सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
12. समाअ
वह
सफल हो गया, जिसने अपना शुध्दिकरण
किया। तथा अपने पालनहार के नाम
का स्मरण किया और नमाज़ पढ़ी। (क़ुरआन
: 14-15/87)
छठा सिद्धांत
सूफ़ी दर्शन के अनुसार छठा सिद्धांत यह है कि भक्ति-संगीत सुनने से हमारा हृदय
पवित्र होता है और हम धीरे-धीरे ईश्वर से प्रेम करने लगते हैं। संगीत से मन
केन्द्रित होता है और फिर ईश्वर की ओर उठता है।
सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में संगीत और प्रेम को ईश्वर (अल्लाह) तक
पहुँचने का एक बेहद पवित्र और सीधा माध्यम माना गया है। सूफ़ी संतों का मानना है
कि जब कोई व्यक्ति सच्चे मन से भक्ति-संगीत (जैसे क़व्वाली या रूहानी कलाम)
सुनता है, तो उसके मन से सांसारिक
विकार दूर होने लगते हैं। संगीत की पवित्र तरंगें हृदय को साफ़ (तज़किया-ए-नफ़्स) करती हैं। सूफ़ीवाद का
मूल आधार ही प्रेम है। संगीत सुनने से इंसान के भीतर का सांसारिक प्रेम (इश्क-ए-मिज़ाजी)
धीरे-धीरे ईश्वर के प्रति असीम प्रेम (इश्क-ए-हक़ीक़ी) में बदलने लगता है। सूफ़ी
संगीत की लय और शब्दों का दोहराव ध्यान को भटकने से रोकता है। इससे मन पूरी तरह
केन्द्रित हो जाता है और दुनिया के शोर से कटकर एक जगह टिक जाता है। जब संगीत से
मन पूरी तरह एकाग्र हो जाता है, तो आत्मा (रूह)
सांसारिक बंधनों से ऊपर उठने लगती है। इस अवस्था में साधक ईश्वर के अत्यंत निकट
महसूस करता है, जिसे कई बार 'वज्द' (परमानंद या
दिव्य आनंद की स्थिति) भी कहा जाता है। मशहूर सूफ़ी संत हज़रत इनायत ख़ान ने भी कहा था कि जो कोई
संगीत के रहस्यों को समझता है, वह पूरे
ब्रह्मांड के रहस्य को समझ सकता है, क्योंकि
संगीत सीधे आत्मा से संवाद करता है।
सूफ़ियों की भक्ति-भावना प्रेमोपासना के अंतर्गत “श्रवण” का एक रूप
उनके “तिलावत” अर्थात् “क़ुरआन शरीफ़” के नियमित पाठ से मिलता
है। यह प्रियतम के गुणगान का दूसरों से सुनना नहीं है, बल्कि ख़ुद धर्म-ग्रंथ का
पारायण करके उसे कर्णगोचर कर लेने के रूप में पाया जाता है। सूफियों के लिए तिलावत
केवल शब्दों को दोहराना नहीं है, बल्कि यह एक
गहरी आध्यात्मिक क्रिया है। सूफी मानते हैं कि तिलावत के दौरान बंदा (साधक) सीधे
ईश्वर (अल्लाह) से बातचीत करता है। सूफी विचारधारा में कुरान की आयतों का
ध्यानपूर्वक पाठ करने से इंसान का दिल (क़ल्ब) शुद्ध होता है और उसमें से
अहंकार व बुराइयां दूर होती हैं। इसमें केवल शब्दों को पढ़ना काफी नहीं है, बल्कि उसके गहरे रूहानी और छुपे हुए अर्थों (बातिन) को समझने की कोशिश
की जाती है। तिलावत को ज़िक्र (अल्लाह को याद करने) का सबसे उत्तम रूप माना
जाता है, जिससे आत्मा को शांति मिलती
है।
सूफ़ियों की एक और साधना है जिसे “अवराद” कहा जाता
है। इसके अनुसार कुछ चुने हुए भजनों का पाठ नित्य किया जाता है। सूफीवाद (तसव्वुफ)
में "अवराद" का अर्थ नियमित
रूप से पढ़े जाने वाले विशेष दुआओं, वज़ीफ़ों, अल्लाह के नामों (अस्मा-उल-हुस्ना) या क़ुरान की आयतों के संग्रह से
है। यह शब्द अरबी भाषा के 'विर्द' का बहुवचन है, जिसका
शाब्दिक अर्थ "पानी के घाट पर जाना" या "लगातार आने-जाने का
मार्ग" होता है। जिस तरह शरीर को जीवित रखने के लिए रोज़ाना भोजन और पानी की
ज़रूरत होती है, उसी तरह सूफी अपनी आत्मा की
खुराक के लिए दिन और रात के निश्चित समय पर (आमतौर पर फज्र और मगरिब की नमाज़ के
बाद) इन वज़ीफ़ों को पढ़ते हैं। अक्सर एक सूफी गुरु (शेख या पीर)
अपने शिष्य (मुरीद) की आध्यात्मिक स्थिति को देखकर उसे एक विशेष 'विर्द' या 'अवराद' तय करके देते हैं। इसे बिना
नागा रोज़ाना पढ़ना होता है। सूफियों का मानना है कि अवराद का लगातार जाप करने से
दिल साफ होता है, दुनियावी
विचार दूर होते हैं और साधक ईश्वर (अल्लाह) के करीब पहुंचता है।
सूफ़ी साधकों के “कीर्तन” को “समाअ” कहा जाता है। समा
अरबी शब्द है जिसका मूल ‘समअ’ है और इसका
शाब्दिक अर्थ सुनना है। सूफ़ियों की साधना की आंतरिक अवस्थाएं तल्लीनता और अंतर्ज्ञान तक पहुँचने के
एक माध्यम को आध्यात्मिक संगीत कार्यक्रम यानी “समाअ” कहते हैं। यह सूफियों की
एक विशेष प्रथा है जिसमें अल्लाह की इबादत के लिए आध्यात्मिक संगीत, कव्वाली या
सूफी गीतों को सुना जाता है। इस संगीत को
सुनते-सुनते सूफी साधक आध्यात्मिक रूप से इतने भावविभोर हो जाते हैं कि वे झूमने
या नृत्य करने लगते हैं, जिसे 'रक्स' कहा जाता है।
सूफ़ीमत में समाअ शब्द का
प्रयोग संगीत आदि को सुनकर तल्लीन होने के लिए किया जाता है। इसमें काव्य और संगीत
द्वारा भाव-समाधि प्राप्त की जाती है। समाअ के लिए साधारण गीत के साथ
नृत्य तक की ज़रूरत पड़ती है। सूफ़ी साधक उनके द्वारा अपने को आत्म विभोर कर लेता है।
सूफ़ियों ने देखा कि हाल (भाविष्टावस्था) केवल ज़िक्र (स्मरण) या मुराक़वा
(ध्यान) आदि से ही नहीं उत्पन्न होती, बल्कि नृत्य, संगीत आदि से भी उत्पन्न होती है। इसी नृत्य-संगीत आदि का सम्मिलित नाम समाअ
है। ‘समा’ का मक़सद है, सुनने वाला
जिस चीज़ को सुन रहा है उसमें तल्लीन हो जाए। समाअ के संगीत में पूरी तरह डूब जाने
के बाद साधक जिस गहरे ध्यान या तल्लीनता की स्थिति में पहुँचता है, उसे सूफी मत में 'वज्द' या 'हाल' कहा जाता है। यह एक ऐसी मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति है जहाँ इंसान बाहरी
दुनिया को भूलकर पूरी तरह ईश्वर के प्रेम में लीन हो जाता है। इस तल्लीनता के चरम
पर जब साधक का मन पूरी तरह शुद्ध हो जाता है, तब उसे ईश्वर की तरफ से जो सीधा ज्ञान या दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, उसे 'मआरिफ़त' या 'कश्फ़' कहते हैं। इसी को सूफी दर्शन में अंतर्ज्ञान कहा गया है।
समाअ के प्रति सूफ़ियों के सभी पंथ में एक मत नहीं है। कुछ सिलसिले समाअ को
आध्यात्मिक उन्नति का सबसे बड़ा माध्यम मानते हैं, जबकि कुछ अन्य इसके पूर्णतः खिलाफ हैं। इस्लाम में संगीत के प्रति आकृष्ट होना
निषिद्ध किया गया है। कुछ सूफ़ी ख़ानक़ाहों में न केवल समाअ की सभाएँ प्रचलन में नहीं है, बल्कि इसे पूर्णतः वर्जित
माना जाता है। जबकि सूफ़ियों के “चिश्तिया” और “क़ादरिया” संप्रदाय में इसका विशेष महत्व रहा है और
समाअ की महफ़िलें सजाई जाती रही हैं। हज़रत इमाम
ग़ज़ाली रह. (मृ. 1111 ई.) ने अपनी
पुस्तक “कीमिआ-ए-सआदत” में समाअ को विधिक माना
है। चिश्ती संप्रदाय का मानना था कि संगीत और कव्वाली आत्मा को ईश्वर के करीब लाने
और दिल में ईश्वरीय प्रेम की आग को भड़काने का सबसे सीधा रास्ता है। भारतीय
उपमहाद्वीप की दरगाहों पर जो कव्वाली की परंपरा
दिखाई देती है, वह इसी
सिलसिले की देन है।
नक्शबंदी सिलसिला समाअ, संगीत और नृत्य के सख्त खिलाफ है। वे बाहरी या
शोर-शराबे वाले संगीत के बजाय 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (मन ही मन या मौन साधना/शांति से ईश्वर का स्मरण) और
ध्यान पर ज़ोर देते हैं। सुहरावर्दी सिलसिला समाअ को बहुत अधिक महत्व नहीं देता। वे बाहरी नियमों
और धार्मिक विद्वता पर अधिक ध्यान देते हैं। यदि समाअ का आयोजन होता भी है, तो वह बहुत ही सीमित और सख्त शर्तों के तहत होता है। कादिरी
सिलसिला के कुछ उप-पंथ बिना वाद्य यंत्रों के केवल आध्यात्मिक कविताओं को
लयबद्ध तरीके से सुनने (समाअ बिला-मजामीर) की अनुमति देते हैं, लेकिन वे कव्वाली या नाच-गाने वाले रूप को पसंद नहीं
करते।
प्रसिद्ध सूफ़ी मौलाना रूमी द्वारा प्रचलित “मौलवी” संप्रदाय में
समाअ को एक अनोखा रूप मिला। यहाँ समाअ के दौरान साधक एक विशेष सफेद पोशाक पहनकर
गोल-गोल घूमते हुए नृत्य करते हैं, जिसे पूरी
दुनिया में 'व्हर्लिंग
दरवेश' के नाम से
जाना जाता है। उन्होंने तो इसे अपने लिए प्रमुख साधना के रूप में अपनाया। मेवलेवी संप्रदाय के मौलवी सूफ़ी समा की उत्पत्ति का श्रेय हज़रत रुमी को देते हैं।
इस
अनोखे रूप के निर्माण की कहानी यह है कि हज़रत रुमी शहर के
बाज़ार के मध्य एक दिन चल रहे थे कि उन्होंने सोने
पर हथोडा मारने की आवाज़ सुनी। ऐसा माना
जाता है कि हज़रत रुमी ने हथोडा मारने की आवाज़ में ज़िक्र को सुना, “ला इलाहा इल्लल्लाह" अर्थात सोने को मारने
वाले वृत्तिकारों के मारने की आवाज़ में उन्हें "अल्लाह
के अलावा कोई पूज्यनीय नहीं है" की लय सुनाई दी। इसलिए खुशी में झूम उठे। अपनी
दोनों बाहों को बढ़ाया और एक वृत्त (सूफ़ी घुमावदार) में
नृत्य करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही समा का अभ्यास और मेवलेवी आदेश के दरवेश पैदा
हुए थे।
सूफ़ी इस बात में विश्वास करते हैं कि परमात्मा ने संसार के सभी जीवों को
अपनी-अपनी भाषा में उसका गुणानुवाद करने की शक्ति दी है। सृष्टि कि जितनी ध्वनियाँ हैं वे स्तुति-वादन का रूप ले सकती हैं। परमात्मा ने जिसके अंतर को खोल दिया है और आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान की है वह
सभी जगह उसकी आवाज़ सुनता है। लय सुर वाले संगीत को सुनकर वह भावाविष्टावस्था को प्राप्त हो जाता है। उसका नफ़्स पिंजड़े के पंछी की तरह पिंजड़े से छुटकारा पाने के लिए छटपट करने
लगता है।
प्रसिद्ध सूफ़ी संत ख़्वाजा हजवेरी (जिन्हें दाता गंज बख्श भी कहा जाता है) ने अपनी पुस्तक “क़श्फ़-अलमहजूब” में समाअ को ग्यारहवां
तिरोहणात्मक अंतर्ज्ञान कहा है। इस पुस्तक की संरचना में उन्होंने सूफी मत के कड़े
रहस्यों और साधनाओं को समझाने के लिए 11 मुख्य 'हिजाब' (परदे या अज्ञानता) और उनके 'कश्फ़' (अनावरण/अंतर्ज्ञान) की चर्चा की है। इस क्रम में उन्होंने ग्यारहवें और
अंतिम अध्याय को पूरी तरह से "समाअ" पर केंद्रित किया है। उन्होंने कहा है कि समाअ को
वर्जित करने के बजाए इस बात पर ज़ोर दिया जाना
चाहिए कि किस शब्द को सुनना है और किसे नहीं। अगर समाअ से भावाविष्टावस्था की
प्राप्ति हो जाए तो वह अपेक्षित है, लेकिन अगर वह केवल दिल बहलाव के लिए है, तो
उसे छोड़ देना चाहिए। शैख़ ज़ुन्नून
मिस्री के विचार से समाअ बंदे पर
ईश्वर की ओर से आयद (अवतरित/प्रभावित) होता है। यह हृदय को सत्य के मार्ग पर अग्रसर करता है। लेकिन
जो व्यक्ति इंद्रिय के स्वाद के लिए उसकी ओर जाता है, वह अधर्म के मार्ग पर चला
जाता है। उन्होंने समाअ की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए एक बेहद प्रसिद्ध और
ऐतिहासिक कथन कहा है, जिसे ख्वाजा
अली हुजवेरी ने अपनी पुस्तक 'क़श्फ़-अल-महजूब' के ग्यारहवें अध्याय में भी उद्धृत किया है। शेख ज़ुन्नून मिस्री का मूल विचार
है, "समाअ (ईश्वर की
ओर से) एक दिव्य प्रभाव (ईश्वरीय प्रेरणा) है जो दिलों को सत्य की तरफ उकसाता है। जिसने
इसे सत्य (यानी शुद्ध नीयत) के साथ सुना, उसने सत्य (ईश्वर) को पा लिया और जिसने इसे वासना (मनोरंजन) के लिए सुना, वह पाखंडी (धर्मभ्रष्ट) हो गया।" उनके अनुसार, समाअ के
दौरान जो आध्यात्मिक तरंगें या भावनाएं उठती हैं, वे इंसान की खुद की पैदा की हुई नहीं होतीं। वह शुद्ध रूप से अल्लाह की तरफ से
बंदे के दिल पर नाजिल होने वाला एक 'वारिद' (आध्यात्मिक झोंका) है। जब
यह ईश्वरीय प्रभाव बंदे पर आयद होता है, तो उसके दिल
से दुनिया के सारे परदे हट जाते हैं और वह सीधे ईश्वरीय सत्य का अनुभव करने लगता
है। उन्होंने साफ किया कि चूंकि यह ईश्वर की ओर से आने वाली एक पवित्र विधा है, इसलिए श्रोता के दिल में केवल ईश्वर की चाह होनी चाहिए। यदि कोई इसे सांसारिक
आनंद के लिए सुनता है, तो वह इसके
वास्तविक संदेश से वंचित हो जाता है।
दूसरी तरफ़ शेख़ अबूबकर शिबली का कहना था कि जो व्यक्ति पूरी तरह से
ईश्वर की भक्ति में डूबा न हो उसके लिए समाअ द्रोह और कष्ट का कारण है। वे समाअ के
गहरे मर्म को समझते थे और उन्होंने चेतावनी दी थी कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से
परिपक्व नहीं है और पूरी तरह अल्लाह की भक्ति में लीन नहीं है, उसके लिए समाअ विनाशकारी हो सकता है। शेख शिबली ने कहा था, "समाअ का
बाहरी रूप एक 'फ़ितना' (द्रोह/परीक्षा/भटकाव) है और इसका आंतरिक रूप एक 'इबरत' (नसीहत/उपदेश) है। अतः, जो व्यक्ति इसमें छिपे आध्यात्मिक संकेतों को पहचानता है, उसके लिए नसीहत सुनना जायज़ है। लेकिन जो इसे नहीं पहचानता (यानी जिसका दिल
पूरी तरह ईश्वर में डूबा नहीं है), वह सीधे
द्रोह (फ़ितना) को दावत देता है और खुद को भारी कष्ट (विपत्ति) में डालता
है।" शेख शिबली का मानना था कि जो लोग केवल सांसारिक इच्छाओं, वासना या मनोरंजन के भाव से समाअ (संगीत) सुनते हैं, उनका ध्यान ईश्वर से हट जाता है। उनके लिए यह आध्यात्मिक मार्ग से द्रोह या भटकाव (फ़ितना) बन जाता है। शेख शिबली का यह विचार स्पष्ट करता है कि समाअ कोई आम नाच-गाना या
मनोरंजन नहीं है, बल्कि एक
बेहद गंभीर और पवित्र आध्यात्मिक विधा है जिसके लिए कड़े आत्म-नियंत्रण और पूर्ण समर्पण की आवश्यकता होती है।
शेख़ जुनैद बग़दादी के अनुसार
समाअ युवकों के लिए द्रोह और वृद्धों के लिए निरर्थक कार्य है। सूफी मत के सबसे
बड़े स्तंभों में से एक, हज़रत जुनैद
बगदादी ने समाअ (आध्यात्मिक संगीत)
के व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव को स्पष्ट करते हुए उम्र के आधार पर यह
महत्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था, "समाअ युवकों (नवदीक्षितों) के लिए एक 'फ़ितना' (द्रोह/भटकाव/अशांति) है, क्योंकि उनकी सांसारिक इच्छाएँ और भावनाएँ अभी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं
होतीं। वहीं, वृद्धों (या उन लोगों के
लिए जो आध्यात्मिक रूप से मृत या सुस्त हैं) के लिए यह एक निरर्थक कार्य है, क्योंकि केवल बाहरी रूप से सुनने से उनकी आत्मा जागृत नहीं होती।" सूफी
मार्ग में कदम रखने वाले नए या युवा साधकों का मन चंचल होता है। संगीत की लय और
सुर उनके भीतर ईश्वरीय प्रेम के बजाय शारीरिक उत्तेजना या सांसारिक वासनाओं को
भड़का सकते हैं। इसलिए उनके लिए समाअ मार्ग से द्रोह या भटकाव का कारण बन जाता है। जिन
लोगों का दिल आध्यात्मिक रूप से जाग्रत नहीं है या जो केवल एक आदत के रूप में
बुढ़ापे में इसे सुनते हैं, उनके लिए यह समय की बर्बादी है। संगीत उनके कानों को तो
छूता है, लेकिन उनके दिल पर कोई गहरा
असर नहीं छोड़ पाता। शेख जुनैद बगदादी का मानना था कि समाअ का वास्तविक अधिकार
केवल उन 'औलिया' या 'आरिफ़ीन' (सिद्ध संतों) को है, जिनका अहंकार (नफ़्स) पूरी तरह मर चुका है और जो केवल अल्लाह की याद में जीते
हैं। यही कारण है कि जब शेख जुनैद बगदादी के शिष्यों ने देखा कि उनके जीवन के
अंतिम वर्षों में उन्होंने खुद समाअ की महफिलों में जाना बंद कर दिया था, और जब उनसे इसका कारण पूछा गया, तो उन्होंने
कुरान की आयत का हवाला देते हुए कहा था— "जब दिल सीधे ईश्वर से जुड़ जाए, तो फिर माध्यमों (संगीत) की आवश्यकता नहीं रह जाती।"
लेकिन समय के साथ राग-रागिनियों को त्याज्य होने पर भी मुसलमानों की सहमति हो
गई। हां भाव-समाधि पर सभी सूफ़ी एक मत हैं।
हज़रत अबू साद (मृ. 969 ई) को खानक़ाह में आचरण के लिए नियम स्थापित करने और ज़िक्र के
सूफ़ी सामूहिक भक्ति अनुष्ठान करने
संगीत (सामाअ), कविता और
नृत्य की शुरूआत के लिए भी जाना जाता है। वर्तमान में
भी, खासकर भारतीय उपमहाद्वीप में समाअ को ख़ानक़ाही जीवन का महत्वपूर्ण अंग समझा जाता
है। चिश्ती संप्रदाय के प्रसिद्ध सूफ़ी संत बाबा फ़रीद ने तो “तिलावत” वाले वक्त क़ुरआन शरीफ़ का पाठ
भी सुंदर लय में ही करने को महत्व दिया। उनके अनुसार वैसा पाठ करना परमेश्वर से वार्तालाप
करने के जैसा है। समाअ का आयोजन प्रायः “उर्स” के अवसर पर भी
किया जाता है। ख़ानक़ाहों में उर्स के अवसर पर महफ़िले-समाअ (सभा-श्रवन) में क़व्वाल संत- शाइरों या शाइरों की शाइरी या क़ौल संगीत में सुनाते हैं और सुनने वाले सभी तरह के लोग होते हैं। समाअ के लिए गीत के साथ-साथ नृत्य की भी आवश्यकता पड़ती है। इन
अनुष्ठानों में अक्सर गायन, यंत्र बजाना, नृत्य करना, कविता और
प्रार्थनाओं का पाठ, प्रतीकात्मक पोशाक पहनना, और अन्य
अनुष्ठान शामिल हैं। समाअ गायन पर तो ज़ोर देता है, लेकिन
संगतता के लिए उपकरणों को भी शामिल
करता है। इनमें सबसे आम उपकरण तम्बूरीन, घंटे और बांसुरी हैं।
समा में अक्सर हम्द के गायन शामिल होते हैं, जिन्हें कौल और बैत कहा जाता
है। अमीर खुसरो (1253-1325) महान कवि, संगीतज्ञ और शेख़
निजामुदीन औलिया के अनुयायी थे। उन्होंने कौल
(कहावत) का प्रचालन करके चिश्ती समाअ को एक विशिष्ट आकार दिया। कौल को क़व्वाली के शुरू और आखिर में गाया जाता था। इसके बाद सूफ़ी कविता का पाठ होता था जो फारसी, हिन्दवी या उर्दू में होती थी और कभी-कभी तीनों ही भाषाओं में होती थी। अक्सर इसमें प्रेमपूर्ण कविता शामिल होती है। समा धुनों और नृत्य पर ध्यान केंद्रित करके
अल्लाह पर ध्यान करने का माध्यम है। यह अल्लाह
के प्रति व्यक्ति के
प्यार को जागृत करता है, आत्मा को शुद्ध करता है, और अल्लाह को खोजने का एक तरीक़ा है। व्यक्ति का दिल और आत्मा सीधे अल्लाह के साथ
संवाद करते हैं। इस प्रकार समा का लक्ष्य वज्द तक पहुंचना है। समा के माध्यम से सूफ़ी लोग खमरा (आध्यात्मिक नशा) तक पहुंचते हैं। इस तरह समा के द्वारा आध्यात्मिक चिंतन की एक उच्च
स्थिती तक पहुंचा जा सकता है।
इस्लाम में पैग़म्बर हज़रत
मुहम्मद स. के अहले बैत (परिवारजनों)
के प्रति आदर-सम्मान का भाव रखना अनिवार्य बताया गया है। समय के साथ
जब इस्लामी राज्य-व्यवस्था का विकास हुआ, तो इस अवधारणा
की उपेक्षा हुई। यहां तक कि उनके अनुयायियों को कठोर यातनाएं सहनी पड़ी। सूफ़ियों के
भी एक खास समूह को जिन्होंने पैग़म्बर के परिवारजनों को अपना आदर्श बनाया, उस समय के शासकों
द्वारा प्रताड़ित किया गया। ऐसी परिस्थिति में ये सूफ़ी अपने मन की बात बताने के लिए
सांकेतिक शब्दों का प्रयोग करने लगे। कुछेक संप्रदाय अपने मनोभाव व्यक्त करने के लिए
समाअ की सभाओं के माध्यम से हज़रत अली और पैग़म्बर साहब के परिवारजनों की स्तुति के गीत
गांव-गांव बस्ती-बस्ती गाने लगे। इनमें से आज भी सूफ़ी शेख़ लाल शहबाज़ क़लन्दर की ख़ानक़ाह
में हज़रत अली की स्तुति में अत्यंत उत्साह से गाया गीत “दमा-दम मस्त क़लन्दर अली दा पहला नम्बर” अत्यंत लोकप्रिय है।
समाअ सूफ़ीवाद में इबादत
का एक विशेष रूप से लोकप्रिय अंग है। समाअ में साधक हाथों को उठाकर पैरों से थिरक-थिरककर नृत्य करते हैं। इस नृत्य
को ‘रक्स’ कहते हैं। सूफ़ी साधक गीत-नृत्य के
द्वारा आत्म विभोर हो जाते हैं। सूफ़ी साधक भाव-विह्वल होकर कभी-कभी बेसुध तक हो
जाते देखे गये हैं। कहा जाता है कि समाअ के मौक़ों पर उठने वाली मधुर ध्वनि में लीन
हो जाने वाले की अंतर्दृष्टि आप से आप खुल जा सकती है और वह प्रियतम के निकट भी
चला जाता है। समा मन के माध्यम से मनुष्य की आध्यात्मिक उत्थान और पूर्णता के लिए प्यार की एक रहस्यमय यात्रा का
प्रतिनिधित्व करता है। सूफ़ी अनुयायी
प्रेम के माध्यम से सच्चाई की ओर आगे बढ़ता है। अपने अहंकार को
छोड़ता है, सत्य पाता है और पूर्णता में आता है। हज़रत रुमी ने समा के संदर्भ में कहा है, “मेरे लिए यह समा
इस दुनिया का और बाद का भी है। समा के भीतर जो भी घुमते हुए नृत्य करता है, गोया कि
अपने भीतर के क़ाबे के अतराफ़ (चारों तरफ़) घूमता है।”
हज़रत जलालुद्दीन रूमी यह कथन उनके सूफी दर्शन के सबसे गहरे रहस्य 'दिल के काबे' और
ब्रह्मांडीय एकता को दर्शाता है। इस उद्धरण के माध्यम से रूमी ने समाअ (घूर्णन
नृत्य/Whirling) की केवल बाहरी क्रिया को
नहीं, बल्कि उसके पीछे के गहरे
आध्यात्मिक मर्म को समझाया है। इस्लाम में मक्का स्थित
काबा की परिक्रमा (तवाफ़) की जाती है। लेकिन रूमी और अन्य रहस्यवादी
सूफियों का मानना है कि ईश्वर मिट्टी या पत्थर के बने घर में नहीं, बल्कि इंसान के 'दिल'
(हृदय) में वास करता है। रूमी ने अपनी कविताओं में कई बार
कहा है कि "हृदय ही ईश्वर का वास्तविक घर है।" इसलिए, जब कोई सूफी
साधक समाअ के दौरान अपने ही अक्ष पर गोल-गोल घूमता है, तो वह किसी बाहरी इमारत का चक्कर नहीं काट रहा होता, बल्कि वह अपने भीतर छिपे उस ईश्वरीय केंद्र (अपने दिल के काबे) की परिक्रमा कर
रहा होता है। रूमी के अनुसार, इस सृष्टि की
हर छोटी-बड़ी चीज़—परमाणु के इलेक्ट्रॉन से लेकर आसमान के ग्रह और तारे तक—सब अपने
केंद्र के चारों ओर घूम रहे हैं। समाअ में घूमना इसी ब्रह्मांडीय नियम का हिस्सा
बनना है। जब साधक घूमता है, तो वह अहंकार
(नफ़्स) को मिटाकर पूरी तरह शून्य हो जाता है। उस अवस्था में, उसका नृत्य भौतिक दुनिया (इहलोक) से शुरू होकर रूहानी दुनिया (परलोक) तक फैल
जाता है। यही कारण है कि उन्होंने कहा, "मेरे लिए यह समा इस दुनिया का और बाद का भी है।" रूमी ने स्पष्ट किया कि
मक्का जाकर भौतिक काबा की परिक्रमा करना एक बाहरी धार्मिक कर्तव्य (शरिया) है, लेकिन समाअ के माध्यम से अपने भीतर के काबे की परिक्रमा करना 'तरीक़त' (आध्यात्मिक मार्ग) और 'मआरिफ़त' (सत्य का साक्षात्कार) है। जब कोई साधक पूरी तल्लीनता से समाअ में नृत्य करता
है, तो वह सीधे अपने आत्मा में
मौजूद ईश्वर से जुड़ जाता है। रूमी का यह कहना इस बात का प्रतीक है कि ईश्वर को
खोजने के लिए बाहर भटकने या केवल औपचारिक अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं है। समाअ
वह माध्यम है जो इंसान को खुद के भीतर झांकना सिखाता है, जहाँ साक्षात ईश्वर निवास करता है।
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मनोज
कुमार