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बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

देसिल बयना - 51 : खस्सी मार घरबैय्या खाय, हत्या लेके पाहुन जाय

देसिल बयना - 51

खस्सी मार घरबैय्या खाय, हत्या लेके पाहुन जाय

करण समस्तीपुरी

कवि कोकिल विद्यापति के लेखिनी की बानगी, "देसिल बयना सब जन मिट्ठा !"
दोस्तों हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतीम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप AIbEiAIAAAAhCOGGwPuf3efHRhC_k-XzgODa1moYsN388brgg9uQATABK_5TSqNcP8pRR08w_0oJ-am4Ew4 सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज  ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रहे इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं
 करण समस्तीपुरी

हफ्ता भर से गाँव में गुल-गुल हो रहा था। उसी दिन चुल्हिया माय साड़ी के अंचरा से मुँह दाबे बड़की काकी को कह रही थी, "माई जी ! घोर कलयुग.... ! बाभन-वैष्णो के घर में भी.... !" चुल्हिया माय का बोली बंद हो गया था मगर होंठ ऊपर नीचे हो रहे थे और हाथ से इशारा कर के कुछ कही थी जिस पर काकी 'अरे राम हो....' बोल कर दांतों तले जीभ दबा ली थी।

सांझ में खेलावन मल्लिक पेठिया से लौटते वक़्त तम्बाकू चबाने के लिए, झपसी काका के दालान पर बैठ गए। तम्बाकू पर अस्सी चुटकी नब्बेताल देते हुए काका पूछे थे, "तब मल्लिक जी ! अरे का हाल है आपके टोला का... ई का सब सुनते हैं ?"

मल्लिक जी इधर-उधर देख कर बोले, "का रहेगा..... ? ई बटोही ठाकुर का घरैना तो सारा संस्कार बिसर गया..... ! पहले का जमाना रहता तो अभी तक.... ! मगर अब कौन किसको बोलनेवाला है.... ?"

काका बोले थे, "नहीं मल्लिक जी !  ई पर अंकुश तो लगाना पड़ेगा.... ! नहीं तो.... !" कह कर झपसी काका मल्लिक जी के सामने हाथ पसार दिए थे। मल्लिक जी चुटकी भर तम्बाकू उठा कर निचले होंठ में दबाये फिर थू-थू कर के बोले, "सो तो है ही... ! जामुन राय भी कह रहे थे कि उसके ऊपर करवाई तो करना पड़ेगा.... !"

उ दिन इस्कूल से लौट रहे थे तो देखे कि काली-थान में दरी जाजिम बिछाया हुआ था। छोटका बच्चा सब बेल्टी उलट रहा था और गीत गा-गा कर स्वांग उतार रहा था, "कान-कनैठी ! मंगल-बैठी !! पीपल तल पंचैती !!!"

हम सोचे का बात है... ? इतना तैय्यारी... ? अभी तो लगन-उगन भी नहीं है। मेला में भी देरी है.... ! फिर ई सब ताम-झाम....? वहीं पीपल के जड़ में बैठे सुक्कन मामू चरित्तर धोबी से बतिया रहे थे। बटोही ठाकुर का पंचैती होने वाला है..... ! अब तक कुछ मामला भी समझ में आने लगा था। वैसे भी मामला समझ में आये चाहे नहीं, हमरे लिए गाँव-घर का पंचायती उतने मजेदार था जितना कि आज कल के लेडी के लिए टीवी सीरियल होता है। हम भूख-प्यास सब भूल कर बगली में बस्ता दबाये कार्य-करम शुरू होने का इंतिजार करने लगे।

तुरते पंच-परमेश्वर का कहचरी जम गया। सरपंच बाबू सवाल का गोला दागने लगे। बीच-बीच में जामुन राय और सरयू चौधरी भी नुख्ता फ़ेंक देते थे। बटोही ठाकुर और उनका बेटा सुखैय्या सब कुछ गट-गट सुन रहा था। सब कुछ पूछ लेने के बाद सरपंच बाबू बोले, "ठाकुर जी, ई तो जघन्य अपराध है। ब्रहामन के घर में जीव-हत्या उ भी पितरपक्ख में.... ! आप तो गियानी पंडित हैं। आपही कहिये.... ! वेद-पुराण में भी इ के लिए कौनो प्रायश्चित है...?"

"ओह्हो.... ! तो चुल्हिया माय और खेलावन मल्लिक इसी की बात कर रहे थे.... ! अच्छा !" अब हमरे समझ में आया। बटोही ठाकुर के घर में पितरपक्ख में खस्सी का मांस बना था.... !" चलो अब आएगा खेल का मजा। पंडीजी दूसरे को बड़ा पतिया-प्रायश्चित लगाते हैं। आज आया है ऊँट पहाड़ के नीचे।

लेकिन बटोही ठाकुर भी थे खेलल खेसारी। वैसे ही सात गाँव नहीं पुजाते थे। शातिर वकील जैसे पहिले सब बात सुन लिए फिर इत्मीनान से बोले, "सरपंच बाबू ! वैसे तो हम मानते हैं ई अपराध अच्छम है। मगर ई पाप कौनो हम चाहे हमारा पिरवार अपने लिए नहीं किया है।"

जामुन राय तरंग कर बोले थे, "अच्छा ! अपने लिए नहीं तो का... ? एक पक्ख अगारी काली माई को बलि दे रहे थे का...?"

लेकिन ठाकुर जी फिर भी नहीं उखरे। एकदम शांति से बोले, "नहीं राय जी ! काली माई नहीं ! भगवान को भोग लगा रहे थे.... !"

सरयू चौधरी के आँख का कोर फड़क उठा था, "सुनिए सरपंच बाबू ! 'एक तो चोरी और ऊपर से सीनाजोरी !!' अब अपने साथ साथ भगवान को भीभ्रष्ट करने पर लग गए हैं।"

सरपंच बाबू भी डपट लगाए, "ओहि ठाकुर जी ! भासियाइये मत ! सोच-संभाल कर बोलिए... !"

बटोही ठाकुर दोनों हाथ जोड़ कर बोले, "सोच-संभाल कर ही बोलें हैं हजूर। हम अपना परिवार को पितरपक्ख तो क्या फगुआ में भी ई का औडर नहीं देते। मगर ई तो शस्त्र-पुरान में भी कहा गया है और आप हम सभी जानते हैं, "अतिथि देवो भवः !" है कि नहीं.... ? उ में भी मिथिला में जहां पाहुने साक्षात भगवान हैं। उ दिन कमला पार पाहुन आये रहे। जमींदारी घर के हैं। कम से कम एक शाम  'बड़ा खाना' होना ही चाहिए। अब पाहुन के सत्कार में ई अपयश भी लेना पड़ा.... ! हम तो अतिथि का सत्कार कर अपना धर्म निबाहे.... ! अब सकल समाज को ई अपराध लगता है तो हमें जो सजा दे....... !", इतना कह कर ठाकुर जी दरी पर उकरु मार के बैठ गए।

अहि रे तोरी के.... ! बटोही ठाकुर तो एक्कहि मंतर में सब का भूत उतार दिए। सभी पंच एक-दूसरे का मुँहतक्की कर रहे थे। प्रकट कोई नहीं कर रहा था लेकिन दो-चार का ग्रुप बना कर लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। कोई ठाकुर जी को चालाक, तो कोई धूर्त तो कोई महात्मा कह रहा था।

पंच में से हरखू सिंघ ही बोल सके, "भाई ! जो कहो.... ! लेकिन ठाकुर जी का पाइंट भी सही है। आखिर पाहुन मेहमान आ जाएगा तो आदमी का करेगा... ? पंडी जी सच में गियानी हैं। कौनो काम बिना शास्त्र-पोथी के नहीं करते हैं.... ! अभी सुना न.... धरम शास्त्र में भी कहता है कि पाहुनकुटुम भगवान से भी बढ़ कर होता है। हत्या तो हुआ मगर ई तो अतिथि देवता को खुश करने के लिए हुआ न... !"

सरयू चौधरी लगता था कौनो जमाने से चोटियाये हुए थे। फट से बतकट्टी कर दिए, "अच्छा ई का दोष नहीं मगर पाहुन को भी तो पितरपक्ख मालुम था.... !" उधर जामुन राय भी दही में सही मिला रहे थे।

तमाम राय-मशविरा के बाद सरपंच बाबू खड़े होकर फैसल सुनाये, "बटोही ठाकुर गियानी पंडित हैं। उनके घर पितरपक्ख में खस्सी खाना सच में बड़ा अपराध है। मगर उ अपराध किये तो पाहुन पूजा के लिए लिए, जो कि अपराध से कही बड़ा धर्म है। अगर पाहुन नहीं आते तो हमको विश्वास है कि पंडीजी के घर मे ई सब नहीं होता। ठाकुर जी का परिवार तो अपना धर्म निबाह रहा था मगर पाहुन का क्या करतब था... ? कम से कम मना तो कर सकते थे.... ! सो ई हत्या का सारा पाप पाहुन के सर जाता है। हम कमला पार उनके जवार में ई मोकदमा भेजेंगे लेकिन अभी पंडीजी निरपराध साबित होते हैं।"

सरपंच बाबू के फैसला सुनते ही भीड़ में कुल-बुल-कुल-बुल होने लगा। सुक्कन मामू दुन्नु हाथ उठा कर बोले, "जय हो पंच परमेशर ! ई हुआ न दूधका दूध और पानी का पानी !" इसी तरह जितनी मुँह उतनी बातें हो रही थी।

उधर तपेसर हजाम जनानी महाल में परबचन बांच रहा था, "ई बटोही झा... हैं भारी धूर्त। ऐसा पत्ता फेंका कि सकल सभा चारो नाल चित्त। खास्सेमार के अपने सब परानी खाया। उ में बेचारा एगो पाहुन भी था तो सारा दोष उसी पर लगा दिया... !"

जनानी ग्रुप में तपेसर के बात पर हाँ-हूँ होने लगा तो मनियारी  भी बिच्चे में टपक पड़ीं, "हाँ हो तपेसर ! सच्चे कहते हो ! पंडीजी के घर तो पहुनाई भी खतरा से खाली नहीं है। 'खस्सी मार घरबैय्या खाय ! हत्या लेके पाहुन जाय !' कौन करे ऐसी पहुनाई... ?"

तपेसर चट से पलटा, "का बात है मनियारी भौजी ! कहावत गढ़े में तुम्हरा भी जोड़ नहीं है। हा... हा... हा.... ! मगर कही हो एकदम सच्च। हाँ यहाँ तो सोलहो आने यही हुआ, 'खस्सी मार घरबैय्या खाय ! हत्या लेके पाहुन जाय !'  पंडीजी खस्सी मार के सब परानी अपने खा लिए और दोष लगा दिए बेचारे पाहुन पर। हा... हा... हा.... ! ही.... ही... ही... ही.... !! हें...हें...हें...हें..... !!!"

तपेसर के ठहक्का के साथ महिला मंडली और बाल-वृन्द की हंसी-ठिठोली भी जुड़ गयी। अब हमरी हंसी भी संभाल से बाहर थी। अपना बस्ता संभाले और खिखियाते हुए भागे घर की तरफ।

ई किस्सा तो पुराना हो गया मगर आज भी जब कोई अपना किया हुआ अपराध या दोष नीति और प्रमाण का बहाना देकर दूसरे के माथे डालताहै तो हमें मनियारी की कहावत याद आ जाती है, "खस्सी मार घरबैय्या खाय ! हत्या लेके पाहुन जाय !" दोष किसी का और दोषी कोई और !!