नमस्कार ब्लोगर बन्धु-गण ! महज तीन महीने हुए.... और हमने ब्लॉग पर पोस्टों का शतक पूरा कर लिया। इस शतकीय सफ़र में आपका सहयोग, सुझाव, आकांक्षा आशीर्वाद, पाठकीयता और शुभ-कामनाओं का स्थान सर्वोपरी है। आपकी सृजनात्मक प्रतिक्रया हर कदम पर हमारी रचनात्मक ऊर्जा को उत्प्रेरित करती रही। "मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल ! लोग मिलते गए और कारवां बनता गया !! मैं आपके स्नेह और सुझाव से कभी उऋण नहीं हो सकता पुनश्च सौवें पराव पर हृदय से आपका आभार ! एक महापुरुष ने कहा था, "हजालों मील लम्बे सफ़र की शुरुआत भी फ़कत एक कदम से ही होती है ।‘ सौवें मील-स्तम्भ के पार आज हमें याद आता है हमारा पहला कदम। आपकी नजर कर रहा हूँ इस ब्लॉग पर प्रकाशित पहली कविता !
-- मनोज कुमार
विश्व विटप की डाली पर है,
मेरा वह प्यारा फूल कहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!
जग में बस पीड़ा ही पीड़ा,
दुख ज्वाला में जलते तारे।
शशि के उर में करुण वेदना,
प्रिय चकोर हैं दूर हमारे !!
बड़ी विचित्र रचना इस जग की,
कांटों में खिलते फूल यहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!
नीर बरसते झम-झम झम-झम,
बादल अम्बर के विरहाकुल !!
टकरा-टकरा कर उपलों से,
तट छूने को लहरें व्याकुल !
कैसे पार लगेगी नौका,
हैं धाराएं प्रतिकूल यहां !!
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!
सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,
कोकिल की कूक में दर्द भरा !
मरघट की सी नीरवता में,
है डूब रही सम्पूर्ण धरा !!
सब देख रहे इक-दूजे को,
कर दी है किसने भूल कहां !
है सुख की शीतल छांव कहां,
चुभते पग-पग पर शूल यहां !!
| !! आशा है आपका स्नेह और सहयोग पूर्ववत बना रहेगा !! |