राष्ट्रीय आन्दोलन
479. विभाजन की स्वीकारता पर मुहर
1947
दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति
का अधिवेशन हुआ। नेहरूजी ने उसमें भारी मन से घोषणा की कि विभाजन ही सबसे कम घातक और
अंतिम उपाय बचा था। इसलिए अनिच्छा के साथ विभाजन स्वीकार करना अनिवार्य हो गया था।
उस दिन भारत के विभिन्न भागों में लोगों ने जमकर खुशियाँ मनायीं।
दिल्ली में जब संविधान सभा के अध्यक्ष ने मोहनदास करमचंद गाँधी को राष्ट्रपिता की उपाधि
देते हुए संविधान सभा की बैठक शुरू की तो बहुत देर तक करतल ध्वनि होती रही। एसेम्बली
के बाहर भीड़ महात्मा गाँधी की जय के नारे लगा रही थी। कांग्रेस
और लीग दोनों ने विभाजन स्वीकार कर लिया था। बहुत से लोगों
को विभाजन के विरुद्ध प्रचंड और उग्र आंदोलन की आशा थी। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी।
जब कांग्रेस और लीग ने विभाजन की योजना पर हस्ताक्षर कर दिया था, तो राजनीतिक अर्थ
में विभाजन की योजना उनके लिए जीवित प्रश्न नहीं रह गई।
बुनियादी मतभेद होने के बावजूद भी, जब गांधीजी ने देखा कि कांग्रेस के नेताओं ने
विभाजन को अपना लिया है, तो उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस के उन प्रतिनिधियों से नेहरू
और पटेल के रुख़ का समर्थन करने का और विभाजन को स्वीकार करने का अनुरोध किया। गांधीजी
जानते थे कि विदेशी तंत्र के सामने सत्याग्रह सरल था, लेकिन अब किसका विरोध करें? सब
तो अपने थे। अपने विश्वस्त साथियों से क्या असहयोग करना या विवाद खड़ा करना? कांग्रेस
मंत्रिमंडल पहले शांति-स्थापना की मांग करती और बाद में विभाजन स्वीकार करती तो ज़्यादा
सही होता। हिंसा और आतंक की धमकी से पाकिस्तान की मांग करना ग़लत था। लेकिन कांग्रेस
मंत्रिमंडल ने शांति-स्थापना का आग्रह ही नहीं किया। लीग की गतिविधियों से त्रस्त और सरकारी अफसरों की दगाबाज़ी से
परेशान कांग्रेस के नेताओं ने विभाजन पर सहमति ज़ाहिर कर दी। जिन्ना की तो मन की मुराद
पूरी हो गई। वायसराय ने 4 जून को गांधीजी को बुलाया, और उन्हें यह समझाने की पूरी कोशिश की कि विभाजन की योजना का विरोध करना क्यों उचित नहीं है। अपनी
प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, “लोकतंत्र में साधारण लोग ही सच्चे
मालिक हैं। उनके नेता, जो अब सरकार में चले गए हैं, उनके सेवक हैं। इसलिए भारतीयों
को अपने नेताओं को कठिन निर्णय लेने के लिए अकेले छोड़ने और बाद में अपने संतोष के लायक़
काम न होने पर उन्हें दोष देने के बजाए उन्हें बताना चाहिए कि वे क्या करें। कांग्रेस
की राय है कि उसे परिस्थितियों के सामने झुकना पड़ा। पक्ष-विपक्ष का सावधानी से विचार
करके उन्होंने अनिच्छापूर्वक विभाजन को मान लिया है। वायसराय को दोष देने से कोई लाभ
नहीं। उन्होंने खुल्लम-खुल्ला कह दिया था कि वे संयुक्त भारत चाहते हैं, परन्तु जब
कांग्रेस ने मुसलिम लीग की स्थिति को मान लिया तब वे कुछ नहीं कर सके। मैंने भरसक प्रयत्न
किया कि लोग संयुक्त भारत के पक्ष में डटे रहें, परन्तु मेरी कुछ नहीं चली। ऐसी परिस्थिति
में मेरा और आपका क्या कर्तव्य है? क्या हम कांग्रेस के ख़िलाफ़ विद्रोह करें? जहां तक
मेरा संबंध है, मैं तो कांग्रेस का सेवक हूं, क्योंकि मैं देश का सेवक हूं। मैं कभी
कांग्रेस संगठन के साथ बेवफाई नहीं कर सकता। विभाजन निश्चित वस्तु बन चुका है। वह तो
हो गया सो हो गया। लेकिन उसके ज़हर को मारा जा सकता है। उसने घृणा और शत्रुता की भावना
बढ़ा दी है। उसे दबा कर मिठास और सद्भाव के साथ विभाजन के ब्यौरे की बातें तय कर ली
जाएं, तो दोनों भाग अभी भी एक-दूसरे के स्थायी शत्रु बनने तथा एक-दूसरे के लिए और दुनिया
की शांति व सुरक्षा के लिए ख़तरा बनने के बजाए मित्रों तथा भले पड़ोसियों की तरह साथ
में रह सकते हैं।”
अपने इस ध्येय को आगे बढ़ाने के लिए गांधीजी ने 6 जून को माउंटबेटन से मुलाक़ात की। उससे कहा जब भी आपको मौक़ा मिले आप जिन्ना को
समझाएं कि अब तो निर्णय हो चुका है। आपको अपना पाकिस्तान मिल गया। आब आप ख़ुद जाकर कांग्रेस
के नेताओं से मित्रों की तरह बातचीत क्यों न कर लें और शेष बातों पर आपस में निबटारा
करने की कोशिश क्यों न करें? जिन्ना को समझाएं कि वे जाकर पूर्व पंजाब और पश्चिम बंगाल
के ग़ैर-मुसलिम अल्पसंख्यकों को अपना बना कर पंजाब और बंगाल के विभाजन को रोकें। 7 जून को गांधीजी ने माउंटबेटन से हुई बातचीत का सार नेहरू को पत्र लिखकर बता दिया।
गांधीजी के सुझाव के अनुसार माउंटबेटन ने जिन्ना से बात की, लेकिन उसका कोई फल नहीं
निकला।
जामिया मिलिया इस्लामिया से मुसलमानों की मंडली गांधीजी से मिलने आई। विभाजन के
भावी परिणामों से वे आशंकित थे। गांधीजी ने उनसे कहा, “अगर एक पक्ष भी हिंसा का
पूरी तरह परित्याग करने और अहिंसा की शक्ति पर निर्भर रहने का निश्चय कर लेता, तो साम्प्रदायिकता
की फैलती हुई आग अपने आप बुझ जाती।” पंजाब से सिक्ख नेता मास्टर तारा सिंह गांधीजी से मिलने
आए। पंजाब का एक-तिहाई से अधिक भाग पाकिस्तान में चला जाने वाला था। गांधीजी ने उनसे
कहा, “आपस की फूट के कारण ही भारत का विभाजन हुआ है।” पूना से आए विद्यार्थियों
के एक दल को उन्होंने कहा, “भारत ने स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए सत्य और अहिंसा
की पद्धति को लक्ष्य के रूप में नहीं बल्कि एक साधन के रूप में अपनाया था, इसलिए ज्यों
ही वह लक्ष्य सिद्ध हुआ वे दोनों हमसे अलग पड़ गए। नतीजा हमारी आज की दुर्दशा है।”
उन्हीं दिनों एक प्रस्ताव आया कि गांधी-परिवार का पैतृक मकान राष्ट्र के लिए ले
लिया जाए। गांधीजी की एक संबंधी महिला वहां रहती थीं। उन्होंने इसे संपत्ति हरण समझा
और उसके विरुद्ध गांधीजी से सहायता मांगी। गांधीजी ने उसे समझाया, “तुम्हें यह मकान छोड़ देना चाहिए और जो भी मुआवज़ा मिले उससे संतोष करना चाहिए। मुझे
स्मारकों की परवाह नहीं है। ... लेकिन यदि हमारे पैतृक घर का की अच्छा उपयोग होता है,
तो तुम्हें या तुम्हारे सलाहकारों को उसमें बाधक नहीं बनना चाहिए।”
इन्हीं दिनों एक वाकया हुआ। गांधीजी ने एक दिन प्रार्थना सभा में कहा, “वह समय तेज़ी से आ रहा है, जब भारत को अपन पहला राष्ट्रपति चुनना होगा। यदि चक्रैया
ज़िन्दा होता, तो मैं इस पद के लिए ख़ुशी से उसके नाम का प्रस्ताव रखता। उसने आपने आप
को मानव-जाति की सेवा में पूरी तरह अर्पण कर दिया था। वह हरिजन था। परन्तु छूत-अछूत
का, हिन्दू-मुसलमान का कोई भेद नहीं रखता था” उसके लिए सब मनुष्य थे
और वह सच्चे अर्थ में मनुष्य था। लेकिन आज वह हमारे बीच नहीं रहा। फिर भी मुझे इस विचार
से ख़ुशी होगी कि कोई भंगी की लड़की हमारा प्रथम राष्ट्रपति बने। ऐसी लड़कियां मौज़ूद हैं।
... भारतीय गणतंत्र के भावी राष्ट्रपतियों के लिए अंग्रेज़ी जानना ज़रूरी नहीं होगा।
... मैंने 1917 या 1918 में ही एक सार्वजनिक भाषण में कह दिया था कि जब तक कोई मोची या भंगी भारत का राष्ट्रपति
नहीं बनेगा, तब तक मुझे संतोष नहीं होगा।”
7 जून को हिन्दू महासभा का एक दल गांधीजी से मिलने आया। उसमें से एक सदस्य ने कहा,
“प्रार्थनाओं में क़ुरान की आयतें न पढ़वाई जाएं। ... आपको राजनीति से हट जाना चाहिए।
जितनी जल्दी आप हटेंगे उतना ही भारत का भला होगा।” गांधीजी ने जवाब दिया,
“मेरा जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित है। मेरी राजनीति सत्य और अहिंसा के आदर्शों
का सामाजिक क्षेत्र में किया जाने वाला विस्तार या प्रयोग मात्र है। मैं इन आदर्शों
के प्रचार में मर जाना पसंद करूंगा, परन्तु स्वाधीनता के बदले में उन्हें छोड़ना पसंद
नहीं करूंगा। इसलिए आपकी सलाह न मानने के लिए आप मुझे क्षमा करें।” उसके बाद समाजवादियों का एक दल गांधीजी से मिलने आया। समाजवादी कांग्रेस के नेताओं
से अलग हो गए थे। दोनों समूहों के बीच सैद्धान्तिक मतभेद थे। विभाजन की योजना कांग्रेस
द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के कारण समाजवादी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से नाराज़ थे। गांधीजी ने उन्हें समझाया, “अब विदेशी लोग जा रहे हैं। सत्ता भारतीयों के हाथ में
आने वाली है। अब अगर सहयोग-वृत्ति प्रकट करने के बजाए आप लोग अड़ंगेबाज़ी की नीति अपनाते
रहेंगे तो देश की कुसेवा होगी। कांग्रेस के नेता जो कुछ कर रहे हैं, वह यदि आपको नापसंद
है, तो आपको उनसे मिल कर चर्चा करनी चाहिए और मित्रतापूर्ण ढंग से आपसी भेद मिटा लेना
चाहिए।”
लंबे समय तक गांधीजी के सेक्रेटेरियल स्टाफ़ की सदस्य के तौर पर काम करने वाली राजकुमारी अमृत कौर उनसे मिलने आई। इन दिनों वे संविधान सभा का काम
देख रही थीं। इसलिए उन्हें गांधीजी से अलग रहना पड़ता। लेकिन जब भी उन्हें समय मिलता
वह गांधीजी की सहायता करने आ जातीं। 8 जून को तपती दोपहरी में वह आईं, तो गांधीजी ने उनसे कहा, “इतनी तेज़ धूप में आने की क्या ज़रूरत थी। संविधान सभा में जो काम तुम कर रही हो,
वह भी मेरी सेवा ही है।” उन दिनों गांधीजी का रक्तचाप बढ़ा रहता था। सीमाप्रांत से जो ख़बरें आ रही थीं,
उससे गांधीजी को काफी वेदना हो रही थी। किसी ने गांधीजी को तार भेजा, “भारत के विभाजन को कांग्रेस ने मान लिया है, लेकिन चारों ओर उसका तीव्र विरोध है।
ऐसी स्थिति में क्या आप आमरण अनशन नहीं करेंगे?” गांधीजी ने जवाब दिया,
“ऐसे उपवासों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। कांग्रेस का मेरे विचारों से मतभेद
हैं, क्या इसीलिए मैं उपवास करूं?”
9 जून को सुबह की सैर के समय हिन्दू महासभा के दो युवक आए और गांधीजी से कहने लगे,
“आप महात्मा नहीं हैं। आप हिन्दुओं को अहिंसा का उपदेश करके दुर्बल बना रहे हैं।” गांधीजी ने उनसे कहा, “तुम नहीं जानते कि तुम्हारे आपत्ति करने के बहुत पहले
ही मैंने महात्मा की पदवी छोड़ दी है। ... जो लोग पाकिस्तान के अत्याचार का बदला लेना
चाहते हैं, तो सही तरीक़ा यह है कि वे पाकिस्तान जाकर अत्याचार करने वाले से लड़ें। भारत
में रहने वाले मुसलमानों से कायरतापूर्ण बदला लेने में कोई बहादुरी नहीं हो सकतीं।” उन युवकों के चले जाने के बाद उन्होंने राजेन्द्र प्रसाद से कहा, “मेरी इच्छा सारे देश में दौरा कर के एक नया आंदोलन छेड़ने की हो रही है। मैं देश
के नौजवानों को रचनात्मक कार्य में लगाना चाहता हूं। मैं देश के लिए कुछ न कुछ करने
का उत्साह उनमें देख रहा हूं। उस उत्साह को कोई सहारा नहीं मिल रहा है। इससे उसके ग़लत
दिशा में जाने का ख़तरा है। लगातार काम करते रहने से गांधीजी के शरीर की ऊर्जा समाप्त
हो गई थी। स्नानघर में व चक्कर खा कर गिर गए। पांच मिनट बाद होश आया तो वे बाहर निकले।
बाहर में राजाजी और घनश्याम दास बिरला उनका इंतज़ार कर रहे थे। गांधीजी का पीला चेहरा
देखकर उन्हें चिंता हुई। उन्होंने गांधीजी को सूचना दी कि प्रयत्नपूर्वक यह समाचार
फैलाया जा रहा है कि आपका अपने साथियों के साथ मतभेद हो गया है और कांग्रेस महासमिति
में आप कार्यसमिति के निर्णय के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएंगे। गांधीजी ने कहा, “विभाजन के बारे में मेरा कार्यसमिति से मतभेद हो सकता है। मैंने मतभेद प्रकट भी
किया है। लेकिन मेरा यह भी कहना है कि समिति ने जो निर्णय किया है उसे सभी कांग्रेसियों
द्वारा स्वीकार कर लिया जाए। संविधान के अनुसार कांग्रेस महासमिति ने अपना अधिकार कार्यसमिति
को सौंप दिया था, इसलिए वह कार्यसमिति के निश्चय को गंभीर विचार के बिना नहीं ठुकरा
सकती।”
14 जून को नेहरू ने गांधीजी को कहा, शाम की महासमिति में आपको भाषण देना होगा। गांधीजी
ने अपने भाषण में कहा, “विभाजन पर कार्यसमिति के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना
या उसमें संशोधन करना आप लोगों के लिए अनुचित होगा। सदन को ऐसा करने का अधिकार तो है,
परन्तु सदस्यों को याद रखना चाहिए कि कार्यसमिति ने आपके प्रतिनिधि की हैसियत से योजना
को स्वीकार किया है। आपका कर्तव्य है कि आप कार्यसमिति का समर्थन करें।” नेहरू ने अपने वक्तव्य में कहा, “लीगी सदस्यों के भीतर से
तोड़-फोर करने और अंग्रेज़ों द्वारा अपने हाथ में नियंत्रण रखने के कारण अंतरिम सरकार
देश में फैलती हुई अराजकता का सामना करने में इतना असमर्थ हो गई थी कि कांग्रेस के
वरिष्ठ नेताओं ने देश के विभाजन की क़ीमत चुका कर भी इस असह्य स्थिति से बचने में सुख
माना। पंजाब और बंगाल के विभाजन जो समस्या उपजी है, हमें उसे रोकने के लिए दृढ़
संकल्प होना है। अंग्रेज़ भारत छोड़कर जा रहे हैं। भारत की क़ानून व्यवस्था में उनकी अब
कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। वे अधिक जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं हैं। इन सब परिस्थितियों
के कारण हमें लगा कि विभाजन को स्वीकार कर लेना ज़्यादा अच्छा है।” पटेल ने नेहरू की बातों का समर्थन करते हुए कहा, “हमारे सामने स्पष्ट वास्तविकताएं
थीं। हमें यह चुनाव करना था कि भारत का एक ही विभाजन हो या अनेक हों। कांग्रेस के लिए
तथ्यों का सामना करना ज़रूरी था। वह भावुकता में नहीं बह सकती थी। महासमिति इसे पसंद
करे य न करे, असल में तो पंजाब और बंगाल दोनों में पहले से ही पाकिस्तान मौज़ूद है।
ऐसी परिस्थितियों में मैं वास्तविक पाकिस्तान को अधिक पसंद करूंगा, क्योंकि तब उन लोगों
को जिम्मेदारी का कुछ ख़्याल रहेगा।” 9 घंटों की बहस के अंत में कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी ने निजी स्पष्टीकरण
दिए। “मैं पिछले तीस बरसों से गांधीजी के साथ रहा हूं। उनके प्रति मेरी निष्ठा कम नहीं
हुई है। यह निष्ठा व्यक्तिगत नहीं, राजनीतिक है। जब मेरा उनसे मतभेद भी हुआ है, तब
भी मैंने उन्हें राजनीतिक दृष्टि से अधिक सही माना है। आज भी मुझ लगता है वे और उनकी
परम निर्भयता सच्ची है और मेरा रवैया दोषपूर्ण है। तब मैं उनके साथ क्यों नहीं हूं?
क्योंकि मुझे लगता है कि सामुदायिक आधार पर समस्याओं का हल करने का अभी उन्हें कोई
उपाय नहीं मिला है। जब उन्होंने हमें अहिंसक
असहयोग आंदोलन सिखाया, तब उनके पास एक निश्चित पद्धति थी। हमने उसका अनुसरण किया था।
आज वे स्वयं अपना मार्ग खोज रहे हैं। वे नोआखाली में रहे। उनके प्रयत्न से स्थिति में
सुधार हुआ। अब वे बिहार में हैं। वहां की स्थिति भी सुधरी है। परन्तु इससे पंजाब की
आग नहीं बुझ रही है। वे कहते हैं कि मैं बिहार में सारे भारत के लिए हिन्दू-मुस्लिम
एकता की समस्या का हल ढूंढ रहा हूं। संभव है, ऐसा हो। परन्तु यह समझना कठिन है कि उसे
हल कैसे किया जा रहा है। निश्चित कदम दिखाई नहीं दे रहे, जो हमें वांछित ध्येय तक पहुंचा
सके। और फिर हमारे दुर्भाग्य से आज गांधीजी नीतियां तो निर्धारित कर सकते हैं, परन्तु
वे कार्यान्वित मुख्यतः दूसरों के द्वारा की जाती हैं। और ये लोग उनकी विचारधारा के
मानने वाले नहीं बने हैं। इस दुखद परिस्थिति में ही मैंने भारत के विभाजन का समर्थन
किया है।” मतगणना के बाद प्रस्ताव के पक्ष में 157 मत पड़े और विपक्ष में 15। विभाजन की स्वीकारता
पर मुहर लग गई।
कांग्रेस अध्यक्ष के भाषण से यह स्पष्ट था कि उन्होंने अहिंसा के असफलता की बात
नहीं की थी। उन्होंने यह स्वीकारा था कि केवल बौद्धिक विश्वास पर आधारित अहिंसा अपर्याप्त
है। अपनी आंखों के सामने हिंसा के भीषण दृश्यों को बुद्धि की आंख से देखकर वे घबरा
उठे थे। गांधीजी ने उसी दृश्य को श्रद्धा की दृष्टि से देखा था। उन्होंने असुरक्षितता
में भी सुरक्षितता महसूस की। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। विभाजन ही कांग्रेस
अध्यक्ष को सबसे सुरक्षित मार्ग लगा। बाद के वर्षों में लगभग सभी बड़े नेताओं ने अपनी
ग़लती स्वीकार की। 16 अक्तूबर, 1949 को न्यूयॉर्क की एक सभा में नेहरू ने स्वीकार किया, “अगर हमें हत्याकांड के
रूप में होने वाले भयंकर परिणामों का ज्ञान
होता, तो हम भारत के विभाजन का प्रतिकार करते।” मौलाना आज़ाद ने एक वक्तव्य
में 2 वर्ष बाद कहा था, “उस समय बापू की बात न मान
कर हमने बड़ी भूल की।” राजेन्द्र प्रसाद ने दुखित हो कर कहा था, “काश, हमें यह परिणाम मालूम होता!” भारत के सभी बड़े नेताओं
के प्रति आचार्य कृपलानी के भी विचार बदल गए थे और उन्हें वे विभाजन का जिम्मेदार मानने
लगे थे।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- राष्ट्रीय
आन्दोलन
संदर्भ : यहाँ
पर
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