राष्ट्रीय आन्दोलन
487. गांधीजी कलकता में
1947
9 अगस्त, 1947 को नोआखाली जाते हुए महात्मा गांधीजी कलकत्ता में रुके थे। कोलकाता में हालात अच्छे नहीं थे। संप्रदायिक तनाव बना हुआ
था। सांप्रदायिक दंगों के कारण मुसलमानों के मन में डर समाया हुआ था। हर तरफ फसाद, अल्लाह-ओ-अकबर, हर-हर महादेव के नारे, पथराव, आगज़नी, खून-खराबा। मुसलमानों ने गांधीजी से अनुरोध किया कि नोआखाली जाने से पहले वो कुछ समय कलकत्ता में बिताएं ताकि शहर को जला रही सांप्रदायिकता की भयानक आग में थोड़ा पानी छिड़का जा सके। कलकत्ता में गांधीजी सोदपुर प्रतिष्ठान में रुके।
विभाजन के बाद, वहां नए मंत्रिमंडल का गठन हो चुका था। 3 जुलाई को डॉ. प्रफुल्लचन्द्र घोष के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में नए मंत्रिमंडल
ने शपथ-ग्रहण की थी। पूर्व बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में सुहरावर्दी की जगह नज़ीमुद्दीन
का चुनाव हुआ। बंगाल के मुख्यमंत्री प्रफुल्लचंद्र गांधीजी से मिलने आए। गांधीजी ने
कहा, “जलती हुई आग की लपटों पर पानी की बाल्टी डाले बिना मैं कलकत्ता से आगे नहीं बढ़
सकता।”
अगस्त 1946 में
हुए 'ग्रेट कलकत्ता किलिंग' (कलकत्ता के भीषण हत्याकांड) के बाद से
कलकत्ता में कभी भी शांति नहीं रही। आज़ादी पा लेने के बाद स्थिति उलट गई थी। हिन्दू
अब अपने घर के मालिक होने के भाव से उत्तेजित थे। युद्ध के मार्ग पर बढ़ रहे थे। मुसलमान
डरे हुए थे। कभी-कभी आक्रामक हो जाते और उलट कर जवाब देते थे। लेकिन उनको यह अच्छी
तरह से मालूम था कि कलकत्ता से धकेले जाने से अब उनको कोई चमत्कार ही बचा सकता था। 10 अगस्त को मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मंडल गांधीजी से मिलने आया। लीग अध्यक्ष
मोहम्मद उस्मान मंडल के नेता थे। उसने गांधीजी से कलकत्ते में रुकने का निवेदन किया।
"हम मुसलमानों का आप पर उतना ही अधिकार है जितना हिंदुओं का। क्योंकि आपने
स्वयं कहा है कि आप मुसलमानों के भी उतने ही हैं जितने हिंदुओं के।" गांधीजी
ने उस्मान से कहा, “मैं कलकत्ता रुकने
को तैयार हूं, पर आपको मुझे आश्वासन देना होगा कि नोआखाली के हिंदू सुरक्षित रहेंगे।
अगर नोआखाली में कुछ भी गड़बड़ी हुई, तो मैं जान दे दूंगा। आपके दरवाजे पर उपवास करके
मर जाऊंगा।” मुस्लिम लीग ने नोआखाली के सुरक्षा की गारंटी
दी। उन लोगों ने गुंडों के सरगना ग़ुलाम सरवर और कासिम अली को पैगाम भेजा कि शांति बनाए
रखनी है। अब गांधीजी ने 11 अगस्त के बजाय 13 अगस्त को नोआखाली जाने का प्रोग्राम बनाया।
इसी बीच सुहरावर्दी जो
कराची में थे, को मालूम हुआ गांधीजी नोआखाली जा रहे हैं, दिल्ली होते हुए कलकत्ते आ
गए। उनकी न केवल कलकत्ते में हुक़ूमत जाती रही थी, बल्कि पूर्वी बंगाल के मुस्लिम लीगी
नेतृत्व से भी निकाल दिया गया था। 11 अगस्त को मिलते ही उन्होंने गांधीजी से निवेदन किया, “आपका अभी कलकत्ता छोड़ना
ग़लत होगा। कलकत्ता सुलग रहा है। आप नोआखाली जाना स्थगित कर दें। मैं आपके साथ काम करूंगा।” गांधीजी ने कहा, "ठीक है मैं नोआखाली की यात्रा स्थगित कर देता
हूँ, बशर्ते आप मेरे साथ रहना स्वीकार करें। हमें तब तक काम करना होगा जब तक कलकत्ता में
हर हिंदू और मुसलमान उस जगह पर नहीं लौट जाता जहाँ वो पहले रह रहा था। हम अपनी आख़िरी साँस तक अपनी कोशिश जारी रखेंगे। मैं नहीं चाहता कि आप इसपर तुरंत फ़ैसला लें। आप अपने घर जाएं और अपनी बेटी से सलाह करें। पुराने सुहरावर्दी को मर कर एक फ़कीर का रूप
धारण करना होगा।" सुहरावर्दी ने प्रस्ताव
मंजूर कर लिया।
11 अगस्त को बीबीसी ने ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे बड़े
दुश्मन से एक संदेश देने का अनुरोध किया। गांधीजी के
सचिव रहे प्यारे लाल अपनी किताब 'महात्मा गांधी द लास्ट फ़ेज़' में लिखते हैं, 'जीत के साथ साथ
वो समय दुख का भी था और गांधीजी ने महसूस किया
कि उन्हें कुछ भी नहीं कहना हैं। बीबीसी ने ज़ोर
दिया कि उनका संदेश कई भाषाओं में अनुवादित करके प्रसारित किया जाएगा। लेकिन निर्मल कुमार बोस के ज़रिए महात्मा
गांधी ने बीबीसी को सख़्त भाषा में संदेश भिजवाया, "मुझे इस प्रलोभन में नहीं आना चाहिए। उनसे कह दो कि
वो भूल जाएं कि मुझे अंग्रेज़ी आती है।"
हैदरी मैंशन में
कोलकाता में फ़ौज
तैनात नहीं थी। बस, एक व्यक्ति था, गाँधी। बगल में सुहरावर्दी, जिसे कांग्रेस में ज़्यादातर लोग पसंद नहीं करते
थे। कांग्रेसी महात्मा से कह रहे थे कि उनसे दूर हो जाएं। साथ रहने में जान का खतरा
है। पर गाँधीजी ने किसी की नहीं सुनी। 12 अगस्त को हुई प्रार्थना सभा में गांधीजी ने
कहा, “मुझे कुछ हिंदुओं ने आगाह किया है कि मैं सुहरावर्दी
पर विश्वास न करूं। लेकिन मैं सुहरावर्दी पर विश्वास करूंगा और
बदले में यह भी चाहूँगा कि उन पर भी विश्वास किया जाए। हम दोनों एक ही छत के नीचे रहेंगे और एक
दूसरे से कुछ भी नहीं छिपाएंगे। लोगों को हर परिस्थिति में सच कहने का साहस होना चाहिए।”
कलकत्ता में शांति
स्थापना के लिए जिस मकान का चुनाव किया गया वह बेलियाघाटा के एक बूढ़ी मुस्लिम महिला
का हैदरी मैंशन था। यह इलाका कसाईखाना था और अपराधियों और बदमाशों का बदनाम अड्डा था।
यहां गांधीजी पर हमले हो सकते थे। हिन्दू युवक इसलिए नाराज़ थे कि जब हिन्दुओं का बेरहमी
से क़त्ल हो रहा था तब वे उन्हें बचाने में बिल्कुल नाकाम हुए थे। आज वे मुसलमानों को
बचाने के लिए उनके बीच पहुंच गए हैं। यह सब जानते हुए भी सुरक्षा के लिए गांधीजी ने
कोई हथियारबंद दस्ता लेने से इंकार कर दिया था। उनके साथ दिल में प्रेम, सिर में विवेक
और हाथ में अहिंसा का हथियार था। 13 अगस्त को ढाई बजे सोदपुर आश्रम से निकलने का
निर्णय हुआ।
तुषार गांधी अपनी
किताब 'लेट्स किल गांधी' में लिखते हैं, "13 अगस्त को ठीक 2 बजकर 28 मिनट पर गांधी ने सोदपुर आश्रम का अपना कमरा छोड़ा। 2 बजकर 30 मिनट पर वो कार में ड्राइवर के बग़ल में बैठ कर बेलियाघाटा के एक पुराने मुहल्ले में स्थित हैदरी मंज़िल की
तरफ़ चल पड़े। यह एक मुसलमान का घर था। 12 घंटों में उस घर की सफ़ाई कर उसे रहने लायक
बनाया गया था। ये घर चारों
तरफ़ से खुला हुआ था। वहाँ सिर्फ़ एक ही
शौचालय था और उसका इस्तेमाल सैकड़ों लोग करते थे - जिसमें ड्यूटी पर तैनात पुलिस
वाले, मिलने आने वाले लोग और दर्शन करने आई भीड़ भी शामिल
थी। बारिश की वजह से वहाँ कीचड़ और दलदल हो गया था। वहाँ बदबू आती थी। उस बदबू को
दबाने के लिए हर जगह खूब सारा ब्लीचिंग पाउडर डाला गया था, जिससे सिर चकराने लगता था। गांधीजी को रहने
के लिए एक कमरा दिया गया था और उनके सहयोगियों के लिए एक कमरा अलग से। तीसरे कमरे
में गांधीजी का दफ़्तर बनाया गया था।
जैसे ही गांधी और
सुहरावर्दी की कारें वहाँ पहुंची नाराज़ भीड़ ने उनका स्वागत किया। कुछ लड़के वहां खड़े थे। लड़के काफी उत्तेजित
थे। उन्होंने गांधीजी से कहा, “आप यहां क्यों आए हैं? पिछले साल जब 16 अगस्त को सीधी कार्रवाई के नाम पर हिंदू मर रहे थे तब तो नहीं आए? अब मुसलमान
रो रहे हैं तो आप उनका साथ देने चले आए। आप उन जगहों पर क्यों
नहीं गए जहाँ से हिंदू भाग गए हैं?” लोग नारे लगा रहे थे, “गांधी वापस जाओ।” तभी सुहरावर्दी की गाड़ी वहां पहुंची। लड़कों
ने उसे घेर लिया। गांधीजी ने लड़कों को समझाया और दो लड़कों बातचीत के लिए अन्दर बुलाया।
सुहरावर्दी को अन्दर आने दिया गया।
अभी भीड़ प्रदर्शन कर ही रही थी कि एक
अंग्रेज़ हॉरिस एलेक्ज़ेंडर भी तब तक आ चुके थे। उन्हें गांधीजी ने
बेलियाघाटा में अपने साथ रहने के लिए बुलाया था। घर की खिड़कियों और दरवाज़े पर पत्थर बरस रहे थे।
कुछ युवा लोगों ने खिड़की पर चढ़ कर उस कमरे में घुसने की कोशिश की जिसमें गांधीजी
रुके हुए थे। जैसे ही हॉरिस एलेक्ज़ेंडर ने खिड़कियों को बंद करने की कोशिश की उन पर
पत्थरों की बरसात शुरू हो गई और खिड़कियों के शीशे टूट कर हर दिशा में उड़ने लगे। वहाँ मौजूद हिंदुओं ने गांधीजी पर मुस्लिम समर्थक होने का आरोप लगाते हुए
उनसे बेलियाघाट छोड़ देने के लिए कहा।
प्यारे लाल लिखते हैं, "गांधी ने इन लोगों के साथ दो बार मुलाकात की। इन लोगों ने गाँधी से शिकायत की
कि वो पिछले साल 16 अगस्त को कहाँ थे जब
उनके ख़िलाफ़ 'डायरेक्ट एक्शन' की शुरुआत हुई थी ? अब मुसलमानों के इलाके
में थोड़ी परेशानी आई तो आप उन्हें बचाने दौड़ते हुए चले आए।"
गांधीजी ने लड़कों को समझाया, “पिछले वर्ष जो हुआ, बहुत बुरा हुआ। अगस्त 1946 से लेकर अब तक
हुगली का बहुत पानी बह गया है। उस समय मुसलमानों ने जो कुछ किया वो ग़लत था लेकिन 1946 का बदला 1947 में लेने का
क्या फ़ायदा है ? मैं तो नोआखाली जा रहा था। आपके ही रिश्तेदारों
ने मुझे वहां बुलाया था। अब कलकत्ता में ही रहकर उनका रक्षण करना होगा। मैं हिंदू-मुसलमान
दोनों की सेवा कर रहा हूं। नोआखाली का उत्तदायित्व मैंने सुहरावर्दी और गुलाम सरवर
पर डाला है। अगर बेलियाघाट के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों को वापस आने का न्योता
दें तो वो मुस्लिम बहुल इलाके में जा कर उनसे भी हिंदुओं को वापस बुलाने का अनुरोध
करेंगे।”
गांधीजी की इस मुद्रा
से और काफी समझाने-बुझाने से लड़कों की उत्तेजना कम
हुई। गांधीजी ने कहा मैं
अपने आप को आपके
संरक्षण में दे रहा हूँ। आपको छूट है
कि आप मेरे ख़िलाफ़ हो सकते हैं। मैं अपने जीवन
के अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया हूँ। मैंने नोआखाली
के मुसलमानों से भी इसी अंदाज़ में बात की है। आप क्यों नहीं देख पा रहे कि इस कदम से
मैंने नोआखाली में हिंदुओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी एक तरह से शहीद सुहरावर्दी
और उनके साथियों पर छोड़ दी है ?
जब दिल्ली में सरदार पटेल ने सुना कि
गांधीजी हैदरी मंजिल में रहने चले गए हैं, तो उन्होंने गांधी को पत्र लिखकर अपनी
चिंता का इज़हार किया। उन्होंने लिखा, 'तो आपको
कलकत्ता में रोक लिया गया है वो भी एक ऐसे घर में जो खंडहर बन चुका है और जो
गुंडों और बदमाशों का अड्डा है। क्या आपका
स्वास्थ्य ये तनाव झेल पाएगा ? मुझे पूरा अंदाज़ा है कि वो बहुत गंदी
जगह होगी। मुझे अपने बारे में बताते रहिएगा।'
14 अगस्त को
दूसरे दिन 14 अगस्त को भी यही क्रम चलता रहा। वे युवक फिर आए और सुहरावर्दी की मौजूदगी में
गांधीजी के साथ लंबी बातचीत की। इस बार वे नौजवान पूरी तरह से प्रभावित हो
गए। उन्होंने अपने दोस्तों को शांति और सद्भावना के लिए गांधीजी के साथ काम करने
के लिए मनाने की पूरी कोशिश करने का संकल्प लिया। बाद में उनमें से एक ने दूसरे से
कहा: "यह बुज़ुर्ग कितना जादुई व्यक्तित्व वाला है! हालात चाहे कितने भी
मुश्किल क्यों न हों, उन्हें हार का मतलब तक नहीं पता!" 15 अगस्त के बाद जब हथियारबंद गार्ड हटा लिए गए, तो उनमें से कुछ ने स्वयंसेवक के तौर पर
उनके घर की सुरक्षा की।
हैदरी मैंशन के कम्पाउंड में शाम की प्रार्थना सभा में दस हज़ार लोग शामिल हुए।
गांधीजी ने कहा, “कल 15 अगस्त को हम ब्रिटिश शासन से मुक्त हो
जाएंगे। लेकिन आज आधी रात को भारत दो देशों में
विभाजित हो जाएगा। कल का दिन
ख़ुशी के दिन के साथ साथ दुख का भी दिन होगा। अगर कलकत्ता के बीस लाख हिंदू मुसलमानों को
मारने पर तुले हैं, तो मैं नोआखाली में कैसे मुंह दिखाऊंगा? अगर साम्प्रदायिकता की
आग देश को लपेट लेगी, तो हमारी नवोदित आज़ादी बच नहीं पाएगी।”
प्रार्थना के बाद गांधीजी अपने कमरे में आ गए। थोड़ी देर बाद वो सड़क की तरफ़ खुलने वाली
खिड़की के सामने पहुंच गए। नीचे खड़ी
भीड़ सुहरावर्दी के ख़िलाफ़ नारे लगा रही थी। भीड़ ने पूछा, “सुहरावर्दी कहां है? गांधीजी ने कहा, “मैंने ही उसे घर में रहने
को कहा है, ताकि उसे देखकर आप लोगों का दिल न दुखे।” कुछ लोग मैंशन पर ईंट-पत्थर
बरसाने लगे। सुहरावर्दी ने फर्श पर लेटकर अपनी जान बचाई। गांधीजी ने घर का शटर खोल
दिया और लोगों को समझाने लगे। थोड़ी देर में सारा मामला शांत हो गया। गांधीजी ने कहा,
“सुहरावर्दी पर हमला करना ठीक नहीं है। उन लोगों ने मेरे साथ काम करना स्वीकार किया
है।” किसी ने पूछा, “सुहरावर्दी कहां है?” गांधीजी ने कहा, “वह रोज़ा तोड़ रहा है।” इस पर किसी ने कहा, “वह बेईमान है।” गांधीजी ने कहा, “अगर बेईमान होगा, तो मेरे
साथ टिक नहीं पाएगा।” भीड़ शांत हो चुकी थी।
गांधीजी ने सुहरावर्दी को बुलाया। दोनों एक
साथ खड़े हुए। गांधीजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। सुहरावर्दी बोला, “हमारा परम सौभाग्य है कि
महात्माजी आज हमारे बीच में हैं। हम कलकत्तावासी इस सौभाग्य को कदर करके इस ख़ून-ख़राबे
को बंद कर देंगे।” भीड़ में से किसी ने पूछा,
“कलकत्ता के क़त्लेआम के लिए क्या तुम जिम्मेदार नहीं हो?” उसने कहा, “हां, उसकी जवाबदेही मेरी
थी।” उसके इस ईमानदार वक्तव्य ने भीड़ को प्रभावित किया।
सत्ता के हस्तान्तरण के ठीक पहले कलकत्ता में गांधीजी
की उपस्थिति ने जादू का सा काम किया। गत बारह महीनों का सांप्रदायिक तनाव और विद्वेष
एकाएक समाप्त हो गया। समाचार आया कि पांच हज़ार हिंदू-मुस्लिम दोनों क़ौम का जुलूस गांधीजी
से मिलने आ रहा है। सुहरावर्दी ने कहा, “देखा महात्माजी का चमत्कार, एक ही दिन में जादू
हो गया।” हिन्दुओं और मुसलमानों का दल सड़कों पर एक साथ जमा
होकर स्वाधीनता की पूर्व बेला का जश्न मना रहे थे। एक-दूसरे को प्यार से गले लगा रहे
थे। यह चमत्कार से कम नहीं था!
आज़ादी की पूर्व-संध्या
पर महात्मा गाँधी शाम ढले सुहरावर्दी के साथ लौट आए। कमरे में दरी पर नीचे बैठे थे।
जब वह सोने गए तो रात के 11 बज चुके थे। लेकिन पूरी रात 'जय' के नारे सुनाई
देते रहे। पूरा शहर जश्न के मूड में था। 15 अगस्त के उस बड़े दिन के इंतज़ार में
हर तरफ़ झंडे, सजावट और गाते-बजाते लोगों की भीड़ दिखाई दे रही थी। कई इलाकों में हिंदू
और मुसलमान देर रात तक एक-दूसरे के साथ घुल-मिलकर घूमते दिखे; जबकि कल तक
हालात ऐसे थे कि हिंदू दिन के उजाले में भी मुस्लिम इलाकों में जाने की हिम्मत
नहीं करते थे और मुसलमान भी हिंदू इलाकों में नहीं जाते थे।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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