सलिल जी को आभार जिन्होंने इसे ग़ज़ल का रूप देने में हमारी मदद की!
ये कैसै रखवाले देख
ये कैसै रखवाले देख
आज फ़ुरसत में हूं। मन में रह-रह कर ख़्याल आता है कि अगर किसी एक सबसे बड़े खलनायक का नाम लेने को कहा जाए तो सबसे पहले किसका नाम आएगा? अभी-अभी तो गुज़रा है विजय का पर्व, तो उत्तर भी हठात् ही सूझ गया – “रावण”। कहते हैं इसके एक-दो नहीं बल्कि पूरे दस सिर थे! और जब वह किसी सुर पर विजय प्राप्त करने की ख़ुशी में अट्टहास लेता था तो आकाश से लेकर पाताल तक पूरा ब्रह्मांड डोलने लगता था।
कल्पना कीजिए, कैसा लगता होगा वो दृश्य, बिल्कुल वैसे ही न, जैसे गब्बर शाकाल के अंदाज़ में कहे, “मोगाम्बो ख़ुश हुआ!”
तो आपको ले चलते हैं फ़्लैशबैक में ....
दस सिर वाला यह पौराणिक पात्र बड़ा सौभाग्यशाली था। इसको यह कालजयी नाम “रावण”, भी भगवान शिव के द्वारा ही प्राप्त हुआ था। पिता विश्रवा और माता कैकसी के इस पुत्र के बचपन का नाम तो दशानन था। ब्रह्मा के पुत्र महान् ऋषि पुलस्त्य का यह पौत्र था। यानी ब्रह्मा दशानन के प्रपितामह थे। मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि इतने अच्छे कुल का यह पात्र नायक न हो कर इतने बुरे चरित्र वाला खलनायक कैसे बन गया?
फ़्लैशबैक .......
दशानन के पिता विश्वश्रवा बहुत बड़े तपस्वी थे। अपने तपबल से उन्होंने काफ़ी ज्ञान अर्जित किया था। उसकी विद्वता से भरद्वाज मुनि काफ़ी प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह विश्रवा से कर दिया। इस दम्पत्ति के पुत्र थे कुबेर। कुबेर देवताओं के कोषाधीश थे।
उस समय असुरों के राजा थे सुमाली। उनकी पत्नी थी अप्सरा थाटक। इस दम्पत्ति की बेटी थी कैकसी। सुमाली अपनी बेटी की शादी दुनिया के सबसे बलशाली और ज्ञानी से करना चाहते थे। ... और उस समय इस योग्यता पर विश्रवा से अधिक कोई खड़ा नहीं उतरता था। अत: उन्होंने उससे ही कैकसी की शादी कर दी। कैकसी की संतानों में दशानन सबसे बड़ा था।
बचपन से ही दशानन बड़ा उत्पाती था। एक बार उसने अपने बड़े भाई कुबेर का अपमान किया। कुबेर इससे काफ़ी दुखी हुए। उसने अपनी मां के साथ पिता का महल छोड़ दिया और अलग रहने लगा।
कहते हैं अपने प्रपितामह ब्रह्मा से उसने शक्ति पाई। उस शक्ति का लाभ उठाकर उसने देवताओं को पराजित कर दिया। विजय और शक्ति के मद में चूर वह चला भगवान शंकर को ही आजमाने। उसने तो ताल ठोककर ऐलान कर दिया कि कैलास को उठा कर वह लंका ले जाएगा। यह खबर जब भगवान कैलाशपति के पास पहुंची तो उन्होंने उसे समझाया पर ख़ुद को सबसे अधिक बलवान समझने वाला किसी की बात मानने को तैयार होता है क्या? रावण भी नहीं माना।!
इस परिस्थिति में भगवान आशुतोष ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे से कैलास को दबा दिया। कैलास पर्वत के नीचे दब कर दशानन चीखने-चिल्लाने लगा। तब जाकर दशानन को अपनी शक्ति का एहसास हुआ। और वह शिव भगवान से बार-बार विनती और निवेदन करने लगा। वो तो थे भोलेनाथ। रावण की प्रार्थना से ख़ुश हो गए। जब औढरदानी ख़ुश हों तो कुछ न कुछ मिलना तय था। दशानन को उन्होंने “चंद्रहास” नामक तलवार दे दिया और कहा आज से तुम “रावण” हो! संस्कृत में रावण का अर्थ होता है – “रावयति भीषयति सर्वान् इति रावण:” अर्थात् जिसके चिल्लाने से ब्रह्मांड कांप उठे। इसके बाद से रावण महादेव का भक्त हो गया और जपने लगा, “हर-हर महादेव”।
इस फ़्लैशबैक के बाद फिर से हम पहुंचते हैं अपने मूल प्रश्न पर ...
... कि इतने अच्छे कुल का यह पात्र नायक न हो कर इतने बुरे चरित्र वाला खलनायक कैसे बन गया? मुझे नहीं पता। अगर आपको पता है तो टिप्पणियों के द्वारा हमे भी बताएं।
मुझे तो लगता है उसने ---- राजेश रेड्डी का यह शे’र पढ लिया होगा।
वैसे अपना तो इरादा है भला होने का
पर मज़ा और है दुनियां में बुरा होने का
ख़ैर ख़्याल अपना-अपना! अपन जब फ़ुरसत में होते हैं तो कुछ न कुछ सोच ही लेते हैं। पर रावण के खलनायक्त्व पर आज नहीं। फिर कभी। अभी तो आपको एक कविता भी सुनानी है, यानी अभी ..
“अभी तो हाथ में जाम है
तौवा कितना काम है ।
फुरसत मिलेगी तो देखा जाएगा ।
दुनिया के बारे में सोचा जाएगा।”
सबसे ऊंचा रावण
पुतला जब पूरा बन गया
कारीगर उसके सामने तन गया
“यह मेरे मन को खूब जंचा है
इसबार
रावण का क़द पहले से ऊंचा है
इसके ओज के सामने कौन टिकता है
यह रावण तो
दूर से ही दिखता है।”
कारीगरों की अब क़िस्मत जगी है
रावण को ऊंचा दिखाने की होड़ जो लगी है
मंडली वालों की ही सब यह दया है
इसीलिए तो रावण का कद
काफ़ी ऊंचा हो गया है,
इस बात की भी है सब जगह चर्चा
रावण पर किया गया है
पहले से अधिक ख़र्चा
कारीगरों ने पुतलों को बड़े कौशल से गढा है
इसीलिए रावण का कद
हर तरह से बढा है
वैसे तो
सबसे ऊंचा रावण होने के दावे कई करते हैं
पर दिल्ली के रावणों के सामने
सब पानी भरते हैं
यहां के रावण हैं
एक से एक मनभावन
और सच मानिए
दिल्ली में ही है
देश का सबसे ऊंचा रावण।
सबसे ऊंचा रावण।
सबसे ऊंचा रावण।
कविताउठ तोड़ पीड़ा के पहाड़
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| पिछले सप्ताह प्रकृति द्वारा किए गए विध्वंस से आहत जो कविता लिखी थी, उसे प्रस्तुत किया था। यहां पढें। प्रकृति के द्वारा हुए विनाश के बावज़ूद भी जीवन चक्र तो चलता रहता है। आदमी को उठना पड़ता है, विपदाओं से लड़ना पड़ता है। अगर हम अतीत (बीती) को ही याद करते रहेंगे तो वर्तमान में जीना कठिन लगेगा व भविष्य असम्भव प्रतीत होगा। यदि हम मृत्यू से भयभीत होते हैं तो इसका अर्थ है कि हम जीवन का महत्व ही नहीं समझते। जन्म का अन्त है मृत्यु और मृत्यु का अन्त है जन्म। समस्याएं न सिर्फ़ आएंगी बल्कि हो सकता है संसार में समस्याएं बढ़ेंगी इसलिए हमें समस्याओं का सामना करने की अपनी क्षमता को बढ़ाना चाहिए। हमें समस्यायों से निपटने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यदि हम बहुत अधिक लोगों पर निर्भर रहते हैं तो इससे हमारे निराश होने के अवसर बढ़ जाते हैं। समस्याओं का डटकर मुक़ाबला करना होता है। अगर मुझे अन्धेरे से बहुत डर लगा है तो अपनी ऑंखे बन्द कर लेना समझदारी नहीं है। हमारी सच्ची परीक्षा तो कठिन परिस्थितियों में ही होती है। परीक्षा की घडी मनुष्य को महान बनती है, विजय की घड़ी नहीं। समस्यायें चाहे कैसी भी हों परन्तु इनसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें परीक्षा समझ कर पास करना चाहिए। विपत्ति आने पर हिम्मत बनाये रखना सबसे अच्छा उपाए है। पहाड जैसी विपत्ति को दूर करने के लिए सिर्फ थोडा सा साहस ही पर्याप्त है। |
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(१) चिठियाना-टिपियाना संवाद(२) चिठियाना-टिपियाना संवाद : द्वितीय अध्याय(३) चिठियाना-टिपियाना संवाद : तृतीय अध्यायः(४)चिठियाना-टिपियाना संवाद : अध्याय – 4 |
| उस दिन छदामी लाल के क़दम मिलन पार्क के अंदर पड़े ही थे कि उसने देखा टिपियाना एक कोने में गुमसुम उदास बैठा है और चिठियाना उसकी तरफ़ बढ रहा है। |
| चिठियाना-क्या हुआ भाई टिपियाना! आज मिलन पार्क के इस कोने में, गुमसुम, गंभीर, अकेले। |
| टिपियाना-भाई! आज सच में बिल्कुल अलग-थलग और अकेला महसूस कर रहा हूं। |
| चिठियाना-क्यों, क्या हुआ? |
| टिपियाना-हमारे ऊपर गंभीर संकट छा गया है। |
| चिठियाना-ऐसा क्या हुआ मेरे भाई? |
| टिपियाना-भाई मत कहो! तुम्हारे मुंह से भाई का संबोधन, अच्छा नहीं लगता। |
| चिठियाना-लो, कर लो बात! अब मुझसे क्यों ख़फ़ा हो रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? |
| टिपियाना-तुम्हारे मुंह से यह सब सुनना अच्छा नहीं लगता। तुम हमें आस्तीन के सांप समझते हो। गया था गले मिलने, दुआ-सलाम करने और तुम मेरी इस हरकत को यह समझ बैठे कि इसमें मेरा स्वार्थ है। निहितार्थ है। |
| चिठियाना-ऐसा कब कहा हमने? यह क्यों कर आया तुम्हारे मन में? |
| टिपियाना-सब कहने से ही होता है क्या? हम तो तुम्हारा हर लिखा, अन-लिखा सब पढते हैं, पढ लेते हैं! पर तुम …. तुम तो हमारी सीधे-सादे ढंग से कही बात का कुछ “और” ही अर्थ लगाते हो….! |
| चिठियाना-कभी ऐसा कहा हमने? |
| टिपियाना-….. और क्या? कहा नहीं तो ….. तुम ही बताओ जब तुम ख़ुद के बीमार होने की बात करोगे तो मैं तो यही कहूंगा ना कि … … ‘तुम्हारे साथ जीवन के हर पल का आनंद मिला है। तुम जल्दी स्वस्थ हो जाओ ताकि हम फिर से खुशियों को महसूस कर पाएं।’ … … या फिर … … ‘तुम्हारा आस-पास न होना बेहद अखर रहा है। जल्द ठीक हो जाओ।’ |
| चिठियाना-हां। |
| टिपियाना-पर मेरे इस कहे के पीछे तुम सोचोगे कि ….‘हां-हां तुम तो यही चाहते हो कि मैं स्वस्थ हो जाऊं ज़ल्द से ज़ल्द ताकि तुम्हारे यहां जाकर तुम्हारा मन बहलाऊं।’ |
| चिठियाना-अरे-रे-रे—!! नहीं! नहीं!! भाई!!! ऐसा क्यों कहूंगा? कभी नहीं। |
| टिपियाना-मैं समझता नहीं क्या? सब समझता हूं। अब जब तुम स्वस्थ और तरो ताज़ा दिखोगे तो यही तो कहूंगा कि बहुत अच्छा दिख रहे हो, स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट और सही-सलामत! |
| चिठियाना-हां! इसमें ऐतराज़ वाली कोई बात नहीं है। |
| टिपियाना-पर मैं जानता हूं कि मन ही मन तुम कह रहे होगे …. ‘हां-हां, बीमारी में मेरे पास आकर दो-चार सेव-फल लाते थे …. अब बच गया! … इसी लिए इतने चहक रहे हो!! खुद कितने प्रफुल्लित लग रहे हो कि मिला छुटकारा व्यर्थ के इस खर्च से!!’ |
| चिठियाना-भाई टिपियाना ….. |
| टिपियाना-भाई मत कहो! जब भी भाई कह कर मैं गले लगता हूं तो तुम इसका भी कोई और ही मतलब निकालते हो जैसे …. जैसे …. ‘आज तो गला दबाने के लिए ही गले पड़ रहा है।’ |
| चिठियाना-यह सरासर आरोप है मुझ पर! ये आज तूने कौन सा मुद्रा अख़्तियार कर लिया है? |
| टिपियाना-आरोप नहीं, मिस्टर चिठियाना! मेरा अब यही रूप तुम्हें देखने को मिलेगा। |
| चिठियाना-क्या बकते हो? |
| टिपियाना-बकता नहीं हूं! तुम्हें आगाह कर रहा हूं। जब तुम बीमार पड़ोगे तो कहूंगा --- ‘अच्छी और तगड़ी बीमारी है! थोड़ी और तगड़ी और अच्छी हो जाए यह बीमारी तो मज़ा आ जाए! शायद फिर उसका ईलाज इंडिया में संभव ही न हो। फिर तो इसी बहाने विदेश यात्रा का तुम्हारा भी योग बन जाएगा!’ |
| चिठियाना-अरे! शुभ-शुभ बोलो! |
| टिपियाना-हां-हां, जब तुम तरो-ताज़ा दिखोगे तो शुभ-शुभ ही बोलूंगा … कहूंगा …. ‘इतने दिनों के बाद यह चमक तुम्हारे चेहरे पर अच्छी नहीं लगती। आंखों को खटक रही है। इसकी तेज को कम करो। फिर से बीमार पड़ो। बीमार थे तो कितना ऐश-ओ-आराम था। कितने सारे लोग पूछने आते थे। अब स्वस्थ हो गए हो, तो कोई पूछने भी नहीं आएगा। फिर इधर-उधर घूमते-भटकते फिरोगे। |
| चिठियाना-भाई तुम्हारा आज सिर फिर गया है। |
| टिपियाना-फिरा नहीं है, अब होश आया है। हमारा क्या है, हम तो फिर भी कुछ न कुछ टिपिया लेंगे। आपस में ही बतिया लेंगे। तुम अपना सोचो, दुकान सजा कर बैठे रहोगे, हम सामने से गुज़र जाएंगे। न दुआ, न सलाम, फिर …. … |
| चिठियाना-बहुत हुआ! अब बस करो …! |
| टिपियाना-हां-हां! बस ही करता हूं…. |
| चिठियाना-हुंह! |
| टिपियाना-हुंह!! |
| चिठियाना-….. ….. |
| टिपियाना-…. …… |
| चिठियाना-???? |
| टिपियाना-???? |
| चिठियाना-!, @, #, $, \, ~ |
| टिपियाना-!, @, #, $, \, ~ |
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| टिपियाना-%, ^,-*, (, ), /, |
| चिठियाना-<, > |
| टिपियाना-<, > |
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| (इतिश्री ब्लोगर-खंडे नवरात्रोपलक्ष्ये चिठियाना-टिपियाना अनबन-बनबन वार्ता नाम षष्ठो अध्यायः !!) |
आंच-39 (समीक्षा) परश्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविताक्या जग का उद्धार न होगा!
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इस ब्लॉग पर साधना जी अपनी माँ, श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’, की रचनाओं को हम तक पहुँचा रहीं हैं! कहती हैं,
जिन विषम परिस्थितियों और परिवेश में इन कविताओं का सृजन हुआ होगा उसके लिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह कार्य किसी असाधारण व्यक्तित्व के हाथों ही सम्पन्न हुआ होगा! इस ब्लॉग की कविताएं पढते हुए बरबस यह मन में आता है कि जिन विषम परिस्थितियों और परिवेश में इन कविताओं का सृजन हुआ होगा उसके लिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह कार्य किसी असाधारण व्यक्तित्व के हाथों ही सम्पन्न हुआ होगा! इस ब्लॉग पर प्रस्तुत कविताओं का अवलोकन एक समृद्ध और जीवंत साहित्यकार की लगभग चौथे दशक से लेकर आठवें/नौवें दशक तक की काव्य-यात्रा से रू-ब-रू होना है। जहाँ कविताओं के बीज विचारों की ऊष्मा से युक्त हैं, वहीं रचनात्मक सफलताओं की संपूर्ति काव्य कला की शर्तों पर ही होती है। वह भी अपने समय-समाज की परिवर्तन-कामी चेतना के साथ।
4 नवम्बर 1986 को उनका निधन हुआ। यह ब्लॉग और इस पर मां की कविताओं की प्रस्तुति साधना जी और उनकी बहन आशा जी की माँ की सृजनशीलता के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि है!
आज की आंच के लिए हमने चयन किया है श्रीमती ‘किरण’ की कविता * क्या जग का उद्धार न होगा * । कोई ज़रूरी नहीं कि कठिन समय को रूपायित करने के लिए कविता अपने विन्यास और बोधगम्यता में कठिन हो जाए। इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर जाते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि कठिन समय को रूपायित करने के लिए कविता अपने विन्यास और बोधगम्यता में कठिन हो जाए। कम-से-कम किरण जी की कविता इस तर्क को नकारती है। किरण जी की कविता * क्या जग का उद्धार न होगा * के सरोकार केवल फूल, पत्ते, कलि, उपवन, तितली, भंवरों से ही नहीं, कहीं न कहीं पूरे भूमंडल से जुड़े हैं। कवयित्री `किरण’ सरल और सहज मुहावरे में पिरो कर कठिन समय को कविता में साधती हैं। ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ? कोई भी रचनाकार समय, समाज और परिवेश की उपेक्षा नहीं कर सकता है, क्योंकि जहाँ वह रहता है, जहाँ से वह पलकर बड़ा होता है, मनुष्य बनता है, उनके समस्त क्रियाकलाप, ऊहापोह, घात-प्रतिघात, संघर्ष आदि उनके मस्तिष्क में गुंफित होते हैं। अतः रचनाकार की संघर्षशीलता, जुझारूपन, संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों के प्रति चेतना और दिशाबोध, उसे यहीं से मिलते हैं। डॉ. `किरण’ भी अपने समय, समाज और परिवेश की उपज है। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय-फलक पर हताशा है, निराशा है, भूख है, गरीबी है, शोषण है, अशिक्षा है, टूटन है और मोहभंग भी है। मुरझाये फूलों का यौवन आज धूल में तड़प रहा है, काँटों के संग रह जीवन में कितना उसने कष्ट सहा है, किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ? उनकी लेखनी में हम आग और शीतलता आक्रोश और सरलता, निर्भीकता तथा स्पष्टता, भावुकता तथा कठोरता सभी भाव पायेंगे! उनका रुझान समाजपयोगी साहित्य के सृजन की ओर है। कारुणिक, त्रासद, शक्तिहीनों के विकल्प को दर्शाने वाली रचना होते हुए भी यह कविता नये आशावाद की सूचक है और यह आशावाद आने वाली पीढ़ी के जरिये व्यक्त होता है। जहाँ कविताओं के बीज विचारों की ऊष्मा से युक्त हैं, वहीं रचनात्मक सफलताओं की संपूर्ति काव्य कला की शर्तों पर ही होती है। वह भी अपने समय-समाज की परिवर्तन-कामी चेतना के साथ। ओ माली तेरी बगिया में आ वसंत कब मुस्कायेगा, कब कोकिल आग्रह के स्वर में स्वागत गीत यहाँ गायेगा, क्या तितली भौरों के जीवन में सुख का संचार न होगा ? शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम है। `किरण’ जी एक समर्थ सर्जक हैं। कविता की पंक्तियां कभी सादगी के अंदाज में ताना मारती है....... तो कभी अनुरोध और विनती करती प्रतीत होती हैं तो कभी सांत्वना के स्वर सुनाई पड़ते हैं। मुरझाये फूलों का यौवन आज धूल में तड़प रहा है, काँटों के संग रह जीवन में कितना उसने कष्ट सहा है, किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ? बिल्कुल अपठनीय और गद्यमय होते जा रहे काव्य परिदृश्य पर ..... `किरण’ जी की यह कविता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे कविता की मूलभूत विशेषताओं को प्रयोग के नाम पर छोड़ नहीं देतीं। बेहद संश्लिष्ट इस कविता में उपस्थित लयात्मकता इसे दीर्घ जीवन प्रदान करती है। कविता पढ़ने पर लू में शीतल छाया की सुखद अनुभूति मिलती है। कविता काफी अर्थपूर्ण है, और ज्यादा समकालीन भी। उन्मादिनी हवा ने आकर सूखे पत्तों को झकझोरा, मर्मर कर धरिणी पर छाये सुखद वृक्ष का आश्रय छोड़ा, कुम्हलाई कलियों के उर में क्या जीवन का प्यार न होगा ? इनकी काव्यभाषा सहज है। यह कविता तरल संवेदनाओं से रची गई है, जो दिल से पढे जाने की अपेक्षा रखती है। भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्दों का खूबसूरत चयन, जिनमें सटीक शब्दो का प्राचुर्य है, आकर्षक है। ओ माली तेरी बगिया में आ वसंत कब मुस्कायेगा, कब कोकिल आग्रह के स्वर में स्वागत गीत यहाँ गायेगा, तितली भौरों के जीवन में क्या सुख का संचार न होगा ? कविता महज कवयित्री का बयान भर नहीं है। इसमें कवयित्री की भावनाएं सीधे-साधे सच्चे शब्दों में बेहद ईमानदारी से अभिव्यक्त हुई हैं। कविता इतनी लयात्मक है कि इसे बार-बार पढने का मन करता है। इस कविता में कवयित्री ने प्रकृति का सहारा लेकर अपनी बात कही है। अगर यह कहें कि उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है तो अनुचित नहीं होगा। इस रचना में प्रकृति के बहाने जीवन के मर्म को समझाने की कोशिश की गई है। जैसे ‘अज्ञेय’ का - “दुख हृदय को मांझता है ज़्यादा रगड़ने से बर्तन का मुलम्मा छूट जाता है।” - वैसे ही इस कविता को पढने से भौतिकता की चमक-दमक का मुलम्मा छूट जाता है। लोग नैसर्गिक स्थिति में आ जाते हैं और मन संवेदनशील हो जाता है। जब संवेदना का जल हृदय में डोलता है तो वाणी अवाक हो जाती है। कविता सचमुच विभोर करने वाली है। कविता को पढते वक़्त इसपर ‘बच्चन’ की और उनकी कविता की छाप दिखाई देती है। “इस पार प्रिये मधु है तुम हो उस पार न जाने क्या होगा?” कुछ लोगों को इसमें शैलीगत कमज़ोरियां दिख सकती है, पर मुझे नहीं दिखती क्योंकि फॉर्म और कंटेंट में बिखराव बिल्कुल नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि यह कविता एकदम ताज़ी है, और आज के ताजा प्रसंगों पर आधारित है, न ही यह कि इन्हें प्रतिमान मानकर आज की हिन्दी कविता के संबंध में कोई निर्णायक बात कही जाय। हाँ, इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने कुछ ऐसी समस्याओं की ओर हमारा ध्यान खींचा है, जो आज से 20-25 वर्ष पहले भी थीं, आज भी हैं और तब तक रहेंगी जब तक कि सामंती एवं पूँजीवादी आधारों पर टिकी व्यवस्था खत्म नहीं हो जाती। |
| घाट अखारा गए तो, अखारा मिला न एक, देखे मुर्दे घाट पर जलते हुए अनेक। पहुंचा जिस बाज़ार में पूरी हुई न आस, मूड बिगड़ कर हो गया मन का सत्यानास। मन का सत्यानास पहुंचा जब मैं गोला, मूड बनाना चाहा तो मिला न भांग का गोला। | हम तो मोती झील जाकर के पछताए, मोती की झील के बदले कुत्ते मोती पाए। कुत्ते मोती पाए भागा रखकर सिर पर पैर, धर्मशाला पहुंचा तो देखा नहीं धर्म की खैर। धर्म-कर्म के नाम पर पैसे जाते लूटे, नयाटोला पहुंच कर घर सब पाते टूटे। |
जनवरी १९४७ में गांधी जी नोआखाली में थे। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे।
सात दिनों में उन्होंने ११६ मील की यात्रा की। इस दौरान उन्हों ने ४७ गावों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावन जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा।
गांधी जी उन दिनों बंगाल में भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है।
१९४६ के अक्तूबर अंत तक गांधी जी तीसरी श्रेणी की रेलगाड़ी यात्रा के द्वारा कोलकाता पहुंचे। उद्देश्य उनका था नोआखाली के दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करना। बंगाल का यह डेल्टा प्रदेश है। इस क्षेत्र के लोग अत्यंत ग़रीब हैं। न सड़कें, न यातायात का साधन था। गांधी जी गांव-गांव घूमे। हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने एकत्र होते रहे। गांधी जी, भाईचारे, निर्मल-मन, शत्रु को क्षमा का संदेश सुनाते थे। उनकी यह यात्रा समाप्त होते-होते, नोआखाली और तिपेरा ज़िलों में समुदायों के आपसी संबंध काफ़ी सुधरे। गांधी जी कहा करते थे,
“यदि मैं हिन्दू भाईयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा।”
जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब न केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी।
बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधी जी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया।
गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।
नोआखाली में गांधी जी भड़क उठी साम्प्रदायिकता की आग बुझाने गए थे। ७७ वर्षीय गांधी जी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, “जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।”
गांधी जी सुहरावर्दी के निवेदन पर नोआखाली गए थे।
गांधी जी ने सामाजिक बदलाव के कार्य को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर उसमें अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष भी जोड़ दिया। स्वावलंबन और ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को स्थापित करके उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने पर बल दिया। अपनी ज़िन्दगी पर अपने नियंत्रण की बात ने जो धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव के कार्य का उद्देश्य बन गया, सामाजिक कार्य को एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया। गांधी जी ने समाज की जड़ता को भंग कर लोगों को सोचने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया और समाज में बदलाव के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचार किया। सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में इन कार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
भारत में गांधी जी को राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ एक पैगम्बर और पिता का स्थान दिया जाता है। उनके नेतृत्व में देश आज़ाद हुआ। वो राजनेता के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वो एक नए भारत के निर्माण के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। जात-पात, छुआ-छूत, साप्रदायिक भेद-भाव को दूर करने के लिए सारी उम्र लड़ते रहे। साम्प्रदायिकता की आग ठंडी करने में उन्हें शहादत प्राप्त हुई। साम्प्रदायिक दंगों पर क़ाबू पाने के लिए गांधी जी अकेले जीवन के अंतीम क्षणों तक प्रयत्नशील रहे।
29 जनवरी 1948 को गांधीजी ने अपनी पौत्री मनु से कहा था,
“यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।”
और यह कैसा संयोग था कि 30 जनवरी 1948 के दिन उस महात्मा को प्रार्थना सभा में जाते हुए मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हुई।
ठीक ही कहा था लॉर्ड माउंट बेटन ने,
“सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया।”
महा कवि पंत ने कहा था
तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !
तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।
पं. सोहन लाल द्विवेदी की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं जिन्होंने सारे विश्व को एक नयी दिशा दी।
चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।
“बापू के प्रति” अपने उद्गार प्रकट करते हुए कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है :-
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन।
सुख भोग खोजने आते सब,
आये तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज”।
उन जैसे महामानव के बारे में जितना भी कहा जाए कम है। रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां यहां स्मरण हो रहें हैं :-
“तू कालोदधि का महास्तम्भ, आत्मा के नभ का तुंग-केतु,
वापू! तू मर्त्य, अमर्त्य, स्वर्ग, पृथ्वी, भू, नभ का महासेतु।
तेरा विराट यह रूप कल्पना पट पर नहीं समाता है,
जितना कुछ कहूं मगर कहने को शेष बहुत रह जाता है।”
फ़ुरसत में … हिन्दी दिवसकुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातेंऔर दो क्षणिकाएं
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फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस के अवसर पर लिखा हुआ बहुत कुछ पढने, देखने और सुनने को मिला। कुछ अखबारों के शीर्षक देखिए“हिंदी अपने घर में प्रवासिनी”, “हाशिए पर हिंदी”, “हिदी को राष्ट्रभाषा बनाने में राजभाषा विभाग का टालू रवैया”, “हिंदी के प्रति कब खत्म होगी लापरवाही”, आदि, आदि। इस दिन जब ये सब पढता हूं तो एक शे’र बरबस आ जाता है ज़ुबान पर कोई हद ही नहीं शायद मुहब्बत के फसाने की सुनाता जा रहा है जिसको जितना याद आता है। इन दिनों मैंने अखबार पढना ही बंद कर दिया है, क्योंकि है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं हाथ में हर चीज़ होगी आइना होगा नहीं। अखबारों और अन्य कई जगह इन सूर्ख़ियों को देख लगता है जब हम घर से बाहर निकलते हैं तो हमारे हाथ में भाला बरछी, लाठी सोंटा सब होता है, पर आइना नहीं होता। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि मुझे यह गाना बहुत अच्छा लगता है, ये न पूछे मिला क्या है हमको हम ये पूछें किया क्या है अर्पण हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। सरकारी कार्यालयों में जो प्रयोग होता है वह राजभाषा है। और १४ सितंबर को जो मनाया जाता है वह राजभाषा हिंदी दिवस है भाषा हिंदी दिवस नहीं। राजभाषा नीति, प्रेरणा, प्रोत्साहन और सद्भावना पर आधारित है। यह माना जाता है कि जब तक एक भी हिंदीतर भाषी राज्य असहमत होगा तब तक हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकती। अशोक चक्रधर के शब्दों में कहें तो हिंदी तो जगन्नाथी रथ है, इसे हम सब मिलकर खीचें। इक्कीसवीं सदी की व्यावसायिकता जब हिन्दी को केवल शास्त्रीय भाषा कह कर इसकी उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगाने लगी तब इस समर्थ भाषा ने न केवल अपने अस्तित्व की रक्षा की, वरण इस घोर व्यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज कराई। जनसंचार के सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा और टेलीविजन ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में वैश्विक क्रांति दी है। आज हर कोई हिंदी बोल समझ लेता है, लिख पढ़ भले न पाए। विज्ञापन की दुनियां में हिंदी का बोलबाला है। विज्ञापन की दुनियां का हिंदी के बगैर काम नहीं चलता। विज्ञापन गुरु यह जान और मान चुके हैं कि माल अगर बेचना है तो उन्हें हिंदी में ही बाज़ार में उतरना पड़ेगा। हां ये जो हिंदी परोसी जा रही है उसे कुछ लोग “हिंगलिश” की संज्ञा देते हैं। परन्तु यह सर्वग्राह्य हिंदी है। आज बाज़ारबाद शबाब पर है। उत्पादक तरह-तरह से उपभोक्ताओं को लुभाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में विज्ञापन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दिवा-रात्री समाचार चैनल, एफ.एम. रेडियो और विज्ञापन एजेंसियों की बाढ़ में बिना लाग लपेट बेवाक और संक्षिप्त शब्दों में पूरी रचनात्मकता वाली हिन्दी का ही बाज़ार है। इंटरनेट पर भी हिंदी का अभूतपूर्व विकास हो रहा है। इंटरनेट पर हिंदी की कई वेबसाइटें हैं। हिंदी के कई अख़बार नेट पर उपलब्ध हैं। कई साहित्यिक पत्रिकाएं नेट पर पढ़ी जा सकती हैं। हिंदी में ब्लॉग लेखक आज अच्छी रचनाएं दे रहें हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार माध्यमों का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह देश की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के विकास का स्पष्ट संकेत देता है। यह भी कहा जाता है कि बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से लोग आतंकित हैं। कुछ यह कहते मिल जाएंगे कि “हमें बाज़ार की हिंदी से नहीं बाज़ारू हिंदी से परहेज़ है।” जिस बाज़ारू भाषा को बाज़ारवाद से ज़्यादा परहेज़ की चीज़ कहा जा रहा है वह वास्तव में कोई भाषा रूप ही नहीं है। कम से कम आज के मास कल्चर और मास मीडिया के जमाने में। आज अभिजात्य वर्ग की भाषा और आम आदमी और बाज़ारू भाषा का अंतर मिटा है। क्योंकि आम आदमी की गाली-गलौज वाली भाषा भी उसके अंतरतम की अभिव्यक्ति करने वाली यथार्थ भाषा मानी जाती है। उसके लिए साहित्य और मीडिया दोनों में जगह है, ब्लॉग पर भी। आज सुसंस्कृत होने की पहचान जनजीवन में आम इंसान के रूप में होने से मिलती है। दबे-कुचलों की जुबान बनने से मिलती है, गंवारू और बाज़ारू होने से मिलती है। यह हिन्दी उनकी ही भाषा में पान-ठेले वालों की भी बात करती है, और यह पान-ठेले वालों से भी बात करती है, और उनके दुख-दर्द को समझती और समझाती भी है। साथ ही उनमें नवचेतना जागृत करने का सतत प्रयास करती है। अत: यह आम आदमी की हिंदी है, बाज़ारू है तो क्या हुआ। बाज़ार में जो चलता है वही बिकता है और जो बिकता है वही चलता भी है। प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही संपर्कभाषा का रूप ले सकती है। साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। सामान्य बोलचाल में प्रचलित अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, उर्दू से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों के हिंदी में प्रयोग से सही अर्थों में यह जनभाषा बन सकेगी और तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाईयों के बीच की दूरी पट सकेगी। हिन्दी की विकास यात्रा में इसे और अधिक प्रयोजनमूलक यानी फंक्शनल बनाया जाए। प्रयोजनमूलक हिन्दी जीवन और समाज की ज़रूरतों से जुड़ी एक जीवन्त, सशक्त और विकासशील हिन्दी भाषा है। आज ऐसी ही प्रयोजनमूलक हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों को सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए। हिंदी लाहे लाहे पूरे देश में पसर रही है । कह कर न मैं हिंदी को कमजोर कर रहा हूँ न उसका दायरा सीमित । अगर ट्रेन लेट है कहकर बात बनती है तो उसे विलम्ब क्यों कर दूँ । अगर ट्रेन स्टेशन में ढुक रही है से बात ज्यादा समझ में आए तो आगमन के इंतजार में क्यों बैठूँ । और अब क्षणिकाएं |
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दुर्वासा न बनो मुझे नहीं मरना किसी बहेलिए के हाथों तुम्हारी जुदाई ही काफी है मुझे हरपल मारने के लिए। |
| (2) पीपल ! |
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“दुनिया में रिश्ता एक ही होता है – तड़प का, विरह की हिचकी का, और शनाई का, जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है – यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है…”- हिंदी तथा पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और विभाजन के दर्द को एक नए मुकाम पर ले जाने वाली अमृता प्रीतम ने अपने साहस के बल पर समकालीन महिला साहित्यकारों के बीच अलग जगह बनाई। अमृता जी ने ऐसे समय में लेखनी में स्पष्टवादिता दिखाई, जब महिलाओं के लिए समाज के हर क्षेत्र में खुलापन एक तरह से वर्जित था। एक बार जब दूरदर्शन वालों ने उनके साहिर और इमरोज़ से रिश्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा,
अमृता जी का साहस और बेबाकी उन्हें अन्य महिला लेखिकाओं से अलग पहचान दिलाई। जिस जमाने में महिलाओं में बेबाकी कम थी, उस समय उन्होंने स्पष्टवादिता दिखाई। यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था।
फिर तुम्हें याद किया, हमने आग को चूम लिया इश्क ज़हर का प्याला सही, मैंने एक घूंट फिर से मांग लिया और इमरोज़ की सूरत में – अहसास की इन्तहा देखिए, एक दीवनगी का आलम ही था, कलम ने आज गीतों का काफ़िया तोड़ दिया मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आया है। उठो! अपनी गागर से-पानी की कटोरी दे दो मैं राहों के हादसे, उस पानी से धो लूंगी- अमृता जी की रचनाएं बनावटी नहीं होती थी। यह उनकी लेखिनी को खास बनाता है। अमृता जी जो भी लिखती थी, उसमें आम भाषा की सरलता झलकती थी। यही उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाता था। “अक्षर-जो कागजों पर उतरते रहे, वे सबके सामने हैं-इसलिए मुझे और कुछ नहीं कहना। लगता है, मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती रही, लिखती रही, वह सब देवताओं को जगाने का प्रयत्न था, उन देवताओं को जो इन्सान के भीतर सो गए हैं....” विभाजन के बाद अमृता लाहौर से भारत आई थी। लेकिन उन्हें दोनों देशों में अपनी रचनाओं के लिए ख्याति मिली। 1956 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली वो पहली महिला थी। 1969 में पदमश्री और पद्म विभूषण से नवाजा गया। 1982 में उन्हें कागज ते कैनवास के लिए साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार, ज्ञानपीठ मिला। 1986 से 1992 तक वो राज्यसभा की सदस्य रहीं। 2003 में उन्हें पाकिस्तान की पंजाबी अकादमी ने भी पुरस्कृत किया। इस पर उन्होंने कहा था , बड़े दिनों बाद मेरे मायके को मेरी याद आई। हालाकि अमृता जी का उपन्यास पिंजर भी विभाजन के दर्द को अलग तरह से दिखाता है, पर उन्हें सबसे ज्यादा उनकी कविता “अज अक्खां बारिस शाह नू” के लिए जाना जाता है। इसमें उन्होंने विभाजन के दर्द को मार्मिक तौर पर पेश किया है। ज़मीन पर लहू बहने लगा- इतना- कि कब्रें चूने लगीं और मुहब्बत की शहज़ादियां मज़ारों में रोने लगीं… सभी कैदों में नज़र आते हैं हुस्न और इश्क को चुराने वाले और वारिस कहां से लाएं हीर की दास्तान गाने वाले… तुम्हीं से कहती हूं-वारिस! उठो! कब्र में से बोलो और इश्क की कहानी का कोई नया वरक खोलो…
उन्होंने इस अत्मकथा में मानवता की स्थापना पर अपनी बेबाक टिप्पणी लिखी है। साम्प्रदायिकता को भी दरकिनार कर दिया है, और एक मुक्कमल लेखिका के रूप में हमारे सामने प्रकट होती हैं। कोई अपने हाथ में पत्थर उठाता है तो पहला ज़ख्म इंसान को नहीं, इंसानियत को लगता है। और सड़क पर जो पहली लाश गिरती है, वह किसी इंसान की नहीं होती, इंसानियत की होती है… उनका मानना है मज़हब के नाम पर जितना कत्लो-खून हुआ वह हमारे देश की स्वंतंत्रता का बहुत बड़ा उलाहना है … जैसे इश्क की ज़बान पर एक छाला उभर आया हो जैसे सभ्यता की कलाई से एक चूड़ी टूट गई हो इसी तरह इस पुस्तक में कलम के कर्म के बारे मे बताते हुए कहती हैं कि इसके अनेक रूप होता है: वह बचकाने शौक में से निकले तो जोहड़ का पानी हो जाता है; अगर सिर्फ़ पैसे की कामना में से निकले तो नकली माल हो जाता है; अगर सिर्फ़ शोहरत की लालसा में से निकले तो कला का कलंक हो जाता है; अगर बीमार मन में से निकले तो ज़हरीली आबोहवा हो जाता है; अगर किसी सरकार की ख़ुशामद में से निकले तो जाली सिक्का हो जाता है।
मेरी खामोशी की गली से अक्षरों के साए गुजरते रहे चांद की मटकी से जब- कतरे से कुछ गिरते रहे रात की दहलीज़ पर- तारे दुआ करते रहे… अज्ञेय रचित “शेखर एक जीवनी” उपन्यास की पंक्ति है “दर्द से भी बड़ा विश्वास है।” …. यही विश्वास अमृता प्रीतम के लेखन में दिखता है और यही बल उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाता है। कभी तो कोई इन दीवारों से पूछे- कि कैसे इबादत गुनाह बन गई थी |