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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

भारत और सहिष्णुता-अंक-22

भारत और सहिष्णुता-अंक-22

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जितेन्द्र त्रिवेदी

अध्‍याय –9

पिछले अध्‍याय में विदेशी आक्रमणकारियों के शृंखलाबद्ध आक्रमणों के उल्‍लेख के पीछे मंशा यह दिखाने की थी कि भारत में मुसलमानों का आना कोई अनूठी घटना नहीं है। जिस तरह भारत में ई.पू. 500 से ही अनेकानेक विदेशी जातियॉं हमलावर के रूप में आयीं हैं, उसी तरह मुसलमानों का भी आगमन एक चिर-परिचित बाहरी जाति के भारत में प्रवेश के रूप में लिया जाना चाहिये किन्‍तु भारत में मुसलमानों के प्रवेश को इतने सरल ठंग से लेने में कई लोग आपत्ति रखते हैं। वे लोग अन्‍य विदेशी आक्रमणकारियों – बौद्ध सेनापति चंगेज खॉँ और बुर्दान्‍त आक्रांता हलाकू के द्वारा मुसलमानों से कहीं अधिक किये गये नरसंहार और नृशंसता को केवल इसलिये माफ कर चुके हैं कि यवन, शक, कुषाण, हूण, मंगोल और ऐसी ही कई खूँखार विदेशी जातियॉँ अंतत: हिन्‍दू धर्म में ही विलीन हो गयी और आज उनका अलग से कोई अ‍ास्तिव नहीं दिखायी देता किन्‍तु भारत में मुसलमान एक अलग धर्म के रूप में मौजूद है। डा. रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्‍तक संस्‍कृ‍ति के चार अध्‍याय में चंगेज खॉँ की नृशंसता के बारे में लिखा है कि चंगेज खॉं बौद्ध था किन्‍तु इस बौद्ध सेनापति ने इतनी निर्दयताऍँ कीं कि इतिहास आज तक उसकी याद रोमांच के साथ करता है। विश्‍व विजय के उद्देश्‍य से उसनें बुखारा, समरकंद, हेरात, बलख और कितने ही नगरों को भूनकर राख कर दिया। उसका उत्‍तराधिकारी हलाकू उससे भी ज्‍यादा जालिम था, किन्‍तु उन्‍हे भी माफ कर चुके है और मुसलमानों के बारे में अभी भी इस देश के कुछ लोगों के दिल साफ नहीं हुए हैं।

...........इतिहास की इन घटनाओं के प्रकाश में देखने पर भारत में इस्‍लामी अत्‍याचार के कुछ मनोरंजक पहलू सामने आते हैं। पहली बात तो यह है कि गजनवी और गौरी के साथ जो इस्‍लाम भारत पहुँचा, वह वही इस्‍लाम नहीं था जिसका आख्‍यान हजरत मुहम्‍मद और उनके शुरू के चार खलीफाओं ने किया था अथवा जो इस्‍लाम, गजनवी के आक्रमण के पूर्व, सौदागरों और फकीरों के साथ भारत के पश्चिमी तटों पर उतरा था। वास्‍तव में, यह वह इस्‍लाम था, जो एम.एन. राय के मतानुसार, तुर्को और तातार अनुयायियों के हाथों व्‍यभिचरित हो चुका था।

तीसरी बात यह कि गजनवी और गौरी – जैसे मुसलमान इस्‍लाम के सेवक नहीं थे, उनमें दूसरों का धन लूटकर आनन्‍द मनाने की भावना ही प्रधान थी। इस्‍लाम की दुहाई, तौहीद का प्रचार और मूर्ति पूजा का खण्‍डन, ये सिर्फ लोभ को छुपाने के आवरण मात्र थे। गजनवी ने भारत पर सत्रह बार चढ़ाई की, लेकिन, इन चढ़ाइयों में उसने इस्‍लाम का प्रचार कुछ भी नहीं किया। इतिहास इतना ही जानता है कि वह इस देश का धन लूटने को आता था और यहॉं की लूट से उसने अपनी राजधानी को मालामाल किया भी। तैमूरलंग ने जब हिन्‍दुस्‍तान की ओर नज़र डाली तब, कहते हैं, लोगो ने उससे कहा कि हिन्‍दुस्‍तान जाने की ऐसी क्‍या जरूरत हो सकती है, वहॉँ तो मुसलमानों का राज्‍य पहले से ही मौजूद है। किन्‍तु राज्‍य मुसलमानों का हो या हिन्‍दुओं का तैमूरलंग भारत की समृद्धि को लूटने के लिये बेकरार था। अतएव, वह सन् 1398 ई. में सिंधु के पार चला आया। मुहम्‍मद तुगलक को हरा कर उसने दिल्‍ली में डेरा डाल दिया और लूट मार मचाकर फिर समरकन्‍द को लौट आया।

इतिहास लेखकों का यह भी मत है कि महमूद गजनवी की सेना में हिन्‍दू सिपाही भी काफी संख्‍या में काम करते थे। इन सिपाहियों के मध्‍य एशिया के युद्धों में महमूद का साथ दिया था। तिलक नाम का एक हिन्‍दू महमूद की सेना में कुछ ऊँचे पद का अधिकारी था और नियाल्‍तगीन नामक सरदार ने जब महमूद के खिलाफ विद्रोह किया, तब उसे दबाने को तिलक ही भेजा गया था।

एक स्थित यह भी हुई कि जब इस देश पर मुगलों का आक्रमण हुआ, तब पठान और राजपूत आपस में दोस्‍त हो गये और यह दोस्‍ती काफी दिनों तक चलती रही। हल्‍दीघाटी में महाराणा प्रताप की सेना की एक पंखी बिलकुल पठानों की थी और यह पठान महाराणा के प्रति अत्‍यन्‍त वफादार थे।

ऐसे लोग भारत में केवल एक धर्म को प्रमुखता से देखने में ही आनंद की अनुभूति की आकांक्षा रखते हैं और भारत जिन जातीय-विजातीय, भीतरी-बाहरी तत्‍वों से बना है उसे अनदेखा कर देना चाहते हैं। इस तरह तो उन्‍हें भारत में उपस्थित सिर्फ मुसलमानों से ही नहीं अपितु ईसाइयों, पारसियों और बौद्धो से भी परेशानी महसूस होती होगी क्‍योंकि ये धर्म भी भारत में हिन्‍दू धर्म से इतर अलग अस्तित्‍व रखे हुए है। मंगोल, तातर, और हूण जैसी बर्बर जातियों के इस देश में किये गये बर्बर कृत्‍यों को हम सिर्फ इसलिए माफ कर चुके हैं कि अब उनका अलग से कोई अस्तित्‍व दिखाई नहीं देता और वे तत्‍व किसी न किसी रूप में हिन्‍दू धर्म में ही विलीन हो गये किन्‍तु जो समुदाय उन्‍हीं की तरह बाहर से आये थे और आज इस देश के हर क्षेत्र में अपनी भूमिकाएँ निभा रहे हैं, वे हमें केवल इसलिये खटक रहे हैं कि धर्म के रूप में उनका अलग अस्तित्‍व क्‍यों है? ऐसा सोचना भारत की बहुलतावादी प्रवृत्ति, जिसके दर्शन हमनें पीछे के अध्‍यायों के पन्‍ने-पन्‍ने में किये हैं, को झुठलाना हैं और यह इस देश की महान समाहनकारी परंपरा के भी विरूद्व है। अत: हिन्‍दू-मुस्लिम संबंधो की व्‍याख्‍या के माध्‍यम से मेरा यह विनम्र प्रयास रहेगा कि यदि हिन्‍दू-मुस्लिम प्रश्‍न का उत्‍तर बहुत सरल नहीं है तो इस प्रश्‍न का उत्‍तर बहुत जटिल भी नहीं है।

इस अध्‍याय में मैं इस्‍लाम के आगमन के बाद हिन्‍दू मुसलमानों के संपर्क से जिस संस्‍कृति का निर्माण हुआ, उसे व्‍याख्‍यायित करने की कोशिश करूँगा। हम यह देखने की भी कोशिश करेंगे कि किस तरह भारत के संपर्क में आकर इस्‍लाम ने ‘तसब्‍बुफ’ (तसब्‍बुफ का अर्थ हिन्‍दी में लिखना है) की राह पकड़ी और भारत ने इस्‍लाम के संपर्क से भक्ति आंदोलन की राह पकड़ी। किन्‍तु अपनी बात शुरू करने से पहले मैं हिन्‍दू-मुस्लिम प्रश्‍न की भूमिका बनाते हुए डॉ. रामधारी सिंह दिनकर की पुस्‍त्‍क "संस्‍कृति के चार अध्‍याय" से एक मार्मिक बात कहना चाहता हूँ: "हिन्‍दुओं को इस बात का ज्ञान प्राप्‍त करना है कि इस्‍लाम का भी अर्थ शान्ति-धर्म ही है। इस धर्म का मौलिक रूप अत्‍यन्‍त तेजस्‍वी था तथा जिन लोगों ने इस्‍लाम की ओर से भारत पर अत्‍याचार किया, वे शुद्ध इस्‍लाम के प्रतिनिधि नहीं थे। इन अत्‍याचारों को हमें इसलिये भूलना है कि उनका कारण ऐतिहासिक परिस्थितियाँ थीं जो अब समाप्‍त हैं और इसलिए भी कि इन्‍हें भूले बिना हम देश में एकता स्‍थापित नहीं कर सकेंगे।"

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

भारत और सहिष्णुता-अंक-21

भारत और सहिष्णुता-अंक-21

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जितेन्द्र त्रिवेदी

 

अलबरनी के हवाले से मैं यह कहना चाहता हूँ कि आक्रांताओं के बारे में हमदर्दी दिखाना सच पर जानबुझ कर पर्दा डालने जैसा है। अलबरनी खुद गजनी की सेना का हिस्‍सा था और उसका नमक खाता था लेकिन उसने अपने लेखन में कहीं भी महमूद गजनी के कारनामों की प्रशंसा तो दूर उन्‍हें छिपाने की भी कोशिश नहीं की। उसने बड़ी बेबाकी से गलत को गलत कहा और गजनी के हमलों को कहीं से भी ‘ईस्‍लाम सम्‍मत’ नहीं बताया। अपितु अलबरनी ने साफ-साफ शब्‍दों में लिखा कि इससे इस्‍लाम को फायदे की अपेक्षा नुकसान ही अधिक हुआ। अलबरनी ने भारतीय साहित्‍य को पढ़ने के लिये स्‍वयं अधेड़ अवस्‍था में संस्‍कृत सीखी और वेद, उपनिषदों सहित दर्जनों पुस्‍तकों को पढ़ने के बाद भारत के बारे में बड़ी मुकम्‍मल राय दुनियां के सामने रखी। जहाँ वह भारतीय मेधा और ज्ञान का कायल था वहीं उसने यहाँ की कुरीतियों की निंदा भी की है। वह लिखता है - "भारतीय किसी बर्तन को दूसरे के छू लेने पर अपने उपयोग का नहीं समझते जो कि उनके तंग दायरे को बताता है। और उन्‍हें चीजों को पुन: शुद्ध करके इस्‍तेमाल करने की कला आती ही नहीं।" इस तरह अलबरनी ने जिस आलोचनात्‍मक और निष्‍पक्ष तरीके को अपनी बात कहने का माध्‍यम बनाया, उसी अंदाज में आज फिर से मुसलमानों के भारत आगमन और यहाँ बस जाने के सूत्रों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। जिस तरह तुर्क आक्रांताओं की बर्बरता पर पर्दा डालने का प्रयास मूर्खतापूर्ण होगा उसी तरह भारत में मुसलमानों की मौजूदगी को विदेशी या विजातीय तत्‍वों की उपस्थित करार देना उससे भी बड़ी मूर्खता होगी क्‍योंकि जिस तरह इस अध्‍याय में हमनें देखा कि कैसे यहाँ अगणित विदेशी जातियों के हमले हुए, उन्‍होंने यहाँ जो भी न करने लायक चीजें थी, कीं, फिर भी अन्‍तत: वे इसी मिट्टी का हिस्‍सा बन गये उसी लहजे में हमें मुसलमानों के आगमन को भी देखने की जरूरत है। डॉ. अमर्त्‍यसेन ने इस बात की गहराई को समझते हुए अपनी पुस्‍तक – ‘आर्ग्‍यूमेन्‍टेटिव इंडिया’ में बड़ी मार्के की बात कही है:

"महमूद गजनी और अन्‍य आक्रांताओं द्वारा किये गये भीषण विनाश के ही किस्‍से बखानने तथा धार्मिक सहिष्‍णुता के लंबे इतिहास की अनदेखी करने के प्रयास उचित नहीं होगें। वास्‍तविकता यही है कि भारत में आते समय आक्रांताओं ने चाहे जितनी क्रूरता और बर्बरता का प्रदर्शन किया हो किन्‍तु यहाँ बस जाने के बाद कुछ एक अपवादों को छोड़कर उन्‍होंने भी सहनशीलता ही अपना ली थी। भारत के मुसलमान शासकों में मुगलों को तो विध्‍वंसक नहीं अपितु निर्माणकर्ता कहना अधिक उपयुक्‍त लगता है।" उन्‍होंने भारत में बाहरी तत्‍वों के प्रवेश पर अलग से टिप्‍पणी करते हुए उसी किताब में लिखा है कि "धार्मिक सहिष्‍णुता तो भारत के इतिहास में यहाँ अनेक धर्मों के फलने-फूलने से ही स्‍पष्‍ट हो जाती है। यहाँ हिन्‍दू, बौद्ध, जैन, यहूदी, ईसाई, इस्‍लाम, पारसी, सिख, बहाई आदि अनेक धर्मो के अनुयायी सदियों से रह रहे हैं। हिन्‍दू शब्‍द भी बाहर से आया है और फारसी और अरबों की देन माना जाता है – उन्‍होंने सिंधु नदी के नाम पर यहाँ बसे लोगों का और उनके नाम का निर्धारण कर लिया था। यहूदी तो येरूशलम के पतन के तुरंत बाद ही भारत आ गये थे। उनसे भी पहले 8वीं शताब्‍दी ई.पू. में ‘बेन’ नामक इजरायली कबीले के लोग भारत आ गये थे। बाद में भी यहूदियों का आगमन समय-समय पर होता रहा। 5वीं और छठी शताब्दियों में दक्षिण अरब, फारस से, तो फिर बगदाद और सीरिया से 18वीं से 19वीं सदी में भी यहूदी भारत में आकर बसे है। ये मुख्‍यत: कोलकाता और मुंबई के आसपास ही केन्द्रित रहे हैं। ईसाई भी बहुत जल्‍दी ही भारत आ गए थे। चौथी शताब्‍दी तक आज के केरल प्रांत में ईसाईयों की अच्‍छी-खासी बस्तियॉं बस चुकी थी। 7वीं शताब्‍दी के अंत में ईरान में धार्मिक उत्‍पीड़न से त्रस्‍त पारसी समुदाय ने भी भारत की ओर रूख किया। भारत में शरणार्थी बना अंतिम समुदाय बहाई है। इस लंबे इतिहास काल में और अनेक धाराओं में यहाँ आकर लोग बसे हैं। 8वीं शताब्‍दी में पश्चिमी तट पर मुस्लिम अरब व्‍यापारियों ने बसना शुरू कर दिया था। यह उत्‍तर-पश्चिम से आक्रमणकारी इस्‍लाम के आगमन से कहीं पहले की बात रही है। भारत के बहुधार्मिक परिदृश्‍य में प्रत्‍येक धर्म का अनुयायी समुदाय अपना विशिष्‍ट स्‍वरूप बनाये रह सका है। विविधता और बहुलता की समृद्ध परंपरा ने सदा अन्‍यों से सम्‍मानपूर्ण आदान-प्रदान और संवाद के आधार पर सहिष्‍णुता को ही उचित ठहराया है।"

उपरोक्‍त अध्‍ययन से यह स्‍पष्‍ट हो गया है कि 1000 ई. तक भारत की धरती पर कई सजातीय और विजातीय तत्‍व एक साथ रहने लग गये थे और यहाँ की संस्‍कृति एक मिश्रित संस्‍कृति का स्‍वरूप धारण कर चुकी थी और इसे भानुमती का कुनबा कहा जा सकता है और जब 1000 वर्ष पूर्व ही भारत में नाना भाँति के विचारों, धर्मों वाले लोग रहने की पंरपरा शुरू हो चुकी थी तो 20वीं – 21वीं सदी में अचानक से हम एक ही धर्म और संस्‍कृति की प्रमुखता की बात क्‍यों करने लग गए हैं?

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

भारत और सहिष्णुता-अंक-20

भारत और सहिष्णुता-अंक-20

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जितेन्द्र त्रिवेदी

अंक-20

इतनी स्‍पष्‍ट और इंसानियत भरी बातें जब मक्‍का वालों ने सुनी तो बहुत से लोग मुहम्‍मद साहब के मुरीद हो गये किन्‍तु जिन लोगों के कारनामों के खिलाफ ये बातें जाती थीं वे उनके विरोधी हो गये और उन्‍होंने उन्‍हें अपमानित करना शुरू कर दिया। जब हजरत मुहम्‍मद साहब रास्‍ते में निकलते तो उनके टखनों पर निशाना बना-बना कर पत्‍थर मारे जाते। फिर भी उन्‍होंने बाहर निकलना जारी रखा तो उनके मुँह पर खाक फेंकी जाती। इन जुल्‍मों से भी वे नहीं घबराये और अमन और शांति का पैगाम देते रहे तो मक्‍का में उन्‍हें मारने के लिये षड़यंत्र रचा गया जिसमें उन्‍हें आधी रात में घर के भीतर जिंदा जलाने की योजना थी, किन्‍तु दैवयोग से उन्‍हें इसकी जानकारी हो गई और आजिज आकर हिजरी संवत 01 (ई. सन् 622) को उन्‍होंने अपनी स्‍वरक्षा (Self Defence) और मिशन को पूरा करने के लिये एक जद्दोजहद शुरू की जिसे उन्‍होंने ‘जिहाद’ का नाम दिया और मक्‍का छोड़कर मदीना आ गये। अनाचर-अत्‍याचार के दम घोंटू वातावरण के खिलाफ उन्‍होंने भरसक तालमेल बिठाने की कोशिश की, बातचीत, सुलह-सफाई और समझाइश के सारे रास्‍ते इख्तिहार किये, किन्‍तु जब ‘कुरैश’ (मक्‍का का उनका विरोधी कबीला) ने उनके अस्तित्‍व को ही मिटाने की चाल चली तब उन्‍हें विवश होकर ‘जिहाद’ करना पड़ा और वे मदीना आकर अपने अस्तित्‍व की लड़ाई लड़ने लगे। मदीना में उन्‍होंने अपने अनुकूल परिस्थियाँ तैयार कर ली और अपने समान विचारों वाले लोगों को संगठित कर मक्‍का पर 628 ई. में हमला बोल दिया। उनके साथ मात्र 10 हजार लोग थे जिन्‍होंने वीरता पूर्वक मक्‍का पर कब्‍जा कर लिया। मक्‍का की विजय के तुरंत बाद उन्‍होंने अपना ऐतिहासिक भाषण दिया जिसे यहाँ ताजा हवाले के ख्‍याल से दिया जा रहा है -

"मक्‍का वालो ! एक ईश्‍वर के अलावा कोई पूज्‍य नहीं। उसका कोई सहभागी नहीं। उसी ने अपने बंदों की सहायता की और समस्‍त झुंडों को तोड़ दिया। हाँ ! सुन लो। समस्‍त अभियान, पुरानी हत्‍याएं और खून के बदले एवं जो भी खून बहा वह मेरे पैरों के नीचे है। हे कुरैश वालों! ईश्‍वर ने अब जहालियत का घमण्‍ड तथा वंश पर गर्व करना खत्‍म कर दिया है। तुम सब लोग आदम की संतान हो और आदम मिट्टी से पैदा हुये थे।"

हजरत मुहम्‍मद के उपरोक्‍त भाषण से स्‍पष्‍ट होता है कि अपने विरोधियों पर जीत दर्ज करने के बाद भी न वे इतराये और न ही उस जीत में अपनी खुद की विलक्षणता दर्शायी, अपितु उन्‍होंने सबको खोलकर बता दिया कि जो कुछ हुआ है वह ईश्‍वर की कृपा से ही हुआ है।

इस तरह मक्‍का पर विजय करने के साथ इस्‍लाम दुनियां के धर्मों के बीच खड़ा हुआ और इन विजय अभियानों का सिलसिला पूरे अरब प्रायद्वीप से होता हुआ यूरोप, एशिया माइनर और अफ्रीका तक चला गया, किन्‍तु हमारे अध्‍ययन का विषय भारतीय प्रायद्वीप में इस्‍लाम के आगमन से संबंधित है, अत: हम उसी पर अध्‍ययन केन्द्रित करते हैं।

भारत में मुसलमानों की सबसे पहली आवाजाही सन् 626 ई. में ही शुरू हो गई थी जब अरब सौदागरों का पहला बेड़ा भारत के पश्चिमी समुद्र तटों पर उतरा। उनका यह आगमन व्‍यापार के लिये और मित्रतापूर्ण था किन्‍तु हमले के रूप में मुसलमानों का आगमन हुआ सन् 712 ई. में जब खलीफा के अल्‍पव्‍यस्‍क 17 वर्षीय सिपहसालर मु0 बिन कासिम ने भारत का सीना छलनी कर दिया। मु0 बिन कासिम ने भारत पर अब तक हुये हमलों को मात दे दी किन्‍तु उसका प्रभाव क्षणिक रहा। मुसलमानों के दल के दल धर्म विजय के जोश में यहाँ आए किन्‍तु भारत के सीमावर्ती प्रदेशों से आगे नहीं बढ़ पाये। वे मात्र लूटमार करके चल जाते। उनकी यह आवाजाही अगले 200 वर्षों तक जारी रही और उल्‍लेखनीय सफलता हासिल की महमूद गजनी ने जो सन् 1001 ई. में भारत को लूटने के इरादे से यहाँ आया था और उसने यह प्रतिज्ञा की हुई थी कि वह हर साल भारत पर कम से कम एक हमला जरूर करेगा। उसे इस्‍लाम के खोखले साम्राज्‍य के लिये उसे धन की आवश्‍यकता सता रही थी। उसने हिन्‍दुस्‍तान पर लगभग 17 हमले किये और हर बार भारी माल यहाँ से लेकर गया। इन 17 हमलों में से किसी ने इतना दुख भारत को नहीं दिया जितना 1025-26 ई. में उसके सोमनाथ के हमले ने।

गजनी के चले जाने के बाद भी मुसलमानों की रिहाइश भारत में जारी रही और कई दल भारत में स्‍थायी रूप से बस गये। यहीं से एक अनोखी संस्‍कृति की शुरुआत हुई जिसे अब ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ कहा जाता है। यद्दपि तुर्क हमलावरों ने भारत के कलेजे को भारी दुख पहुंचाया था तथापि इन हमलावरों के साथ ऐसे नायाब तत्‍व भी जाने-अनजाने में भारत आ गये जिनकी व्‍याख्‍या करने का प्रयास हम करेंगे। महमूद गजनी भारत के इतिहास में केवल तबाही के लिये ही याद नहीं किया जायेगा अपितु ‘अलबरनी’ जैसे विद्वान को भारत में लाने के लिये भी याद किया जोगा। अलबरनी एक ऐसा व्‍यक्ति था जो अपने समकालीनों में सर्वाधिक संतुलित और ज्ञानवान था। उसे ईश्‍वर ने बहुत बड़ा हृदय दिया था जो अपने-पराये के भेद को महत्‍व ही नहीं देता था और किसी के भी गुणों की प्रशंसा करने में सिद्धहस्‍त था। जिन भारतीयों को गजनी ने ‘काफिर’ कह कर दुत्‍कारा था उनके बारे में अलबरनी की यह राय थी कि हिन्‍दुस्‍तान की गली-गली में एक सुकरात रहता है। अलबरनी उस समय तक की ज्ञान की सभी विधाओं में निपुण था। क्‍या खगोलशास्‍त्र, क्‍या विज्ञान, क्‍या भूगर्भशास्‍त्र, क्‍या गणित, क्‍या दर्शन, क्‍या साहित्‍य, क्‍या इतिहास, ज्ञान की सभी विधाओं में वह पारंगत था और उसने अपने ज्ञान को दुनिया को बाटनें के उद्देश्‍य से सैंकड़ों किताबें लिखी जिन्‍हे पढ़कर आज भी उसकी प्रतिभा का लोहा मानना पड़ता है। वह एक निष्‍पक्ष व्‍यक्ति था जिसनें साफ-साफ लिखा है कि कुछ प्रारंभिक मुस्लिम शासकों के कार्य प्राय: धार्मिक भावनाओं पर आधारित न होकर केवल राजनीतिक स्‍वार्थों पर आधारित थे। लूटमार उनका प्रमुख धंधा था। इसीलिये उसके दिये गये विवरणों पर विश्‍वास होता है और इसीलिये उसके इस विवरण पर भी विश्‍वास किया जाना चाहिये जिसमें उसने यह महत्‍वपूर्ण तथ्‍य दिया है जिसे जानकर कई लोग चौंक सकते हैं, वह यह कि सुल्‍तान महमूद गजनी की सेना में कई कन्‍नड़ सैनिक थे जो कर्नाटक में भर्ती हुये थे। बड़ी ईमानदारी से उसने यह भी खुलासा किया है कि बार-बार के तुर्क हमलों से हिन्‍दू व मुसलमानों के बीच सैद्धांतिक और भावनात्‍मक शत्रुता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। अलबरनी मनोविज्ञान का भी अच्‍छा ज्ञाता था उसने ‘किताबुल हिन्‍द’ में लिखा है:

"अपने हाव-भाव व्‍यवहार आदि को लेकर भारतीय हम लोगों से बहुत ही अलग हैं – यहाँ तक कि हमारी बात, पहनावा और रस्‍मों आदि की चर्चा कर वे अपने बच्‍चों को डराते भी हैं। वे हमारा चित्रण शैतान की औलाद के रूप में करते हैं और हमारे प्रत्‍येक कार्य को सद्कार्य और सद्व्‍यवहार के एकदम विपरीत मानते हैं किन्‍तु हमें यह भी मान लेना चाहिये कि विदेशियों के बारें में ऐसे भ्रांतिपूर्ण विचार केवल हमारे देश और भारत में ही प्रचलित नहीं हैं – ये तो दुनियां के सभी देशों में व्‍याप्‍त होते हैं।" स्‍व-अलोचना (अपने भीतर झांकना) और सामान्‍यीकरण के ऐसे उदाहरण कम ही मिलेंगे।

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

भारत और सहिष्णुता-अंक-19

भारत और सहिष्णुता-अंक-19

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जितेन्द्र त्रिवेदी

अंक-19

इस्‍लाम का उदय मुहम्‍मद साहब के उदय से गुँथा हुआ है। उन्‍होंने तत्‍कालीन अरब के भोग-विलास और बेहयाई पूर्ण समाज को सही दिशा दिखाने के उद्देश्‍य से उन्‍हें ईश्‍वर की राह पर लाने की जो जद्दोजहद शुरू की, उसकी चरम परिणति थी – ‘इस्‍लाम’। ‘इस्‍लाम’ का अर्थ है – शांति में प्रवेश करना और ईश्‍वर के आगे अपने को सौंप देना। मुहम्‍मद साहब का जन्‍म 570-71 ई. में अरब प्रायदीप के मक्‍का नगर में हुआ था। उनके पिता अब्‍दुल्‍ला तथा माता आसीना ‘कुरैश’ नामक कबीले से संबंधित थे। अरब के कबीले आपस में लड़ते रहते थे और उनकी एक-दूसरे से बदला लेने की रस्‍म पीढ़ीयों तक चलती थी। मुहम्‍मद साहब यह देख कर दुखी रहते थे और इससे भी ज्‍यादा वे दुखी थे – उस समाज की अश्‍लीलता, नग्‍नता, जहालत और खुली गुमराही से।

जब वे 30 वर्ष पार कर गये तो धीरे-धीरे उनके व्‍यक्तिव में बदलाव आने लगा। उनका मन सांसारिक विषयभोगों में नहीं लग रहा था और वे मक्‍का के समीप एक पहाड़ की गुफा के तंग रास्‍ते पर बैठकर घंटों ध्‍यान लगाते रहते थे। जब वे 39 वर्ष की अवस्‍था में पहुँचे तो अचानक ध्‍यान में उन्‍हें ईश्‍वरीय अनुभूति हुई और यह पैगाम मिला कि ईश्‍वर ने उन्‍हें अपने काम के लिये चुन लिया है। इसी दिन से उन्‍हे नबूबत हासिल होना माना जाता है, किन्‍तु मुहम्‍मद साहब इस घटना से डर गये और दौड़ते हुए घर पहुँचे और डरते-डरते अपनी पत्‍नी खदीजा को सारी बातें बता दीं। भय से उनका सारा शरीर कंपायमान था और उन्‍हें लग रहा था कि अब वे जीवित नहीं रह पायेंगे। इस पर उनकी पत्‍नी ने उन्‍हे ढाढस दिया और समझाया- ‘आपके प्राणों को कोई भय नहीं है। आप एक नेक इंसान हैं, सगे-संबंधियों का हक देते हैं, लोगों की जिम्‍मेदारी उठाते हैं, सज्‍जनों, संतो, गरीबों और मुहताज लोगों की सहायता करते हैं, लोगों की कठिनाइयों में मददगार बनते हैं। आपके साथ ईश्‍वर कुछ गलत क्‍यों करेगा? पत्‍नी के समझाने पर उन्‍हें थोड़ी तसल्‍ली तो हुई पर पत्‍नी भी भीतर से सहम गयी थी। पत्‍नी उन्‍हें लेकर एक वृद्ध ईसाई धर्माचारी के पास गई। उन्‍होंने उस वृद्ध ईसाई को सब कुछ बताया तो वह बोला- ‘यह वही तत्‍व ज्ञाता फरिश्‍ता है जो हजरत मूसा पर उतरा था किन्‍तु इसकी जाति के लोग इसका बहिष्‍कार कर देंगे, इसे सतायेंगे।‘ इन बातों ने मुहम्‍मदसाहब को सचेत कर दिया किन्‍तु वे ‘हीरा’ नामक गुफा पर नियमित रूप से जाते रहे और पुन: उस तरह की अनुभूति की प्रतीक्षा करने लगे। इस प्रतीक्षा में उनका ध्‍यान निरंतर एकाग्र होने लगा और उनके हृदय पर जो अकस्‍मात संस्‍कार मनुष्‍य प्रवृत्ति के कारण पड़े थे दूर हो गये। अब उनके हृदय में लगातार उसी ईश्‍वरीय अनुभूति के संदेश की इच्‍छा बलबती होने लगी। एक दिन जब वे ध्‍यान में बैठे तो उन्‍हें ‘ज्ञान के रूप में सुरा-ए-मुद्दसिर की आरंभिक आयतें अवतीर्ण हुई जो इस प्रकार हैं:

"ऐ कमली ओढ़ने वाले! उठ! पथ भ्रष्‍ट लोगों को सचेत कर ......." उन्‍हे स्‍पष्‍ट ईश्‍वरीय आदेश मिल गया कि - ला इलाह इल्‍लल्‍लाह मुहम्‍मदरसूलउल्‍लाह, अर्थात् ईश्‍वर एक है और मुहम्‍मद उसका पैगंबर है, ईश्‍वर के अलावा अन्‍य किसी की भी उपासना करना मानवता के लिये जहर है। मनुष्‍य को स्‍वार्थ रहित होकर समस्‍त कामनाओं का त्‍याग करके परस्‍पर भाईचारे से रहना चाहिये। हजरत मुहम्‍मद साहब ने इन ईश्‍वरीय संदेशों को मक्‍का के लोगों तक पहुँचाना शुरू कर दिया, किन्‍तु उनका भारी विरोध हुआ, उनका मजाक उड़ाया गया और उन्‍हें तरह-तरह से सताया गया। लेकिन लोग यह भी देख रहे थे कि जो लोग मुहम्‍मद साहब की शिक्षाओं पर अमल करने लगे वे और भी अधिक सत्‍कर्मी, सत्‍यवादी, शुद्ध और विनम्र होने लग गए थे। इस फर्क का असर जनता पर पड़ना स्‍वाभाविक था।

मुहम्‍मद साहब के मार्फत कुरान की ऐसी-ऐसी आयतें उतरने लगी जिनको पढ़ने और सुनने पर उनकी मिठास लोगों के अपनी ओर खींचने लगी:

"और ‘यतीमों को उनका धन दो और न बुरी चीज को उनकी अच्‍छी चीज से बदलो और न उनके माल को अपने माल के साथ गड्डमड्ड करके उसे हड़पो।"

(सूरा अन-निसा। आयत संख्‍या-2)

"जो कुछ अल्‍लाह ने तुममें से किसी को दूसरों के मुकाबले अधिक दिया है, उसकी कामना न करो ....."

(वही / आयत सं. 32)

"और अच्‍छा व्‍यवहार करो, माता-पिता के साथ और नातेदारों, अनाथों, मुहताजों और पड़ोसियों के साथ और पास के व्‍यक्तियों के साथ और उन नौकरों के साथ जो तुम्‍हारे पास हो। निसंदेह अल्‍लाह किसी ऐसे व्‍यक्ति को पसंद नहीं करता जो इतराने वाला और डींग हाँकने वाला हो।"

(वही / आयत सं. 36)

"यदि तू मुझे कत्‍ल करने को मेरी ओर अपना हाथ बढ़ायेगा तो मैं तुझे कत्‍ल करने को तेरी ओर अपना हाथ बढ़ाने वाला नहीं हूँ ....... जिसने किसी बेगुनाह व्‍यक्ति को मारा तो मानों उसने समस्‍त मानवता की ही हत्‍या कर डाली और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो समस्‍त मनुष्‍यों को जीवन प्रदान किया।"

(सूरा अलमाइदा / आयत सं. 28 एवं 32)

"हे नबी कह दो- मैं तुम लोगों से यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्‍लाह के खजाने हैं और न मैं परोक्ष की सारी बातें जानता हूँ और न मैं तुमसे यह कहता हूँ कि मैं फरिश्‍ता हूँ। मैं तो बस उसी पर चलता हूँ जो राह मेरा ईश्‍वर दिखाता हे।"

(सूरा अल-अनआन/ आयत सं. 50)

"और तुम्‍हारे पास तुम्‍हारे ईश्‍वर की ओर से सूझ-बूझ की बातें आ चुकी हैं तो जिस किसी ने सूझ-बूझ से काम लिया तो उसमें उसका अपना भला है और जो कोई फिर भी अंधा बना रहा तो उसने खुद अपना बुरा किया। ........ और अल्‍लाह के सिवा ये जिन्‍हें पुकारते हैं इस्‍लाम मानने वाला उन्‍हें कतई गाली न दे क्‍योंकि कहीं ऐसा न हो कि ये लोग फिर आगे बढ़ कर ईश्‍वर को ही गाली देने लग जाये।"

(वही / आयत सं. 105 एवं 109)

"आओ मैं तुम्‍हें सुनाऊँ कि तुम्‍हारे रब ने तुम्‍हें किन चीजों से रोका है, यह कि उसके साथ किसी और को शरीक न ठहराओ, माता-पिता के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करो, गरीबी के कारण अपनी औलाद की हत्‍या न करो, अश्‍लील बातों के पास भी मत फटको, चाहे वे खुली हों या छिपी हों और किसी जीव की हत्‍या मत करो ..... और यह कि अनाथ के माल के निकट भी न जाओ और जब बात कहो तो न्‍याय की कहो, चाहे मामला अपने नातेदार का ही का क्‍यों न हो"

(वही / सूरा 152 153)

"कह दो मेरी नमाज और मेरा जीना और मेरा मरना सिर्फ ईश्‍वर के लिये है, जो मेरा ही नहीं सारे संसार का मालिक है। अपने रब को गिड़गिड़ा कर और चुपके-चुपके पुकारो।"

(वही / सूरा 163 और सूरातुल अअराफि/ आयत 55)

"नरमी और क्षमा से काम लो, भले काम का हुक्‍म दो और अज्ञानी लोगों से न उलझो।"

(सूरातुल अअराफि/ आयत सं. 199)

"मॉं-बाप के साथ अच्‍छा व्‍यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों तुम्‍हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाये तो उन्‍हें ‘हूँ’ तक न कहो और न ही उन्‍हें झिड़को बल्कि उनसे भली बातें करो और दयालुता के साथ उनके लिये विनम्रता की भुजा झुका दो और कहो: ‘मेरे मालिक। जिस तरह इन्‍होंने बचपन में मेरा पालन-पोषण किया है, तू भी इन पर दया कर।"

(सूरा बनी इसराईल/आयत सं. 23 से 24)

"और व्‍यभिचार में लिप्‍त मत हो, निसंदेह वह एक अश्‍लील कर्म और बुरा मार्ग है। धरती में अकड़ते हुए न चलो। न तो तुम धरती को फाड़ सकते हो और न ही पहाड़ों की उँचाई तक पहुँच सकते हो।"

(वही सूरा /आयत सं. 32 व‍ 37)

"और ए रसूल यह कह दो लोगों से तुम मुझे चाहे ‘अल्‍लाह’ कहकर पुकारो या ‘रहमान’ कहकर पुकारो, जो भी कहकर पुकारो, उसके लिये सारे नाम ही अच्‍छे हैं।"

(वही आयत सं. 110)

"और जो कुछ कि हमने सांसारिक जीवन की चमक-दमक इन नाना भांति के लोगों को बरतने को दे रखी है, उसके द्वारा इनको आजमाइश में डालने पर तुम कदापि उसी में मत उलझ जाना।"

(सूरा तॉहॉं / आयत सं. 131)

"और जो कुछ ईश्‍वर ने तुझे दिया है, उसके द्वारा ‘आखिरत’ का घर बनाने का उपाय कर और संसार में से अपना हिस्‍सा मत भूल, अहसान कर जिस प्रकार ईश्‍वर ने तेरे साथ अहसान किया है और धरती में बिगाड़ पैदा करने वाला मत बन। निसंदेह ईश्‍वर बिगाड़ पैदा करने वालों को पसंद नहीं करता।"

(सूरा अल कससि / आयत सं. 77)

"हे नबी! उस किताब को पढ़ो जो तुम पर उतारी जा रही है और नमाज कायम करो क्‍योंकि यह निश्‍चित रूप से अश्‍लीलता और बुरे कर्म से रोकने में मदद करती है।"

(सूरा अल-अन्‍कबूति/ आयत सं. 45)

"मेरा और अपने मॉ-बाप के कृतज्ञ हो, क्‍योंकि लौट के मेरी ही ओर आना है --- और चल उस व्‍यक्ति के मार्ग पर जिसने मुझसे लौ लगाई ----- हे मेरे बच्‍चे! नमाज कायम कर और भलाई का हुक्‍म दे और लोगों को बुराई से रोक और जो मुसीबत भी तुम पर पड़े तो उसे सहन करता जा क्‍योंकि यह बड़े साहस की बात है और लोगों के सामने अपना मुँह मत बिदकाया कर और न धरती में अकड़ कर चल। निसंदेह ईश्‍वर किसी आत्‍मश्‍लाघी और डींग मारने वाले को पंसद नहीं करता। सीधी-सीधी चाल चल और अपनी आवाज तो नीची रखा कर, निश्‍चय ही सब आवाजों से बुरी आवाज गधे की होती है।"

(सूरा लुकमान/ आयत सं. 14 से 19)

"इसमें (कुरान में) ईश्‍वर ने सर्वोत्‍तम बात उतारी है। एक ऐसी किताब के रूप में जिसके सभी भाग परस्‍पर मिलते जुलते हैं, क्रांतिकारी हैं ---- यह ईश्‍वर का मार्ग दर्शन है जिससे वह लोगों को सीधे मार्ग पर ले आता है।"

(सूरा तुजजुमरि/ आयत सं. 23)

"न अच्‍छा चरित्र परस्‍पर समान होता है और न बुरा चरित्र। तुम चरित्र की बुराई को अच्‍छे से अच्‍छे चरित्र के द्वारा दूर करो, फिर तुम क्‍या देखोगे कि तुम्‍हारे और जिसके बीच वैर था वह ऐसा हो जायेगा मानों कोई आत्‍मीय मित्र हो।"

(सूरा तुहामीम अस्‍सज्‍दति/ आयत सं. 34)

"बुराई का बदला लेना भी उसी जैसी बुराई है अत: तुम क्षमा कर दो और माफ कर दोगें तो उसका बदला ईश्‍वर के जिम्‍मे है और जो अपने ऊपर हुए जुल्‍म का खुद बदला ले ले तो फिर ऐसे लोगों के विरुद्ध उलाहने को कोई मार्ग नहीं और उसका बदला ईश्‍वर के जिम्‍मे नहीं है (क्‍योंकि वह खुद ही बदला ले चुका है) और जो सब्र करे और क्षमा कर दे तो निश्‍चय ही यह उन कामों में से है जो सफलता के लिये आवश्‍यक ठहराए गए हैं।"

(सूरा तुरा-शूरा /आयत सं. 40 से 43)

"हे ईमान वालों। यदि तुम्‍हारे पास कोई सुनी-सुनाई ख़बर आये तो छान-बीन कर लिया करो, ऐसा न हो कि किसी गिरोह के साथ बेजा हरकत कर बैठो और‍ फिर तुम्‍हें अपने किए पर पछतावा हो। ---- हे ईमान वालों। बहुत से गुमान से बचा करो क्‍योंकि गुमान गुनाह है और न तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे बुराई करे, क्‍या तुम में से कोई इस बात को पसंद करेगा कि अपने मरे हुए भाई का मास खाये? ईश्‍वर के यहाँ तुममें से सबसे ज्‍यादा इज्‍जत वह पायेगा जो बंदो के साथ व्‍यवहार में डर रखता हो।"

(सूरा तुल हुजुरात /आयत सं. 6, 12 एवं 13)

"तो जो अनाथ हो उस पर जोर ना दिखाना और जो माँगने वाला हो उसे झिड़कना मत।"

(सूरा अज-जुहा /आयत सं. 9 एवं 10)

मंगलवार, 6 सितंबर 2011

भारत और सहिष्णुता-अंक-18

भारत और सहिष्णुता-अंक-18

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जितेन्द्र त्रिवेदी

अंक-18

भारत पर अगला हमला ‘हिन्‍द-यवनों’ ने किया। इन्‍हें ‘हिन्‍द यवन’ इसलिए कहा जा रहा है क्‍योंकि सिकंदर के जाने के बाद भी कुछ यूनानी बस्तियां भारत के वक्ष में आश्रय ले रहीं थी और इन्‍होंने मौर्य साम्राज्‍य के अंतिम शासन वृहद्रर्थ (जिसका उल्‍लेख किया जा चुका है) की कायरता और प्रमाद का फायदा उठाकर भारत पर कब्‍जा करने के इरादे से हमला कर दिया। यह हमला 180 ई.पू. के लगभग हुआ था। इतिहास में इसे ‘बैक्ट्रियन’ हमले के नाम से जाना जाता है और इसका नेता था- डे‍मेट्रियस। पुष्‍यमित्रशुंग ने इस हमले को नाकामयाब कर दिया और उसके वंशज वसुमित्र ने उन्‍हे सिंधु नदी के किनारे तक खदेड़ दिया। यद्यपि बैक्ट्रियन भारत पर कब्‍जा नहीं कर सके किन्‍तु उनकी कई टोलियों का बसाव यहाँ हो गया और उनके एक नेता मिनांडर ने तो बौद्ध धर्म ही ग्रहण कर लिया। जहाँ भारत का प्रभाव बैक्ट्रियनों पर पड़ा, वहीं उनका भी प्रभाव हम पर पड़े बिना नहीं रह सका और कला के क्षेत्र में ‘गांधार शैली’ का विकास उसी वजह से हुआ। इसके अलावा सिक्‍कों, नक्षत्र विज्ञान, चिकित्‍सा में आये तत्‍व आज तक उनके प्रभाव को बयान कर रहें हैं। यूनानी दवाएं (होम्‍योमेथी) भारत में तभी से आने लग गई थीं।

विदेशी हमलों की शृंखला में अगला आक्रमण शकों का हुआ। इसका समय ई.पू. 20 से शुरू हुआ और छुटपुट हमलों के बाद शक भारत की मिट्टी के अंग ही बन गये। वे मूलत: सीरदरया के खानाबदोश लोग थे जिन्‍होंने उर्वर क्षेत्रों की तलाश में भारत पर चढ़ाई की थी किन्‍तु यहाँ की जलवायु उन्‍हें इतनी रास आयी कि यह कबीला यहीं बस गया और 20 ई.पू. से लेकर 200 ई. तक शकों ने भारत के किसी न किसी क्षेत्र में अपनी सत्‍ता स्‍थापित करके रखी। शकों का सबसे प्रतापी शासक रूद्रदामन था और उसी ने 72 ई. में शक संवत की नींव डाली। वह अशोक की तरह एक प्रजावत्‍सल सम्राट था जिसने प्रजा की भलाई के लिये नहरों, बाँधों और झीलों का निर्माण करवाया। सौराष्‍ट्र की सुदर्शन झील आज भी उसकी जनोन्‍मुखता की गवाही देती है।

विदेशी हमलवरों की अगली कड़ी में पहलवों का नाम जोड़ा जा सकता है किन्‍तु शक और पहलवों का इतिहास एक दूसरे से अत्‍यधिक उलझा हुआ है। पहलव मूलत: कैस्पियन सागर के दक्षिण पूर्व में पार्थिया नामक स्‍थान से आये थे। 46 ई. के आस-पास पहलव जाति का नेता गोदोफर्नीज पंजाब और सिंध पर राज कर रहा था किन्‍तु पहलव अधिक दिन तक यहाँ राज नहीं कर पाये और 65 ई. के आसपास कुषाणों ने उस क्षेत्र से उन्‍हें अपदस्‍थ कर दिया।

कुषाण चीन के पास कानसू के यूची कबीला से संबंध रखते थे और 50 ई. के आसपास इस कबीले ने भारत का रूख किया। कुषाणों का सबसे प्रतापी सम्राट कनिष्‍क हुआ और 78 ई. के लगभग उसने दक्षिण भारत के नीचे के तीन-चार राज्‍यों को छोड़कर वर्तमान पाकिस्‍तान समेत वर्तमान भारत के संपूर्ण प्रदेश पर एकक्षत्र राज किया। यही नहीं, उसने चीन पर भी हमला बोला और उसके बहुत बडे़ भू-भाग पर कुछ समय के लिये कब्‍जा कर लिया। इस तरह कनिष्‍क के नियंत्रण वाला भारत एक अंतरराष्‍ट्रीय साम्राज्‍य था। भारत में कुषाणों का नियंत्रण 250 ई. के आसपास तक रहा और इस अवधि में उन्‍होंने बहुत सी चीजें भारत की सभ्‍यता और संस्‍क़ति में जोड़ीं। स्‍थापत्‍य की मथुरा और सारनाथ, दोनों शैलियॉं कुषाणों के नवाचारों से भरी पड़ी हैं। इससे पूर्व भारत में स्‍थापत्‍य का यह स्‍वरूप कभी देखने को नहीं मिला। भारतीय स्‍थापत्‍य कला को मध्‍य एशियाई स्‍थापत्‍य के तत्‍वों से समृद्ध करने का काम कुषाणों ने ही किया। स्‍वयं कनिष्‍क ने वेशभूषा के स्‍तर पर कई प्रयोग किये और लंबे चोंगे वाली पोशाक के साथ पतलून जैसा अधोभाग में धारण करने वाला वस्‍त्र पहनने की आदत हिन्‍दुस्‍तानियों को सिखाई। यही नहीं, उन्‍होंने यहाँ के धर्म को भी अपना लिया और यहाँ के धर्म-नेताओं ने भी इन सब विजातीय तत्‍वों को अपने वक्ष में स्‍थान देना प्रारंभ कर दिया। मनु ने घोषित किया है कि शक, यवन, पहलव, कुषाण आदि विदेशी लोग संस्‍कार युक्‍त होने पर क्षत्रिय जाति में गिने जा सकते हैं। फलस्‍वरूप वैष्‍णव एवं शैव संप्रदायों के प्रति इन विदेशियों का आकर्षण बढ़ा और इनमें से किसी ने गरुणध्‍वज स्‍थापित कर भागवत धर्म ग्रहण किया तो किसी ने वासुदेव (कनिष्‍क के वंशज का नाम) नाम धारण कर इस धरती के प्रति अपनी निष्‍ठाएँ देने का प्रयास किया। कुषाण राजाओं के सिक्‍कों पर त्रिशूल और नंदी का अंकन उन्‍हें सहज ही शैव घोषित करने के लिये पर्याप्‍त आधार है।

ईरानी, यूनानी, पहलव, शक, कुषाणों के अलावा बीच-बीच में कई अन्‍य कबीले भी भारत में घुसते रहें और इस ‘महानद’ में आकर विलीन होते गए, कहाँ तक कोई उनके नाम गिनाये, मैं नाम गिनाता जाऊँगा और सूची लंबी होती जायेगी – मंगोल, तातार, हूण भी यहाँ आये और सबको इस देश की मिट्टी ने इस कदर रचा-बसा लिया कि आज वे तत्‍व कहीं से भी विजातीय नहीं नजर आते। मोहम्‍मद इकबाल इस देश की इसी अदा पर फिदा हो गये थे:

"यूनानों मिस्र रोमाँ मिट गये सब जहॉं से

अब तक मगर है बाकी नामों-निशाँ हमारा

कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्‍मन दौरे जहां हमारा।"

पराये को भी अपना लेने की भारत की विशेषता कोई आधुनिक घटना नहीं है अपितु हमने इस अध्‍ययन से सत्‍यनारायण के दर्शन कर लिये कि इस धरती पर विजातीय तत्‍वों को हजम करने की जो शक्ति प्रकृति ने इस भू-भाग को दी है। वैसा हाजमा पूरे विश्‍व में अन्‍य किसी भू-भाग को नसीब नहीं हो पाया है। शायद इसीलिये गुरुदेव रविन्‍द्रनाथ टैगोर ने अपनी कालजयी कविता में डंके की चोट पर कहा था:-

"आर्य, हेथा अनार्य

हे थाय, द्रविड़-चीन

शक, हूण दंत पाठान-मोगोल

एक देहे होलो लीन"

भारत में बाहरी हमलों की गिनती करने का काम जिस उद्देश्‍य से किया गया था वह अभी पूरा नहीं हुआ है क्‍योंकि ऊपर गिनाये गए बाहरी तत्‍वों के आगमन की कड़ी में सबसे अधिक उल्‍लेखनीय है: इस्‍लाम का हिन्‍दुस्‍तान में आगमन। मैं इस्‍लाम के आगमन को सूत्र बना कर कुछ बातें कहने की कोशिश करूँगा।

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

भारत और सहिष्णुता-अंक-17

भारत और सहिष्णुता-अंक-17

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जितेन्द्र त्रिवेदी

अध्‍याय – 8

इस अध्‍याय में मैं भारत में हुए बाहरी हमलों का लेखा-जोखा लेने का प्रयास करूँगा क्‍योंकि इन बाहरी हमलों ने भी भारत के निर्माण में उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई है। इन हमलों की वजह से की कई जातियाँ भारत में आ गईं और आज तक साथ-साथ रह रही हैं जो कि भारत की अपनी अनूठी विरासत है।

पिछले अध्‍याय में जहाँ बाहरी आक्रमणों और पुष्‍यमित्रशुंग द्वारा प्रजा की रक्षा हेतु किये गये प्रयासों के माध्‍यम से यह दिखाने का प्रयत्‍न किया गया है कि भारतीयों की सहिष्‍णुता को दब्‍बूपन या कायरता नहीं समझा जाना चाहिये और न ही तख्‍ता पलट को षडयंत्र कहकर उसके महत्‍व को घटाना चाहिए। भारतीयों में यह विलक्षणता शुरू से ही रही है कि उन्होंने अति सर्वत्र वर्जयेत्’ के सूत्र वाक्‍य को जीया है और जब भी कोई सोच अतिवादी होने लगी तो इस धरती ने कभी बुद्ध के रूप में मध्‍यमार्गी पैदा कर वैदिक हिंसा और प्रवृत्तिमार्गी सोच के बीच का रास्‍ता दिखाया। एक ओर जब मौर्य साम्राज्‍य के वंशजों द्वारा अहिंसा और सहिष्‍णुता के अतिवादी छोर को पकड़ने की कोशिश की गयी तो वहीं दूसरी ओर पुष्‍यमित्रशुंग जैसे व्‍यावहारिक और प्रजा की नब्‍ज टटोलने वाले व्‍यक्तियों का भी यहाँ उदय हुआ, जिन्‍होंने अपने कार्यों से यह दिखा दिया कि शासन के अंतर्गत व्‍यक्ति की निष्‍ठा वंश के प्रति न होकर प्रजा और देश के प्रति होनी चाहिये। इस प्रकार महात्‍मा बुद्ध और सेनापति पुष्‍यमित्रशुंग दोनों ने अरस्‍तू के ई.पू. 350 में प्रस्‍तुत किये गये अध्‍ययन ‘यूडीमियन एथिक्‍स (किसी भी व्‍यक्ति के सुख-चैन की आदर्श स्थिति) का जाने-अनजाने में पालन किया था। यहगँ अरस्‍तू के उस अध्‍ययन की थोड़ी सी चर्चा करना प्रसंग से भटकना नहीं कहा जाये तो मैं यह स्‍वतंत्रता लेता हूँ। इस अध्‍ययन में अरस्‍तू ने मानवीय व्‍यवहार के ऐसे कुछ भावों की व्‍याख्‍या करके यह बताने का प्रयास किया कि यदि मानव अपने क्रिया-कलापों का विश्‍लेषण करना छोड़ देता है तो उसके व्‍यक्तित्‍व और कार्यों में अधूरापन रह जायेगा किन्‍तु यदि वह थोड़ा सा इस तरफ ध्‍यान दे ले तो उसका व्‍यक्तिव और कर्म दोनों पूर्णता की तरफ जा सकते हैं। इसे ही अरस्‍तू ने मानव के लिये ‘सुखचैन की आदर्श स्थिति कहा है जिसमें बीच की स्थिति में रहने से व्‍यक्ति आत्‍मप्रसादी’ का अनुभव कर सकता है, किन्‍तु थोड़ी भी कमो-बेशी उसके चरित्र और व्‍यवहार में क्‍या बदलाव ला सकते हैं। इसे नीचे दिये गये चार्ट से समझा जा सकता है:-

कम होने पर (–)

आदर्श स्थिति/बीच की स्थित

अधिक होने पर (+)

कायरता (Cowardice)

मक्‍खीचूस (Stinginess)

लुल्‍ल (Spinelessness)

भोंदू (Boorishness)

खूसट (Surliness)

निखट्टू (Lethargy)

साहस (Courage)

उदारता (Liberality)

सौम्‍यता (Gentleness)

हाजिर-जबाबी (Wittiness)

मैत्रीपूर्ण (Friendliness)

महत्‍वाकांक्षी (Ambitious)

हड़बडि़यापन (Rashness)

फिजूलखर्ची (Profligacy)

झक्‍की (Rage)

मुँहलगापन (Buffoonery)

चमचागीरी (Obsequiousness)

उन्‍मादी (Hysterical)

पिछले अध्‍याय के अंतर्गत मैंने अध्‍याय दो में उठाये उन सवालों के भी जबाब देने की कोशिश की है कि सहिष्‍णुता भारतीयों में कायरता और सब कुछ सहते जाने की प्रवृत्ति को जन्‍म देने का कारक है या नहीं है। किसी भी निष्‍कर्ष तक पहुँचने का हक इसके अभिज्ञ पाठकों के ही अधिकार क्षेत्र में है, अत: मैं इसे उन्‍हीं के विवेक पर छोड़कर इस अध्‍याय को प्रारम्भ करता हूँ।

भारत पर हुये बाहरी हमलों का लेखा-जोखा करते समय हम यह देखेंगे कि उन सब हमलावरों को भारत की मिट्टी ने कैसे अपने में मिला कर अपने सदृश बना लिया और आज वे तत्‍व किसी भी दृष्टिकोण से विजातीय नहीं कहे जाएगें, अपितु, यदि भारत-निर्माण की प्रक्रिया में से उन्‍हें निकाल दिया जाये तो भारत का वह स्‍वरूप ही नहीं दिखेगा जो आज दिखाई देता है। विभिन्‍न संस्‍कृतियों के आगमन से यहॉं जो विविधता पैदा हुई है, उसी ने दुनियां में हमें ‘विलक्षण बना दिया है। इन बाहरी हमलों से उस समय तो जनता में काफ़ी हरारत हुई होगी और परस्‍पर मार-काट ने जन-जीवन को अस्‍त-व्‍यस्‍त कर दिया होगा किन्‍तु अपने जातीय स्‍वभाव के वशीभूत होकर हमने उसे भी सहन करने की अद्भुत क्षमता दिखाई है।

यूँ तो भारत में बाहरी हमले आर्यों के आगमन से ही शुरू हो गये थे जिसका जिक्र पहले ही किया जा चुका है। इस प्रकार इस क्षेत्र में आर्यों के सहयोग से सभ्‍यता, संस्‍कृति और शहरों के उदय ने समकालीन ईरानियों का ध्‍यान इस भू-भाग की ओर खींचा। उस समय ईरान के इखमनी शासक अपने राज्‍य विस्‍तार की लिप्‍सा से भारत की ओर बढ़ने लगे। ईरानी शासक देरियस 516 ई.पू. में पश्चिमोत्‍तर भारत में घुस गया और उसने पंजाब, सिंधु नदी के पश्चिम के इलाके और सिंध को जीत कर अपने साम्राज्‍य में मिला लिया। इस तरह भारत का यह भू-भाग ईरान (तब का फारस) का बीसवाँ क्षत्रपी (प्रांत) बन गया। भारत का यह हिस्‍सा सबसे अधिक आबादी वाला और उपजाऊ था। भारतीय प्रजा ईरानी साम्राज्‍य का अंग बन गयी और भारतीय युवक इरानी फौज में भरती होने लगे। तभी से पंजाब के आस-पास के इस भू-भाग में फौज में भरती होने की तीब्र उत्‍कंठा विद्यमान है जो आज भी देखी जा सकती है। भारत और ईरान का यह सम्‍पर्क करीब 20 वर्षो तक रहा जिससे इस भू-भाग को फायदा हुआ। इससे भारत और ईरान के बीच व्‍यापार को बढ़ावा मिला। इस सम्‍पर्क के सांस्‍कृतिक परिणाम और भी महत्‍वपूर्ण हुए। ईरानी लिपिकार, जिन्‍हें ‘कातिब कहा जाता था, भारत में लेखन का एक खास रूप ले आये जो ‘खरोष्‍ठी लिपि के नाम से मशहूर हुई। यह लिपि अरबी की तरह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती है। अशोक के कई अभिलेख इसी लिपि में पाये गये हैं जो यह बताते हैं कि कितनी तेजी से इस क्षेत्र के बाशिन्‍दों ने बाह्य चीजों को अपनाने में कितनी फुर्ती दिखाई साथ ही साम्राज्‍य को प्रांतों मे बाँटने के तत्‍व का ज्ञान भी हमें ईरानियों से ही हुआ।

लेकिन ईरानियों के संपर्क में आने के कारण इस भू-भाग की जानकारी यूनानियों को भी हो गईं और ईरानियों के जरिये ही उन्‍हें भारत की अपार सम्‍पत्ति का पता चल गया था। जिससे उसके लिये उनमें लालच बढ़ा आर अंततोगत्‍वा सिकंदर ने भी भारत पर आक्रमण कर दिया। लूट-मार, खून-खराबे और आगजनी की इतनी बीभत्‍स घटना इस क्षेत्र में पहली बार हुई और मजे की बात यह थी कि ये संघर्ष पहले-पहल भारत की धरती पर भारतीयों में नहीं, अपितु दो बाहरी जातियों - ईरानियों और यूनानियों के बीच हुये और आखिरकार मकदूनियावासी यूनानियों ने भारत से ईरानी साम्राज्‍य का नामो-निशान मिटा दिया, किन्‍तु ईरानी यहाँ फलते-फूलते रहे और हजारो कोस दूर स्थित ईरान की कई चीजें यहाँ बदस्‍तूर जारी रहीं। ईरानियों पर विजय पा लेने के बाद सिकंदर ने भारतीय राजाओं को अपना निशाना बनाया जहाँ उसे सबसे कड़ी टक्‍कर झेलम नदी के किनारे पोरस ने दी और उसके सम्‍पूर्ण भारत जीतने के मंसूबे को कमजोर कर दिया। यद्यपि पोरस परास्‍त हुआ किन्‍तु सिकंदर का मनोबल भी उसी के साथ परास्त होने लग गया था। सिकंदर के हवाले से जो वर्णन मिलते हैं वे उसकी तबकी मनोदशा को दर्शाते हैं:- "मैं दिलों मे उत्‍साह भरना चाहता हूँ, जो निष्‍ठाहीन और कार्यरतापूर्ण डर से दबे हुये हैं।" इस प्रकार वह राजा जो अपने शत्रुओं से कभी नहीं हारा, अपने लोगों के मनोबल टूटने से वापस लौटने को तैयार हो गया। सिकंदर भारत में लगभग 19 महीने (ई.पू. 326 से 325 तक) रहा और उसने अपने भू-भाग को तीन हिस्‍सों में बाँटकर उसे तीन यूनानी गवर्नरों के हाथों में सौप दिया। सिकंदर के भारत आगमन का सबसे महत्‍वपूर्ण परिणाम था, भारत और यूरोप के बीच पहला सम्‍पर्क अथवा पूर्व और पश्चिम का परिचय। शुरुआत में कुछ यहूदियों के भारत में घुस आने के और यहीं बस जाने के उल्‍लेख प्राप्‍त होते है परंतु उल्‍लेखनीय तत्‍व तब भारत आये जब ईसा की मृत्‍यु के बाद कई दल यहाँ आये। रोमिला थापर ने अपनी पुस्‍तक ‘भारत का इतिहास’ में उल्‍लेख किया है कि ईसा की पहली शताब्‍दी में पश्चिम से व्‍यापारिक जहाजों के साथ भारत में ईसाई मत का प्रवेश हुआ। ईसाई मत के भारत आगमन का सम्‍बन्‍ध सन्‍त पाल के आगमन से जोड़ा जाता है जो एडेसा के कैथोलिक चर्च के अनुसार ईसाई धर्म के प्रचार के लिये दो बार भारत आये थे। संत थामस लगभग ईसा की आधी सदी में मालाबार पहुंचे थे और वहाँ कई गिरजाघरों की स्‍थापना करने के बाद मद्रास के निकट उपदेश देने लग गये और वहीं मैलापुर में उनकी हत्‍या कर दी गई। मालाबार क्षेत्र में सीरिया से आये उस समय के ईसाई मतानुयायी आज भी शक्तिशाली रूप में पाये जाते हैं। इस तरह भारत ने ईसा की पहली सदी से ही ईसाई धर्म के उन अवशेषों को अपने वक्ष में स्‍थान दिया है जिन्‍हें उन्‍हीं के देश में उन्‍हीं के बन्‍धुओं ने सलीब पर चढ़ा दिया था।

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

भारत और सहिष्णुता अंक - 15



भारत और सहिष्णुता अंक - 15

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जितेन्द्र त्रिवेदी

अध्‍याय 7
      जितेन्द्र इस अध्‍याय में मुख्‍य रूप से मैं दो तथ्‍यों को आधार बना कर वर्तमान में सत्‍ता और जनता के बीच के सूत्र को समझने की कोशिश करूँगा कि जिन स्थितियों से आज का समाज जूझ रहा है और अपने-आपको असमंजस की स्थिति में खड़ा हुआ देखते जाने में ही अपनी नियति समझ बैठा है, वास्‍तव में क्‍या वही ठीक है और क्‍या इस यथास्थितिवाद से ही भारत का भला हो जायेगा? अथवा क्‍या सत्‍ता पर काबिज सर्वोच्‍च पदाधिकारी को ऐसे समय में देश को उबारने की जिम्‍मेदारी नहीं लेनी चाहिये? पहले भाग में तथ्‍य के रूप में, मैं सम्राट अशोक के काल का सहारा लूँगा और दूसरे भाग में तथ्‍य के रूप में मौर्य साम्राज्‍य के भंजक-पुष्यमित्र शुंग का।

भाग - एक
      अशोक ने जब मौर्य साम्राज्‍य की सत्‍ता हस्‍तगत की तब साम्राज्‍य व्‍यवस्‍था जटिल स्‍वरूप ले चुकी थी और कौटिल्‍यीय अर्थशास्‍त्र ने उसे और भी जटिल करने का काम कर दिया था। ज्ञात हो कि चंद्रगुप्‍त मौर्य का संपूर्ण शासन कौटिल्‍य (चाणक्‍य) द्वारा रचित अर्थशास्‍त्र के अनुसार संचालित होता था। नौकरशाही और सत्‍ता के कई सोपानों ने शासक और जनता के बीच की दूरी बढ़ा दी थी। साम्राज्यिक व्‍यवस्‍था अपने में विभिन्‍न संस्‍कृतियों, विश्‍वासों और सामाजिक व राजनीतिक व्‍यवस्‍थाओं के गहरे आवरण में डूब चुकी थी।  अशोक के समक्ष दो ही विकल्‍प थे। एक ओर वह ढ़ाँचे को बलप्रयोग द्वारा स्थिर रख सकता था, जिसके लिये अत्‍यधिक व्‍यय की आवश्‍यकता थी अथवा दूसरी ओर वह ऐसे नैतिक मूल्‍य प्रस्‍तुत करे जो कि सभी को स्‍वीकार्य हों तथा जो सभी सामाजिक वर्गों एवं धार्मिक विश्‍वासों के बीच अपना स्‍थान बना लें। अशोक ने यह विकल्‍प धम्‍म नीति में ढूँढा और यही मैं बताना चाहता हूँ कि सत्‍ता का प्रयोग जनता को समरस करने में किस तरह किया जाता है जो अशोक ने दुनियाँ के इतिहास में बखूबी करके दिखा दिया।
      धम्‍म नीति उन समस्‍याओं के समाधान का एक महत्‍वपूर्ण प्रयास था जिनसे उस युग का जटिल समाज जूझ रहा था। यहाँ मैं जानबूझकर उस युग के समाज का विवरण देकर अनावश्‍यक विस्‍तार एवं इतिहास में और अधिक गहरे में घुसने की कवायद से बचते हुये अपनी बात को कहना प्रधान उद्देश्‍य मान रहा हूँ। अशोक के काल के अभिलेखों के सूक्ष्‍म अध्‍ययन से पता चलता है कि एक ओर जहाँ अशोक बौद्ध मत में अपनी पूरी आस्‍था रखता था वहीं दूसरी ओर वह धम्‍म नीति के द्वारा सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व तथा सहिष्‍णुता के महत्‍व का संदेश भी दे रहा था। यह नीति अशोक के दिमाग की उपज थी तथा समाज के अंतर्गत व्‍याप्‍त सामाजिक तनावों के समाधान के प्रति सत्‍ताधीश का व्‍यक्तिगत प्रयास था जिसे वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में पुन: परिभाषित करने की आवश्‍यकता है। यदि अशोक शताब्दियों पहले सत्‍ता के माध्‍यम से ऐसे प्रयास करने का साहस दिखा सका था तो क्‍या आज देश का सर्वोच्‍च सत्‍ताधीश ऐसे प्रयास करने का साहस नहीं दिखा सकता? अशोक के निजी विश्‍वास तथा साम्राज्‍य के समक्ष खड़ी समस्‍याओं के समाधान के विषय में उसकी चिंता धम्‍म नीति के प्रतिपादन का कारण बनें। अशोक की धम्‍म नीति जिसमें सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व की बात कही गई है तथा अशोक की बौद्ध धर्म में व्‍यक्तिगत आस्‍था के बीच हमें अंतर करना होगा क्‍योंकि अधिकांशत: अशोक की धम्‍म नीति तथा बौद्ध मत अनुयायी के रूप में अशोक को अलग-अलग समझे बिना और बिना अंतर किये एक ही संदर्भ में रखकर अध्‍ययन करने की प्रवृत्ति चली आ रही है। अत: आवश्‍यक है कि हम उस सामाजिक माहौल को समझें जिसके अंतर्गत अशोक पला, बढ़ा तथा जिसका प्रभाव उसके जीवन के बाद के वर्षों पर दिखाई देता है। मौर्य राजा उदारवादी दृष्टिकोण रखते थे। चंद्रगुप्‍त मौर्य अपने जीवन के उत्‍तरार्द्ध में जैन मत का अनुयायी हो गया तथा बिंदुसार आजीवक मत में दीक्षित हो गया था। स्‍वयं अशोक ने अपनी स्‍वेच्‍छा से अपने निजी जीवन में बौद्धमत को स्‍वीकार किया और अपनी जनता पर कभी भी बौद्ध मत थोपने का प्रयास नहीं किया। इस तरह एक ऐसा साम्राज्‍य जिसकी नींव ब्राह्मण वंश के पोषक चाणक्‍य के वरदहस्‍त से चंद्रगुप्‍त ने रखी थी। अपने निजी धार्मिक मामलों में चाणक्‍य की तत्‍कालीन परंपरा के विपरीत चला गया और चंद्रगुप्‍त का पुत्र अपने पिता की परंपरा के विपरीत गया। उसी तरह अशोक ने अपने लिये नितांत नई परंपरा स्‍वीकार की। शताब्दियों पहले से इस देश में इतनी उदारता थी कि एक ही कुटुंब के व्‍यक्ति अलग-अलग विचारधाराओं को मानने वाले हो सकते थे और दादा से लेकर पोता, गुरु से लेकर चेले का धार्मिक मामलों में कोई हस्‍तक्षेप नहीं था, तो आज भारत में क्‍यों अपनी शताब्दियों पुरानी उदारता के समृद्ध अतीत को अमल मे लाने से हम कतरा रहे हैं? हम अतीत की सिर्फ नकारात्‍मक बातों को लेकर ही क्‍यों बैठे रहते हैं, जबकि मेरा यह दिखाने का यह विनम्र प्रयास है कि अतीत सिर्फ बुरी और कड़वी घटनाओं का ब्यौरा नहीं है। बल्कि उसमें बहुतायत में सकारात्‍मक और वर्तमान को ऊर्जा देने वाली अच्‍छी चीजें भरी पड़ी हैं। अब यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम क्‍या ग्रहण करना चाहते हैं। अशोक उन तनावों से पूरी तरह परिचित हो गया था, जो उसके तत्‍कालीन समाज में ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, आजीवक संप्रदाय, संशयवादी और नास्तिक संप्रदायों और ऐसे ही कई असनातनी संप्रदायो के उदय के कारण समाज में आ गये थे। इन असनातनी संप्रदायों की किसी न किसी रूप में संख्‍या बढ़ रही थी और ये किसी न किसी रूप में ब्राह्मणवाद  के विरोधी थे परंतु अब भी ब्राह्मण समाज पर अपना नियंत्रण बनाये हुये थे। इससे समाज में किसी न किसी रूप में वैमनस्‍य का हावी होना अवश्‍यसंभावी था। ऐसी दशा में परस्‍पर सौहार्द और विश्‍वास का वातावरण बनाना आवश्‍यक था। साम्राज्‍य के कुछ भाग ऐसे भी थे जहां न तो ब्राह्मणवाद का प्रभुत्‍व था और न ही असनातनी संप्रदायों का। अशोक ने स्‍वयं अपने शिलालेखों में यवनों के प्रदेश का जिक्र किया है, जहाँ न तो ब्राह्मण और न ही श्रमण संस्‍कृति प्रचलन में थी। इसके अतिरिक्‍त साम्राज्‍य के कई जन-जातीय या आदिवासी क्षेत्रों में भी ब्राह्मणवाद या असनातनी संप्रदायों का प्रभाव नहीं था। इन सारी विभिन्‍नताओं के बीच साम्राज्‍य के अस्तित्‍व और परस्‍पर सौहार्द्र को बनाये रखने के लिये समाज की समस्‍याओं के प्रति एक समरूपी समझ और व्‍यवहार की आवश्‍यकता थी। इसीलिये अशोक के द्वारा धम्‍म के सिद्धांत इस प्रकार से प्रतिपादित किये गये कि वे सभी समुदायों और धार्मिक संप्रदाय के व्‍यक्तियों को स्‍वीकार्य हों।  अशोक ने कभी भी धम्‍म को औपचारिक रूप से व्‍याख्‍या‍यित अथवा संरचनाबद्ध नहीं किया अपितु उसने धम्‍म में सहिष्‍णुता तथा सामान्‍य आचरण के निर्देश देने की तरफ अधिक ध्‍यान दिया। धम्‍म ने दुहरी सहिष्‍णुता की बात की है जिसमें जन सामान्‍य के मध्‍य आत्‍म अनुशासन, आत्‍म सहिष्‍णुता तथा विभिन्‍न विचारों एवं आस्‍थाओं के बीच सहिष्‍णुता का आवाहन किया गया है। इसमें अशोक ने दासों एवं नौकरों के प्रति सहानुभूति, बड़ों का आदर, जरूरतमंदो, ब्राह्मणों व श्रमणों के प्रति उदारता पर विशेष बल दिया है।  अशोक ने इस तरह सभी धार्मिक संप्रदायों के बीच सहिष्‍णुता का आवाहन किया।  उसने धम्‍म नीति में अहिंसा पर विशेष बल‍ दिया और अहिंसा को व्‍यावहारिक स्‍वरूप देने का मतलब था- युद्ध एवं विजय अभियान का परित्‍याग करके दिखाना जो उसने बखूबी कर दिखाया।  अशोक के 13वें शिलालेख में लिखा हुआ है "आठ वर्षों तक तपस्‍या के उपरांत देवताओं के प्रिय सम्राट पिय्यदस्‍सी ने कलिंग पर विजय प्राप्‍त की ------ देवताओं के प्रिय ने कलिंग विजय के उपरांत बहुत पछतावा किया----- आज यदि कलिंग विजय की प्रतिक्रिया में हताहत, मृत अथवा निर्वासित लोगों की संख्‍या का 100वॉं अथवा 1000वॉं भाग भी उसी प्रकार के कष्‍टों का सामना करता है तो यह देवताओं के प्रिय के मस्तिष्क पर बोझ बनेगा ------------- धम्‍म का यह अभिलेख इसलिये खोदा गया है कि मेरे कोई पुत्र अथवा प्रपौत्र नई विजय प्राप्‍त करने की न सोचें -----। वे धम्‍म द्वारा विजयी होने को ही वास्‍तविक विजय समझें तथा धम्‍म में प्रसन्‍नता ही उनके लिये परम प्रसन्‍नता है, क्‍योंकि धम्‍म इस संसार में तथा इसके बाद दोनों ही स्‍थानों के लिये मूल्‍यवान है।" अशोक की धम्‍म नीति केवल गूढ़ वाक्‍यों पर ही समाप्‍त नहीं हो जाती थी अपितु उसने इसे सत्‍ता में भी अपनाने का भरसक प्रयास किया। अशोक ने घोषणा की - "मैं जो भी कार्य करता हूँ केवल उस ऋण को उतारने का प्रयास है जो सभी जीवों का मुझ पर है।"  अशोक की यह सोच सर्वथा नयी सोच थी और आज भी सत्‍ता के सर्वोच्‍च पदाधिकारी के लिये शासन व्‍यवस्‍था का उत्‍साहवर्धक आदर्श है क्‍योंकि अशोक के पहले तक कौटिल्‍य ने अपने धुँआधार तर्कों से यह सोच प्रतिपादित कर दी थी कि राजा पर किसी का ऋण नहीं होता और उसका एक मात्र कार्य राज्‍य पर येनकेन-प्रकारेण सक्षम शासन करना है।  इस बनी-बनाई सोच के विपरीत जाकर अशोक की जबाबदेही की भावना आज भी सत्‍ताधीशों के लिये चमकदार प्रकाश स्‍तंभ बनी हुई है। रोमिला थापर ने मौर्य साम्राज्‍य विषयक अपने अध्‍ययन में स्‍पष्‍ट किया है कि अशोक की धम्‍म नीति न केवल मूलभूत मानवीयता का अद्भुत दस्‍तावेज है, बल्कि उस समय की सामाजिक राजनैतिक आवश्‍यकताओं का उपयुक्‍त समाधान भी प्रस्‍तुत करती है।  अहिंसा पर उसके बल देने का यह तात्‍पर्य कदापि नहीं निकाला जाना चाहिए कि वह अव्‍यवहारिक हो गया था और उसने राज्‍य की सुरक्षा की आवश्‍यकताओं के प्रति आँखे मूँद ली थी अपितु समय-समय पर वह कई शिलालेखों में उन तत्‍वों को चेतावनी भी देता है जो उद्दण्‍ड हो गये थे।  वह कहता है- यद्यपि वह बल प्रयोग से घृणा करता है। परंतु यदि वे समस्‍याएँ उत्‍पन्‍न करना बंद नहीं करते हैं तो शक्ति का प्रयोग करने के लिये देवों के प्रिय को बाध्‍य होना पड़ेगा।'  जातीय विविधता एवं धार्मिक विभिन्‍नता तथा वर्गीय आधार पर विभाजित समाज में सहिष्‍णुता का आवाहन निश्‍चय ही बुद्धिमत्‍ता का कार्य था और अशोक ने ऐसा करके शताब्दियों पूर्व सत्‍ता की शक्ति का प्रयोग दूरगामी लक्ष्‍यों की प्राप्ति के लिये करने की नई जुगत विकसित की और व्‍यापक उदे्श्‍यों की पूर्ति में उसका यह प्रयत्‍न निसंदेह सत्‍ता के माध्‍यम से जनता के बीच समग्रीकृत सोच को पनपाने का महत्‍वपूर्ण और कारगार उपाय भी साबित हुई।  मैं इस प्रश्‍न के साथ इस विषय को समाप्‍त कर रहा हूँ कि क्‍या इस प्रयत्‍न को वर्तमान भारत के परिप्रेक्ष्‍य में पुन: व्याख्यायित करने की कोशिश नहीं की जा सकती है?
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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

भारत और सहिष्णुता अंक - 14

भारत और सहिष्णुता अंक - 14

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पिछले अंक में वाद-संवाद का विवरण देने के पीछे मेरा यह उद्देश्‍य था कि समकालीन भारत में हमें यह समझने की कोशिश अवश्‍य करनी चाहिये कि आज के भारतीय समाज की असहिष्‍णुता के निवारण में समकालीन भारत की यह पुरातन संवाद परंपरा कितनी प्रासंगिक होगी और यह क्‍या योगदान दे सकती है। भारत में इस परंपरा के विकास का अच्‍छा खासा श्रेय बौद्ध और जैनों को दिया जाना चाहिये। उनकी सामाजिक प्रगाति के माध्‍यम के रूप से विचारों के आदान-प्रदान के प्रति गहरी निष्‍ठा थी।

बौद्ध धर्म की अपेक्षा जैन धर्म अधिक प्राचीन है। ऋषभदेव से यह परंपरा विकसित होती हुई अंतिम तीर्थंकर महावीर वर्धमान जिनका जन्‍म 599 ई.पू. हुआ था, अपनी 72 वर्षों की अवस्‍था में मृत्‍यु से पूर्व उन्‍होंने इस संप्रदाय की नींव भली-भांति पुष्‍ट कर दी और अहिंसा को उन्‍होंने पक्‍के तौर पर स्‍थापित कर दिया। सांसारिकता पर विजयी होने के कारण वे ‘जिन’ (जमी) कहलाये और उन्‍हीं के समय से इस संप्रदाय का नाम जैन हो गया। आरम्‍भ से ही जैन धर्म की शब्‍दावली वैदिक धर्म की शब्‍दावली रही थी। यद्यपि सदियों तक जैन लोग अलग संप्रदाय बनाकर रह रहे थे, फिर भी, अलग रह कर जिस संशयवाद को उन्‍होंने परिष्‍कृत कर ‘स्‍यादवाद’ के रूप में विकसित किया उसकी परंपरा वेदों में मौजूद थी। वेदों के अति प्रतिष्ठित ‘सृष्टि सूक्‍त’ का समापन इस संशय से हुआ है –

"वास्‍तव में इसे कौन जानता है? यह कब पैदा हुआ है? यह कब की सृष्टि है? देवता तो इस विश्‍व की सृष्टि के बाद आए हैं तो फिर यह कौन जानता है कि इस विश्‍व का उदय कहाँ से हुआ है। यह कहॉं से उदय हुआ है - संभवत: यह स्‍वयं (स्‍वयं ही बन गया है) है, या शायद नहीं भी। सत्‍य क्‍या है, यह तो सर्वोच्‍च स्‍वर्ग से इसे निहारने वाला ही जानता है – संभव है, वह भी नहीं जानता हो।"

इस सूक्‍त के अलावा अन्‍यान्‍य ऐसे श्‍लोकों से वैदिक साहित्‍य भरा हुआ है जिनमें इसका उल्‍लेख करना समीचीन रहेगा-

"हिरण्‍गर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्‍य जात: पतिरेक आसीत्,

स दाधार पृथ्‍वीं द्यामुतेमाम् कस्‍मै देवाय हविषा विधेम"

इन वैदिक ऋचाओं में वर्णित संशयवादी प्रवृत्ति बाद में भी संस्‍कृत साहित्‍य में दिखाई पड़ती है। यह तो सर्व विदित है कि किसी भी पुरातन भाषा की तुलना में अधिक विशाल साहित्‍य संस्‍कृत में ही रचा गया है और इसी में, जिसे देव भाषा भी कहते है, किसी भी अन्‍य भाषा की तुलना में कहीं अधिक विशाल संशयवादी, अनीश्‍वरवादी या नास्तिकतावादी साहित्‍य की रचना सर्वाधिक हुई है। इस समग्र साहित्‍य को आज हम हिन्‍दू दर्शन का अभिन्‍न अंग मानते हैं। यह संशयवादी परंपरा प्राचीन काल से मध्‍यकाल में चार्वाक की उग्र बौद्धिकतापूर्ण अभिव्‍यक्तियों से गुजरती हुई मध्‍यकाल में चौदहवीं सदी के माधवाचार्य की रचना ‘सर्व दर्शन’ तक चली आई थी, जिसमें उन्‍होंने पहले ही अध्‍याय में नास्तिकता तथा भौतिकवाद का मंडन करके चार्वाक की परंपरा को पुष्‍ट किया। इस परंपरा के अद्यतन दर्शन तो 18वीं सदी के संस्‍कृत साहित्‍य तक मिल जाते है जिनमें जयर्षि की रचना ‘तत्‍तोपलव सिंह’ सर्व प्रमुख हैं।

वर्तमान काल तक देवभाषा संस्‍कृत में संशयवाद की इस परंपरा से यह बात सिद्ध होती है कि अनेक विवादों और भाँति-भॉंति के विचारों को समा लेने की प्रवृत्ति सदैव से ही भारत की संवाद परंपरा का अक्षुण्‍ण अंग रही है और इसी संवाद परंपरा ने भारत में सहिष्‍णुता का विकास किया किन्‍तु जो सहिष्‍णुता और वाद-संवाद की परंपरा वेदों से लेकर ऊपर बताये गये ग्रंथो के माध्‍यम से हालिया दौर तक पोषित हुई है। वह आजादी के बाद कहाँ लुप्‍त होती जा रही है? इसका भयावह रूप इससे पता लगता है कि जाति, धर्म और क्षेत्र के बारे में टिप्‍पणी करना तो कभी का निषिद्ध-प्राय समझा जाने लगा था, किन्‍तु अब तो संविधान में सुधार की बात करना भी ‘गुनाह’ में शामिल हो चुका है। यह तब है जब संविधान खुद ‘अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता’ की गारंटी देता है।

यहाँ मैं सम्राट अशोक का उल्‍लेख कर इस अध्‍याय को समाप्‍त करूँगा। अशोक ने तीसरी शताब्‍दी ई.पू. उस समय की राजधानी पाटली पुत्र (आज का पटना) में तीसरा बौद्ध सम्‍मेलन आयोजित किया था। तीसरे महा सम्‍मेलन के समय प्राय: समूचे उपमहादीप के साथ-साथ अफगानिस्‍तान तक के विशाल भूखण्‍ड के शासक अशोक का अभिमत विशेष ध्‍यान की अपेक्षा रखता है जिसमें अशोक इस बात के प्रति बहुत अधिक प्रतिबद्ध थे कि सार्वजनिक चर्चा बिना किसी वैमनस्‍य और हिंसा के चलनी और संपन्‍न होनी चाहिये। उन्‍होंने सार्वजनिक चर्चा के लिये प्रथम नियमों की रचना कर उन्‍हें सूत्रबद्ध किया। अशोक का सारा ध्‍यान और चिंता इस बात पर थी और उनका आग्रह था कि सभी वक्‍ता अपनी भाषा पर नियंत्रण रखेंगे, कोई अपने मत को श्रेष्‍ठ और दूसरों का हीन बताने की गलत चेष्‍टा नहीं करेगा और उपयुक्‍त अवसरों पर भी वे नरम और उदार भाषा का ही प्रयोग करेंगे। तीखी बहस के समय भी सभी अवसरों पर अन्‍य मतों एवं उनके अनुयायियों के प्रति सद्भाव और समानता की भावना का प्रदर्शन अनिवार्य कर दिया गया था।

अशोक द्वारा निर्धारित नियमों पर राजी होकर बहस में भाग लेने वाले साधारण से साधारण व्‍यक्ति के समक्ष अशोक खुद चलकर चरणो में अपना मस्‍तक रखते थे और उसका सम्‍मान करते हुये सभा में लिवा लाते थे। इस पर उनके अमात्‍य यश ने आपत्ति की कि बाकी सब तो जायज है पर सम्राट का कई नदियों के जल से ‘मूर्धाभिषिक्‍त’ मस्‍तक इन अकिंचन भिक्षुओं और संन्‍यासियों के धूल-धूसरित चरणों में शीश नवाना कहॉं तक उचित है?

अशोक ने इसका सीधे-सीधे तो जवाब नहीं दिया, किन्‍तु उन्‍होंने उस महामंत्री (अमात्‍य यश) को निर्देश दिया कि अपनी मौत मर चुके किसी मेंढ़े का सिर काट कर बाजार में मिलने वाली राशि से मुझे अवगत करायें। महामंत्री ने ऐसा ही किया और सम्राट को बताया कि कुछ मुद्रा उस मरे हुए ‘मेढ़े’ के सिर की मिली है, इस पर सम्राट ने क्रमश: अपनी मौत मरे हुये भैंसे, घोड़े, गाय के सिर की भी बाजार में बेच कर कीमत बताने को कहा। महामंत्री ने पुन: कुछ अधिक मुद्रा प्राप्‍त होने की जानकारी सम्राट को दी।

अंत में अशोक ने कहा कि अब आप किसी अपनी स्‍वाभाविक मृत्‍यु प्राप्‍त लावारिश व्‍यक्ति के सिर को बाजार में बेच कर जो भी धन मिले मुझे शीघ्र बताएं महामंत्री ने कुछ दिन बाद सम्राट को सूचित किया कि मनुष्‍य के सिर की कीमत बाजार में कुछ भी प्राप्‍त न हो सकी।

तब अशोक ने कहा कि वह मस्‍तक किसी को भी बिना मूल्‍य दे दिया जाए परंतु उसे बिना मूल्‍य लेने वाला भी नहीं मिला तो यह बात अमात्‍य यश ने अशोक को बतायी। तब अशोक बोले, "मनुष्‍य का यह मस्‍तक बिना मूल्‍य देने पर भी लोग उसे क्‍यों नहीं लेते?"

अमात्‍य यश ने उत्‍तर दिया- क्‍योंकि लोगों को इस मस्‍तक से घिन आती है।

अशोक ने इस पर कहा – लोग इसी मनुष्‍य के कटे सिर से घिन करते है या सभी मनुष्‍यों के कटे मस्‍तकों से भी घिन करेंगे।

अमात्‍य यश ने कहा – सम्राट किसी भी मनुष्‍य के कटे सिर को यदि लोगों के पास ले जाया जायेगा तो वे इसी प्रकार घृणा करेंगे।

अशोक ने शांतिपूर्वक पूछा – ‘क्‍या वे मेरे सिर से भी घृणा करेंगे?’

इस प्रश्‍न का उत्‍तर देने में अमात्‍य यश झिझकने लगा तो अशोक ने उसे अभय दंड दिया तब अमात्‍य बोला – ‘सम्राट! आपके मस्‍तक से भी लोग ऐसे ही घृणा करेंगे’

इस पर अशोक ने कहा कि जब इस कटे सिर से लोग‍ घृणा करते हैं तो क्‍या यह उचित नहीं है कि इसे भिक्षु और संन्‍यासियों के चरणों में जीते जी ही परिशुद्ध कर लिया जाये ?

यह कथा बौद्ध ग्रंथ ‘दिव्‍यावदान’ में उल्‍लेखित है।

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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

भारत और सहिष्णुता-13


भारत और सहिष्णुता
clip_image002 जितेन्द्र त्रिवेदी
अंक-13
      एक बार बुद्ध इच्‍छानंगल नाम के गाँव में रूके हुए थे। उस समय बहुत से ब्राह्मण भी उस गाँव में रहते थे।  उन ब्राह्मणों में से वशिष्‍ठ एवं भारद्वाज नामक दो तरुण ब्राह्मणों में इस संबंध में विवाद हुआ कि मनुष्‍य जन्‍म से श्रेष्‍ठ होता है या कर्म से। भारद्वाज अपने मित्र से बोला- हे वशिष्‍ठ जिसकी माँ की ओर से, पिता की ओर से सात पीढि़याँ शुद्ध हों, जिसके कुल में सात पीढि़यों में वर्ण संकर न हुआ हो, वही ब्राह्मण श्रेष्‍ठ है। वशिष्‍ठ बोला- हे भारद्वाज, जो मनुष्‍य शील सम्‍पन्‍न और कर्तव्‍य दक्ष हो उसी को ब्राह्मण कहना चाहिये 
      बहुत वाद-विवाद हुआ फिर भी दोनों एक दूसरे को समझा नहीं सके। अंत में वशिष्‍ठ बोला- हे भारद्वाज, हमारा यह वाद समाप्‍त नहीं होगा। देखो, वह गौतम बुद्ध हमारे गॉंव में रूका है।  वह बुद्ध है, पूज्‍य है, सब लोगों का गुरु है, उसकी कीर्ति भी अभी बहुत फैली हुयी है। क्‍यों न हमें उसके पास जाकर अपना मतभेद बताना चाहिये। वे दोनों गौतम के पास गये और कुशल- प्रश्‍नादि पूछकर एक ओर बैठ गये। जब बुद्ध ने आने का कारण पूछा तो उन्‍होंने साफ-साफ बता दिया और कहा कि -  "हे गौतम ब्राह्मण कहते हैं कि ब्राह्मण वर्ण ही श्रेष्‍ठ है, अन्‍य वर्ण हीन हैं, इस सम्‍बन्‍ध में आपका क्‍या मत है।"
      बुद्ध ने उक्‍त प्रश्‍न का सीधे-सीधे जवाब नहीं दिया अपितु वाद-संवाद के माध्‍यम से इस विषय को सुलझाने में कामयाबी हासिल की।  उन्‍होंने उन ब्राह्मणों से कहा- मेरे भाइयों यह बताइये कि क्‍या ब्राह्मणों की स्त्रियाँ ऋतुमती होती हैं? गर्भवती होती हैं? बच्‍चों को जन्‍म देती हैं? उन्‍हे दूध पिलाती हैं?

ब्राह्मणों ने कहा हाँ, हे गौतम।
बुद्ध इस तरह तो ब्राह्मणों की स्त्रियाँ और संतति अन्‍य वर्णों के समान ही हुई।
ब्राह्मण इसे और स्‍पष्‍ट कीजिये, हे गौतम।
बुद्ध हे ब्राह्मणों, यौन, कंबोज आदि प्रदेशों मे आर्य और दास दो ही वर्ण हैं और कभी-कभी आर्य से दास एवं दास से आर्य बन जाते हैं? क्‍या तुमने यह बात सुनी है?

ब्राह्मण जी हाँ हे गौतम, हमने वैसा सुना है।
बुद्ध यदि ऐसा है तो फिर इस कथन के लिये क्‍या आधार है कि ब्रह्मदेव ने ब्राह्मणों को मुख से उत्‍पन्‍न किया और वे सब वर्णो में श्रेष्‍ठ है।
            ब्राह्मण आपका कहना चाहे जो हो, हे गौतम ब्राह्मण की यह दृढ़ धारणा है कि केवल ब्राह्मण वर्ण ही श्रेष्‍ठ है और अन्‍य वर्ण हीन हैं।

            बुद्ध इतने पर भी न तमतमाये और अपितु वे पहले से भी और संयत और शालीन होकर पूछने  लगे - क्‍या तुमको ऐसा लगता है कि यदि क्षत्रिय, वैश्‍य, शुद्र प्राणघात, चोरी, व्‍यभिचार, असत्‍य भाषण, चुगली, गाली-गलौज तथा बकवास करें, लोगों के धन पर दृष्टि रखें, द्वेष-बुद्धि बढ़ायें, नास्तिकता को स्‍वीकार करें तो केवल वही देह त्‍याग के पश्‍चात् नरक में जायेगा और यदि ब्राह्मण ये कर्म करे तो वह नरक में नहीं जायेगा?

ब्राह्मण हे गौतम! किसी भी वर्ण का मनुष्‍य ये पाप करे तो वह मरने पर नरक चला जायेगा, ब्राह्मण हो या अब्राह्मण। सभी को अपने पाप का प्रायश्चित करना ही पडे़गा।
बुद्ध क्‍या तुम ऐसा मानते हो कि यदि कोई ब्राह्मण प्राणघात से निवृत्‍त हो जाए, चोरी, व्‍यभिचार, असत्‍य भाषण, चुगली, गाली-गलौज, वृथा प्रताप, परधन का लोभ, द्वेष एवं नास्तिकता और ऐसे ही दस अन्‍य पापों से निवृत्‍त हो जाए तो केवल वही मरने के बाद स्‍वर्ग का अधिकारी होगा और अन्‍य वर्णों के लोग ऐसे ही पापों से निवृत्‍त होने के बावजूद स्‍वर्ग में नहीं जा पायेंगे?’
ब्राह्मण नहीं, हे गौतम! किसी भी वर्ण का मनुष्‍य हो, यदि उसने पाप कर्म छोड़ दिये हैं तो वह स्‍वर्ग का अधिकारी है।

बुद्ध ऐसा क्‍यों? हे ब्राह्मण।
ब्राह्मण ऐसा इसलिये हे गौतम कि पुण्‍याचरण का फल ब्राह्मण और अब्राह्मण दोनों को ही समान रूप से मिलता है।
बुद्ध क्‍या तुम्‍हें ऐसा लगता है कि इस प्रदेश में केवल ब्राह्मण ही द्वेष-वैर-बिरहित और मैत्री-भावना रख सकता है और क्षत्रिय, वैश्‍य तथा शुद्र उस भावना को नहीं कर सकते हैं?

ब्राह्मण नहीं गौतम, इस क्षेत्र में चारों वर्ण मैत्री भावना कर सकते हैं, उसकी भला किसी को क्‍या मनाही हो सकती है। मैत्री करूणा तो सार्वभौम अनुपालनीय है।

बुद्ध तो फिर यह कहने में क्‍या अर्थ है कि सिर्फ ब्राह्मण वर्ण ही श्रेष्‍ठ है और अन्‍य वर्ण हीन है?’
ब्राह्मण आप चाहे जो कहिए, मैं तो आपकी बात भले ही मान लूँ, पर ब्राह्मण अपने ही को श्रेष्‍ठ मानते हैं और अन्‍य वर्णों को हीन समझते हैं, जबकि आपकी बात सही है इसमें जरा भी शक नहीं है।

बुद्ध उनकी ध्‍यान से सुनते रहे और जो भी उनके मन में आया हो परन्‍तु आगे के संवाद को देखने से जो प्रतीत होता है उससे लगता है कि जैसे वे तर्क करने के लिये एक सीढ़ी और नीचे उतर गये और एकदम जमीन पर आकर और अधिक विनम्र और शालीनता भरे शब्‍दों में बोले - हे ब्राह्मण कोई मूर्धाभिषिक्त राजा सब जातियों के सौ पुरुषों को एकत्र करें और उनमें से क्षत्रिय, ब्राह्मण एवं राजकुल में उत्‍पन्‍न व्‍यक्तियों से कहे अजी इधर आइये और शाल या चंदन जैसे उत्‍तम वृक्षों की उत्‍तरारणी लेकर अग्नि उत्‍पन्‍न कीजिये और उनमें से चांडाल, निषाद आदि हीन लोगों से कहे कुत्‍ते को रोटी-पानी देने के बर्तन में या सूअर को दाना-पानी देने के बर्तन में एरंड की उत्‍तरारणी से अग्नि पैदा करो तो क्‍या केवल ब्राह्मणों द्वारा चंदन की उत्‍तरारणी से जो आग उत्‍पन्‍न होगी वही अग्नि भास्‍वर और ज्‍यादा प्रखर होगी, चांडालादि द्वारा एरंड से जो आग पैदा होगी उससे अग्नि जैसे कार्य नही हो पाएगें
ब्राह्मण हे गौतम! किसी भी वर्ण का मनुष्‍य अच्‍छी या बुरी लकड़ी की उत्‍तरारणी बना कर किसी भी स्‍थान में अग्नि पैदा करे तो वह समान रूप से अग्नि के गुण लिये होगी और उससे समान अग्नि कार्य हो सकेंगे।

बुद्ध यदि कोई क्षत्रिय कुमार किसी ब्राह्मण कन्‍या के साथ शरीर संबंध रखे और संबंध के कारण यदि उसके पुत्र हो जाए तो क्‍या तुम्‍हें ऐसा नहीं लगता कि वह पुत्र अपने माँ-बाप के समान ही मनुष्‍य होगा? इसी प्रकार यदि कोई ब्राह्मण कुमार क्षत्रिय कन्‍या से विवाह करे और उस संबंध से उसके पुत्र हो जाए तो क्‍या तुम समझते हो कि वह अपने माँ-बाप के समान न होकर और ही ढंग का होगा।
ब्राह्मण हे गौतम ऐसे विवाह से जो बच्‍चा पैदा होगा वह भी निश्चिय ही अपने माता-पिता की ही तरह मनुष्‍य होगा और उसे हम ब्राह्मण भी कह सकते है और क्षत्रिय भी।
बुद्ध और यदि किसी घोड़ी और गधे के शरीर-संबंध से जो बछेरा होता है, क्‍या उसे हम उसकी माँ या पिता जैसे कह सकते हैं।
ब्राह्मण हे गौतम, उसे घोड़ा और गधा नहीं कहा जा सकता।  वह तो एक अलग ही ढंग का प्राणी होता है और उसे हम खच्‍चर कहते हैं।
बुद्ध हे ब्राह्मण, पशु कीड़े-मकोड़ों, वृक्ष एवं वनस्‍पतियों में विभिन्‍न प्रजातियाँ पाई जाती हैं।  उनकी भिन्‍नता के चिह्न उन समुदायों में स्‍पष्‍ट दिखाई देते हैं। परंतु मनुष्‍यों में भिन्‍नता के चिह्न नहीं पाये जाते।  बाल, कान, नाक, मुँह, ओठ,  भौंह, गला, पेट, पीठ, हाथ, पाँव, आदि अवयवों से एक मनुष्‍य दूसरे मनुष्‍य से पूर्णतया भिन्‍न नहीं होता है। अर्थात् हे ब्राह्मण, जिस तरह पशु-पक्षियों में आकारादि में विभिन्‍न जातियाँ पाई जाती हैं वैसे मनुष्‍यों में नहीं हैं। सब मनुष्‍यों के अवयव लगभग समान ही होने से मनुष्‍यों में जाति भेद निश्चित नहीं किया जा सकता है परंतु मनुष्‍य की जाति कर्म से अवश्‍य निश्चित की जा सकती है।
बुद्ध के इस कथन के बाद सभी ब्राह्मण बात को समझने की स्थिति में आ गये तो उन्‍होंने अपनी बात को और स्‍पष्‍ट करने के लिये  ब्राह्मणों से कहा
दो ब्राह्मण भाइयों में से एक ने वेद-पठन किया हुआ है और अच्‍छा पढ़ा-लिखा है लेकिन दूसरा शिक्षित है तो लोग उनमें से किस भाई को अधिक आदर और आमंत्रण देंगे?

ब्राह्मण जो‍ शिक्षित है स्‍वाभाविक रूप से उसी को, हे गौतम

बुद्ध यदि उन भाइयों में जो विद्वान है वह दुराचारी है, व्‍यभिचारी है और दूसरा विद्वान तो नहीं किन्‍तु सदाचारी और सुशील है तो उन दोनों में पहले किस का आदर होगा और किसे आमंत्रण दिया जायेगा?’
ब्राह्मण हे गौतम, जो शीलवान होगा उसी का आदर होगा और उसी को प्रथम आमंत्रण दिया जायेगा?’

बुद्ध ऐसा क्‍यों, हे ब्राह्मण
ब्राह्मण हे गौतम, दुराचारी मनुष्‍य को दिया हुआ दान कैसे फलदायक होगा?

      बुद्ध ने अब अपने तर्कों को समेटते हुए संवाद की निष्‍पत्ति करते हुये निष्‍कर्ष रूप से कहा- हे ब्राह्मण अभी बातचीत के दौरान तुमने पहले जाति को महत्‍व दिया, फिर विद्वता को और अब शील को महत्‍व दे रहे हो अर्थात् मन-वचन-कर्म की जिस शुद्धि की मैं बात करता हूँ आखिर उसी के तुम भी उपासक और कायल हो। बुद्ध की यह बात सुनकर बिना कुछ कहे वे ब्राह्मण सि‍र झुकाकर चल दिये।