5. सूफ़ीमत का उदय-3
5.5 इस्लाम का उदय और प्रचार
कुछ शब्दों के अर्थ
अलैहिस्सलाम: यानी 'उनपर सलामती हो!' नबियों और फ़रिश्तों के नाम के साथ इज़्ज़त और मुहब्बत के लिए ये शब्द
बढ़ा देते हैं।
सहाबी: उस खु़शक़िस्मत मुसलमान को कहते हैं, जिसे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से मुलाक़ात का मौक़ा मिला हो।
सहाबी की जमा (बहुवचन) सहाबा है और मुअन्नस (स्त्रीलिंग) सहाबिया है, जिसका बहुवचन सहाबियात है।
रज़ियल्लाहु अन्हु: इसके मानी हैं
अल्लाह उनसे राज़ी हो! 'सहाबी' के नाम के साथ यह
इज़्ज़त और मुहब्बत की दुआ बढ़ा देते हैं। सहाबिया के नाम के साथ 'रज़ियल्लाहु अन्हा' बोलते हैं, सहाबा के लिए 'रज़ियल्लाहु अन्हुम' कहते हैं और सहाबियात के नाम के साथ 'रज़ियल्लाहु
अन्हुन्न' कहते हैं।
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम: इसका मतलब है, 'अल्लाह उनपर रहमत और सलामती की बारिश करे!' हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का नाम लिखते, लेते या सुनते हैं तो इज़्ज़त और मुहब्बत के लिए यह दुआ बढ़ा देते हैं।
पच्चीस वर्ष की उम्र में हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. की शादी हज़रत
खदीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से हुई। हज़रत ख़दीजा के साथ उनकी ज़िन्दगी अत्यन्त आनंदपूर्ण
ज़िन्दगी थी। वह एक बहुत होशियार, तजुर्बेकार और समझदार औरत थीं। उन्होंने उनकी तबीयत
और मिज़ाज को, उनकी पसन्द-नापसन्द को ख़ूब पहचान लिया और हमेशा उसका पूरा-पूरा ख़याल
रखा। पैगम्बर मोहम्मद साहब सल्ल. की प्रवृत्ति थी सदैव
सत्य बोलना, हर काम ईमानदारी से करना, हंगामों से बचना, शोर-ग़ुल की
महफ़िलों से दूर रहना और एकांत में बैठ कर सोच-विचार करना। वह प्राकृतिक दृश्यों
का निरीक्षण करते। अल्लाह की निशानियों का अध्ययन करते और सच को पहचानने की कोशिश
करते।
शादी के कुछ साल बाद पैगम्बर मोहम्मद साहब सल्ल. के भीतर
आध्यात्मिक रुझान पैदा होने लगा। उनका ध्यान अपने समाज के वातावरण के नैतिक और
धार्मिक विघटन की ओर जाने लगा। वे लोगों के हो रहे नैतिक पतन से चिंतित रहने लगे।
वे सोचने लगे कि ईश्वर आराधना का सही मार्ग कौन सा है? इन सब चिंतन के
परिणामस्वरूप मुहम्मद साहब अलौकिक दर्शन करने लगे। वे एकांत में रहना चाहने लगे। ध्यान
करने के लिए वह मक्का के पहाड़ों की ओर चल दिए। मक्का के चारों ओर पहाड़ों का
सिलसिला है। बीच में काबा है। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. ने मक्का शहर के
नज़दीक, घर से तीन मील दूर हिरा नामक पहाड़ पर स्थित एक गुफा ('ग़ारे-हिरा') में कुछ दिनों की
एकांत साधना की। जिस सत्य के लिए वह बेक़रार थे, उसको खोजते, उसको पाने की कोशिश
करते। जिस ज्ञान की उनको अभिलाषा थी उसकी तलाश करते। यह दुनिया जिसमें हम रह रहे
हैं, इसकी हक़ीक़त क्या है? यह एक सवाल था, जिसका जवाब पाने के
लिए वह बड़े बेचैन थे। जिसके फलस्वरूप उन्हें गूढ़ रहस्य का लाभ हुआ। रमज़ान का
महीना था। एक दिन उनके सामने देवदूत प्रकट हुआ। उस देवदूत का नाम जिब्राइल था। इस्लामी
मान्यताओं के मुताबिक़ मोहम्मद साहब को ईश्वर का संदेश जिब्राईल फ़रिश्ते (ईसाईयत में
गैब्रियल) के ज़रिए 7वीं सदी के अरब में, लगभग 40वें साल (610) में हासिल
हुआ। यह वही देवदूत था, जिसने ईसा मसीह की माँ मैरी को कहा था कि तुम्ही
यीशु को जन्म दोगी। उन्हें फ़रिश्ता की आवाज़ सुनाई दी, “ऐ मुहम्मद! तू
अल्लाह का पैग़म्बर है और मैं जिब्राइल हूं।”
हज़रत जिब्राइल ने हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. से कहा ‘पढ़’ ("इक़रा"),
उन्होंने उत्तर दिया “मैं पढ़ा हुआ नहीं हूँ”। दो-तीन बार और पूछने पर जब यही जवाब मिलता रहा, जिसके बाद पवित्र
क़ुरआन की पहली आयतें (सूरह अल-अलक) अवतरित हुईं। यह सूरह ज्ञान, इंसान की रचना और
अल्लाह की शक्ति का वर्णन करती है। हज़रत जिब्राइल ने कहा, “अपने रब के नाम से
पढ़, जिसने इंसान के जमे खून से पैदा किया। पढ़ और तेरा रब बहुत महान है, जिसने क़लम के
द्वारा लिखाया और मनुष्य को वह सब सिखाया जिससे वह अनभिज्ञ था।” यही पहला ईश्वरीय
सन्देश था। इस घटना ने उनको झकझोर कर रख दिया। वे गुफा से बाहर निकल आए। उस रात
फ़रिश्ता ने मुहम्मद की पैग़म्बरी का ऐलान कर दिया। अंतिम नबी मुह़म्मद सल्लल्लाहु
अलैहि व सल्लम, ईसा अलैहिस्सलाम के छः सौ वर्ष पश्चात् 610 ईस्वी में नबी
हुये। उनके और ईसा अलैहिस्सलाम के बीच कोई नबी नहीं आया। उनसे पहले नबी अपनी विशेष
जाति के लिये भेजे जाते थे, जबकि
उन्हें सर्व साधारण लोगों की ओर नबी बना कर भेजा गया, अर्थात मुह़म्मद
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पूरे मनुष्य विश्व के लिये एक अन्तिम रसूल हैं। मोहम्मद साहब को जब
ईश्वर का संदेश मिला तो वह एक शुभ रात्रि थी जिसे ‘लैलतुल क़द्र’ कहा गया है। यह
रमज़ान के महीने के अन्तिम दशक की एक विषम (21, 23, 25, 27, या 29) रात्रि होती है।
इसी रात्रि में पूरे वर्ष होने वाले विषय का निर्णय किया जाता है। यह रात गुनाहों
की माफी और इबादत के लिए सर्वोच्च है। इसी शुभ रात्रि में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व
सल्लम) पर क़ुरआन उतरने का आरंभ हुआ। फिर 23 वर्षों (610 ईस्वी से 632 ईस्वी) तक आवश्यकतानुसार
विभिन्न समय में उतरता रहा।
कहा जाता है कि मोहम्मद साहब को देवदूत के पहले पैग़ाम का इलहाम हुआ
तो उन्हें समझ ही नहीं आया कि क्या किया जाए। वह डर गए। वह समझ ही नहीं पाए उनके
साथ यह क्या हो रहा है। उन्हें जो अनुभूति हो रही थी, उसके बारे में वह
समझ ही नहीं पा रहे थे, क्योंकि वे एकेश्वरवाद या अद्वैतवाद की संस्कृति
में पले-बढ़े नहीं थे। उन्हें वह संदर्भ बिंदु ही नहीं मिल रहा था, जहाँ से वह अपने
साथ हुई घटना का विश्लेषण करें और इसे समझ पाएं। मोहम्मद साहब इस पैग़ाम से काफ़ी
भ्रमित हो गए थे। इसने उन्हें बेचैन कर दिया था। रातोंरात वे घर लौट आए।
पैगम्बर मोहम्मद साहब ने अपने इस अहसास को सिर्फ़ एक शख़्स को बताया।
उस शख्स को जिन पर वह सबसे ज़्यादा विश्वास करते थे। भय से काँपते हुए और पसीने
में नहाए हुए उन्होंने आते ही फ़रमाया, “मुझे कंबल उढ़ा दो!
कंबल उढ़ा दो!”
तुरन्त हज़रत
ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने कंबल उढ़ा दी।
जब मन कुछ शान्त हुआ, तो उन्होंने सारा हाल हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) को
सुनाया। हज़रत ख़दीजा ने उनकी ये बातें सुनीं और उन्हें शांत किया। उन्हें कहीं न
कहीं इस बात का अंदाजा हो रहा था कि मोहम्मद साहब के साथ कुछ अच्छा ही हुआ होगा। हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने
इस घटना के बारे में ईसाइयत की जानकारी रखने वाले एक रिश्तेदार वराकाह इब्न नवाफुल
से मशविरा किया। नवाफुल को पहले के धर्मग्रंथों की जानकारी थी। वे तौरेत पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि यह वही
तत्त्वज्ञाता फ़रिश्ता है जिसे अल्लाह ने मूसा पर उतारा था। उन्होंने भविष्यवाणी
की कि मोहम्मद साहब इस उम्मत (क़ौम) के पैगंबर हैं। लिहाजा हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने
मोहम्मद साहब को मिले संदेश की उनसे पुष्टि कर ली।
शुरुआत में जब मोहम्मद साहब को उन संदेशों का इलहाम होना शुरू हुआ तो
वह ख़ुद संशय में थे। हज़रत जिब्राइल ने उनको संतोष दिलाते हुए कहा, “निःसंदेह आपको रसूल
चुन लिया गया है, आप प्रतीक्षा करें”। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर प्रथम
वह़्यी के पश्चात् कुछ दिनों तक वह़्यी नहीं आई। इस अवधि में मोहम्मद साहब काफी
चिंतित रहे। फिर एक बार वे कहीं जा रहे थे कि आकाश से एक आवाज़ सुनी। ऊपर देखा तो
वही फ़रिश्ता जो उनके पास ‘ह़िरा’ गुफ़ा में आया था आकाश तथा धरती के बीच एक
कुर्सी पर विराजमान था। जिस से वे डर गये थे और धरती पर गिर गये थे। फिर घर आये थे
और अपनी पत्नी से कहा था मुझे चादर ओढ़ा दो, मुझे चादर ओढ़ा दो।
उन्होंने चादर ओढ़ा दी थी। और अल्लाह ने यह सूरह उतारी थी। इसी प्रथम वह़्यी से वे
(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नबी बनाए गए। और अब उन पर धर्म के प्रचार का भार रख
दिया गया। इन आयतों में उन के माध्यम से मुसलमानों को पवित्र रहने के निर्देश दिये
गये हैं। जिब्राईल दोबारा प्रकट हुए और सूरह अल-मुद्दस्सिर की आयतें उतरीं। ‘सुरह
मुद्दस्सिर’ की जो शुरुआती आयतें अवतीर्ण हुईं थीं, वे इस प्रकार हैं, “हे चादर ओढ़ने वाले! खड़े हो जाओ, फिर पथभ्रष्ट लोगों
को सावधान करो। तथा अपने पालनहार की महिमा का वर्णन करो। तथा अपने कपड़ों को
पवित्र रखो। और मलिनता को त्याग दो, मूर्तियों से अलग रहो। अधिक प्राप्त करने की भावना
वश, किसी के साथ अपकार न करो। आपत्तियों में भी अपने ईश्वर के प्रति दृढ़ विश्वास
और धैर्य धारण करो।”
हज़रत मुहम्मद सल्ल. को स्पष्ट रूप से आदेश मिल गया कि उठो और पथभ्रष्ट
मानवता के कल्याण व उत्थान का मार्ग प्रशस्त करो। हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के
भरोसे ने मोहम्मद साहब को हिम्मत दी कि वे अपना संदेश का प्रसार करें। ख़दीजा
के भरोसे ने उन्हें यह अहसास कराया उनकी भी कोई आवाज़ है। असगर अली इंजीनियर
का मानना है इस्लाम का जन्म मक्का के अत्यंत व्यापारिक वातावरण में हुआ। 610 ई. में, हज़रत मुहम्मद साहब
ने सार्वजनिक रूप से इन रहस्योद्घाटनों का प्रचार करना शुरू किया, यह घोषणा करते हुए कि
" ईश्वर एक है", अल्लाह को पूर्ण "समर्पण" (इस्लाम) कार्यवाही का सही तरीक़ा
है (दीन), और वह इस्लाम के अन्य भविष्यवक्ताओं के समान, ख़ुदा के पैगंबर और
दूत हैं। अगले 13 वर्षों तक वे मक्का में रहे। नबूवत के पद पर वे आसीन हो चुके थे।
उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि "ईश्वर एक है" को लोगों के बीच
कैसे स्वीकारता बढ़ाई जाए और उन्हें सैंकड़ों ईश्वर को अस्वीकार करने का उपदेश कैसे
दिया जाए।
उन्होंने पहली दीक्षा हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा)
को दी। हज़रत ख़दीजा ने मोहम्मद साहब के संदेश पर भरोसा किया और उसे कुबूल किया।
चूँकि ख़दीजा पहली शख्स थीं, जिन्हें मोहम्मद साहब ने अपनी अनुभूतियों के बारे
में बताया था इसलिए इतिहास में उन्हें पहला मुसलमान माना गया। एक नए धर्म में
दीक्षित होने वाला पहला शख्स। यह ऐतिहासिक सच है कि हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) दुनिया
की पहली महिला हैं जिन्होंने मुस्लिम धर्म को स्वीकार किया। बाद में चचेरे भाई हज़रत
अलि (रज़ियल्लाहु अन्हु) और दास हज़रत जैद बिन हारिस (रज़ियल्लाहु अन्हु) को तथा मित्र हज़रत
अबूबकर (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हज़रत उस्मान (रज़ियल्लाहु अन्हु) आदि
को दी। इस प्रकार इस्लाम धर्म का प्रसार आरंभ हुआ। लगभग 610 ई. के आसपास मुहम्मद
साहब ने लोगों को अपने ज्ञान का उपदेश देना आरंभ किया था। इसी घटना को इस्लाम का आरंभ
माना जाता है। इसी मोड़ पर उन्होंने कबीलों के सरदारों को चुनौती देनी शुरू की और
सार्वजनिक रूप से यह कहना शुरू किया कि इस दुनिया में सिर्फ़ एक ही ईश्वर है और वह
है अल्लाह। किसी दूसरे की उपासना ईश निंदा है। शुरू में इस्लाम का प्रचार गुप्त
ढंग से होता रहा। मुसलमानों की संख्या में बढोत्तरी होती रही।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ने सबसे पहले 610 ई. में मक्का से इसलाम
का प्रचार शुरू किया। उनके इस प्रयास से मक्का को व्यापारिक केन्द्र होने के अलावा
धार्मिक पवित्रता भी मिली। मक्का में ही काबा-शरीफ़ स्थित था। काबा-शरीफ़ को अरबों
के पितामह पैग़म्बर हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) और उनके सुपुत्र पैग़म्बर हज़रत
इस्माईल (अलैहि.) ने बनवाया था। क़ुरआन में “मक़ामे इब्राहीम” अर्थात वह पत्थर जिस
पर खड़े हो कर इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने काबा का निर्माण किया जिस पर उनके पैरों के
निशान आज तक हैं, की चर्चा है (3:97)। इब्राहीम
अलैहिस्सलाम के दो पुत्र हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम तथा हज़रत इस्ह़ाक़ अलैहिस्सलाम
हैं। हज़रत इस्ह़ाक़ अलैहिस्सलाम की संतान से बहुत से नबी आये, परन्तु हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के गोत्र से केवल अन्तिम नबी हज़रत मुह़म्मद
सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आये। हज़रत इस्राईल
अलैहिस्सलाम आदरणीय इब्राहीम
अलैहिस्सलाम के पौत्र हज़रत याक़ूब
अलैहिस्सलाम की उपाधि है। उन की संतान को बनी इस्राईल कहा गया है। क़ुरआन में (6: 84, 85, 86 में) 18 नबियों की चर्चा की गयी है, वे हैं –
इब्राहीम, इस्ह़ाक़, याक़ूब, नूह़, दावूद, सुलैमान, अय्यूब, यूसुफ, मूसा, हारून,
ज़करिय्या, यह़्या, ईसा, इल्यास, इस्माईल, यस्अ, यूनुस और लूत। आद जाति का निवास स्थान
अह़क़ाफ़ का क्षेत्र था। जो ह़िजाज तथा यमामा के बीच स्थित है। उन की आबादियाँ
उमान से ह़ज़रमौत और इराक़ तक फैली हुई थीं। समूद जाति अरब के उस क्षेत्र में रहती
थी, जो ह़िजाज़ तथा शाम के बीच “वादिये क़ुर” तक चला गया है।
जिस को आज “अल उला” कहते हैं। इसी को
दूसरे स्थान पर “अलहिज्र” भी कहा गया है।
लूत अलैहिस्सलाम इब्राहीम अलैहिस्सलाम के भतीजे थे। और वह जिस जाति के मार्गदर्शन
के लिये भेजे गये थे, वह उस क्षेत्र में रहती थी जहाँ अब “मृत सागर” स्थित है। उस का
नाम भाष्यकारों ने सदूम बताया है। मिस्र के शासकों की उपाधि फ़िरऔन होती थी। यह
ईसा पूर्व डेढ़ हज़ार वर्ष की बात है। उन का राज्य शाम से लीबिया तथा ह़बशा तक था।
फ़िरऔन अपने को सब से बड़ा पूज्य मानता था और लोग भी उस की पूजा करते थे। उस की ओर
अल्लाह ने मूसा (अलैहिस्सलाम) को एक अल्लाह की इबादत का संदेश दे कर भेजा कि पूज्य
तो केवल अल्लाह है उस के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं। बनी इस्राईल हज़रत यूसुफ
अलैहिस्सलाम के युग में मिस्र आये थे। तथा चार सौ वर्ष का युग बड़े आदर के साथ
व्यतीत किया। फिर उन के कुकर्मों के कारण फ़िरऔन और उस की जाति ने उन को अपना दास
बना लिया। जिस के कारण हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने बनी इस्राईल को मुक्त करने की
माँग की।
इस धर्म का उद्देश्य था मनुष्य को एक निराकार ईश्वर, अल्लाह की पूजा
सिखाना, जीवन को पवित्र और उन्नत करना और मनुष्य को समता और भाईचारे का उपदेश
देना। पैग़म्बर मुहम्मद साहब के उपदेश धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक, तीनों
क्षेत्रों में एक सा प्रभाव रखते थे। उनके उपदेशों ने अरबों के अंदर एक नई रूह
फूंकी। जब पैगम्बर हज़रत मोहम्मद साहब ने इस्लाम का प्रचार शुरू किया तो मक्का के
समाज में एकेश्वरवाद का विरोध करने वाले कई लोगों ने उन्हें हाशिये पर धकेलने की
कोशिश की। इस प्रकार मक्का में उन्होंने अविश्वासियों से शत्रुता का अनुभव किया।
उस काल में इस्लाम को स्वीकार करना और हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. का साथ देना
साक्षात मौत को निमंत्रण देना था। फिर भी जो लोग इस्लाम स्वीकार कर रहे थे वे
द्वैतवादी परंपरा तथा उपासना से तंग आ चुके थे और सत्य की खोज में थे। लेकिन उस वक़्त हज़रत
ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने उनका साथ दिया। इस तरह उस दौरान उनको जिस समर्थन
और संरक्षण की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी वह उन्हें हज़रत खदीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से
मिली। हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने अपनी पूरी क्षमता और ताक़त के साथ पति और इस्लाम
का समर्थन किया। हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने न सिर्फ पैग़ंबर मोहम्मद को
व्यापार से अलग पूरी तरह इस्लाम के लिए समर्पित होने को प्रोत्साहित किया बल्कि
उन्होंने इस काम में उनकी आर्थिक मदद भी की। अगले दस साल तक हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने
अपने पति और एक नए पंथ के समर्थन के लिए अपने परिवार के संपर्कों और अपनी संपत्ति
का पूरा इस्तेमाल किया। इस तरह उस समय एक ऐसे नए धर्म की स्थापना उस माहौल में हुई
जब समाज बहु-ईश्वरवाद में विश्वास करता था। शुरू के तीन साल तक गुप्त ढंग से
इस्लाम का प्रचार होता रहा।
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ईश्वर का स्पष्ट आदेश आया कि
इस्लामी सन्देश का प्रचार और प्रसार आम लोगों के बीच किया जाए। वे सफ़ा की पहाड़ी पर
चढ़ गए और जोर से पुकारा, “या सबाहा”। लोग वहाँ आकर जमा हो गए। उनसे उन्होंने
कहा, “यदि मैं आप सबों से
यह कहूं की इस पहाड़ के पीछे एक बड़ी सेना जमा है जो आप पर हमला बोलने के लिए तैयार
है, तो क्या आप मेरी बातों सच मानेंगे?” लोगों ने कहा “निःसंदेह सच
मानेंगे। आपने आज तक झूठ नहीं बोला। हम तो सादिक़ (सच्चा) मानते हैं।”
उन्होंने लोगों से कहा, “मैं तुम्हें एक ईश्वर की
उपासना की ओर बुलाता हूँ। मूर्ति पूजा से बचाना चाहता हूँ। इस तरह पैगम्बर ने घोषणा कर दी कि
विश्व को उत्पन्न करने वाला केवल अल्लाह ही है। मनुष्य को भी उसी ने बनाया। वही
सबका स्वामी है। मनुष्य ईश्वर का दास है। उसकी आज्ञा का पालन करना उसका कर्तव्य
है। एक अल्लाह ही पूज्य है। किसी और के सामने झुकना गुनाह है। इस घोषणा ने कुरैश
और अन्य लोगों को भड़का दिया। अब तक क़रीब चालीस लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया था।
एक दिन काबा जाकर पैगम्बर ने एकेश्वरवाद की घोषणा कर दी। मूर्तिपूजकों को यह काबा
का अपमान लगा। लोग उन पर टूट पड़े। उन्हें बचाने के लिए आगे आए हज़रत हारिस बिन आबो
हाला को तलवार से काट दिया गया। इस्लाम की राह में यह पहला बलिदान था। हज़रत
मुहम्मद साहब सल्ल. बिना रुके लोगों के बीच अपना उपदेश प्रचारित करते रहे। लोगों
को मूर्ति पूजा और बुराइयों से बचने का उपदेश देते रहे। उनके विरोधियों के लिए यह
सब असहनीय था। लोग उनकी हंसी उड़ाते थे। उन पर तरह-तरह के आरोप लगाते थे। धीरे-धीरे
हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। कुरैश उनकी प्रसिद्धि से
नाराज़ हो गए। उन्होंने निश्चय किया कि बल प्रयोग द्वारा मुसलमानों को सताएं, पीड़ित करें।
मुसलमानों को इनके अत्याचार सहने पड़े। लेकिन वे अपने निश्चय एक अल्लाह के अतिरिक्त
किसी अन्य को अपना रब नहीं मानेंगे, पर अडिग रहे। इसका परिणाम यह हुआ की आम लोगों
के मन में इनके प्रति सहानुभूति बढ़ने लगी। विरोधी और भी अत्याचार करने लगे।
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के नबी होने के पश्चात् उन पर
विरोधियों ने कई बार प्राण घातक आक्रमण का प्रयास किया। जब उन्होंने मक्का में
सफ़ा पर्वत से एकेश्वरवाद का उपदेश दिया तो उनके चचा अबू लहब ने उन पर पत्थर
चलाये। फिर उसी युग में वे काबा के पास नमाज़ पढ़ रहे थे कि अबू जह्ल ने उनकी
गर्दन रोंदने का प्रयास किया, किन्तु उनके रक्षक फ़रिश्तों को देख कर भाग गया।
जब क़ुरैश ने यह योजना बनाई कि उनको वध कर दिया जाये, और प्रत्येक क़बीले
का एक युवक उनके द्वार पर तलवार ले कर खड़ा रहे और जब वे निकलें तो सब एक साथ
प्रहार कर दें, तब भी वे उन के बीच से निकल गये। और किसी ने देखा भी नहीं। फिर
उन्होंने अपने साथी अबू बक्र के साथ हिजरत के समय सौर पर्वत की गुफा में शरण ली।
उस समय गुफा में केवल हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु उनके साथ थे और
काफ़िर गुफा के मुंह तक उनकी खोज में आ पहुँचे, उन्हें उनके साथी
ने देखा, किन्तु वे उनको नहीं देख सके। और जब वहाँ से मदीना चले तो सुराक़ा नामक
एक व्यक्ति ने कुरैश के पुरस्कार के लोभ में आ कर उनका पीछा किया। किन्तु उस के
घोड़े के अगले पैर ज़मीन में धंस गये। उसने उनको गुहारा, उन्होंने दुआ कर दी, और उसका घोड़ा निकल
गया। उसने ऐसा प्रयास तीन बार किया फिर भी असफल रहा। उन्होंने उसको क्षमा कर दिया।
और यह देख कर वह मुसलमान हो गया। उन्होंने फ़रमाया कि एक दिन तुम अपने हाथ में
ईरान के राजा का कंगन पहनोगे। और उमर बिन ख़त्ताब के युग में यह बात सच साबित हुई।
मदीने में भी यहूदियों के क़बीले बनू नज़ीर ने छत के ऊपर से उन पर भारी पत्थर
गिराने का प्रयास किया, जिससे अल्लाह ने उनको सूचित कर दिया। ख़ैबर की एक
यहूदी स्त्री ने उनको विष मिला कर बकरी का माँस खिलाया। परन्तु उनपर उसका कोई बड़ा
प्रभाव नहीं हुआ। जब कि उनका एक साथी उसे खा कर मर गया। एक युद्ध यात्रा में वे
अकेले एक वृक्ष के नीचे सो गये, एक व्यक्ति आया और उनकी तलवार ले कर कहाः मुझ से
आप को कौन बचायेगा? उन्होंने कहाः अल्लाह! यह सुन कर वह काँपने लगा, और उस के हाथ से
तलवार गिर गई और उन्होंने उसे क्षमा कर दिया।
अपने विरोधियों द्वारा किए जा रहे उत्पीड़न से बचने के लिए, उन्होंने कुछ अनुयायियों
को 615 ई में अबीसीनिया (हबशा) भेजा। वहाँ
का राजा ईसाई था और दयालु और न्याय प्रिय था। इन लोगों के प्रभाव से प्रेरित होकर
वहाँ के राजा ने इस्लाम स्वीकार कर लिया।
इस दौरान हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने अपनी पूरी क्षमता और ताक़त
के साथ पति और इस्लाम का समर्थन किया, लेकिन 619 ईस्वी में बीमारी के
बाद उनका निधन हो गया। हज़रत ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का इन्तिक़ाल रमज़ान के
महीने में हुआ। उस समय उनकी उम्र 65 साल थी। वे शेब-ए-अबू तालिब (बहिष्कार) के कठिन
दिनों में भूख और कष्टों के कारण बीमार हुईं और उनका निधन हो गया। उन्हें जन्नत-उल -मुअल्ला कब्रिस्तान में दफ़नाया गया, जो मक्का, सऊदी अरब में है।
पैगम्बर मोहम्मद साहब अकेले हो गए। वह बुरी तरह टूट चुके थे। वह हज़रत ख़दीजा की मौत
से कभी उबर नहीं पाए। हज़रत ख़दीजा की मौत के साल को आमुल हुस्न ('उदासी का') साल कहा जाता है। उसी
वर्ष पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के चाचा अबू तालिब का भी निधन हो गया था, इसलिए इस वर्ष को
उनके जीवन का सबसे दुखद वर्ष माना जाता है। इस्लाम के उदय और उसके बनने में एक
महिला की अहम भूमिका रही, और वो महिला थीं- हज़रत ख़दीजा। हज़रत ख़दीजा के बारे में
ज़्यादा से ज़्यादा जानकारी हमें हदीस की कहानियों से ही मिलती है। हदीस मोहम्मद
साहब के काम और आदतों का वर्णन है। हदीस को सबसे पहले मोहम्मद साहब के अनुयायियों
ने ही सुनाना शुरू किया। इन्हें बाद में लिखा गया। हदीस सुनाने वालों में हज़रत आइशा
रज़ियल्लाहु अन्हा भी थीं। मोहम्मद साहब की बाद की पत्नियों में वह भी एक थीं।
इस्लाम में उनको भी अहम जगह मिली है। कुछ दिनों के बाद हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. के
चाचा अबूतालिब का भी देहांत हो गया। इधर कुरैशों का विरोध और अत्याचार और अधिक बढ़
गया। उन्होंने यह निश्चय कर रखा था की हज़रत मुहम्मद साहब सल्ल. को इतना सताएं की
वे इस्लामी प्रचार को छोड़ दें। लेकिन अब इस्लाम का प्रकाश मक्का से बाहर फैलना
शुरू हो गया था। अब नामुमकिन था कि मुशरिकों की फूँको से यह चिराग़ बुझ जाता, चाहे वे कम हों या
अधिक, ताक़तवर हों या कमज़ोर। “अल्लाह अपने दीन का प्रकाश फैलाकर रहेगा
चाहे अधर्मी कितना न चाहें।" (क़ुरआन)
*** *** ***
मनोज कुमार
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