सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

वह प्राचीन क़िला

वह प्राचीन क़िला

श्यामनारायण मिश्र


आसमान से बातें करता,
वह प्राचीन क़िला।
हमको मरे हुए कछुए-सा,
औंधा पड़ा मिला।

गुंबद गले, छत्र टूटे,
दीवारों में बीवांई।
भव्य बावली में है
जल की जगह, सड़ी काई।
जल के सपनों-सा टूटा,
पत्थर में कमल खिला।

फानूसों की जगह हो गया,
जालों का अनुबंध।
इत्र-सुगंधों की वारिस
सीलन औ’ दुर्गन्ध।
तोत मैना नहीं
चहकते उल्लू मूड़ हिला

राजकुमारी झांड़ू देती,
बर्तन मलती रानी।
राजकुमार बावला,
कुल की, अंतिम एक निशानी।
दादा से दिल्ली कंपती थी,
पोतों को दूभर है,
अपना ही तहसील, ज़िला।

(चित्र : आभार गूगल सर्च)


21 टिप्‍पणियां:

  1. कल हैदराबाद के किसी नवाब की बात हो रही थी !
    आज उस नवाब का पोता कुछ ऐसे ही हालातों में है
    समय के साथ बहुत कुछ परिवर्तन होता है ...यही इस रचना
    में पढने को मिला ....आभार सुन्दर रचना के लिए !

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  2. दादों से दिल्ली कंपती थी..बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  3. परदेसी के हाथ हमेशा इज्ज़त बिकी यहाँ पर ,
    जनमें जब ऐसे कपूत तो दोष धरोगे किस पर !

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  4. राजकुमारी झांड़ू देती,
    बर्तन मलती रानी।
    राजकुमार बावला,
    कुल की, अंतिम एक निशानी।
    दादा से दिल्ली कंपती थी,
    पोतों को दूभर है,
    अपना ही तहसील, ज़िला।

    ....क्या यह सामयिक विडम्बना ही है ???

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  5. वाह....
    बहुत बढ़िया....
    हलके शब्दों में भारी अभिव्यक्ति....

    सादर
    अनु

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  6. कुल की, अंतिम एक निशानी।
    दादा से दिल्ली कंपती थी,
    पोतों को दूभर है,
    अपना ही तहसील, ज़िला,,,,,,बेहतरीन अभिव्यक्ति,,,

    दुर्गा अष्टमी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें *

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  7. आसमान से बातें करता,
    वह प्राचीन क़िला।
    हमको मरे हुए कछुए-सा,
    औंधा पड़ा मिला।

    इन पुण्य आत्माओं की अप्रतिम रचनाएं पढ़वा संजोके आप एक बड़ा काम कर रहें हैं .

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  8. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा मंगलवार २३/१०/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका स्वागत है

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  9. दफ़न यादों में सब कुछ है कोई शिकवा गिला .
    सहेजा मान मर्यादा फिर सब खोया कहाँ मिला .

    besutiful lines to remember

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  10. ऐतिहासिक धरोहरों का यही हाल रहा ... सुंदर प्रस्तुति

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  11. बहुत सुन्दर सार्थक ऐतिहासिक चित्रात्मक प्रस्तुति ..आभार

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  12. सार्थक ऐतिहासिक चित्रात्मक प्रस्तुति ..बहुत खूब..

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  13. मनोज जी! आपके पास जिस रूप में भी इनकी कविताओं का सनाकलन है.. कृपया मुझे भेजें.. एक एक नवगीत मुझे लालच दिलाता है पूरा पढ़ जाने का!!

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  14. बहुत ही बेहतरीन चित्रण है..
    भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  15. आसमान से बातें करता,
    वह प्राचीन क़िला।
    हमको मरे हुए कछुए-सा,
    औंधा पड़ा मिला।....dard ki parakashtha hai.....

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  16. दादा से दिल्ली कंपती थी,
    पोतों को दूभर है,
    अपना ही तहसील, ज़िला।

    बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति.

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  17. मुग़ल-वंश की वर्तमान हालात सी व्यथा या फिर डूबते सूरज का सच..

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