शनिवार, 28 नवंबर 2009

बिहारी समझ बैठा है क्या ?

-- मनोज कुमार
आजकल मैं सभ्य दिखने लगा हूँ। असभ्य तो मैं पहले भी नहीं था, पर दिखता नहीं था। अब दिखता हूँ इसका अहसास मुझे अपनी पिछली दिल्ली यात्रा पर हुआ। दिल्ली विमान पत्तन से पूर्व भुगतान टैक्सी में सवार हो जब साउथ ब्लाक के लिए चला तो एक लाल सिग्नल पर टैक्सी को कुछ देर के लिए ठहरना पड़ा। एक सामान बेचने वाला टैक्सी के पास आया तो टैक्सी ड्राइवर ने बेची जा रही वस्तु का दाम पूछा। विक्रेता ने डेढ़ सौ कहा। इस पर टैक्सी चालक का जुमला था – “चल बे,..जा। बिहारी समझ बैठा है क्या? 40 की चीज को एक सौ पचास बोलता है।मुझे लगा कि टैक्सी चालक पिछली सीट पर बैठे सवारी को बिहारी नहीं मान रहा है। शायद सभ्य मान रहा है , और जो सभ्य है वह बिहार का नहीं हो सकता !

सरकार की नौकरी में नागपुर, हैदराबाद, चंडीगढ़ के रास्ते कोलकाता पहुँच गया हूँ। अन्य प्रांतों में सरकारी दौरों के कारण आना-जाना लगा ही रहता है। विभिन्न प्रांतों के रहन सहन, रीति-रिवाज, तौर-तरीक़े सीखने-अपनाने की मेरी आदत से, हो सकता है अपना बिहारीनेस दूर हो गया हो।
इसी संदर्भ में आज मुझे चंडीगढ़ का एक वाकया याद रहा है। एक दिन मेरा लड़का स्कूल नहीं जाने की जिद पर अड़ गया। मैंने कारण जानना चाहा तो बोला- “सब मुझे बिहारी कहते हैं। मैं नहीं जाऊँगा।मैंने कहा, “हम बिहार के हैं इसलिए कहते हैं।किसी तरह उसे समझा बुझा कर स्कूल भेजा। वह मेरी सर्विस में जाने के साथ-साथ बिहार के बाहर ही पला-बढ़ा इसी लिए उसे इस बिहारीपने का महत्व मालूम हो। पर मुझे कोई – “इस् स्साला बिहारी !” कहता है तो मैं बुरा नहीं मानता। उस वक्त मैं माननीय डा० राजेन्द्र प्रसाद से लेकर रामधारी सिंह दिनकर तक को याद कर लेता हूँ। मेरा सीना गर्व में फूल जाता है। और सोचता हूँ जिस बुद्ध को बिहार की धरती पर ज्ञान मिला वो थोड़ा इसे भी ज्ञान दे देते। जब शांति अहिंसा की बात चलती है तो सम्राट अशोक को याद कर लेता हूँ। पौरुष और पराक्रम की बात चलती है तो चन्द्रगुप्त को याद कर लेता हूँ। शिक्षा की बात चलती है, तो नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालय की याद जाती है। कवियों की बात चलती है तो विद्यापति के प्रति श्रद्धा सुमन बिखेर देता हूँ, हां बाबा नागार्जुन को भी। जब नारियों के प्रति सम्मान और प्रतीक को याद करता हूँ तो सीता मां के आगे नतमस्तक हो जाता हूँ। जब पेंटिंग का जिक्र चलता है तो मिथिला पेंटिंग को मन में रख लेता हूं। जब भाषाओं की बात चलती है तो मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका, वज्जिका, उर्दू, .. और तो और .. प्राकृत, पाली अप्रभंश उन दिनों की, .... और हिंदी, .. आज की , एक ही प्रांत में इतनी भाषाएं, याद कर लेता हूँ। फेहरिश्त लंबी है। आपका वक्त जाया नहीं करूँगा। कुछ आप भी याद कर लें। पर जो मैं गिना रहा हूँ क्या वो केवल बिहार और बिहारियों का ही है। शायद नहीं। ये पूरे हिंदुस्तान के तो हैं ही। शायद विश्व के भी हों।
कुछ खास बैठकों-सभाओं में जब मैं कण्ठ लंगोट पहन कर जाता हूँ तो लगता है फिर से पराधीन भारत में गया हूँ। वहां लोगों की आंग्ल भाषा की औपचारिकता के शहद में डूबो-डूबो कर तीखे शब्द मुझे रास नहीं आते। ऐसी सभ्यता उन्हें ही मुबारक।आपसे मिलकर खुशी हुईवाली औपचारिक मुद्रा में हम नहीं दिखते, इसमें हमें विश्वास नहीं, हम तो गलबहिया डालकर बातें करते हैं। हम बिहारी तो जब किसी अनजान से भी मिलते हैं तो हमारे चेहरे पर जिज्ञासा का नहीं स्वागत का भाव होता है, माने-या--मानें, यह सच है।
हम तो उन्मुक्त उड़ान चाहते हैं
गा लेते हैं जहां दिल में सफाई रहती है होठों पर सच्चाई रहती है ... हर फिक्र ... को उड़ा देते हैं और कहते हैं “तो क्या हुआ यदि हम गणेश को गनेस, सड़क को सरक और शादी को सादी कहते हैं। तब हम कुछ लोगों को विचार करने का अवसर तो दे ही देते हैं
कि ,, और , ड़ और , और क्यों? एक से काम नहीं चल सकता क्या? ”
बिहारी भी तो अब तीन तरह के हो गए हैं। नहीं-नहीं दो ही तरह के। एक तो वो जो बिहार में ही हैं और दूसरा वो जो कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण रोजगार की तलाश में बाहर गए। कुछ ऐसे बिहारी जिन्होंने अच्छा पद पा लिया, पैसे कमा लिये, अंग्रेजी सीख ली वे दिल्ली के टैक्सी चालकों की नजरों में बिहारी थोड़े ही हैं। वे अगर किसी को यह बताते हैं किमैं बिहार से हूँतो सामने वालाकोई मिल गयाकेजादूकी तरह उसे देखेंगे और एक बड़ा साअच्छा” ... बोलेंगे, फिर कहेंगें –“लगते तो नहीं।
पर बात यहां बिहारी होने की नहीं है। बिहारी बुलाए जाने की है।बिहारीबुलाने का मतलब दीन-हीन, अज्ञानी, कुबुद्धि, हाय हैलो हाऊ डू-यू-डू से दूर, कैट टाइप का नहीं होना से है। इसे तो विशेषण के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी प्रांत में रिक्शा चलानेवाला, रेहड़ी लगानेवाला, आइसक्रीम बेचनेवाला, ठेला खींचनेवाला, कुली, बोझा उठाने वाला खेत में मजदूरी करनेवाला बिहारी है। यानी गरीब है। उसकी शालीनता कायरता है और वह लिट्टी चोखा से ऊपर उठ ही नहीं सकता। सत्तू से ज़्यादा पा नहीं सकता। वह हाशिए पर हैऔर रहेगा। ऐसा माना जाता है।
क्या बिहारी होना अभिशाप है ? बड़े यत्न से कई बिहारी को बोल तो लेते हैं, और बिहार के बाहर कीशोशाइटीमें बिहार केबैकवार्डनेसको कोसते भी रहते हैं। जैसे पैर में गोबर लग जाए और आपने गंगा नहा लिया तो सारा कलंक धुल गया। पर बिहारी अगर भाषा का इस्तेमाल फूहर ढंग से करते हैं औरस्कूलके बजायइसकुलजाते हैं, वहां की लडकियांफराकपहिन करसरकपर चलती हैं और उनका माथाठनकतीहै यह देखकर किटरेनछूटगयातो कुछ लोग अपनानॉलेजबघाड़ कर उनका ज्ञानचैककर अपनाकैसमजबूत कर लेते हैं। छोड़िए इन सब का क्या फायदा। अबअगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजोकी बात आती है तो बिहारी पृष्टभूमि का ही सहारा लेना पड़ता है। अब ये मत कहिएगा कि बेटियां पैदा करने वाला यानीबिहारी
हां एक शब्द बिहारी में खूब बोला जाता हैहम अब आप ही बताएंमैंऔरहममें कौन भारी है, .. और कौन बिहारी है।मैं”- “मैंकी रटलगाने वाला याहमकहकर सर झुकाने वाला। हम तो यही जानते हैं कि संघर्ष, संयम और सामूहिकता का नाम बिहारी है।
अब हम बंद करता हूँ। आपहू कुछ सोचें।
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इस लेख से संबंधित आलेख का लिंक जो हिन्दुस्तान में छपा था
http://www.livehindustan.com/news/editorial/guestcolumn/article1-story-57-62-85013.html