गांधी और गांधीवाद
467.
एटली की घोषणा
1947
दिसंबर, 1946 में लंदन में हुए सम्मेलन में प्रधानमंत्री एटली के प्रयासों के बावजूद कांग्रेस और
लीग के मतभेद दूर नहीं हुए। 1947 के आरम्भ में देश के राजनैतिक क्षितिज पर घनघोर
काली घटा छायी हुई थी। दिल्ली में मिलीजुली राष्ट्रीय सरकार की ज़मीन खिसकती जा रही
थी। मुस्लिम लीग कैबिनेट मिशन की योजना से मुकर गई थी।
फरवरी में उसने संविधान सभा में सम्मिलित होने से और मंत्रिमंडल की कार्रवाही में सहयोग
करने से इंकार कर दिया था। फलस्वरूप एक बड़ा संवैधानिक संकट उत्पन्न हो गया। कांग्रेस
भी लीगी मंत्रियों के इस्तीफ़े की मांग कर रही थी। कांग्रेस ने तो यहां तक कह दिया था
कि यदि उसकी मांगे पूरी नहीं हुईं, तो वह भी अंतरिम सरकार से अपने सदस्यों को वापस
बुला लेगी। संविधान सभा को 9 दिसंबर को नई दिल्ली में मिलना था।
बातचीत
की आख़िरी कोशिश
एटली ने लंदन में कांग्रेसी और लीगी नेताओं से बातचीत
की आख़िरी कोशिश के तहत एक सम्मेलन बुलाया। नवंबर 1946 के आखिर में, प्रधानमंत्री एटली ने नेहरू, रक्षा मंत्री बलदेव सिंह, जिन्ना और लियाकत अली खान को एक विशेष बैठक के
लिए 10 डाउनिंग स्ट्रीट बुलाया। डाउनिंग स्ट्रीट सम्मेलन का मकसद मुस्लिम लीग को
संविधान सभा में शामिल करना था। पर इसका नतीज़ा कुछ नहीं निकला। लंदन में अपने
प्रवास के दौरान, जिन्ना ने
सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि उसे उम्मीद है कि भारत एक हिंदू राज्य और एक मुस्लिम
राज्य में विभाजित हो जाएगा। राजनीतिक शतरंज के चतुर खिलाड़ी जिन्ना ने अपने दुराग्रह
से सबको छका कर रखा हुआ था। सारा भारत गृहयुद्ध की-सी स्थिति में था। जिन्ना को यह
एहसास हो गया था कि प्रशासन को कांग्रेस के हाथों में छोड़ देना उसके लिए घातक
साबित होगा; इसलिए उसने
पाकिस्तान के लिए संघर्ष करने के मकसद से सरकार में अपनी जगह बनाने की कोशिश की
थी। उसके लिए, अंतरिम सरकार का
मतलब था—किसी दूसरे तरीके से गृह-युद्ध को जारी रखना। जिन्ना अब 'मिशन प्लान' के ज़रिए नहीं, बल्कि सीधे तौर पर पाकिस्तान हासिल करने का
दांव खेलना चाहता था।
कभी कांग्रेस और कभी लीग के दबाव के कारण लॉर्ड
वेवल का कोई बस नहीं चल
पाता था। वह स्थिति को सुलझाने या उसपर काबू पाने में असमर्थ ही रहा
था। पहले ही इतने दंगे हो चुके थे कि अंग्रेजों को यह उम्मीद होने लगी थी कि अगर
जिन्ना को उन अनुभागों और समूहों में निहित 'आधा पाकिस्तान' या 'चौथाई पाकिस्तान' नहीं मिला, तो और भी दंगे होंगे। डाउनिंग स्ट्रीट सम्मेलन
असहमति के साथ ही समाप्त हुआ।
कठिन और नाज़ुक स्थिति
स्थिति कठिन और नाज़ुक
थी। मूल रूप से, मुस्लिम लीग ने 16 मई, 1946 की कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया था, और इस प्रकार संविधान
सभा में शामिल होने पर सहमति व्यक्त की थी। हालाँकि, बाद में उसने अपनी
सहमति वापस ले ली। जिस मुद्दे पर जिन्ना
ने असेंबली से नाम वापस ले लिया था, वह मुद्दा क्या था? कैबिनेट मिशन की योजना के अनुच्छेद 19 में यह प्रावधान था कि
संविधान सभा पहले नई दिल्ली में एक छोटे, औपचारिक सत्र के लिए
मिलेगी और फिर प्रांतों के तीन समूहों के अनुरूप तीन खंडों में विभाजित हो जाएगी:
समूह 'A' में केंद्र—यानी भारत का हृदय-क्षेत्र—शामिल था और
यहाँ की आबादी मुख्य रूप से हिंदू थी; समूह 'B' में उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत, सिंध और पंजाब शामिल
थे, जहाँ की आबादी का बड़ा हिस्सा मुस्लिम था; और समूह 'C' में—जो उत्तर-पूर्व में स्थित था—बंगाल और असम शामिल
थे। हर अनुभाग अपने
प्रांतों के समूह के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार करेगा। लेकिन अगर किसी प्रांत
को वह संविधान पसंद नहीं आता, तो वह उस समूह से बाहर
रह सकता था। इस प्रकार, हिंदू असम को मुस्लिम बंगाल के साथ 'सेक्शन C' में बैठना होगा और 'ग्रुप C' के लिए संविधान बनाने
में हिस्सा लेना होगा। लेकिन अगर असम को बना हुआ संविधान पसंद नहीं आता है, तो वह 'ग्रुप C' से अलग होकर अकेला रह
सकता है, या शायद 'ग्रुप A' में शामिल हो सकता है। सेक्शन में शामिल होना अनिवार्य था, जबकि ग्रुप में शामिल होना स्वैच्छिक था। गांधी ने इस पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह एक तरह की ज़बरदस्ती है और
इससे मेहनत ही बर्बाद होगी। मान लीजिए कि बंगाल—जिसका 'सेक्शन C' में भारी बहुमत होगा—एक ऐसा संविधान तैयार कर ले जो
असम को 'ग्रुप C' से बांध दे। और फिर, 'उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत' (North-west Frontier Province) को—जो भले ही मुख्य
रूप से मुस्लिम-बहुल था, लेकिन हमेशा से जिन्ना-विरोधी रहा था—पंजाब और सिंध
के साथ बैठने के लिए क्यों मजबूर किया जाए? जिन्ना को संतुष्ट
करने के उद्देश्य से कैबिनेट मिशन की योजना में 'खंडों' और 'समूहों' को शामिल किया गया था; ये पाकिस्तान की ओर बढ़ने का एक आधा या शायद चौथाई कदम थे। इन्होंने भारत को
तीन संघीय इकाइयों में विभाजित कर दिया। ठीक इसी कारण से गांधीजी ने इन्हें
अस्वीकार कर दिया। संविधान सभा का सत्र चल रहा था, लेकिन लीग ने उसका
बहिष्कार कर दिया था; जबकि सच्चाई यह थी कि पूरा देश आज़ादी की माँग पर
एकजुट था। एक तरफ़, लोग आज़ादी पाने के लिए बेसब्री से इंतज़ार कर रहे
थे। दूसरी तरफ़, सांप्रदायिक समस्या का कोई समाधान नहीं था। कैबिनेट मिशन
योजना ही एकमात्र समाधान पेश करती थी, और फिर भी कांग्रेस अपने
मतभेदों को सुलझाने के लिए इस मुद्दे को अंतिम रूप नहीं दे पाई।
कांग्रेस में गांधी का कम होता प्रभाव
नेहरू ने लंदन से
लौटने के कुछ ही समय बाद, नई दिल्ली से नोआखली के श्रीरामपुर गाँव तक की लंबी
यात्रा की और 27 दिसंबर, 1946 को महात्मा को डाउनिंग
स्ट्रीट में किसी सहमति पर पहुँचने में हुई ऐतिहासिक विफलता के बारे में जानकारी
दी। लेकिन गांधीजी ने असम और सिखों को अपनी सलाह दोहराई कि वे संवैधानिक वर्गों और
समूहों से अलग रहें। वे इन्हें भारत को बांटने के साधन मानते थे और ऐसी किसी भी
चीज़ को स्वीकार करने से इनकार करते थे जो विभाजन में योगदान देती हो। अखिल भारतीय
कांग्रेस समिति ने 6 जनवरी, 1947 को 52 के मुकाबले 99 वोटों से यह प्रस्ताव पारित
किया कि इन अनुभागों को स्वीकार कर लिया जाए। कांग्रेस में गांधीजी का प्रभाव कम
होता जा रहा था। गांधीजी नोआखली इसलिए गए थे, ताकि हिंदुओं और
मुसलमानों के बीच के मानवीय बंधन को मज़बूत कर सकें—इससे पहले कि राजनीति और
कानूनी प्रावधान उसे तोड़कर अलग कर दें। उन्हें भारत के विभाजन के परिणामों का
गहरा डर था। गांधीजी अभी भी हिंदू-मुस्लिम दोस्ती में विश्वास रखते थे। नेहरू और
पटेल संवैधानिक विभाजन के लिए राज़ी हो गए, यह जानते हुए भी कि यह
पाकिस्तान की शुरुआत हो सकती है; लेकिन उन्हें गृहयुद्ध
के अलावा कोई दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। उन्हें उम्मीद थी कि जिन्ना तीन
संघीय राज्यों में बँटवारे से खुश हो जाएंगे और पाकिस्तान की माँग छोड़ देंगे।
सत्ता
हस्तांतरण के लिए तारीख तय
समझौते का समय नज़दीक आ रहा था। वायसराय लॉर्ड
वेवेल, दृश्य से ओझल हो गया।
वह एक शांत, बल्कि नपे-तुले
स्वभाव का व्यक्ति था। वह उस समय काम कर
रही ताकतों को समझने में नाकाम रहा था और इसलिए इस मामले को किसी संतोषजनक नतीजे
तक पहुँचाने में और भी ज़्यादा असमर्थ था। ब्रिटेन की लेबर सरकार को लगा कि वे एक दुविधा
का सामना कर रहे हैं। क्या उन्हें मौजूदा स्थिति को ऐसे ही चलने देना चाहिए, या उन्हें अपनी पहल पर कोई आगे का कदम उठाना
चाहिए? एटली का मानना
था कि अब एक ऐसा पड़ाव आ गया है जहाँ अनिश्चितता बनाए रखना बिल्कुल भी ठीक नहीं
है। एक स्पष्ट निर्णय लेना ज़रूरी था, और उसने तय किया कि ब्रिटिश सरकार भारत से अपनी
सत्ता वापस लेने के लिए एक तारीख तय करेगी। स्थिति को अराजकता की ओर बढ़ते देख कर ब्रिटिश
प्रधानमंत्री क्लीमेण्ट एटली आखिरी कोशिश के तौर पर लन्दन में कांग्रेस और लीगी
नेताओं को एक सम्मेलन के लिया बुलाया था। उसका भी नतीजा कुछ नहीं निकला था। इस
विकट परिस्थिति में ब्रिटिश प्रधानमंत्री
क्लीमेण्ट एटली इस नतीजे पर पहुंचा कि एक नई नीति की जरूरत है और एक नया वायसराय ही
उसे कार्य रूप दे सकेगा। एटली का मानना था कि सत्ता हस्तांतरण के लिए एक
तारीख तय कर दी जाए, और इस तरह सारी
ज़िम्मेदारी सीधे-सीधे भारतीयों के कंधों पर डाल दी जाए। लॉर्ड वेवेल को इस बात पर
यकीन नहीं हुआ। उसने अब भी यही तर्क दिया कि अगर सांप्रदायिक मुश्किलों की वजह से
हिंसा भड़कती है, तो इतिहास
अंग्रेजों को कभी माफ़ नहीं करेगा। अंग्रेजों ने भारत पर सौ साल से भी ज़्यादा समय
तक राज किया था, और अगर उनके यहाँ
से चले जाने के बाद अशांति, हिंसा और अव्यवस्था फैलती है, तो इसके लिए वे ही ज़िम्मेदार होंगे। जब उसे
लगा कि वह एटली को अपनी बात नहीं समझा पा रहा है, तो लॉर्ड वेवेल ने अपना इस्तीफ़ा दे दिया।
एटली की घोषणा
20 फरवरी, 1947 को, एटली ने हाउस ऑफ कामंस
में घोषणा की कि “ब्रिटिश सरकार ने जून, 1948 तक भारत छोड़ने का
पक्का इरादा कर लिया है और यदि उस समय तक भारतीय राजनैतिक दल अखिल भारतीय संविधान के
विषय में एकमत न हो सके तो ब्रिटिश भारत में किसी तरह की केंद्रीय सरकार को या कुछ
क्षेत्रों की तत्कालीन प्रांतीय सरकारों को सत्ता हस्तांतरित कर दी जाएगी।” एटली को भारत के संबंध
में सबसे अधिक डर गृहयुद्ध का था।
उस समय सामाजिक रूप से कई उग्र परिवर्तनकारी आंदोलन
चल रहा था। जिनमें प्रमुख थे बंगाल का तेभागा आंदोलन, त्रावणकोर में पुन्नपरा-वायलार
सशस्त्र आंदोलन, और तेलंगाना आंदोलन। तेलंगाना आंदोलन सभी सामाजिक रूप से क्रांतिकारी आंदोलनों का
चरम बिंदु था। इन आंदोलनों ने निस्संदेह जो भय पैदा किया, उसने उस अंतिम समझौते को संभव बनाने में मदद की, जिसके तहत विभाजन और सांप्रदायिक नरसंहार की
कीमत पर सत्ता का 'शांतिपूर्ण' हस्तांतरण सुनिश्चित किया गया। उम्मीद यह थी कि
यह तारीख (30 जून, 1948) सभी पार्टियों को मुख्य मुद्दे पर सहमत होने के लिए मजबूर कर देगी और उस
संवैधानिक संकट को टाल देगी, जिसका खतरा मंडरा रहा था। एटली ने घोषणा की कि
भले ही उस तारीख तक भारतीय राजनेता किसी संविधान पर सहमत न हो पाए हों, फिर भी ब्रिटिश सरकार सत्ता सौंप देगी—'चाहे वह संपूर्ण रूप से ब्रिटिश भारत के लिए
गठित किसी केंद्रीय सरकार को सौंपी जाए, या कुछ क्षेत्रों में वहाँ की मौजूदा प्रांतीय
सरकारों को, अथवा किसी ऐसे
अन्य तरीके से सौंपी जाए जो सबसे अधिक तर्कसंगत प्रतीत हो और भारतीय जनता के
सर्वोत्तम हितों के अनुकूल हो।’ ब्रिटिश प्रधानमंत्री
के 20 फरवरी के वक्तव्य को नेहरूजी ने “समझदारी और साहसपूर्ण” कहा था। जिन्ना को
भी उस ऐतिहासिक वक्तव्य से प्रसन्नता हुई। कांग्रेस के हलकों में इस बयान का
ज़ोरदार स्वागत हुआ; इसे ब्रिटिश सरकार
के देश छोड़ने की ईमानदारी का पक्का सबूत माना गया। देश के बँटवारे की बात उस शर्त
में छिपी थी कि अगर संविधान सभा पूरी तरह से प्रतिनिधि सभा नहीं बन पाती (यानी, अगर मुस्लिम-बहुल प्रांत इसमें शामिल नहीं
होते), तो सत्ता एक से
ज़्यादा केंद्रीय सरकारों को सौंपी जाएगी। लेकिन कांग्रेस को यह बात भी मंज़ूर थी, क्योंकि इसका मतलब यह था कि मौजूदा संविधान सभा
आगे बढ़कर उन इलाकों के लिए संविधान बना सकती थी, जिनका प्रतिनिधित्व उसमें था। जिन्ना को पहले
से कहीं अधिक विश्वास था कि अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उसे बस सही समय का
इंतज़ार करना है।
लॉर्ड माउण्टबेटेन
भारत का वायसराय
एटली ने घोषणा तो कर दी थी, लेकिन उसे सत्ता के
शांतिपूर्ण हस्तांतरण की ज़रा भी उम्मीद नहीं थी। पर वह मानता था कि एक व्यक्ति है जो
शायद गाड़ी को खींच ले जाए। वह व्यक्ति ब्रिटेन के महाराजा के चचेरे भाई और महारानी
विक्टोरिया के पर-पोते रियर एडमिरल लॉर्ड लुईस माउंटबेटन (लुईस फ्रांसिस अल्बर्ट विक्टर निकोलस माउंटबेटन ) था और उसने यह भी
घोषणा की कि लॉर्ड वेवल के स्थान पर बर्मा में तैनात लॉर्ड माउण्टबेटेन भारत के वायसराय
होंगे। लॉर्ड लुई माउंटबेटन—दक्षिण-पूर्व एशिया के पूर्व सुप्रीम कमांडर और शाही
परिवार से ताल्लुक रखने वाले एक नौसेना अधिकारी था। इस तरह लॉर्ड लुईस माउंटबेटन
भारत का भारत के बीसवां और अंतिम ब्रिटिश वायसराय बना। उसे जून 1948 तक भारत में
ब्रिटिश साम्राज्य का इस प्रकार विसर्जन करना था कि वह अधिक से अधिक बुद्धिसंगत और
भारतीय जनता के हित में सर्वोत्तम दिखाई पड़े। एक तय तारीख का
विचार असल में वेवेल का था; 31 मार्च 1948 वह तारीख थी, जब तक उसे उम्मीद थी कि 'बिना सत्ता के ज़िम्मेदारी' वाला दौर शुरू हो जाएगा। एटली का मानना था कि
1948 के मध्य का समय
इस लक्ष्य के लिए सही रहेगा। माउंटबेटन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह एक कैलेंडर
तारीख होनी चाहिए, और इस तरह 30 जून 1948 की तारीख तय हो गई।
कई मौक़ों पर माउंटबेटन ने ब्रिटेन की बड़ी
ज़िम्मेदारी भी संभाली थी। एक नौसैनिक अधिकारी के तौर पर माउंटबेटन दोनों विश्व
युद्धों में शामिल हुए था। दूसरे विश्वयुद्ध के समय वह दक्षिण-पूर्व एशिया में
प्रधान सेनापति था। लॉर्ड माउंटबेटन के
लिए भारत में बुरे से बुरा राजनीतिक गतिरोध, विकट साम्प्रदायिक हिंसा और अराजकता की
स्थिति, गुटों में विभाजित केन्द्रीय सेक्रेट्रिएट, अस्त-व्यस्त प्रशासन तंत्र इंतज़ार
कर रहा था। वह ब्रिटेन के राजवंश का सदस्य था। वह निश्चित और व्यवस्थित आदतों वाला
व्यक्ति था। उसकी बुद्धिमत्ता तीक्ष्ण और सर्वग्राही थी।
बेटनबर्ग के राजकुमार लुईस फ्रांसिस अल्बर्ट
विक्टर निकोलस का जन्म 25 जून 1900 को विंडसर में हुआ था। उस समय महारानी
विक्टोरिया ब्रिटेन की गद्दी पर थीं। माउंटबेटन के पिता लुई बेटनबर्ग के राजकुमार
थे, जबकि उसकी माँ ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया की पोती थीं। पहले विश्व युद्ध
के समय माउंटबेटन के पिता ने अपने परिवार का नाम 'बेटनबर्ग' से बदलकर 'माउंटबेटन' रख दिया था।
शुरुआती शिक्षा मुख्य रूप से घर पर ग्रहण कर 1914 में माउंटबेटन
डार्टमाउथ के रॉयल नेवल कॉलेज में दाखिला लिया। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद, उसके कैरियर
की शुरुआत 1916 में ब्रिटेन की रॉयल नेवी में एक अधिकारी कैडेट के रूप में शुरू हुई, अपनी गहन मेहनत, समर्पण और प्रतिबद्धता के माध्यम से, उसने ब्रिटिश रॉयल नेवी के सबसे प्रतिष्ठित स्थान, फ्लीट एडमिरल को प्राप्त किया।
माउंटबेटन ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान
विध्वंसक नौसैनिक पोत 'एचएमएस केली' की कमान संभाली थी। अगस्त 1942 में माउंटबेटन को
कई देशों की फौज के उस संयुक्त ऑपरेशन का प्रमुख नियुक्त किया गया था, जिसके तहत उत्तरी
फ्रांस में जर्मनी के कब्ज़े वाले डिएप्पे पोर्ट पर छापा मारा गया था। इस अभियान में माउंटबेटन
ने अपनी कुशल प्रतिभा का परिचय दिया और सफलता हासिल की। अपनी चालबाज़ी में
माउंटबेटन कूटनीति, चापलूसी, धमकियों और
प्रलोभन देने जैसे तरीकों का इस्तेमाल करता था। अक्टूबर 1943 में माउंटबेटन को सुप्रीम एलाइड कमांडर साउथ ईस्ट एशिया कमांड (SEAC) नियुक्त किया गया था। दूसरे विश्व युद्ध
के दौरान मित्र देशों का गुट जर्मनी और उसके गुट वाले देशों के ख़िलाफ़ जंग लड़
रहा था। माउंटबेटन की
ज़िम्मेदारी भारत, श्रीलंका, बर्मा, मलाया और इंडो-चीन
तक फैली हुई थी। जनरल विलियम स्लिम
के साथ काम करते हुए, उसे जापान से बर्मा और
सिंगापुर को बुलाया ग़या। सितंबर 1945 में माउंटबेटन ने
सिंगापुर में जापान से दूसरे विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण कराने में सफलता पाई थी। 1946 में एसईएसी को भंग कर दिया गया, जिसके बाद
माउंटबेटन अपने रियर-एडमिरल रैंक के साथ घर लौट आया।
1947 में ब्रिटेन के
प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने माउंटबेटन को भारत के अंतिम वायसराय के तौर पर नियुक्ति
की घोषणा कर दी। माउंटबेटन को भारत
से ब्रिटेन की वापसी की देखरेख करनी थी। भारत की आज़ादी के
बाद भारत के नेताओं ने माउंटबेटन को भारत का अंतरिम गवर्नर जनरल बनाया था। माउंटबेटन 1948 तक भारत का गवर्नर
जनरल रहा। उनके बाद यह ज़िम्मेदारी सी राजगोपालाचारी ने
संभाली थी। 1953 में माउंटबेटन फिर
से ब्रिटिश नौसेना में वापस चला गया। उसे 1954 में नौसेना में
‘फ़र्स्ट सी लॉर्ड’ के तौर पर नियुक्त किया गया। 1959 में माउंटबेटन
डिफ़ेंस स्टाफ का प्रमुख बनाया गया। नौसेना से वह 1965 में रिटायर हुआ।
अपने करियर का लंबा वक़्त पानी के बीच गुज़ारने
वाले माउंटबेटन की मृत्यु भी पानी में ही हुई थी। उत्तरी आयरलैंड
संकट के खूनी संघर्ष दिनों में उसकी हत्या कर दी गई थी। उसकी हत्या 27 अगस्त 1979 को हुई थी। उसकी हत्या में
आईआरए यानी आयरिश रिपब्लिकन आर्मी का हाथ पाया गया था। वह सोमवार का दिन था। माउंटबेटन उस दिन
उत्तर पश्चिम आयरलैंड के मुल्लघमोर बंदरगाह में मछली पकड़ने वाली बोट पर सवार था। माउंटबेटन की नाव ‘शैडो वी’ मुल्लाघमोर गांव से
निकली ही थी कि सुबह क़रीब साढ़े ग्यारह बजे नाव में वह धमाका हुआ था, जिसमें माउंटबेटन
की मौत हो गई। एक चश्मदीद ने
बताया था कि धामाके से नाव के टुकड़े-टुकड़े हो गए और उसमें सवार सभी सात लोग पानी
में गिर गए। धमाके की आवाज़
सुनकर आस-पास के मछुआरे लोगों को बचाने के लिए दौड़े और माउंटबेटन को पानी से बाहर
निकाला। लेकिन इस धमाके
में उसके पैर लगभग कट चुके थे और कुछ ही देर बाद उसकी मृत्यु हो गई। माउंटबेटन का अंतिम संस्कार वेस्टमिंस्टर एब्बी
में हुआ और उसे हैम्पशर के ब्रॉडलैंड्स में उनके घर के पास रोम्सी एब्बी में
दफनाया गया।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- गांधी और गांधीवाद
संदर्भ : यहाँ पर
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