5. सूफ़ीमत
का उदय-6
5.12 (ख) क़ुरआन, सुन्नत और हदीस
इस्लाम धर्म के मूल क़ुरआन, सुन्नत
(प्रथाओं), सीरा
(पैग़म्बर साहब की जीवनी) और हदीस (पैग़म्बर साहब के वक्तव्य, कथन आदि) हैं।
पवित्र क़ुरआन इस्लाम धर्म का सबसे प्रमुख और अंतिम धार्मिक
ग्रंथ है।
क़ुरआन अल्लाह की पुस्तक है। यह सम्पूर्ण जगत के स्वामी की ओर से सम्पूर्ण
मानव जाति को प्रदान किया गया एक महान उपहार है और अंतिम दिव्य संदेश है। यह किसी
मानव की नहीं, बल्कि जगत्-प्रभु की किताब है, ईशवाणी है। 'क़ुरआन' शब्द का अर्थ "वह चीज़ जिसे बार-बार पढ़ा
जाए" है। हालाँकि पहले के पैगम्बरों, विशेष
रूप से ईसाइयों और यहूदियों के लिए,
शास्त्रों को प्रकट किया गया था, फिर भी अंतिम पैगंबर,
मुहम्मद के लिए प्रकट की गई पुस्तक (अल-क़ुरआन)
क़ुरआन मजीद एक रौशन किताब है, जो इंसान को
भलाई के मार्ग पर ले जाने का काम करती है,
इसमें दुनिया के कई ऐसे रहस्यों के बारे में बताया गया है जिसके बारे में
लोग अभी तक नहीं जान पाए हैं ।
यह इस्लाम का केंद्रीय धार्मिक
पाठ है। मुसलमानों
का मानना है कि यह मलक जिब्रील (अलैहिस्सलाम) (अल्लाह के सबसे प्रमुख और
सम्मानित फरिश्तों (देवदूतों) में से एक )
द्वारा पैग़म्बर मुहम्मद को अल्लाह की जानिब से भेजा गया कलाम है। पवित्र ग्रंथ क़ुरआन में उन पदों का संकलन
है जो मुहम्मद साहब के मुख से उन क्षणों में निकले थे जब वे सीधी ईश-प्रेरणा की
अवस्था में थे। ख़ुदा क़ुरआन की आयतें (पद) मुहम्मद साहब के पास देवदूतों के ज़रिए
भेजते थे। इन्हीं आयतों का संकलन क़ुरआन है। ये आयतें मुहम्मद साहब को अलग-अलग समय पर 23
वर्षों (सन 610 से सन
632 तक) में हासिल हुई। इन 23 वर्षों में मुहम्मद साहब 13 साल मक्का में थे और 10 साल मदीना में। मुस्लिम
इतिहास के मुताबिक मुहम्मद साहब ने मदीना में स्वतंत्र मुस्लिम समुदाय का गठन किया
और अपने कई साथियों को क़ुरआन पढ़ने और कानूनों को सीखने का आदेश दिया। इस प्रकार
मुस्लिमों का एक समूह साक्षर बना। पैगंबर मुहम्मद साहब पर जब आयतें उतरती थीं, तो वे उन्हें बोलकर सुनाते थे। उनके अनुयायी
(सहाबा) इन आयतों को याद कर लेते थे और ताड़ के पत्तों,
चर्मपत्र (जानवरों की खाल), हड्डियों
और समतल पत्थरों पर लिख लिया करते थे।
सन 632
में मुहम्मद साहब के निधन के बाद क़ुरआन को लिखा गया।
उनके सभी साथियों को क़ुरआन कंठस्थ याद (हाफ़िज़)
था। पैगम्बर साहब की
मृत्यु के बाद जब हज़रत अबूबक्र ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ पहले ख़लीफ़ा हुए, तब
उन्होंने सन 634 में क़ुरआन
को पुस्तक के रूप में इकट्ठा करने का फैसला किया। हज़रत जैद बिन साबित (655 ई) क़ुरआन को इकट्ठा करने वाले पहले व्यक्ति थे, क्योंकि वह अल्लाह के नबी मुहम्मद के द्वारा पढ़ी
गई आयतों और सूरों को लिखा करते थे।
इस तरह से हज़रत ज़ैद बिन साबित ने ही आयतों को एकत्र कर क़ुरआन को किताब का रूप दिया।
इसकी मूल प्रति हज़रत अबू बकर को मिली। इस्लाम के विस्तार के साथ जब
क़ुरआन अलग-अलग क्षेत्रों में पढ़ी जाने लगी,
तो तीसरे खलीफा उस्मान (644-656 ईस्वी)
ने ज़ैद बिन साबित की देखरेख में उन संकलित प्रतियों की आधिकारिक और प्रामाणिक
प्रतियां तैयार करवाईं और उन्हें इस्लामी साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में भेज
दिया। यह पुस्तक जब से अस्तित्व में आई है,
तब से लेकर आज के दिन तक बदली नहीं है,
मतलब इसमें किसी के भी द्वारा कोई एक भी बदलाव नहीं किया गया है।
क़ुरआन
पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। इसमें 30 पाठ है, 114 अध्याय हैं। पूरी किताब को 30 बराबर हिस्सों में बांटा गया है, जिन्हें 'पारा' या 'जज़'
(Juz) कहा जाता
है। क़ुरआन के हर अध्याय का नाम सूरा होता है और हर सूरे में बहुत सी आयत होती हैं। पवित्र क़ुरआन, पूरे का पूरा, एक लगातार लेख की हैसियत नहीं रखता, बल्कि वह एक 114 हिस्सों में बँटा हुआ है जिनकी शक्ल एक
पुस्तक के अध्यायों की सी समझिए। क़ुरआन के इन हिस्सों को ईश्वर ने ‘सूर’ (सूरत)
कहा है। कुल मिलकर क़ुरान में 114 सूरा है। इनमें सबसे बड़ी सूरह 'अल-बक़रा' (286 आयतें) और सबसे छोटी 'अल-कौसर'
(3 आयतें) है। आयत का शाब्दिक अर्थ
निशानी और चिन्ह होता है। वह प्रकट वस्तु जो किसी छुपी हुई सच्चाई की और रहनुमाई
कर रही हो, अरबी भाषा में ‘आयत’ कहलाती है। आयत-अल-मुदायना,
सूरह अल-बकराह (अध्याय 2), आयत 282 कुरान की सबसे लंबी आयत है। इसे ऋण की आयत (Verse of Debt) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें उधार, लेन-देन, अनुबंध और गवाहों से जुड़े इस्लामी वित्तीय नियमों का
अत्यंत विस्तृत वर्णन है। कुरान की सबसे छोटी आयत सूरह अर-रहमान की आयत नंबर 64 है, जिसमें केवल एक शब्द मुदहाम्मातान है। इसका अर्थ है: "(जन्नत के दोनों
बाग) गहरे हरे रंग के हैं।" यह आयत जन्नत (स्वर्ग) के बाग़ों की सुंदरता, हरियाली और वहां के प्राकृतिक वैभव का
वर्णन करती है। कुरान की सबसे छोटी आयत को लेकर विद्वानों में दो मत हैं। कुछ लोग सूरह
अल-कौसर (अध्याय 108), आयत 3: को सबसे छोटी आयत मानते हैं, इस आयत में
केवल 3 शब्द हैं।
क़ुरआन में एकेश्वरवाद यानी अल्लाह की सत्ता, उसकी महानता और गुणों का वर्णन है। इसमें जीवन जीने
की आचार-संहिता, सामाजिक, नैतिक, और आर्थिक जीवन से जुड़े नियमों का वर्णन है। इसके द्वारा आध्यात्मिक
मार्गदर्शन भी मिलता है, जैसे मनुष्य का ईश्वर से संबंध, न्याय, ईमानदारी और परोपकार की सीख। इसमें पूर्ववृत्त (इतिहास) का ज़िक्र भी है, जैसे आदम, नूह, इब्राहिम, मूसा और ईसा (यीशु) जैसे पिछले पैगंबरों और उनकी कौमों
की कहानियाँ। इसमें परलोक और न्याय के दिन का वर्णन है
जो अच्छे और बुरे कर्मों के परिणाम और
स्वर्ग-नरक की अवधारणा है। इस्लाम में क़ुरआन का स्थान सर्वोच्च है, क्योंकि इसे ईश्वर के अपरिवर्तित और सुरक्षित शब्द माना
जाता है। क़ुरआन की आयतें एक चमत्कारिक वाणी का हिस्सा होने की हैसियत से ‘कलामे
इलाही’ (ईश्वरीय वाणी) होने की ‘निशानी’ और ‘दलील’ हैं। क़ुरआन की आयतें ख़ुद
रहनुमाई हैं, क्योंकि इनसे ईश्वर के गुणों और उसके
हुक्मों और हिदायतों का ज्ञान होता है। क़ुरआनी शिक्षाओं की बुनियाद, ‘ऑर्डर’ और ‘अकीदे’ को ज़बरदस्ती थोपने पर
नहीं, बल्कि सोच-विचार और दलीलों पर क़ायम है।
उसकी बातें तर्कपूर्ण वार्ता की हैसियत रखती हैं, क़ुरआन सिर्फ हुक्मों व हिदायतों का ही नाम नहीं है, बल्कि सबूतों व दलीलों का भी नाम है।
क़ुरआनी आयतें अपने अवतरित होने के समय (काल) की दृष्टि से दो प्रकार की हैं:-
‘मक्की’ और ‘मदनी’। मक्की वे आयतें कही जाती हैं जो हिजरत से पहले उतरी हैं, चाहे वे मक्के में उतरी हों या किसी और
जगह। मदनी उन आयतों को कहा जाता है जो हिजरत के बाद उतरी हैं, चाहे वे मदीने में उतरी हो या मदीने से
बाहर किसी दूसरी जगह। अलग-अलग सूरे अलग-अलग लम्बाई के हैं और इनमें 3 से लेकर 286 आयत हैं। पूरे क़ुरआन में कुल मिलकर 6236 आयतें (पद) हैं। मूल रूप से यह अरबी भाषा में है।
सुन्नत में
मुहम्मद साहब के कृत्यों का उल्लेख है। हज़रत मुहम्मद सल्ल. के प्रवचन,
शिक्षा, मार्गदर्शन को सुन्नत
कहते हैं। सुन्नत का मतलब "मार्ग" या "जीवन
शैली" या "जीवन विधि" भी होते हैं। यह पैगंबर मुहम्मद के जीवन के
उन आचरणों, कथनों, कार्यों और मौन स्वीकृति (जिनका उन्होंने विरोध
नहीं किया) को संदर्भित करता है, जो
मुसलमानों के लिए एक अनुकरणीय जीवन शैली का आधार हैं। सुन्नत एक अरबी शब्द
है, जिसका अर्थ "आसानी से
बहना या सीधा चलने वाली राह"। सही तौर पर इसका अर्थ साफ़-सुथरा सीधा रास्ता
है। साफ़ शब्दों में कहें तो,
यह पैग़म्बर साहब के आचरण का अनुसरण है। सुन्नत के प्रमुख पहलू हैं कौल,
फेल और तकरीर। पैगंबर द्वारा कही गई बातें या उपदेश कौल
(कथन या वचन) है, पैगंबर
के निजी या सार्वजनिक कर्म, जो
उन्होंने अपने जीवन में किए फेल (कार्य या कर्म) कहलाते हैं और किसी साथी
(सहाबी) द्वारा किया गया कार्य, जिसे
पैगंबर ने देखा हो और मना न किया हो, जिसे
उस कार्य के सही होने की स्वीकृति माना गया, तकरीर (सहमति या अनुमोदन) माना
जाता है। कुरान के बाद, सुन्नत इस्लामी कानून (शरिया) का दूसरा सबसे
महत्वपूर्ण और प्रामाणिक स्रोत है।
हदीस वे
किताबें (लिखित संग्रह) हैं जिसमें मुहम्मद साहब के उपदेश, मार्गदर्शन, शिक्षा और जीवन-चर्या संकलित हैं। यह शब्द अरबी भाषा से
आता है और इसके अर्थ "रिपोर्ट (विवरण)", "लेखा" या "रवायत" हैं। यह मार्गदर्शन हज़रत मुहम्मद साहब के काल
में उनके अनुयायी या सहाबा को दिए गए थे। इस ग्रन्थ को उनके अनुयायियों द्वारा मुहम्मद
साहब की मृत्यु के बाद संकलित किया गया था। इस्लामिक पैग़म्बर मुहम्मद के कथनों, कार्यों या आदतों का वर्णन करने वाले विवरण या रिपोर्ट
को कहते हैं। दुनिया के सभी मुसलमानों के लिए पवित्र क़ुरआन के बाद सबसे ज़्यादा महत्व अगर किसी चीज़ का
है तो वो हैं हदीस। हज़रत पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के समय उनके
साथ रहने वाले उनके साथी उनकी बातों और उनके तरीकों को लिख या याद
कर लिया करते थे इसी को हदीस कहा गया, बाद में हदीस और फ़िक़ह के जानकार इमामों ने इन हदीसों को संग्रहित कर किताबों का रूप दिया।
एक हदीस में दो मुख्य भाग होते
हैं। सनद उन लोगों (रावी) की श्रृंखला या चेन को
बताती है कि यह हदीस पीढ़ी दर पीढ़ी कैसे पहुंची। मत्न हदीस का मूल पाठ या
पैगंबर की कही गई मुख्य बात है। हदीसों को उनकी विश्वसनीयता (सनद की जांच) के आधार
पर विभिन्न श्रेणियों में बांटा जाता है, जैसे सहीह (पूर्णतः
प्रामाणिक), हसन (अच्छी/स्वीकार्य), और ज़ईफ़ (कमज़ोर या
संदेहास्पद)। हदीसें विभिन्न विद्वानों द्वारा किताबों में संकलित की गई हैं। सबसे
प्रामाणिक संग्रह सहीह अल-बुखारी और सहीह मुस्लिम माने जाते हैं ।
हदीस और क़ुरआन में क्या अंतर है? क़ुरआन ईश्वर अल्लाह की वाणी है, अर्थात यह अल्लाह
(ईश्वर) द्वारा भेजे गए सीधे शब्द और ईश्वरीय आदेश हैं और हदीस ईश्वर अल्लाह के दूत हज़रत मुहम्मद सल्ल. के
उपदेश है। हदीस अक्सर कुरान की आयतों के व्यावहारिक अर्थ और
संदर्भ को स्पष्ट करने का काम करती है। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की शिक्षाएं और जीवन शैली मुसलमानों के लिए
आदर्श हैं। हदीस नमाज़ पढ़ने के तरीके, रोज़ा, नैतिक आचरण, और शरिया (इस्लामी कानून) के नियमों को समझने में
मार्गदर्शन प्रदान करती है।
पैग़म्बर साहब (हज़रत मुहम्मद) सल्ल.
की जीवनी को सीरत (Sirah) या सीरत अन-नबविय्याह (Seerah an-Nabawiyyah) कहा जाता है। इसमें उनके जीवन, शिक्षाओं, और उनके द्वारा स्थापित आदर्शों का विस्तृत वर्णन होता
है। सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक जीवनी इब्न इस्हाक द्वारा लिखी गई थी, जिसे बाद में इब्न हिशाम ने संपादित किया।
5.12 (ग़) शरिया और शरीअत
मुस्लिम समाज में जब साधारण व्यक्ति कर्मकाण्ड का पालन करता है तो हम कहते हैं कि वह शरीअत का पालन कर रहा है। शरीअत का अर्थ है इस्लामी विधि-विधान। शरीअत (Sharia) इस्लाम धर्म का ईश्वरीय
कानून और जीवन पद्धति है। यह मुसलमानों को एक नैतिक जीवन जीने और ईश्वर के करीब
आने का मार्ग दिखाती है। इसके मार्ग पर चलकर साधक अपने आचरण को शुद्ध बनाता है ताकि वह सत्कर्मों में प्रवृत्त हो। क़ुरआन (ईश्वर का
वचन) और सुन्नत (पैगंबर
मुहम्मद की शिक्षाएं और कार्य) मिलकर शरिया (नियम-क़ानून) बनाती हैं, जो मुसलमानों के संपूर्ण जीवन को परिचालित करती हैं। क़ुरआन और सुन्नत न सिर्फ़ उनके धार्मिक जीवन के पक्षों को बल्कि सामाजिक विचार व्यवहार को भी संचालित करते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों की रक्षा करना, न्याय
स्थापित करना और एक नैतिक समाज का निर्माण करना है।
शरिया क़ानून
इस्लाम की कानूनी व्यवस्था है, जो इस्लाम के पवित्र ग्रंथ क़ुरआन, पैगम्बर की सीख पर
आधारित इस्लाम की मूल शिक्षा (सुन्नत और हदीस) और इस्लामी विद्वानों के ज़ारी आम
सहमति (इज्तिहाद) पर आधारित है। शरिया का शाब्दिक अर्थ है – लक्ष्य तक पहुँचने के लिए
स्पष्ट मार्ग। सभी मुसलमानों के लिए शरिया क़ानून जीवन जीने का एक तरीक़ा है। इसमें प्रार्थना
करना, उपवास करना और गरीबोँ और ज़रूरतमंदों के लिए काम करना शामिल है।
चूंकि मनुष्य की स्थिति सभी जीवों के बीच सर्वोच्च है, इसलिए उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह दोष रहित हो। मनुष्य इच्छा-शक्ति और बुद्धि से सम्पन्न होता है ताकि वह ज्ञान अर्जित कर सके। ज्ञान के द्वारा वह असीमित शक्ति अर्जित कर सकता है। अपनी बुद्धि के प्रयोग से वह प्रकृति की शक्तियों को समझ सकता है और उसका अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल कर सकता है। मनुष्य विवेक से भी सम्पन्न होता है। वह अच्छे और बुरे के बीच फ़र्क़ कर सकता है। यह समझदारी नैतिकता का आधार तैयार करती है। मनुष्य के अंदर निहित ये शक्तियां उसे पूर्णता (तज़किया) की प्राप्ति में मददगार साबित होती हैं। शरिया का यह अंतिम सिरा है। मनुष्य का ईश्वर के प्रति यह कर्तव्य होता है कि वह उससे प्रेम करे, उसका स्वामित्व स्वीकार करे, उसकी पूजा करे, और उसके सामने सजदे में अपना सिर झुकाए। इससे उसके आचरण
में शुद्धता आती है। आचरण की शुद्धता के लिए संयम की ज़रूरत होती है ताकि तन-मन सधे। इस तरह ईश-वंदना के तरीक़ों का निरंतर पालन करने से चित्तवृत्ति की एकाग्रता का अभ्यास होता रहता है। ऐसा करने वाले व्यक्ति को “मोमिन” (ईमान वाला/
'सच्चा आस्तिक') कहते हैं। ईमान वाला: वह व्यक्ति है जो केवल ज़बान से ही नहीं, बल्कि पूरे मन और कर्म से इस्लाम के
सिद्धांतों (अल्लाह, फरिश्तों, किताबों और कयामत) को मानता है और उस पर पूरा भरोसा करता है। कोई भी
व्यक्ति जो इस्लाम धर्म को अपनाता है और नमाज़, रोज़ा जैसे धार्मिक कर्तव्यों का पालन
करता है, वह 'मुसलमान' है। लेकिन जब कोई व्यक्ति उन नियमों को सच्चे दिल से, बिना किसी शक के स्वीकार करता है और
उसका व्यवहार व चरित्र पूर्णतः धार्मिक हो जाता है, तब उसे 'मोमिन' (आस्थावान/सच्चा आस्तिक) कहा जाता है।
5.12 (घ) ईश्वर से संबंधित कर्तव्य
इस्लाम धर्म का जो आरम्भिक रूप था उसमें ये बातें कही थीं कि ईश्वर एक
है और मुहम्मद उसके दूत या पैग़म्बर हैं। धर्मों के आधार पर अधिकार और कर्तव्य को दो भागों में बांटा गया है। एक है “हुक़ूक़-उल-अल्लाह” (ईश्वर से संबंधित
कर्तव्य) और दूसरा “हुक़ूक़-उल-अबाद” (मानव से संबंधित
कर्तव्य)। हुक़ूक़-उल-अल्लाह वे अनिवार्य दायित्व हैं जो एक बंदे (इंसान) पर
उसके पैदा करने वाले (अल्लाह) की तरफ से लागू होते हैं। हुक़ूक़-उल-अबाद
इंसान का अपने साथी मनुष्यों के प्रति नैतिक और धार्मिक कर्तव्य है। इस्लाम में
हुक़ूक़-उल-इबाद का महत्व इतना अधिक है कि यदि इंसान से अल्लाह के हक़
(हुक़ूक़-उल्लाह) में कोई कोताही हो जाए, तो अल्लाह चाहे तो उसे अपनी रहमत से माफ़
कर सकता है। लेकिन, यदि किसी ने किसी इंसान के हक़ मारे हों या किसी पर ज़ुल्म किया हो, तो उसे क़यामत
के दिन तक माफ़ नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह व्यक्ति खुद उसे माफ़ न कर
दे।
इस सिद्धांत में विश्वास रखने वालों से निम्नलिखित पांच कर्म करने को
कहा गया-
एक. कलमा पढ़ना – जप करना : इस बात को दिल
में बिठा लेना कि ईश्वर एक है और मुहम्मद उसके रसूल (दूत) हैं। ला इलाह
इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलल्लाह
दो. नमाज़ पढ़ना – प्रार्थना करना। क़ुरआन में पांच वक़्त नमाज़ पढ़ने
की बात कही गई है. उठते ही बिस्तर पर, फिर
सूर्योदय के समय, फिर मध्याह्न में, शाम को और रात के समय।
तीन. रोज़ा रखना – रमज़ान के महीने में उपवास रखना।
चार. ज़कात – अपनी आय का ढाई प्रतिशत दान दे देना, और
पांच. हज्ज – तीर्थ-यात्रा करना।
ईश्वर से संबंधित कर्तव्य में यह विश्वास निहित है कि अल्लाह एक है,
वह सबक़ा स्वामी और शासक है, समस्त मानव का पूज्य है, कोई अन्य उसके समतुल्य नहीं
है, (तौहीद/एकेश्वरवाद)। पैग़म्बर या नबी ईश्वर के द्वारा नियुक्त उसका प्रति-शासक
है। ईश्वर के दूत के रूप में पैग़म्बर उसके आदेशानुसार सारा काम करता है। इस्लामी राज्य व्यवस्था का आधार यह है कि शासक
अल्लाह है, शासन-व्यवस्था अल्लाह की है। क़ुरआन उसका विधान है, जिसके आधार पर
शासनपालिका और न्यायपालिका आदि गठित होगी। सूफ़ियों को भी पक्का मुसलमान ही माना जा
सकता है। वो दिन में पांच बार नमाज़ अदा करते हैं। रोज़े रखते हैं। इस्लाम के बाक़ी
मानने वालों की तरह मज़हब के नियम का पूरी पाबंदी से पालन करते हैं। साथ ही वो आध्यात्म
पर भी ज़ोर देते हैं। हालांकि वो पैगम्बर मोहम्मद के नाम 'ज़िक्र अल्लाह' को भी जानते हैं। और
इसका अनुकरण भी करते हैं। खुदा की शान में वो क़ुरान की आयतों और पैगम्बर मोहम्मद की
बातों का भी ज़िक्र करते हैं।
5.12 (च) मानव संबंधित दायित्व
मानव संबंधित दायित्व में कहा गया है कि किसी व्यक्ति पर कोई भी
व्यक्ति अपना धर्म बलपूर्वक आरोपित न करे, उपद्रव करना वर्जित है, किसी के उपकार
को जीवन भर याद रखना चाहिए, किसी के निजी जीवन में हस्तक्षेप न किया जाए, सभी
मनुष्य समान हैं इसलिए सबके साथ बंधुत्व,
समानता और सहिष्णुता का व्यवहार करो, स्त्री और पुरुष एक दूसरे के लिए अपरिहार्य
तथा परस्पर पूरक हैं, वैराग्य वर्जित है।
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मनोज
कुमार
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