब हज़रत
अबूबक्र रज़ि. का बदल होता है। लेकिन यह मत अधिकांश सूफ़ियों में लोकप्रिय नहीं है।
लगभग सभी प्रख्यात सूफ़ियों ने अपना सिलसिला हज़रत अली रज़ि. से स्वीकार किया है। इस्लामी
रहस्यवाद (सूफीवाद) में 'क़ुतुब' का अर्थ 'धुरी' होता है। सूफी परंपरा के अनुसार, कुतुब उस सर्वोच्च आध्यात्मिक हस्ती को कहा
जाता है, जिसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त होता है और जो
ब्रह्मांड का आध्यात्मिक केंद्र माना जाता है। मुख्यधारा के रूढ़िवादी इस्लामी
विद्वानों (जैसे सलफी और कुछ वहाबी विचारधारा के उलेमाओं) के एक वर्ग का मानना है
कि 'क़ुतुब' या 'ग़ौस' जैसी उपाधियों का कोई आधार कुरान या
प्रामाणिक हदीस में नहीं है। उनके अनुसार, ये शब्द बाद के दौर में कुछ अतिवादी सूफियों द्वारा
गढ़े गए हैं।
सभी
सूफ़ी संतों ने ज्ञान का स्रोत केवल अल्लाह को माना है और उस ज्ञान तक पहुंचने का वसीला
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. को तस्लीम किया है। (वसीला का
अर्थ अल्लाह की आज्ञा का पालन करने और उस की अवज्ञा से बचने तथा ऐसे कर्मों के
करने का, जिन से वह
प्रसन्न हो। वसीला ह़दीस में स्वर्ग के उस सर्वोच्च स्थान (अल-वसीला) को भी कहा
गया है, जो स्वर्ग
में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को मिलेगा, जिसका नाम “मक़ामे
मह़मूद” है।) उनके सहाबा में हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु और हज़रत अबूबक्र रज़ियल्लाहु
अन्हु के वास्ते से यह ज्ञान सूफ़ी सिलसिलों तक पहुंचा। नक्शबंदिया सिलसिला हज़रत
अबूबक्र रज़ि. के वास्ते से पैग़म्बर साहब तक पहुंचता है, जबकि चिश्तिया, क़ादरिया, सुहरावर्दिया, मदारिया, शतारिया और किबरौविया सिलसिले हज़रत अली रज़ि.
के वास्ते से पैग़म्बर साहब तक पहुंचते हैं। मौलाना
जलालुद्दीन रूमी का मानना है कि मेराज (नबीश्री का उच्चतम आकाश पर
अल्लाह की निशानियों के दर्शन के लिए बुलाया जाना) की रात हज़रत मुहम्मद सल्ल. ने
हज़रत अली रज़ि. को दस हज़ार ऐसे रहस्यों से परिचित कराया जिनका ज्ञान उन्हें अल्लाह
ने दिया था। मेराज की रात नबीश्री हज़रत मुहम्मद सल्ल. को अल्लाह ने ख़िरका
(वह वस्त्र जिसे सूफ़ी पीर अपने सुयोग्य मुरीद को प्रदान करते हैं) प्रदान किया ('खिरका-ए-फक्र' अध्यात्म का चोगा/वस्त्र) और ताक़ीद की कि इसे सुयोग्य पात्र को ही दें। नबीश्री ने कुछ सहाबियों
की परीक्षा ली और अंत में हज़रत अली रज़ि. को सुयोग्य पाकर उन्हें वह पवित्र ख़िरका प्रदान किया।
25 मई 632 ई. को जब पैग़म्बर
हज़रत मुहम्मद सल्ल. की मृत्यु हुई तो उनके सभी शिष्य और समर्थक उनकी पत्नी हज़रत
आयशा बीबी ‘रज़ियल्लाहु
अन्हा’ के घर जुटे। वहीं उन्होंने
अंतिम सांसें ली थीं। पार्थिव शरीर रखा था। लोग शोक-संतप्त थे। उनके ख़ास शिष्य
हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु यह मानने को तैयार
नहीं थे कि पैग़ंबर की भी मौत हो सकती है। उन्होंने कहा – “हज़रत मूसा की तरह मुहम्मद
साहब भी ख़ुदा से मिलने गए हैं। कुछ देर बाद वापस आ जाएंगे।” कुछ लोगों को इस
बात पर यकीन नहीं हुआ। वे आपस में कानाफूसी करने लगे। इस बेइज़्ज़ती को भाँपकर, गुस्से
में हज़रत उमर रज़ि. ने तलवार खींच ली और गरज कर बोले, “झूठे और कपटी हैं
वे लोग जो कहते हैं कि हुज़ूर का इंतक़ाल हो गया। हिम्मत है तो मेरे सामने बोलें।
गर्दन उतार लूंगा’’। इसी बीच हज़रत अबू बक्र रज़ि. वहां
पहुँचे। अंदर गए। बीबी आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की गोद में पड़े सर मुबारक को ग़ौर से
देखा और “इन्ना लिल्लाहि व
इन्ना इलैहि राजिऊन” कहते बाहर आ गए। उन्होंने हज़रत उमर से
कहा – “तलवार म्यान में
डाल दो।”
हज़रत उमर रज़ि. ने
उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया। हज़रत अबूबकर रज़ि. भीड़ की ओर मुड़े और बोले- “हम में से जो लोग
पैग़म्बर मुहम्मद की उपासना करते हों, वे जान लें कि
उनकी मृत्यु हो गयी। लेकिन जो ख़ुदा के उपासक हैं, उन्हें मालूम हो कि
ख़ुदा कभी मरता नहीं।”
इसके बाद वे क़ुरआन
की यह आयत बोले – “मुहम्मद इसके सिवा
और कुछ नहीं बस एक रसूल (धर्मदूत) हैं जिनके पहले भी और रसूल गुज़र चुके हैं। अगर
उनकी मृत्यु हो जाए या उन्हें मार डाला जाए, तो क्या तुम अपने
दीन (धर्म) से फिर जाओगे? याद रखो, जो पलटेगा, उससे अल्लाह का
कुछ नुकसान न होगा।” (सुर: 3 आ.144). अपने दीन (धर्म)
से फिर जाओगे का अर्थ है इस्लाम से फिर
जाओगे। भावार्थ यह है कि सत्धर्म इस्लाम स्थायी है, नबी
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के न रहने से समाप्त नहीं हो जायेगा। उह़ुद में जब
किसी विरोधी ने यह बात उड़ाई कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शहादत हो गयी
है तो यह सुन कर बहुत से मुसलमान हताश हो गये। कुछ ने कहा कि अब लड़ने से क्या लाभ? तथा
कुछ तो यहाँ तक कहने लगे कि यदि मुहम्मद साहब वास्तव में अल्लाह के रसूल होते तो
उन्हें मृत्युदंड न दिया जाता, और इसी कारण उन्होंने
लोगों को अपने पैतृक धर्म में लौटने की सलाह दी। इस आयत में यह संकेत है कि दूसरे
नबियों के समान नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को भी एक दिन संसार से जाना है। तो
क्या तुम उन्हीं के लिये इस्लाम को मानते हो और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
नहीं रहेंगे तो इस्लाम नहीं रहेगा?
6.1 हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रजि.अ.) (573 ई – 23 अगस्त 634)
हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. की मृत्यु
के बाद
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रजि.अ.) 632 ई. में इस्लाम के पहले ख़लीफ़ा (पैगंबर
के उत्तराधिकारी) हुए।
उनका असली नाम अब्दुल्लाह इब्न अबू क़ुहाफ़ा था। 'अबू
बक्र' उनकी
कुनियत (उपनाम) थी। उनका जन्म मक्का में लगभग 573 ईस्वी
में हुआ था। वे पैगंबर मुहम्मद के प्रारंभिक अनुयायियों में से थे (हज़रत खदीजा
रज़ियल्लाहु अन्हा के बाद सबसे पहले इन्होंने इस्लाम क़बूल किया। वे पुरुषों में
सबसे पहले इस्लाम कबूल करने वाले व्यक्ति थे) और इनकी पुत्री हज़रत
आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा पैगंबर
की चहेती पत्नी थी। वे मक्का के सबसे धनवान लोगों में से थे। एक बार उन्होंने इस्लाम
की सेवा के लिए अपना सारा धन पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के चरणों पर रख दिया।
हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने उनसे कहा, “क्या कुछ अपने परिवार
वालों के लिए भी छोड़ा?” तो उन्होंने कहा, “उनके
लिए अल्लाह और उसका रसूल है।”
इस
तरह की बात एक सूफ़ी ही कह सकता है। इसी पर डॉ. अल्लामा ईक़बाल ने कहा है,
परवाने को चिराग़ तो बुलबुल को फूल बस।
सिद्दीक़
के लिए ख़ुदा
और रसूल बस॥
यह
शेर हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) की सच्ची मोहब्बत और उनके पक्के
ईमान को दिखाता है। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ के लिए इस दुनिया की कोई भी चीज़
मायने नहीं रखती। उनके लिए सिर्फ अल्लाह (ख़ुदा) और उनके प्यारे नबी (रसूल) का साथ
ही काफी है। हज़रत अबू बक्र रज़ि. की धर्मपत्नी का नाम हज़रत अस्मा-बिन्त-उमैस रज़ि.
था। हज़रत अबू बक्र रज़ि. ज्ञान-विज्ञान, शौर्य और वीरता में श्रेष्ठ थे। हिजरत के
समय वे पैग़म्बर के सहयोगी थे। उनके साथ 'सौर' नाम
की गुफा में रहते हुए सादा जीवन व्यतीत करते थे। वे पैग़म्बर में पूरी आस्था रखने
वाले में थे,
इसलिए उन्हें ‘अल-सिद्दीक़’ के नाम से पुकारा जाता था। जब पैगंबर साहब ने
अपनी मेराज (आसमानों की पवित्र यात्रा) के बारे में बताया, तो
लोगों ने इस पर संदेह किया. लेकिन हज़रत अबू बक्र ने बिना किसी झिझक के तुरंत उनकी
बात पर विश्वास कर लिया। वे बहुत ही विनयी और दयालु थे। इस्लामी शासन के मुखिया
होने के बावजूद भी वे सादा जीवन ही व्यतीत करते थे। कहा जाता है कि ख़लीफ़ा बनने के
दूसरे ही दिन वे कंधे पर कपड़ों का थान लेकर बेचने के लिए वे बाज़ार में चले गए।
किसी ने उन्हें टोका कि आप ये क्या करते हैं, तो उन्होंने कहा मेरे जीविकोपार्जन
का यही साधन है और इसी से मैं अपने
बाल-बच्चों का पोषण करूंगा।
पैगंबर
साहब की मृत्यु के बाद कई अरब जनजातियों ने विद्रोह कर दिया था। अबू बक्र ने 'रिद्दा
युद्धों' के
जरिए इन विद्रोहों को शांत किया और एकता बनाए रखी। वे सम्पूर्ण अरब को इस्लाम के
झंडे के नीचे लाने के लिए अनवरत लगे रहे। उन्होंने मुस्लिम सेना को मजबूत किया और
सीरिया और इराक की तरफ बड़े साम्राज्यों (बीजान्टिन और सासानियन) को चुनौती दी। उनकी
ख़िलाफ़त के समय (25
मई 632-23
अगस्त 634
तक) सीरिया
के सीमावर्ती क्षेत्र पर इस्लामी हुक़ूमत क़ायम हुई। उनकी ख़िलाफ़त के दौर में हज़रत
उमर रज़ि. के मशविरे से पवित्र क़ुरआन को संकलित किया गया। इस काम के लिए हज़रत ज़ैद
बिन साबित रज़ि. को चुना गया। ख़लीफ़ा अबू बक्र रज़ि. बीमार रहते थे। वे मुश्किल से
ढ़ाई साल ही अपने पद पर रहे। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ की मृत्यु 23 अगस्त
634 ईस्वी
को बीमारी के कारण हुई। उन्हें मदीना की 'मस्जिद-ए-नबवी' में
पैगंबर मुहम्मद साहब के पास ही दफनाया गया है। उनके निधन के बाद एक बार फिर ख़लीफ़ा
के चुनाव के लिए विवाद उठ खड़ा हुआ। किसी तरह स्थिति को क़ाबू में रखा गया और हज़रत
उमर रज़ि. मुसलमानों के दूसरे ख़लीफ़ा (634-43) इसलिए
चुन लिए गए क्योंकि हज़रत अबूबकर रज़ि. ने उन्हें नामज़द किया था।
6.2 हज़रत उमर रज़ि. (586 – 644)
उनका असली नाम हज़रत अबू हफ्स उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) था। वह पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के सबसे करीबी सहाबियों में
से एक थे। मुहम्मद साहब ने हज़रत उमर को ‘फारूक’
नाम की उपाधि दी थी। जिसका अर्थ सत्य और असत्य में फर्क करने वाला है। उनका
जन्म 583 ईस्वी में मक्का के एक सम्मानित कुरैश कबीले में हुआ था। वह
बचपन से ही बहुत बहादुर, बुद्धिमान और ताकतवर थे। उन्हें घुड़सवारी और
कुश्ती का बहुत शौक था। वह काफी पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। शुरुआत में वे इस्लाम के
कट्टर विरोधी थे। एक दिन वह पैगंबर साहब को नुकसान पहुँचाने के इरादे
से निकले थे। रास्ते में उन्हें पता चला कि उनकी बहन और बहनोई ने इस्लाम स्वीकार
कर लिया है। जब वह अपनी बहन के घर गए, तो वहाँ कुरान की पवित्र आयतें सुनीं। उन
आयतों का उनके दिल पर इतना गहरा असर हुआ और उनका गुस्सा शांत हो गया और उन्होंने
तुरंत इस्लाम कबूल कर लिया। उनके इस्लाम अपनाने से मुसलमानों को बहुत बल मिला।
हज़रत अबू बक्र
(रज़ियल्लाहु अन्हु) के बाद वे 634 ईस्वी में दूसरे खलीफा बने। वे बहुत ही
सरल प्रवृत्ति के थे और बहुत ही कम खर्चे में अपना काम चला लेते थे। अपने शासनकाल में हज़रत उमर रज़ि. विधि को सर्वोच्च स्थान देना चाहते
थे। उन्होंने दीवान की प्रथा की शुरुआत की। सैनिकों और अधिकारियों के लिए वेतन और पेंशन का रजिस्टर (दीवान) बनाया। इसके अलावा
देश विजय के द्वारा इस्लामी राज्य का विस्तार करना उनका प्रमुख लक्ष्य था। उनका एक
और लक्ष्य था – शरीअत में कुछ सुधार करना। जब वो ख़लीफ़ा बने तो इस्लाम सिर्फ़ अरब तक
सीमित था, उन्होंने इस्लाम का दायरा दुनिया के चारों कोनों तक फैलाया। उन्होंने न सिर्फ़ संपूर्ण सीरिया, बल्कि इराक़, मिस्र, लीबिया, ईरान, ख़ुरासान, आरमीनिया, अंतालिया, अफ़्गा़निस्तान तक इस्लामी हुक़ूमत का विस्तार किया। उनके शासनकाल में
मुसलमानों ने बिना किसी खून-खराबे के यरूशलेम पर जीत हासिल की।
हज़रत उमर
(रज़ियल्लाहु अन्हु) को इस्लामी शासन प्रणाली का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। उन्होंने
एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस बल, न्याय प्रणाली, और सामाजिक कल्याण
विभाग (बैत-उल-माल) की स्थापना की। कानून की नज़र में उनके
लिए अमीर-गरीब और राजा-प्रजा सब बराबर थे। उन्होंने सरकारी खजाने
(बैत-उल-माल) की व्यवस्था को मजबूत किया। इतिहास में उन्हें उनके सख्त न्याय, ईमानदारी और
बेमिसाल सादगी के लिए याद किया जाता है। उन्होंने पूरी दुनिया पर इंसाफ़ के साथ हुकूमत
करने का तरीक़ा सिखाया। विश्व भर में आज भी उमर-ए-फारूक का इंसाफ मिसाल है। फारूकी दौर में ही
दुनिया भर के इंसानों के लिए अहम फैसले किए गए, जिससे इंसानियत का सिर बुलंद हुआ।
हज़रत उमर रज़ि. ने ख़लीफ़ा का पद ग्रहण करने के दूसरे ही साल बसरा नगर की नींव डाली।
बाद में यह प्रमुख वाणिज्यिक-केन्द्र बना। उन्होंने ही
इस्लामी हिजरी कैलेंडर की शुरुआत की, जो आज भी इस्तेमाल होता है। इतने बड़े
साम्राज्य के शासक होने के बाद भी वे बहुत सादा जीवन जीते थे। वे फटे हुए कपड़ों
में भी रह लेते थे और खुद मदीना की गलियों में घूमकर गरीबों और भूखों की मदद करते
थे। उन्हें मुसलमानों का पहला ऐसा नेता कहा जाता है जिन्हें 'अमीर-उल-मोमिनीन' (मोमिनों का कमांडर)
की उपाधि मिली।
हज़रत उमर रज़ि. की हत्या (8 सितम्बर, 644 ई.) कर दी गई थी। पर्शिया निवासी एक फारसी गुलाम अबू
लू़लू़ फ़िरोज़ ने मस्जिद में नमाज़ पढ़ते समय ज़हर बुझाई कटार से उनकी ह्त्या कर दी। मुहर्रम के दिन ही हज़रत उमर फारूक
शहीद हुए थे। उन्हें पैगंबर मुहम्मद (स.अ.व.) और हज़रत अबू बक्र (र.अ.) के समीप
दफनाया गया। जब वे घायल हो गये और जीवन की आशा न रही
और अपनी अंतिम सांसे ले रहे थे तो उन्होंने छः व्यक्तियों की एक चुनावी मंडली मुक़र्रर की थी, ताकि वह आपस के
परामर्श से शासन के लिये किसी एक को निर्वाचित कर लें। जिसने हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु
अन्हु) को तीसरा ख़लीफ़ा नियुक्त किया। इस्लाम पहला धर्म है जिस ने परामर्शिक
व्यवस्था की नींव डाली। किन्तु यह परामर्श केवल देश का शासन चलाने के विषयों तक
सीमित था।
6.3 हज़रत उस्मान रज़ि. (576-656)
उनका
असली नाम उसमान बिन अफ़्फ़ान था। ख़लीफ़ा बनने के समय हज़रत उस्मान रज़ि. की उम्र लगभग
सत्तर साल थी। वह एक बहुत ही नेक, दयालु और अमीर इंसान थे।
अपनी धन-दौलत को खुदा की राह में खर्च करने के कारण उन्हें 'गनी' (बहुत
अमीर/दानी) कहा जाता है। उन्हें ज़ुन-नूरैन (अर्थात दो नूरों के स्वामी)
के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि पैगंबर मुहम्मद
(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपनी दो सम्मानित बेटियों (हज़रत
रुकैया (रज़ि.) और उनके विसाल के बाद हज़रत उम्म कुलथुम (रज़ि.)) का
विवाह एक के बाद एक आदरणीय उस्मान बिन अफ्फान (रज़ि
अल्लाह अन्हु) से करवाया था।
तीसरे
ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान रज़ि. के काल (643-55) में
इस्लामी साम्राज्य बहुत आगे तक फैला। ईरान, उत्तरी
अफ्रीका और मध्य एशिया के कई नए इलाके इसमें शामिल हुए। उन्होंने
पहली बार मुसलमानों की पानी के जहाजों वाली फौज (नौसेना) बनाई। इस फौज ने समंदर के
रास्ते कई लड़ाइयां जीतीं। हज़रत उस्मान रज़ि.
पैग़म्बर के विशिष्ट सहयोगियों में से थे। वो एक धनी व्यापारी हुआ करते थे लेकिन बाद
में वह मुहम्मद साहब
के प्रमुख साथी बने। उन्होंने रसूल की 186
हदीसें कही हैं। उन्हें विद्वानों द्वारा क़ुरआन का संग्रहकर्ता भी कहा जाता है। उस
समय तक पैग़म्बर के विभिन्न सहयोगियों द्वारा संगृहीत क़ुरआन के कई संकलन मौजूद थे।
उन्होंने अपने कार्यकाल में क़ुरआन के सभी उपलब्ध संकलनों को परिशोधित करवाया। इसके
बाद उन्होंने पाठ-संबंधित सारे मतभेद दूर करने के लिए क़ुरआन की सात प्रामाणिक
प्रतियां तैयार करवाई और उन्हें विभिन्न देशों में भिजवा दिया। इसी वजह से उन्हें 'जामी-उल-कुरान' भी
कहते हैं। बाक़ी
सारे संकलन नष्ट कर दिये गए।
हज़रत
उस्मान क़ुरैशों की उमैय्या शाखा के थे। हज़रत
उस्मान इब्न अफ्फान का जन्म
576 ईस्वी
में मक्का में कुरैश जनजाति के धनी और प्रभावशाली उमय्यद कबीले में हुआ था। उन्होंने
अच्छी शिक्षा प्राप्त की और अरबी साहित्य और वाणिज्य में अच्छी जानकारी रखते थे। हज़रत
उस्मान उन लोगों में से थे, जिसने शुरू में ही
इस्लाम कुबूल कर लिया था। वे बहुत धर्मात्मा थे और बहुत ही अच्छे स्वभाव के थे। उन्हें
साहिब उल हिजरतैन (दो बार हिजरत करने वाला) के नाम से भी जाना जाता है
क्योंकि उन्होंने पहले हबशाह (इथियोपिया) और फिर मदीना अल-मुनव्वरा में हिजरत की
थी। उन्होंने उहुद की लड़ाई और खाई की लड़ाई जैसी प्रमुख लड़ाइयों में भाग लिया और
वीरता एवं वफादारी का परिचय दिया।
हज़रत उस्मान (रज़ि.) के शासन का आखिरी समय और उनकी शहादत
का वाकया बहुत ही दुखद था। उनके खिलाफत के आखिरी सालों में कुछ लोग उनके खिलाफ हो
गए थे। कुछ दंगाइयों ने हज़रत
उस्मान (रज़ि.) पर गलत आरोप लगाए। वे लोग उनके खिलाफ बात फैलाने लगे। फिर बहुत से
दंगाई मदीना शहर में घुस आए। दंगाइयों ने हज़रत उस्मान (रज़ि.) के घर को चारों तरफ से
घेर लिया। उन्होंने घर में पानी और खाना ले जाने पर भी रोक लगा दी। यह घेराव लगभग 40 दिनों तक
चला। हज़रत उस्मान (रज़ि.) बहुत ही दयालु थे। वह नहीं चाहते थे
कि उनकी वजह से मदीना के मुसलमानों के बीच खून-खराबा हो। इसलिए उन्होंने अपने
साथियों को दंगाइयों से लड़ने की इजाज़त नहीं दी। 17
जून 655
ई. को दंगाई दीवार फांदकर
उनके घर में घुस गए। उस समय हज़रत उस्मान (रज़ि.) पवित्र कुरान पढ़ रहे थे। दंगाइयों
ने उसी हालत में उन पर हमला कर दिया और उन्हें शहीद कर दिया। उनका मजार मदीना के जन्नत-उल-बकी
में है। हज़रत उस्मान गनी रज़ि अल्लाह अन्हु का जीवन
और योगदान इस्लामी इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ गया है। धर्म के प्रति उनकी निष्ठा, विस्तार के एक महत्वपूर्ण दौर में उनका नेतृत्व और कुरान
के संरक्षण में उनके प्रयासों ने उन्हें एक आदरणीय व्यक्तित्व बना दिया है।
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मनोज कुमार
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