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सोमवार, 1 नवंबर 2010

ग़ज़ल :: ये कैसै रखवाले देख

सलिल जी को आभार जिन्होंने इसे ग़ज़ल का रूप देने में हमारी मदद की!

ये कैसै रखवाले देख

IMG_0130मनोज कुमार

ये     कैसे   रखवाले    देख

चेहरे     सबके   काले  देख

 

उठती    क्यों आवाज़ नहीं

मुँह   पर सबके ताले देख.

 

मां की भाषा जो बोल रहा

घर  से जाए निकाले  देख.

 

कूड़े     कचरे   का   यह ढेर

और   शहर   के   नाले देख.

 

अमृत    बाँटें   जो   जग में

पीते    ज़हर  के प्याले देख.

 

मेरे    घर   अंधियारा   छोड़

अपने  घर   उजियाले  देख.

 

कदम  दो कदम   चला नहीं

पाँव में पड़ गए छाले देख.

 

मुख में राम बगल में छूरी

ढंग    ये   नये निराले देख.

 

जो  ‘मनोज’ तुमने ना देखा

आज   कलम के हवाले देख.

शनिवार, 23 अक्टूबर 2010

फ़ुरसत में ... सबसे बड़ा प्रतिनायक/खलनायक

फ़ुरसत में ...

सबसे बड़ा प्रतिनायक/खलनायक

IMG_0130_thumb[1] मनोज कुमार

आज फ़ुरसत में हूं। मन में रह-रह कर ख़्याल आता है कि अगर किसी एक सबसे बड़े खलनायक का नाम लेने को कहा जाए तो सबसे पहले किसका नाम आएगा? अभी-अभी तो गुज़रा है विजय का पर्व, तो उत्तर भी हठात्‌ ही सूझ गया – “रावण”। कहते हैं इसके एक-दो नहीं बल्कि पूरे दस सिर थे! और जब वह किसी सुर पर विजय प्राप्त करने की ख़ुशी में अट्टहास लेता था तो आकाश से लेकर पाताल तक पूरा ब्रह्मांड डोलने लगता था।

 

कल्पना कीजिए, कैसा लगता होगा वो दृश्य, बिल्कुल वैसे ही न, जैसे गब्बर शाकाल के अंदाज़ में कहे, “मोगाम्बो ख़ुश हुआ!”

तो आपको ले चलते हैं फ़्लैशबैक में ....

दस सिर वाला यह पौराणिक पात्र बड़ा सौभाग्यशाली था। इसको यह कालजयी नाम “रावण”, भी भगवान शिव के द्वारा ही प्राप्त हुआ था। पिता विश्रवा और माता कैकसी के इस पुत्र के बचपन का नाम तो दशानन था। ब्रह्मा के पुत्र महान्‌ ऋषि पुलस्त्य का यह पौत्र था। यानी ब्रह्मा दशानन के प्रपितामह थे। मन में यह प्रश्न आना स्वाभाविक है कि इतने अच्छे कुल का यह पात्र नायक न हो कर इतने बुरे चरित्र वाला खलनायक कैसे बन गया?

फ़्लैशबैक .......

दशानन के पिता विश्वश्रवा बहुत बड़े तपस्वी थे। अपने तपबल से उन्होंने काफ़ी ज्ञान अर्जित किया था। उसकी विद्वता से भरद्वाज मुनि काफ़ी प्रभावित हुए। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह विश्रवा से कर दिया। इस दम्पत्ति के पुत्र थे कुबेर। कुबेर देवताओं के कोषाधीश थे।

उस समय असुरों के राजा थे सुमाली। उनकी पत्नी थी अप्सरा थाटक। इस दम्पत्ति की बेटी थी कैकसी। सुमाली अपनी बेटी की शादी दुनिया के सबसे बलशाली और ज्ञानी से करना चाहते थे। ... और उस समय इस योग्यता पर विश्रवा से अधिक कोई खड़ा नहीं उतरता था। अत: उन्होंने उससे ही कैकसी की शादी कर दी। कैकसी की संतानों में दशानन सबसे बड़ा था।

बचपन से ही दशानन बड़ा उत्पाती था। एक बार उसने अपने बड़े भाई कुबेर का अपमान किया। कुबेर इससे काफ़ी दुखी हुए। उसने अपनी मां के साथ पिता का महल छोड़ दिया और अलग रहने लगा।

कहते हैं अपने प्रपितामह ब्रह्मा से उसने शक्ति पाई। उस शक्ति का लाभ उठाकर उसने देवताओं को पराजित कर दिया। विजय और शक्ति के मद में चूर वह चला भगवान शंकर को ही आजमाने। उसने तो ताल ठोककर ऐलान कर दिया कि कैलास को उठा कर वह लंका ले जाएगा। यह खबर जब भगवान कैलाशपति के पास पहुंची तो उन्होंने उसे समझाया पर ख़ुद को सबसे अधिक बलवान समझने वाला किसी की बात मानने को तैयार होता है क्या? रावण भी नहीं माना।!

इस परिस्थिति में भगवान आशुतोष ने अपने दाहिने पैर के अंगूठे से कैलास को दबा दिया। कैलास पर्वत के नीचे दब कर दशानन चीखने-चिल्लाने लगा। तब जाकर दशानन को अपनी शक्ति का एहसास हुआ। और वह शिव भगवान से बार-बार विनती और निवेदन करने लगा। वो तो थे भोलेनाथ। रावण की प्रार्थना से ख़ुश हो गए। जब औढरदानी ख़ुश हों तो कुछ न कुछ मिलना तय था। दशानन को उन्होंने “चंद्रहास” नामक तलवार दे दिया और कहा आज से तुम “रावण” हो! संस्कृत में रावण का अर्थ होता है – “रावयति भीषयति सर्वान्‌ इति रावण:” अर्थात्‌ जिसके चिल्लाने से ब्रह्मांड कांप उठे। इसके बाद से रावण महादेव का भक्त हो गया और जपने लगा, “हर-हर महादेव”।

इस फ़्लैशबैक के बाद फिर से हम पहुंचते हैं अपने मूल प्रश्न पर ...

... कि इतने अच्छे कुल का यह पात्र नायक न हो कर इतने बुरे चरित्र वाला खलनायक कैसे बन गया? मुझे नहीं पता। अगर आपको पता है तो टिप्पणियों के द्वारा हमे भी बताएं।

मुझे तो लगता है उसने ---- राजेश रेड्डी का यह शे’र पढ लिया होगा।

वैसे अपना तो इरादा है भला होने का

पर मज़ा और है दुनियां में बुरा होने का

ख़ैर ख़्याल अपना-अपना! अपन जब फ़ुरसत में होते हैं तो कुछ न कुछ सोच ही लेते हैं। पर रावण के खलनायक्त्व पर आज नहीं। फिर कभी। अभी तो आपको एक कविता भी सुनानी है, यानी अभी ..

“अभी तो हाथ में जाम है

तौवा कितना काम है ।

फुरसत मिलेगी तो देखा जाएगा ।

दुनिया के बारे में सोचा जाएगा।”

 

तो अब पेश है कविता ....

सबसे ऊंचा रावण

पुतला जब पूरा बन गया

कारीगर उसके सामने तन गया

“यह मेरे मन को खूब जंचा है

इसबार

रावण का क़द पहले से ऊंचा है

इसके ओज के सामने कौन टिकता है

यह रावण तो

दूर से ही दिखता है।”

 

कारीगरों की अब क़िस्मत जगी है

रावण को ऊंचा दिखाने की होड़ जो लगी है

मंडली वालों की ही सब यह दया है

इसीलिए तो रावण का कद

काफ़ी ऊंचा हो गया है,

 

इस बात की भी है सब जगह चर्चा

रावण पर किया गया है

पहले से अधिक ख़र्चा

कारीगरों ने पुतलों को बड़े कौशल से गढा है

इसीलिए रावण का कद

हर तरह से बढा है

 

वैसे तो

सबसे ऊंचा रावण होने के दावे कई करते हैं

पर दिल्ली के रावणों के सामने

सब पानी भरते हैं

यहां के रावण हैं

एक से एक मनभावन

और सच मानिए

दिल्ली में ही है

देश का सबसे ऊंचा रावण।

सबसे ऊंचा रावण।

सबसे ऊंचा रावण।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

लघुकथा :: अपेक्षा

लघुकथा

अपेक्षा

IMG_0545_thumb[1] मनोज कुमार

“आपकी तारीफ़?”

“जी मैं पत्रकार! आप इन दिनों चर्चित और उभरते हुए कथाकार हैं, आपका इंटरव्यू लेने आया था।”

“जी बैठिए।”

“थैन्क्स!”

“कहिए क्या लेंगे, मेरे वक़्त, और विचार के अलावा। वैसे मैं ये बता दूं कि आप जो लेना चाहेंगे मैं दे न पाऊंगा, और जो मैं दे पाऊंगा आप लेना नहीं चाहेंगे।”

“जी मैं समझा नहीं...”

“आपका न समझना ही इस साक्षात्कार की भूमिका है! आगे बढिए।”

“आप तो आज कल चर्चाओं के हीरो हैं, कहानियों के बादशाह!”

“दो मिनट ठहरिए। पानी तो है घर में। यह तो एक बैचलर का मकान है। नींबू-पानी का गिलास रखकर हम बातें करेंगे, तो हमारी नीरस बातें भी सरस लगेंगी.... ”

“आपके कमरे में हर चीज़ें कुछ न कुछ कहती प्रतीत हो रही हैं। सरसरी तौर पर देखने से पूरे कमरे में अस्त-व्यस्तता का-सा महौल नज़र आता है, टेबुल, कुर्सियाँ, पुस्तकें, कपड़े ... सब अस्त-व्यस्त।”

“अगर मुझमें सुरुचि-सम्पन्नता, क्रियाशीलता के साथ मौन और उर्ध्वगामी चिंतन, ‘हाई थिंकिंग’, की झलक होती, तो क्या आप यहां होते?”

“तो क्या मैं ये मान कर चलूं कि आपकी कहानियां आपके व्यक्तित्व का संप्रेषण हैं?”

“देखिये भाई साहब! कहानियों की चर्चा से मुझे अलग रखिये। मौसम की बातें कीजिये, कॉमन वेल्थ खेल-कूद की चर्चा कीजिये। ....और नहीं तो क्रिकेट या फ़िल्म जगत ही सही…!”

“... ... लेकिन मैं तो कहानियों की चर्चा करने के ख़्याल से आया हूँ।”

“... हम्म! शानदार ख़्याल है साब! लेकिन देर से आये। कुछ दिनों पहले तक मैं कहानियां रचता था, आज गढता भर हूँ।”

“मैं समझा नहीं...”

“मतलब, आप जैसे आलोचकों और अख़बारनबीसों ने हम जैसे कहानीकारों को डीप फ़्रीज़ करने का व्रत-सा ले लिया है। कोई भी चर्चा उठा लीजिये, दो-चार पंक्तियाँ तो मिल ही जायेंगी कि अब कहानी कोई पढ़ने की चीज रह गई है? किस्सागोई बीते दिनों की बात हो गई है। कहानियां तो फ़लां लिखते थे ….!”

“लेकिन आपकी कहानियों की चर्चा तो हर जगह हो रही है।”

“हमें भी तो सर्वाइव करना है ...! हम भी अब बार्टर सिस्टम में विश्‍वास रखते हैं।”

“मतलब?”

“तुम मुझे आलू दो, मैं दाल दूंगा।”

“इससे तो न सिर्फ़ आपकी कहानियों का बल्कि साहित्यजगत का स्तर नीचे गिर जाएगा!”

“देखो भाई यह है यथार्थवादी दृष्टिकोण! और इसके चलते साहित्यजगत को और साहित्यकारों को जो बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ हासिल हुई है, वह तो अंधे तक जान सकते हैं।... तुम्हें नहीं पता क्या? देखते नहीं कितने सम्मान मिल रहे हैं, बांटे जा रहे हैं।”

“हां-हां, पता है! पर इस यथार्थवादी दृष्टि से तो आप और आपकी कहानियाँ कोई बहुत ऊँचे स्तर को तो ..... ”

“मेरी कहानियों को अब गोली मारो। लो, निंबू-पानी पियो ..... !”

“अगर आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?”

“यह तो पूछने के बाद कह सकता हूँ। लेकिन आप पूछिये जरूर, क्योंकि बग़ैर पूछे आप रह सकते नहीं ...”

“आपकी कहानियों मे “वो” विषय बहुत होता है, आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रहा हूं?”

“खूब समझ रहा हूं, “उस” विषय को...”

“आप इस विषय पर क्यों लिखने लगे? कहीं प्रसिद्धि का कारण...”

“देखो भाई! यह सही है या गलत, कहा नहीं जा सकता। पर अगर रचनाओं से रचनाकार और पाठकों के बीच समान संवेदना उभरती है तो उस रचना को महत्त्व का माना जाना चाहिये।”

“मेरा मतलब कुछ और था। कई बार ऐसा भी होता है कि लोग-बाग तुरत ख्याति प्राप्त करने के लिए..... ”

“असली मतलब यह है कि यह सत्य नहीं है। मेरे भाई, मैं तुम्हें ग़लत साबित करने के लिये कोई तर्क या वक्तव्य नहीं दूंगा। तुम्हें ग़लत साबित करके तो मेरा घाटा ही होना है। तुम मेरे बारे में लिखोगे तो मेरे शुभचिंतकों में वृद्धि हो या न हो मेरे पाठकों में वृद्धि तो अवश्य ही होगी।”

“लेकिन .....”

“... लेकिन, मेरे दोस्त, मेरी कहानियों में कहानी खोजो ना, अपनी महबूबाओं की तस्वीरें, उसका फ़िगर और उसका पता-ठिकाना क्यों तलाशते रहते हो...!”

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

कविता - उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

कविता

उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

IMG_0130मनोज कुमार

पिछले सप्ताह प्रकृति द्वारा किए गए विध्वंस से आहत जो कविता लिखी थी, उसे प्रस्तुत किया था। यहां पढें। प्रकृति के द्वारा हुए विनाश के बावज़ूद भी जीवन चक्र तो चलता रहता है। आदमी को उठना पड़ता है, विपदाओं से लड़ना पड़ता है। अगर हम अतीत (बीती) को ही याद करते रहेंगे तो वर्तमान में जीना कठिन लगेगा व भविष्‍य असम्‍भव प्रतीत होगा। यदि हम मृत्‍यू से भयभीत होते हैं तो इसका अर्थ है कि हम जीवन का महत्‍व ही नहीं समझते। जन्‍म का अन्‍त है मृत्‍यु और मृत्‍यु का अन्‍त है जन्‍म। समस्याएं न सिर्फ़ आएंगी बल्कि हो सकता है संसार में समस्‍याएं बढ़ेंगी इसलिए हमें समस्‍याओं का सामना करने की अपनी क्षमता को बढ़ाना चाहिए। हमें समस्यायों से निपटने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। यदि हम बहुत अधिक लोगों पर निर्भर रहते हैं तो इससे हमारे निराश होने के अवसर बढ़ जाते हैं। समस्याओं का डटकर मुक़ाबला करना होता है। अगर मुझे अन्‍धेरे से बहुत डर लगा है तो अपनी ऑंखे बन्‍द कर लेना समझदारी नहीं है। हमारी सच्ची परीक्षा तो कठिन परिस्थितियों में ही होती है। परीक्षा की घडी मनुष्‍य को महान बनती है, विजय की घड़ी नहीं। समस्‍यायें चाहे कैसी भी हों परन्‍तु इनसे घबराना नहीं चाहिए, बल्कि इन्‍हें परीक्षा समझ कर पास करना चाहिए। विपत्ति आने पर हिम्‍मत बनाये रखना सबसे अच्‍छा उपाए है। पहाड जैसी विपत्ति को दूर करने के लिए सिर्फ थोडा सा साहस ही पर्याप्‍त है।

उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

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शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

चिठियाना-टिपियाना संवाद-६

चिठियाना-टिपियाना संवाद-६

(अनबन-बनबन)

12012010005 मनोज कुमार

(१) चिठियाना-टिपियाना संवाद
(२) चिठियाना-टिपियाना संवाद : द्वितीय अध्याय
(३) चिठियाना-टिपियाना संवाद : तृतीय अध्यायः
(४)चिठियाना-टिपियाना संवाद : अध्याय – 4

(५) चिठियाना टिपिआना वाद-विवाद .... आंखों देखा हाल .... लाईव फ़्रॉम ब्लॉगियाना मंच -- कमेंटेटर -- छदामी लाल और निर्धन दास

उस दिन छदामी लाल के क़दम मिलन पार्क के अंदर पड़े ही थे कि उसने देखा टिपियाना एक कोने में गुमसुम उदास बैठा है और चिठियाना उसकी तरफ़ बढ रहा है।

चिठियाना-क्या हुआ भाई टिपियाना! आज मिलन पार्क के इस कोने में, गुमसुम, गंभीर, अकेले।

टिपियाना-भाई! आज सच में बिल्कुल अलग-थलग और अकेला महसूस कर रहा हूं।

चिठियाना-क्यों, क्या हुआ?

टिपियाना-हमारे ऊपर गंभीर संकट छा गया है।

चिठियाना-ऐसा क्या हुआ मेरे भाई?

टिपियाना-भाई मत कहो! तुम्हारे मुंह से भाई का संबोधन, अच्छा नहीं लगता।

चिठियाना-लो, कर लो बात! अब मुझसे क्यों ख़फ़ा हो रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

टिपियाना-तुम्हारे मुंह से यह सब सुनना अच्छा नहीं लगता। तुम हमें आस्तीन के सांप समझते हो। गया था गले मिलने, दुआ-सलाम करने और तुम मेरी इस हरकत को यह समझ बैठे कि इसमें मेरा स्वार्थ है। निहितार्थ है।

चिठियाना-ऐसा कब कहा हमने? यह क्यों कर आया तुम्हारे मन में?

टिपियाना-सब कहने से ही होता है क्या? हम तो तुम्हारा हर लिखा, अन-लिखा सब पढते हैं, पढ लेते हैं! पर तुम …. तुम तो हमारी सीधे-सादे ढंग से कही बात का कुछ “और” ही अर्थ लगाते हो….!

चिठियाना-कभी ऐसा कहा हमने?

टिपियाना-….. और क्या? कहा नहीं तो ….. तुम ही बताओ जब तुम ख़ुद के बीमार होने की बात करोगे तो  मैं तो यही कहूंगा ना कि … … ‘तुम्हारे साथ जीवन के हर पल का आनंद मिला है। तुम जल्‍दी स्‍वस्‍थ हो जाओ ताकि हम फिर से खुशियों को महसूस कर पाएं।’ … … या फिर … … ‘तुम्हारा आस-पास न होना बेहद अखर रहा है। जल्‍द ठीक हो जाओ।’

चिठियाना-हां।

टिपियाना-पर मेरे इस कहे के पीछे तुम सोचोगे कि ….‘हां-हां तुम तो यही चाहते हो कि मैं स्वस्थ हो जाऊं ज़ल्द से ज़ल्द ताकि तुम्हारे यहां जाकर तुम्हारा मन बहलाऊं।’

चिठियाना-अरे-रे-रे—!! नहीं! नहीं!! भाई!!! ऐसा क्यों कहूंगा? कभी नहीं।

टिपियाना-मैं समझता नहीं क्या? सब समझता हूं। अब जब तुम स्वस्थ और तरो ताज़ा दिखोगे तो यही तो कहूंगा कि बहुत अच्छा दिख रहे हो, स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट और सही-सलामत!

चिठियाना-हां! इसमें ऐतराज़ वाली कोई बात नहीं है।

टिपियाना-पर मैं जानता हूं कि मन ही मन तुम कह रहे होगे …. ‘हां-हां, बीमारी में मेरे पास आकर दो-चार सेव-फल लाते थे …. अब बच गया! … इसी लिए इतने चहक रहे हो!! खुद कितने प्रफुल्लित लग रहे हो कि मिला छुटकारा व्यर्थ के इस खर्च से!!’

चिठियाना-भाई टिपियाना …..

टिपियाना-भाई मत कहो! जब भी भाई कह कर मैं गले लगता हूं तो तुम इसका भी कोई और ही मतलब निकालते हो जैसे …. जैसे …. ‘आज तो गला दबाने के लिए ही गले पड़ रहा है।’

चिठियाना-यह सरासर आरोप है मुझ पर! ये आज तूने कौन सा मुद्रा अख़्तियार कर लिया है?

टिपियाना-आरोप नहीं, मिस्टर चिठियाना! मेरा अब यही रूप तुम्हें देखने को मिलेगा।

चिठियाना-क्या बकते हो?

टिपियाना-बकता नहीं हूं! तुम्हें आगाह कर रहा हूं। जब तुम बीमार पड़ोगे तो कहूंगा --- ‘अच्छी और तगड़ी बीमारी है! थोड़ी और तगड़ी और अच्छी हो जाए यह बीमारी तो मज़ा आ जाए! शायद फिर उसका ईलाज इंडिया में संभव ही न हो। फिर तो इसी बहाने विदेश यात्रा का तुम्हारा  भी योग बन जाएगा!’

चिठियाना-अरे! शुभ-शुभ बोलो!

टिपियाना-हां-हां, जब तुम तरो-ताज़ा दिखोगे तो शुभ-शुभ ही बोलूंगा … कहूंगा …. ‘इतने दिनों के बाद यह चमक तुम्हारे चेहरे पर अच्छी नहीं लगती। आंखों को खटक रही है। इसकी तेज को कम करो। फिर से बीमार पड़ो। बीमार थे तो कितना ऐश-ओ-आराम था। कितने सारे लोग पूछने आते थे। अब स्वस्थ हो गए हो, तो  कोई पूछने भी नहीं आएगा। फिर इधर-उधर घूमते-भटकते फिरोगे।

चिठियाना-भाई तुम्हारा आज सिर फिर गया है।

टिपियाना-फिरा नहीं है, अब होश आया है। हमारा क्या है, हम तो फिर भी कुछ न कुछ टिपिया लेंगे। आपस में ही बतिया लेंगे। तुम अपना सोचो, दुकान सजा कर बैठे रहोगे, हम सामने से गुज़र जाएंगे। न दुआ, न सलाम, फिर …. …

चिठियाना-बहुत हुआ! अब बस करो …!
टिपियाना-हां-हां! बस ही करता हूं….
चिठियाना-हुंह!
टिपियाना-हुंह!!
चिठियाना-….. …..
टिपियाना-…. ……
चिठियाना-????
टिपियाना-????
चिठियाना-!, @, #, $, \, ~
टिपियाना-!, @, #, $, \, ~
चिठियाना-%, ^,-*, (, ), /,
टिपियाना-%, ^,-*, (, ), /,
चिठियाना-<, >
टिपियाना-<, >

अब छदामी लाल से रहा नहीं गया। सामने आया और बोला, “यार! तुम दोनों मिलजुल कर रहो। वरना हमारे ब्लॉगियाना के आंगन में सिर्फ़ संकेत ही रह जाएंगे, कोई संवाद नहीं रहेगा …..”

(इतिश्री ब्लोगर-खंडे नवरात्रोपलक्ष्ये चिठियाना-टिपियाना अनबन-बनबन वार्ता नाम षष्ठो अध्यायः !!)

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2010

आंच-39 (समीक्षा) पर श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविता क्या जग का उद्धार न होगा!

आंच-39 (समीक्षा) पर

श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ की कविता

क्या जग का उद्धार न होगा!

IMG_0545 मनोज कुमार

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मेरा फोटोसाधना वैद जी एक संवेदनशील, भावुक और न्यायप्रिय महिला हैं। अपने स्तर पर अपने आस पास के लोगों के जीवन में खुशियाँ जोड़ने की यथासम्भव कोशिश में जुटे रहना उन्हें अच्छा लगता है। “उन्मना” उनका एक ब्लॉग है। पिछले दिनों इस ब्लॉग पर पहुंचा तो वहां पोस्ट की गई एक ऐसी कविता पाया जिस पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव दीखता था। वैसे तो किसी कविता को वाद में बांधना उचित नहीं, पर इस कविता की विशेषता को रेखांकित करने के लिए इसे इस श्रेणी की कविता माना जा सकता है।

इस ब्लॉग पर साधना जी अपनी माँ, श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’, की रचनाओं को हम तक पहुँचा रहीं हैं! कहती हैं,

“मां की संघर्षमय सृजनशीलता, अद्भुत लगन तथा अदम्य इच्छाशक्ति को हमारी यह सविनय श्रद्धांजलि है!”

जिन विषम परिस्थितियों और परिवेश में इन कविताओं का सृजन हुआ होगा उसके लिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह कार्य किसी असाधारण व्यक्तित्व के हाथों ही सम्पन्न हुआ होगा!

इस ब्लॉग की कविताएं पढते हुए बरबस यह मन में आता है कि जिन विषम परिस्थितियों और परिवेश में इन कविताओं का सृजन हुआ होगा उसके लिये यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह कार्य किसी असाधारण व्यक्तित्व के हाथों ही सम्पन्न हुआ होगा!

इस ब्लॉग पर प्रस्तुत कविताओं का अवलोकन एक समृद्ध और जीवंत साहित्यकार की लगभग चौथे दशक से लेकर आठवें/नौवें दशक तक की काव्य-यात्रा से रू-ब-रू होना है। जहाँ कविताओं के बीज विचारों की ऊष्मा से युक्त हैं, वहीं रचनात्मक सफलताओं की संपूर्ति काव्य कला की शर्तों पर ही होती है। वह भी अपने समय-समाज की परिवर्तन-कामी चेतना के साथ।

श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना \श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ का जन्म 14 अगस्त 1917 को उदयपुर के सम्मानित कायस्थ परिवार में हुआ ! मात्र 6 वर्ष की अल्पायु में ही क्रूर नियति ने उनके सिर से पिता का ममता भरा संरक्षण छीन लिया और यहीं से उनके संघर्षों का जो सिलसिला आरम्भ हुआ वह आजीवन अनवरत रूप से चलता ही रहा !
उन्होंने विदुषी, साहित्यलंकार, साहित्यरत्न तथा फिर बी. ए., एम. ए. तथा एल. एल. बी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं! पढ़ने का शौक इतना कि होमियोपैथिक चिकित्सा में भी डॉक्टर की उपाधि प्राप्त कर ली! लेखन का शौक उन्हें बचपन से ही था! इलाहाबाद में अल्पावधि के लिये प्रयाग महिला विद्यापीठ में अध्ययन के दौरान श्रीमती महादेवी वर्मा तथा श्री हरिवंश राय बच्चन व अन्य मूर्धन्य साहित्यकारों के सान्निध्य में प्रोत्साहन पा साहित्य सृजन का यह अंकुर और पुष्पित-पल्लवित होता रहा! इन्दौर भोपाल रेडियो स्टेशन से अक्सर उनकी कवितायें व कहानियां प्रसारित और पुरस्कृत होती रहती थीं!

4 नवम्बर 1986 को उनका निधन हुआ। यह ब्लॉग और इस पर मां की कविताओं की प्रस्तुति साधना जी और उनकी बहन आशा जी की माँ की सृजनशीलता के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि है!

आज की आंच के लिए हमने चयन किया है श्रीमती ‘किरण’ की कविता * क्या जग का उद्धार न होगा * ।

कोई ज़रूरी नहीं कि कठिन समय को रूपायित करने के लिए कविता अपने विन्यास और बोधगम्यता में कठिन हो जाए।

इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर जाते हैं। कोई ज़रूरी नहीं कि कठिन समय को रूपायित करने के लिए कविता अपने विन्यास और बोधगम्यता में कठिन हो जाए। कम-से-कम किरण जी की कविता इस तर्क को नकारती है। किरण जी की कविता * क्या जग का उद्धार न होगा * के सरोकार केवल फूल, पत्ते, कलि, उपवन, तितली, भंवरों से ही नहीं, कहीं न कहीं पूरे भूमंडल से जुड़े हैं। कवयित्री `किरण’ सरल और सहज मुहावरे में पिरो कर कठिन समय को कविता में साधती हैं।

ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?

कोई भी रचनाकार समय, समाज और परिवेश की उपेक्षा नहीं कर सकता है, क्योंकि जहाँ वह रहता है, जहाँ से वह पलकर बड़ा होता है, मनुष्य बनता है, उनके समस्त क्रियाकलाप, ऊहापोह, घात-प्रतिघात, संघर्ष आदि उनके मस्तिष्क में गुंफित होते हैं। अतः रचनाकार की संघर्षशीलता, जुझारूपन, संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों के प्रति चेतना और दिशाबोध, उसे यहीं से मिलते हैं। डॉ. `किरण’ भी अपने समय, समाज और परिवेश की उपज है। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रीय-फलक पर हताशा है, निराशा है, भूख है, गरीबी है, शोषण है, अशिक्षा है, टूटन है और मोहभंग भी है।

मुरझाये फूलों का यौवन

आज धूल में तड़प रहा है,

काँटों के संग रह जीवन में

कितना उसने कष्ट सहा है,

किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ?

उनकी लेखनी में हम आग और शीतलता आक्रोश और सरलता, निर्भीकता तथा स्पष्टता, भावुकता तथा कठोरता सभी भाव पायेंगे! उनका रुझान समाजपयोगी साहित्य के सृजन की ओर है। कारुणिक, त्रासद, शक्तिहीनों के विकल्प को दर्शाने वाली रचना होते हुए भी यह कविता नये आशावाद की सूचक है और यह आशावाद आने वाली पीढ़ी के जरिये व्यक्त होता है।

जहाँ कविताओं के बीज विचारों की ऊष्मा से युक्त हैं, वहीं रचनात्मक सफलताओं की संपूर्ति काव्य कला की शर्तों पर ही होती है। वह भी अपने समय-समाज की परिवर्तन-कामी चेतना के साथ।

ओ माली तेरी बगिया में

आ वसंत कब मुस्कायेगा,

कब कोकिल आग्रह के स्वर में

स्वागत गीत यहाँ गायेगा,

क्या तितली भौरों के जीवन में सुख का संचार न होगा ?

शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम है। `किरण’ जी एक समर्थ सर्जक हैं। कविता की पंक्तियां कभी सादगी के अंदाज में ताना मारती है....... तो कभी अनुरोध और विनती करती प्रतीत होती हैं तो कभी सांत्‍वना के स्‍वर सुनाई पड़ते हैं।

मुरझाये फूलों का यौवन

आज धूल में तड़प रहा है,

काँटों के संग रह जीवन में

कितना उसने कष्ट सहा है,

किन्तु देवता की प्रतिमा पर चढ़ने का अधिकार न होगा ?

बिल्‍कुल अपठनीय और गद्यमय होते जा रहे काव्‍य परिदृश्‍य पर ..... `किरण’ जी की यह कविता इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है कि वे कविता की मूलभूत विशेषताओं को प्रयोग के नाम पर छोड़ नहीं देतीं। बेहद संश्लिष्‍ट इस कविता में उपस्थित लयात्‍मकता इसे दीर्घ जीवन प्रदान करती है। कविता पढ़ने पर लू में शीतल छाया की सुखद अनुभूति मिलती है। कविता काफी अर्थपूर्ण है, और ज्‍यादा समकालीन भी।

उन्मादिनी हवा ने आकर

सूखे पत्तों को झकझोरा,

मर्मर कर धरिणी पर छाये

सुखद वृक्ष का आश्रय छोड़ा,

कुम्हलाई कलियों के उर में क्या जीवन का प्यार न होगा ?

इनकी काव्‍यभाषा सहज है। यह कविता तरल संवेदनाओं से रची गई है, जो दिल से पढे जाने की अपेक्षा रखती है। भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्‍दों का खूबसूरत चयन, जिनमें सटीक शब्दो का प्राचुर्य है, आकर्षक है।

ओ माली तेरी बगिया में

आ वसंत कब मुस्कायेगा,

कब कोकिल आग्रह के स्वर में

स्वागत गीत यहाँ गायेगा,

तितली भौरों के जीवन में क्या सुख का संचार न होगा ?

कविता महज कवयित्री का बयान भर नहीं है। इसमें कवयित्री की भावनाएं सीधे-साधे सच्‍चे शब्‍दों में बेहद ईमानदारी से अभिव्‍यक्‍त हुई हैं। कविता इतनी लयात्मक है कि इसे बार-बार पढने का मन करता है।

इस कविता में कवयित्री ने प्रकृति का सहारा लेकर अपनी बात कही है। अगर यह कहें कि उन्होंने प्रकृति का मानवीकरण किया है तो अनुचित नहीं होगा। इस रचना में प्रकृति के बहाने जीवन के मर्म को समझाने की कोशिश की गई है।

जैसे ‘अज्ञेय’ का -

“दुख हृदय को मांझता है

ज़्यादा रगड़ने से

बर्तन का मुलम्मा

छूट जाता है।”

- वैसे ही इस कविता को पढने से भौतिकता की चमक-दमक का मुलम्मा छूट जाता है। लोग नैसर्गिक स्थिति में आ जाते हैं और मन संवेदनशील हो जाता है। जब संवेदना का जल हृदय में डोलता है तो वाणी अवाक हो जाती है। कविता सचमुच विभोर करने वाली है।

कविता को पढते वक़्त इसपर ‘बच्चन’ की और उनकी कविता की छाप दिखाई देती है।

“इस पार प्रिये मधु है तुम हो

उस पार न जाने क्या होगा?”

कुछ लोगों को इसमें शैलीगत कमज़ोरियां दिख सकती है, पर मुझे नहीं दिखती क्योंकि फॉर्म और कंटेंट में बिखराव बिल्कुल नहीं है।

मैं यह नहीं कहता कि यह कविता एकदम ताज़ी है, और आज के ताजा प्रसंगों पर आधारित है, न ही यह कि इन्हें प्रतिमान मानकर आज की हिन्दी कविता के संबंध में कोई निर्णायक बात कही जाय। हाँ, इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस कविता के माध्यम से कवयित्री ने कुछ ऐसी समस्याओं की ओर हमारा ध्यान खींचा है, जो आज से 20-25 वर्ष पहले भी थीं, आज भी हैं और तब तक रहेंगी जब तक कि सामंती एवं पूँजीवादी आधारों पर टिकी व्यवस्था खत्म नहीं हो जाती।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

फ़ुरसत में … बूट पॉलिश!

shoe polish फ़ुरसत में …

बूट पॉलिश!

IMG_0130              मनोज कुमार

आज फ़ुरसत में मैं ... अपनी ज़िन्दगी के वसंत से स्मृति की यात्रा शुरु करना चाहता हूं। ज़िन्दगी के वसंत की शुरुआत लंगट सिंह कॉलेज के प्रांगण से होती है।

बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज में दाखिल हुआ था। फ़ुरसत में आज वो दिन याद आ गए। इसके पहले ज़िला स्कूल में पढता था। उस स्कूल का यदि हिन्दी में नाम दूं तो यूं बनेगा, बहु-उद्देशीय उच्चतर माध्यमिक बाल विद्यालय (Multipurpose Higher Secondary boys school) । चूंकि इस तरह का सरकारी स्कूल पूरे ज़िले में एक ही होता था, तो उसे ज़िला स्कूल भी कहा जाता था। अब स्कूल के सुक्खाड़ से लंगट सिंह महाविद्यालय के रमन-चमन में हम पहुंचे थे तो मुझे भी कुछ-कुछ होने लगा था।

नहीं समझे? समझाता हूं। आपने स्कूल के नाम पर ग़ौर नहीं फ़रमाया, ‘छात्र विद्यालय’! जी! सिर्फ़ छात्र ...! छात्राओं का विद्यालय तो बगल के कैम्पस में था, चैपमैन बालिका उच्च विद्यालय। ... और उनकी क्लास हमारे से आधा घंटा पहले लगती थी, ख़त्म हो जाती थी आधा घंटा पहले ही। यानी कि उनके दर्शन के भी लाले पड़ते थे। ऊपर से दूसरी मुसीबत यह थी कि ब्रह्मपुरा से स्कूल की दूरी साढे चार किलोमीटर की यात्रा पैदल करनी होती थी। लड़कों के साथ यही मुसीबत थी। लड़कियां तो रिक्शा पकड़ती थीं, तीन-चार जने कुच्चम-कुच्चा करके बैठतीं और घर आकर चार-चार आने के शेयर में काम चला लेतीं। हमारा तो, घर से सीधे स्कूल आना और शाम को खत्म होने पर सीधे घर भागना, यही नित्य की रूटिन थी।

दर्शन कभी कभार हो भी जाता था, तो हमारी एक और मुसीबत थी। मेरी बड़ी बहन उस बलिका उच्च विद्यालय में पढती थी। अब उस ज़माने में दीदी के स्कूल की सारी बालिकाएं ‘दीदी’ ही तो होती थी!

ख़ैर यह मुसीबत एल.एस. कॉलेज में नहीं थी, क्योंकि एक तो दीदी, जिसे हम दिद्दा कहते थे, हमारे प्रथम प्रधान मंत्री अपनी बहन को दिद्दा कह कह संबोधित करते थे, यह कहीं पढा था, तो हमने भी अपनी बड़ी बहन को दिद्दा बुलाना शुरु कर दिया। उन दिनों हम अपने देश के महापुरुषों की बातों का अनुकरण कर गर्व की अनुभूति किया करते थे। आज ..... छोड़िए!

.... तो मैं यह कह रहा था कि दिद्दा का महाविद्यालय की पढाई के लिए दाखिला हुआ था महंत दर्शन दास महिला महाविद्यालय में और हम आए लंगट सिंह कॉलेज। और यहां रमन-चमन था! मतलब हरी-नीली-पीली-लाल, रंग-बिरंगी ड्रेस में ... सजी-धजी बालाएं। पहले दिन तो हम इतना शर्माए-घबराए कि क्लास में प्रोफ़ेसर के आने के पहले तक क्लास के बाहर ही रहे।

.... तो बात उन्हीं रमन-चमन वाले दिनों की है! अपना पहला-पहला ‘ब्रेकअप’ हुआ था। जी, ... ये शब्द तो इक्कीसवीं शताब्दी का है। हम तो बीसवीं शताब्दी के उन दिनों में उन्नीसवीं सदी वाला प्रेम कर बैठे थे। जब ‘ब्रेकअप’ हो ही गया था तो आहें भरने के दिन भी आ गए थे। उस ज़माने में लड़कियों को सर झुका कर चलना सिखाया जाता था। और वे बेचारी इतना आदेश मानती थीं कि सर ऐसे झुका के चलती थीं कि उन्हें उनके ही पैर का नाखून देखना होता था। उन दिनों यदि किसी लड़के को देख लिया तो बस समझिए कि शहर का बने-न-बने, मुहल्ले का समाचार तो बन ही जाता था, कि फ़लां ने फ़लां को देखा। ... और ख़ुदा-न-ख़ास्ता उसे देख कर हंस-मुस्कुरा दी, ... तो ख़ुदा ख़ैर करे, गॉसिप शुरु! फ़िर तो ऐसी ज़िल्लत होती थी, मानों कोई पाप कर लिया हो।

इस महौल के पारंपरिक वातावरण और ज़िला स्कूल के सुक्खाड़ के बाद एल.एस.कॉलेज की हरियाली में एक दिन ऐसा ‘हवा’ का झोंका आया कि मेरा तो पूरा का पूरा आशियाना ही उड़ गया। सफेद वस्त्रों में सजी, दुधिया रंग की उस तरुणी के गुज़रते ही विज्ञान संकाय के सुरम्य वातावरण में सुगंधों से भरी सुहानी हवा तैर गई! नाम-धाम मालूम होते-होते, हमारे ज़माने में चार-छह महीने तो लग ही जाते थे। क्लास में रॉल नम्बर से ही पहचान मिलती थी। हमारे क्लास की टू एट्टी एट तो आज भी हमें चेहरे के साथ याद है, पर नाम .... पता नहीं!

... तो ‘हवा’ जिस तेज़ी से आई, उसी तेज़ी से सर्र से चली भी गई! पर उसके इस आने में, अनजाने में, उससे इश्क़ हो गया, .... और हमारे सकुचाने, शर्माने के इश्किया हाव-भाव को बिना नोटिस किए, बिना दृष्टिपात किए सट्‌ से उसके चले जाने में, ‘ब्रेकअप’!!!

दिल के हज़ारों टुकड़ों को अपने आस-पास फैलाए प्रैक्टिकल लैब में उदास-सा, देवदास-सा, बैठा था। ग़मगीन चेहरा, ... मुकेश द्वारा गाए एक गाने “ज़िन्दा हूं इस तरह कि हमें ज़िन्दगी नहीं” के नायक के चेहरे से भी ज़्यादा दर्दनाक!! साथियो ने पहले पूछा, मेरा जवाब न पाकर चिढाया “– क्या हुआ? .... अबे ! कुछ तो बोल!!” पर देवदासी सूरत से आवाज़ कहीं इत्ती ज़ल्दी निकलती है!! कुछेक ने बार-बार आग्रह किया कि मैं उन्हें मन के भेद बताऊं। तो मुंह से जो निकला, वह जन्तुविज्ञान (Zoology) के छात्र होने के नाते ठीक ही बिम्ब था, आगे की बात के पहले वही सुन लीजिए ...

 

“मैं लटका रहा उनके कानों में रिंग (Ring) की तरह

उन्होंने डस लिया हनी बी (honey bee) के स्टिंग (sting) की तरह!”

इसे ग़ालिबाना शे’र का तमगा देते हुए मेरे यार-दोस्तों ने मेरे दर्द को सुने-समझे बग़ैर जो वाह-वाही की कि मैं पूरे कैम्पस में कवि-शायर घोषित कर दिया गया।

कॉलेज के ‘ब्रेकअप’ का असर घर तक पहुंच गया था। घर में नई-नई आई भाभी ने मेरा हाल-ए-दिल ताड़ लिया। बोलीं, “कुछ तो है जो मेरे देवर जी का चेहरा उतरा हुआ है!” अब किसी से तो अपना ग़म बताना था। बता दिया। अनुभवी भाभी बोलीं, “ऐसे रूखे-सूखे कॉलेज जाइएगा तो थोड़े न कोई घास डालेगी! थोड़ा बन-संवर कर जाइए।” बस भाभी के उकसाने से उम्मीद की किरण फूटी, ... कपड़ों की रविवासरीय साफ़-सफ़ाई का कर्यक्रम हुआ, ... टीनोपाल (नील) डाला गया, ... मांड़ के घोल से उसका कलफ़ बना, ... और आग वाली इस्तरी से उसके तह बैठाए गए।

बोम्बे सैलून, हमारे ब्रह्मपुरा चौक पर ही था! उसमें दाढी बनवाई गई। ... और नाई को सख़्त निर्देश दिया गया कि फ़िटकिरी ज़रा ठीक से रगड़े, ऊपरे-ऊपरे नहीं, ताकि चेहरे पर चमक आए! जब घर से सोमवार को कॉलेज के लिए निकलने लगा तो भाभी ने अपने मायके से मिले अफ़ग़ान स्नो और हिमालय पाउडर भी दिए लगाने को। उन दिनों बिहार में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त फ़ेयर एण्ड लवली थी वह। अब उन दिनों लोरियाल, गार्नियर या शहनाज़ का ज़माना थोड़े ही था। पर, वाह क्या गमकौआ पाउडर था भौजी का। स्नो-पाउडर लगाकर हम टनाटन कॉलेज पहुंचे।

कॉलेज में जिस किसी दोस्त के पास जाते, ऐसा नांक-भौं सिकोड़ता, मानों हम कोई अन्य ग्रह से आए प्राणी हों। एक ने तो कह ही दिया, “क्या मौगी की तरह आज स्नो-पाउडर लगा कर आए हो!” प्रथमे ग्रासे मच्छिका पातः! ऐसी दुर्गति!! पहले पीरियड के बाद कॉलेज के लॉन में इधर से उधर भटकते दिन बिताया।

हम ज़िन्दगी की क्लास में तुक मिला पाएं हों या न हों, कविताओं के तुक मिलाने लगे।

कुछ तो जानकी वल्लभ शास्त्री के शहर के होने का प्रभाव, कुछ हमारे उपकुलपति डॉ. श्याम नंदन किशोर, जो हमारी हिन्दी की क्लास भी लेने आते थे, के व्याखानों का कमाल और कुछ उसी क्लास में उनकी, उन दिनों कवि के रूप में उभर रही, पुत्री अनामिका को सुनने-पढने का असर, --- कि हम ज़िन्दगी की क्लास में तुक मिला पाएं हों या न हों, कविताओं के तुक मिलाने लगे। ... जब तुक मिले तो दोस्तों को सुनाने भी लगे। यार-दोस्त, कुछ भी हो, यार-दोस्त ही होते हैं! ऐसी-ऐसी दाद देनी शुरु किए कि उन दिनों हम तो ख़ुद को काका हाथरसी से कम थोड़े ही समझते थे। पर दिक्क़्त यह आई कि काका की तरह मनोज तो ठीक ठाक है, पर हाथरसी की तरह के बिना किसी उपनाम के कोई कवि या शायर थोड़े ही कहलाता है? अब मुज़फ़्फ़रपुरी तो पहले से ही थे उस क्षेत्र में। तो समस्या यह आई कि कुछ नया सोचना था। विचार मंथन का दौर शुरु हुआ और जो कुछ यार-दोस्तों ने सुझाए मुझे पसंद नहीं आया, और जो मैंने ख़ुद चुना अपने लिए, मेरी मित्र मंडली ने रिजेक्ट कर दिया।

एक दिन झटके में कुछ ऐसा वाक़या हुआ कि एक उपनाम सूझ गया मुझे। चूंकि हमारे स्वभाव में ही था झट से किसी के प्रेमपाश में बंध जाना और नसीब में था फट से उस बंधन का टूट जाना। ... तो बस मुंह लटका कर बैठे रहना मेरी नियति हो गई थी। ऐसे में एक दिन यार दोस्तों की फ़ौज़ ने कैंटिन के कोने में हमें धर लिया और लगे रगड़ने, “क्या मनहूस सी सूरत बनाकर बैठे हो?”

इस नामाकरण में ‘म’ का अनुप्रास तो है ही, और यही तो पचास फ़ीसदी कवि या शायर के रूप में मुझे स्थापित किए दे रहा है।

उनके मुंह से यह सुनकर मुझे लगा कि इससे बेहतर और क्या हो सकता है मेरे लिए उपनाम, तख़ल्लुस! आख़िर जिस व्यक्ति का साल के ५२ हफ़्तों में ५२ बार दिल टूटता हो, उसके लिए इससे बेहतर उपाधि कुछ हो ही नहीं सकती! तो उस दिन से अपना नाम रखलिया मनोज “मनहूस”। इस नामाकरण की विशेषता भी मन ही मन गढ ली, एक तो इसमें ‘म’ का अनुप्रास तो है ही, और यही तो पचास फ़ीसदी कवि या शायर के रूप में मुझे स्थापित किए दे रहा है। दूसरी विशेषता यह कि इसको रखने वाला उन दिनों क्या आज तक मुझे कोई दूसरा नहीं मिला!!

इस नाम से जो पहली रचना मेरी आई वह ‘हवा’ को ही समर्पित थी। दो लाइन देखिए –

“प्रेयसी तेरा रूप सलोना

अपनी इस भोंडी सूरत पे रोज़ मुझे आता है रोना!”

उन दिनों स्थानीय अख़बार था एक। कुछ झकाझक समाचार टाइप का। उसमें छप भी गई यह रचना। इसके छपते ही मैं स्वघोषित स्थानीय कवि से शहरी कवि हो गया। जब शहरी कवि हो गया तो करने निकला शहर भ्रमण। वरना आपको तो मालूम है, हम थे बिना सायकल वाले, और पदयात्रा करने वाला यह फ़कीर, मानों मुज़फ़्फ़रपुर के कूप का मंडूक हों। जब शहर घूम-घाम लिया तो काका हाथरसी की रचना के कुछ अंश की नकल की और कुछ अंश सीधे चुरा लिए और एक कविता बनाई – कुछ अंश देखिए

घाट अखारा गए तो, अखारा मिला न एक,

देखे मुर्दे घाट पर जलते हुए अनेक।

पहुंचा जिस बाज़ार में पूरी हुई न आस,

मूड बिगड़ कर हो गया मन का सत्यानास।

मन का सत्यानास पहुंचा जब मैं गोला,

मूड बनाना चाहा तो मिला न भांग का गोला।

हम तो मोती झील जाकर के पछताए,

मोती की झील के बदले कुत्ते मोती पाए।

कुत्ते मोती पाए भागा रखकर सिर पर पैर,

धर्मशाला पहुंचा तो देखा नहीं धर्म की खैर।

धर्म-कर्म के नाम पर पैसे जाते लूटे,

नयाटोला पहुंच कर घर सब पाते टूटे।

बिना सायकल के मैं चार साल स्कूल के, चार साल महाविद्यालय के तथा दो साल विश्‍वविद्यालय के झेलता रहा था। उस ज़माने में सायकल से स्कूल जाना चभरलेट (Chevrolet) से जाने के समान होता था। पूरे ज़िला स्कूल में एक ही ऐसा खुशनसीब था, और सूतापट्टी के एक कपड़ा व्यवसायी का वह सुपुत्र जिस दिन नई रेल्ले सायकल से स्कूल पहुंचा तो यार-दोस्तों ने स्वागत में कहा था, “की रे! रविया! आज एम्पाला से!! तनी ठाट देख लाटसाहेब के!!!”

अब अपने पिताजी थे रेलवे में मामूली लिपिक। खुद तो १९३० मॉडेल खटारा सायकल से दफ़्तर जाते थे, तो हमारे लिए एम्पाला कहां से जुगाड़ते!

कवित्व मेरा चल पड़ा और हम तो छाने लगे। कारण जो भी हो ये नए उपनाम का कमाल था इससे मैं इन्कार करना नहीं चाहता। पर ऐसा नहीं था कि हमारे नाम के आगे उपनाम शुरु से ही नहीं था। उन दिनों देश के प्रसिद्ध रजनीतिक घराने के एक उभरते हुए नेता के आह्वान पर समाज से जात-पात के भेद-भाव हटाने के उद्देश्य से अपने नाम के आगे का उपनाम, जो जाति सूचक भी था हटा दिया था। अब इसका हमारे समाज से इस प्रथा को हटाने में कितना योगदान हुआ कह नहीं सकता, पर एक घटना आपसे शेयर करने का प्रसंग तो आ ही गया है। मंडल की घोषणा के साथ जो जातीय विद्वेष चारो तरफ़ फैला था, उसका असर कॉलेज के कैम्पस तक भी पहुंच गया था। परीक्षा का एडमिट कार्ड लेने जब कॉलेज पहुंचा तो सारे वातावरण में तनाव का-सा माहौल लगा। कारण मेरी समझ से परे था। ज्योंही काउण्टर से एडमिट कार्ड लेकर बाहर आया कि छात्रों का एक समूह आया और उसे छीनने लगा। मैंने प्रतिरोध किया तो स्वर आया, “मार ... साले ... को! वही है...!” मैं कुछ समझूं, तब तक मेरा एडमिट कार्ड किसी के हाथ में था। उसने पढा नाम मेरा और कोई जातीय उपनाम न पाकर बोला, “अपने ही ग्रूप का है, ... छोड़ दे...!”

भगवान को लाख-लाख धन्यवाद देता आगे बढा। प्रशासन भवन के बहार आने पर कॉलेज की गेट की तरफ़ जाते हुए बीच में बेनीपुरी कॉलेज पड़ता है। उसके सामने एक और ग्रूप खड़ा था। अब उनकी जांच का केन्द्र बिन्दु मैं और मेरा एडमिट कार्ड बना। मेरे नाम के आगे जातीय उपनाम न होने के कारण शंका की सूई मेरी ओर घूमी। ... एक लपका मेरी तरफ़, शोर उठा, “मार ... स्साले को ...!” तभी किसी की नज़र पिता वाले कॉलम पर पड़ी और पिता के नाम के आगे के उपनाम ने उनमें से एक को सद्बुद्धि दी। वह चिल्लाया, “अरे! अपना है!! छोड़ दे!!” ... और मुझे घूरकर बोला, “साला बोल नहीं सकता था कि तू (....) जात का है?”

इस तरह बचते-बचाते आगे भागा। तभी पीछे शोर हुआ। घूम कर देखा तो पाता हूं कि एक छात्र उन दो समूहों में से एक की चपेट में आ चुका है। उसे चार-छह छात्रों ने जकड़ रखा था। फिर न सिर्फ़ उसकी ठुकाई की गई, बल्कि एक ने उसके हाथ को सड़क पर रख कर ईंट से उंगलियों पर दे मारा! फिर अपनी बहदुरी प्रदर्शित करते हुए बोला, “जा.... साले ... जा, अब दे परीक्षा!”

इतने सालों के (चार दशक) बाद एक बार फिर से मुझे लोगों को जात क्या है मेरी, बताना पड़ेगा? सुना है जनगणना करने वाले आएंगे, और पूछेंगे कि मेरी जात क्या है? अब इस देश के नागरिकों में गिना जाना है तो बताना तो पड़ेगा ही! मैं तो मन बना चुका हूं कि कहूंगा, “मोची!!”

“देख लो ! ... बाबू देख लो... हो सके तो चेहरा देख लो !!! ... बीते हुए कल का और आने वाले कल का भी ... चेहरा!!! ......”

जी, हा! मोची! ... जो लोगों के फटे जूते सिलता है। उनपर पैबंद लगाता है, सोल चढाता है, ताकि इंसान आराम से चल सके। साथ ही उनके गंदे हो चुके, मैले हो चुके, जूते चमकाता है, ... चमक आ जाने के बाद उनसे कहता है, “देखिए साहब! ऐसा चमका दिया है कि आप इसमें अपना चेहरा देख लें!”

मैं उस पल की कल्पना में अक्सर खो जाता हूं। ... मेरे सामने मेरे घर के सामने वाला फुटपाथ होता है। उस फुटपाथ पर मैं बैठा हूं और मेरे हाथ में जूता है, जिसे मैं चमका चुका हूं, ब्रश और काली पॉलिश से! .... जूते में चमक आ गई है, और मेरे सामने उस जूते का स्वामी है, जो मेरी जात पूछ रहा है .... उसे मैं कहता हूं, “देख लो ! ... बाबू देख लो... हो सके तो चेहरा देख लो !!! ... बीते हुए कल का और आने वाले कल का भी ... चेहरा!!! ......”

मेरे चेहरे पर तो इस बूट पर पॉलिश करते हुए कुछ कालिख चढ ही गई है, पहले से ही चेहरा मेरा भौंडा था, क्या फ़र्क़ पड़ता है इस जूते के रास्ते कुछ और कालिख मल दी गई तो....!

.... मुझे अब लग रहा है जिन्न बोतल से फिर निकल रहा है....! मैं उससे कहता हूं .....

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चित्र आभार गूगल सर्च

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

कोटि-कोटि नमन बापू!

imageimage जनवरी १९४७ में गांधी जी नोआखाली में थे। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे।

सात दिनों में उन्होंने ११६ मील की यात्रा की। इस दौरान उन्हों ने ४७ गावों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावन जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा।

गांधी जी उन दिनों बंगाल में भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है।

गांधी जी एक बार जब कलकता में थे तो उनकी मुलाक़ात अंग्रेज़ चार्ल्स फ़्रीअर एंड्रूज़ ने गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर से कराई थी। एक था फ़कीर, संन्यासी तो दूसरा चिंतक, कवि। पर दोनों में इतना आंतरिक साम्य था कि गुरुदेव ने गांधी में महात्मा के दर्शन किए और उन्हें सर्वप्रथम “महात्मा” कहकर संबोधित किया।

१९४६ के अक्तूबर अंत तक गांधी जी तीसरी श्रेणी की रेलगाड़ी यात्रा के द्वारा कोलकाता पहुंचे। उद्देश्य उनका था नोआखाली के दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करना। बंगाल का यह डेल्टा प्रदेश है। इस क्षेत्र के लोग अत्यंत ग़रीब हैं। न सड़कें, न यातायात का साधन था। गांधी जी गांव-गांव घूमे। हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने एकत्र होते रहे। गांधी जी, भाईचारे, निर्मल-मन, शत्रु को क्षमा का संदेश सुनाते थे। उनकी यह यात्रा समाप्त होते-होते, नोआखाली और तिपेरा ज़िलों में समुदायों के आपसी संबंध काफ़ी सुधरे। गांधी जी कहा करते थे,

“यदि मैं हिन्दू भाईयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा।”

image जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब न केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी।

बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधी जी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया।

गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।

नोआखाली में गांधी जी भड़क उठी साम्प्रदायिकता की आग बुझाने गए थे। ७७ वर्षीय गांधी जी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, “जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।”

गांधी जी सुहरावर्दी के निवेदन पर नोआखाली गए थे।

मदुरै में एक सभा में गांधी जी खादी पहनने की अपील कर रहे थे, तो कुछ लोगों ने शिकायत की कि खादी बहुत मंहगी है। इस पर गांधी जी ने एक सुझाव दिया कि कम कपड़े पहनिए। गांधी जी ने ख़ुद उस दिन से कुरता और धोती पहनना छोड़ दिया। लंगोटी पहनने लगे और जीवन भर नंगे फ़कीर की तरह रहे। ऐसे थे गांधी जी। कथनी और करनी में फ़र्क़ नहीं।

गांधी जी ने सामाजिक बदलाव के कार्य को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर उसमें अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष भी जोड़ दिया। स्वावलंबन और ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को स्थापित करके उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने पर बल दिया। अपनी ज़िन्दगी पर अपने नियंत्रण की बात ने जो धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव के कार्य का उद्देश्य बन गया, सामाजिक कार्य को एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया। गांधी जी ने समाज की जड़ता को भंग कर लोगों को सोचने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया और समाज में बदलाव के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचार किया। सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में इन कार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

भारत में गांधी जी को राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ एक पैगम्बर और पिता का स्थान दिया जाता है। उनके नेतृत्व में देश आज़ाद हुआ। वो राजनेता के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वो एक नए भारत के निर्माण के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। जात-पात, छुआ-छूत, साप्रदायिक भेद-भाव को दूर करने के लिए सारी उम्र लड़ते रहे। साम्प्रदायिकता की आग ठंडी करने में उन्हें शहादत प्राप्त हुई। साम्प्रदायिक दंगों पर क़ाबू पाने के लिए गांधी जी अकेले जीवन के अंतीम क्षणों तक प्रयत्नशील रहे।

29 जनवरी 1948 को गांधीजी ने अपनी पौत्री मनु से कहा था,

“यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।”

और यह कैसा संयोग था कि 30 जनवरी 1948 के दिन उस महात्मा को प्रार्थना सभा में जाते हुए मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हुई।

ठीक ही कहा था लॉर्ड माउंट बेटन ने,

“सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया।”

 

 

गांधी जी और नोबेल शांति पुरस्कार

आज तक गांधी जी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। प्रश्‍न उठना स्वाभाविक है कि क्या गांधी जी की शांतिपूर्ण तकनीकों में कोई कमी थी? क्या परोक्ष या प्रत्यक्ष तरीक़े से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें इस सम्मान से वंचित रखा? या फिर यह पुरस्कार भी यूरोपीय रंग-भेद नीतियों और पश्‍चिमी साम्राज्यवादी योजनाओं का टोकन मात्र है?

१४ मार्च १९३४ में “क्रिश्‍चियन संचुरी” नामक एक पाश्‍चात्य पत्रिका के संपादकीय में यह बात बड़े सशक्त शब्दों में कही गई थी कि “अगर गांधी नोबेल पुरस्कार के सबसे योग्य प्रत्याशी नहीं होते तो ऐसे पुरस्कार के औचित्य पर विचार होना चाहिए।“

एक बार एक ब्रिटिश महिला अगाथा हैरिसन ने बिहार के भूकम्पग्रस्त इलाक़ों के दौरे पर गांधी जी को उस संपादकीय की प्रति दिखा कर जब उनकी प्रतिक्रिया जाननी तो गांधी जी ने बड़ी संज़ीदगी से काग़ज़ के एक टुकड़े पर लिख दिया था,

“क्या आपने कभी ऐसे सच्चे सेवाव्रती का नाम सुना है जो सेवा के लिए नहीं बल्कि अनुदान के लिए सेवा कार्य करता है।“ image

१९३७ में गांधी जी पहली बार नोबेल शांति पुरस्कार के प्रत्याशी के रूप में विश्‍व के सामने आए। १९३८ और १९३९ में भी गांधी को मनोनीत किया गया। पर पुरस्कार नहीं दिया गया। क्या उस समय मैदान में और बेहतर प्रत्याशी थे? ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिटेन की साम्राज्यवादी और रंगभेदपूर्ण नीति का ही परिणाम रहा होगा कि गांधी जी को इस सम्मान से वंचित रखा गया।

फिर १९४४ तक कोई नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। १९४४ में यह पुरस्कार रेड क्रॉस को दिया गया। १९४७ के लिए गांधी जी का नाम एक बार फिर मनोनीत किया गया। लेकिन इस बार भी इस पुरस्कार से उन्हें वंचित रखा गया।

१९४८ में अंतिम बार गांधी जी को नोबेल पुरस्कार के प्रत्याशी के रूप में मनोनीत किया गया। पर उनकी मौत मनोनीत किए जाने की तिथि के पहले ही हो चुकी थी इसलिए उन्हें “क़ानूनन”नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जा सकता था।

कुछ कवियो के विचार

महा कवि पंत ने कहा था

तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !

तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,

आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।

पं. सोहन लाल द्विवेदी की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं जिन्होंने सारे विश्‍व को एक नयी दिशा दी।

चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,

पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।

“बापू के प्रति” अपने उद्गार प्रकट करते हुए कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है :-

“तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवलimage

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन।

सुख भोग खोजने आते सब,

आये तुम करने सत्य खोज,

जग की मिट्टी के पुतले जन,

तुम आत्मा के, मन के मनोज”।

उन जैसे महामानव के बारे में जितना भी कहा जाए कम है। रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां यहां स्मरण हो रहें हैं :-

“तू कालोदधि का महास्तम्भ, आत्मा के नभ का तुंग-केतु,

वापू! तू मर्त्य, अमर्त्य, स्वर्ग, पृथ्वी, भू, नभ का महासेतु।

तेरा विराट यह रूप कल्पना पट पर नहीं समाता है,

जितना कुछ कहूं मगर कहने को शेष बहुत रह जाता है।”

शनिवार, 18 सितंबर 2010

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस- कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें और दो क्षणिकाएं

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस


कुछ तू-तू मैं-मैं, कुछ मन की बातें

             और दो क्षणिकाएं


15012010007मनोज कुमार

फ़ुरसत में … हिन्दी दिवस के अवसर पर लिखा हुआ बहुत कुछ पढने, देखने और सुनने को मिला। कुछ अखबारों के शीर्षक देखिए

“हिंदी अपने घर में प्रवासिनी”,  “हाशिए पर हिंदी”, “हिदी को राष्‍ट्रभाषा बनाने में राजभाषा विभाग का टालू रवैया”,  “हिंदी के प्रति कब खत्‍म होगी लापरवाही”, आदि, आदि।

इस दिन जब ये सब पढता हूं तो एक शे’र बरबस आ जाता है ज़ुबान पर

कोई हद ही नहीं शायद मुहब्बत के फसाने की

सुनाता जा रहा है जिसको जितना याद आता है।

इन दिनों  मैंने अखबार पढना ही बंद कर दिया है, क्योंकि

है पता हमको वहां पर कुछ नया होगा नहीं

हाथ में हर चीज़ होगी आइना होगा नहीं।

अखबारों और अन्य कई जगह इन सूर्ख़ियों को देख लगता है जब हम घर से बाहर निकलते हैं तो हमारे हाथ में भाला बरछी, लाठी सोंटा सब होता है, पर आइना नहीं होता। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि मुझे यह गाना बहुत अच्छा लगता है,

ये न पूछे मिला क्‍या है हमको

हम ये पूछें किया क्‍या है अर्पण

हर कोई दुनिया को बदलना चाहता है, लेकिन खुद को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता। सरकारी कार्यालयों में जो प्रयोग होता है वह राजभाषा है। और १४ सितंबर को जो मनाया जाता है वह राजभाषा हिंदी दिवस है भाषा हिंदी दिवस नहीं। राजभाषा नीति, प्रेरणा, प्रोत्‍साहन और सद्भावना पर आधारित है। यह माना जाता है कि जब तक एक भी हिंदीतर भाषी राज्‍य असहमत होगा तब तक हिंदी राष्‍ट्रभाषा नहीं बन सकती। अशोक चक्रधर के शब्दों में कहें तो हिंदी तो जगन्नाथी रथ है, इसे हम सब मिलकर खीचें।

इक्‍कीसवीं सदी की व्‍यावसायिकता जब हिन्‍दी को केवल शास्‍त्रीय भाषा कह कर इसकी उपयोगिता पर प्रश्‍नचिह्न लगाने लगी तब इस समर्थ भाषा ने न केवल अपने अस्तित्‍व की रक्षा की, वरण इस घोर व्‍यावसायिक युग में संचार की तमाम प्रतिस्‍पर्धाओं को लाँघ अपनी गरिमामयी उपस्थिति भी दर्ज कराई। जनसंचार के सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा और टेलीविजन ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में वैश्‍विक क्रांति दी है। आज हर कोई हिंदी बोल समझ लेता है, लिख पढ़ भले न पाए।

विज्ञापन की दुनियां में हिंदी का बोलबाला है। विज्ञापन की दुनियां का हिंदी के बगैर काम नहीं चलता। विज्ञापन गुरु यह जान और मान चुके हैं कि माल अगर बेचना है तो उन्हें हिंदी में ही बाज़ार में उतरना पड़ेगा। हां ये जो हिंदी परोसी जा रही है उसे कुछ लोग “हिंगलिश” की संज्ञा देते हैं। परन्तु यह सर्वग्राह्य हिंदी है।

आज बाज़ारबाद शबाब पर है। उत्‍पादक तरह-तरह से उपभोक्‍ताओं को लुभाने का प्रयास करते हैं। ऐसे में विज्ञापन की भूमिका महत्‍वपूर्ण हो जाती है। दिवा-रात्री समाचार चैनल, एफ.एम. रेडियो और विज्ञापन एजेंसियों की बाढ़ में बिना लाग लपेट बेवाक और संक्षिप्‍त शब्‍दों में पूरी रचनात्‍मकता वाली हिन्दी का ही बाज़ार है। इंटरनेट पर भी हिंदी का अभूतपूर्व विकास हो रहा है। इंटरनेट पर हिंदी की कई वेबसाइटें हैं। हिंदी के कई अख़बार नेट पर उपलब्ध हैं। कई साहित्यिक पत्रिकाएं नेट पर पढ़ी जा सकती हैं। हिंदी में ब्लॉग लेखक आज अच्छी रचनाएं दे रहें हैं। भारत में इलेक्ट्रॉनिक जनसंचार माध्यमों का प्रयोग दिनोंदिन बढ़ रहा है। यह देश की संपर्क भाषा के रूप में हिंदी के विकास का स्पष्ट संकेत देता है।

यह भी कहा जाता है कि बाज़ारवाद के असर में हिंदी भाषा के बदलते रूप से लोग आतंकित हैं। कुछ यह कहते मिल जाएंगे कि “हमें बाज़ार की हिंदी से नहीं बाज़ारू हिंदी से परहेज़ है।”  जिस बाज़ारू भाषा को बाज़ारवाद से ज़्यादा परहेज़ की चीज़ कहा जा रहा है वह वास्तव में कोई भाषा रूप ही नहीं है। कम से कम आज के मास कल्चर और मास मीडिया के जमाने में। आज अभिजात्य वर्ग की भाषा और आम आदमी और बाज़ारू भाषा का अंतर मिटा है। क्योंकि आम आदमी की गाली-गलौज वाली भाषा भी उसके अंतरतम की अभिव्यक्ति करने वाली यथार्थ भाषा मानी जाती है। उसके लिए साहित्य और मीडिया दोनों में जगह है, ब्लॉग पर भी। आज सुसंस्कृत होने की पहचान जनजीवन में आम इंसान के रूप में होने से मिलती है। दबे-कुचलों की जुबान बनने से मिलती है, गंवारू और बाज़ारू होने से मिलती है। यह हिन्दी उनकी ही भाषा में पान-ठेले वालों की भी बात करती है, और यह पान-ठेले वालों से भी बात करती है, और उनके दुख-दर्द को समझती और समझाती भी है। साथ ही उनमें नवचेतना जागृत करने का सतत प्रयास करती है। अत: यह आम आदमी की हिंदी है, बाज़ारू है तो क्या हुआ। बाज़ार में जो चलता है वही बिकता है और जो बिकता है वही चलता भी है।

प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही संपर्कभाषा का रूप ले सकती है। साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। सामान्य बोलचाल में प्रचलित अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, उर्दू से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों के हिंदी में प्रयोग से सही अर्थों में यह जनभाषा बन सकेगी और तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाईयों के बीच की दूरी पट सकेगी। हिन्दी की विकास यात्रा में इसे और अधिक प्रयोजनमूलक यानी फंक्शनल बनाया जाए। प्रयोजनमूलक हिन्दी जीवन और समाज की ज़रूरतों से जुड़ी एक जीवन्त, सशक्त और विकासशील हिन्दी भाषा है। आज ऐसी ही प्रयोजनमूलक हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों को सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए।

हिंदी लाहे लाहे पूरे देश में पसर रही है । कह कर न मैं हिंदी को कमजोर कर रहा हूँ न उसका दायरा सीमित । अगर ट्रेन लेट है कहकर बात बनती है तो उसे विलम्‍ब क्यों कर दूँ । अगर ट्रेन स्‍टेशन में ढुक रही है से बात ज्‍यादा समझ में आए तो आगमन के इंतजार में क्‍यों बैठूँ ।

और अब क्षणिकाएं

(1)

दुर्वासा न बनो

मुझे नहीं मरना किसी बहेलिए के हाथों

तुम्‍हारी जुदाई ही काफी है

मुझे हरपल मारने के लिए।

(2)

पीपल !
उग आना तुम
मेरी कब्र पर
हवा से कांपते
तुम्हारे पत्ते
दिलाते रहेंगे
एहसास मुझे
कि उसकी सांसे
तिर रही है
यहीं कहीं..
इतना ही काफी है
मेरे जीने के लिए ..

शनिवार, 11 सितंबर 2010

फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा “अक्षरों के साये”

पिछले दिनों फ़ुरसत से फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा “अक्षरों के साये” पढा। इसके प्रकाशन के बीस वर्ष पूर्व उन्होंने “रसीदी टिकट” (1977 ) लिखा था। यह आत्मकथा अध्यात्म से जुड़े धरातल पर उनके समग्र जीवन का विवरण प्रस्तुत करती है। उनके चिंतन का कमाल हमारे सामने एक नितांत नवीन दुनिया के भीतर झांककर देखने की उनकी अदम्य इच्छा के रूप में आता है।

“दुनिया में रिश्ता एक ही होता है – तड़प का, विरह की हिचकी का, और शनाई का, जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है – यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है…”-

हिंदी तथा पंजाबी लेखन में स्पष्टवादिता और विभाजन के दर्द को एक नए मुकाम पर ले जाने वाली अमृता प्रीतम ने अपने साहस के बल पर समकालीन महिला साहित्यकारों के बीच अलग जगह बनाई। अमृता जी ने ऐसे समय में लेखनी में स्पष्टवादिता दिखाई, जब महिलाओं के लिए समाज के हर क्षेत्र में खुलापन एक तरह से वर्जित था। एक बार जब दूरदर्शन वालों ने उनके साहिर और इमरोज़ से रिश्ते के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा,

“दुनिया में रिश्ता एक ही होता है – तड़प का, विरह की हिचकी का, और शहनाई का, जो विरह की हिचकी में भी सुनाई देती है – यही रिश्ता साहिर से भी था, इमरोज़ से भी है…”-

अमृता जी का साहस और बेबाकी उन्‍हें अन्‍य महिला लेखिकाओं से अलग पहचान दिलाई। जिस जमाने में महिलाओं में बेबाकी कम थी, उस समय उन्‍होंने स्‍पष्‍टवादिता दिखाई। यह किसी आश्‍चर्य से कम नहीं था।

1963 की बात है। विज्ञान भवन में एक सेमिनार था। उसमें लेखिका ममता कालिया ने उनसे पूछा कि आपकी कहानियों में ये इंदरजीत कौन है? इसपर अमृता जी ने एक दुबले पतले लड़के को उनके आगे खड़ा करते हुए कहा, “इंदरजीत ये है। मेरा इमरोज़।” उनके इस खुले तौर पर इमरोज को मेरा बताने पर वो चकित रह गई। क्‍योंकि उस समय इतना खुलापन नहीं था। इसी तरह से उनका बेबाकी से स्वीकार करना कि यह साहिर की मुहब्बत थी, जब लिखा …

फिर तुम्हें याद किया, हमने आग को चूम लिया

इश्क ज़हर का प्याला सही, मैंने एक घूंट फिर से मांग लिया

और इमरोज़ की सूरत में – अहसास की इन्तहा देखिए, एक दीवनगी का आलम ही था,

कलम ने आज गीतों का काफ़िया तोड़ दिया

मेरा इश्क यह किस मुकाम पर आया है।

उठो! अपनी गागर से-पानी की कटोरी दे दो

मैं राहों के हादसे, उस पानी से धो लूंगी-

अमृता जी की रचनाएं बनावटी नहीं होती थी। यह उनकी लेखिनी को खास बनाता है। अमृता जी जो भी लिखती थी, उसमें आम भाषा की सरलता झलकती थी। यही उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाता था।

“अक्षर-जो कागजों पर उतरते रहे, वे सबके सामने हैं-इसलिए मुझे और कुछ नहीं कहना। लगता है, मैं सारी ज़िंदगी जो भी सोचती रही, लिखती रही, वह सब देवताओं को जगाने का प्रयत्न था, उन देवताओं को जो इन्सान के भीतर सो गए हैं....”

विभाजन के बाद अमृता लाहौर से भारत आई थी। लेकिन उन्‍हें दोनों देशों में अपनी रचनाओं के लिए ख्‍याति मिली।

1956 में उन्‍हें साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार पाने वाली वो पहली महिला थी।

1969 में पदमश्री और पद्म विभूषण से नवाजा गया। 1982 में उन्‍हें कागज ते कैनवास के लिए साहित्‍य का सर्वोच्‍च पुरस्‍कार, ज्ञानपीठ मिला।

1986 से 1992 तक वो राज्‍यसभा की सदस्‍य रहीं। 2003 में उन्‍हें पाकिस्‍तान की पंजाबी अकादमी ने भी पुरस्‍कृत किया। इस पर उन्‍होंने कहा था , बड़े दिनों बाद मेरे मायके को मेरी याद आई।

हालाकि अमृता जी का उपन्‍यास पिंजर भी विभाजन के दर्द को अलग तरह से दिखाता है, पर उन्‍हें सबसे ज्‍यादा उनकी कविता “अज अक्‍खां बारिस शाह नू” के लिए जाना जाता है। इसमें उन्‍होंने विभाजन के दर्द को मार्मिक तौर पर पेश किया है।

ज़मीन पर लहू बहने लगा-

इतना- कि कब्रें चूने लगीं

और मुहब्बत की शहज़ादियां

मज़ारों में रोने लगीं…

सभी कैदों में नज़र आते हैं

हुस्न और इश्क को चुराने वाले

और वारिस कहां से लाएं

हीर की दास्तान गाने वाले…

तुम्हीं से कहती हूं-वारिस!

उठो! कब्र में से बोलो

और इश्क की कहानी का

कोई नया वरक खोलो…

उनकी आत्‍मकथा “रसीदी टिकट” उनकी कालजई रचनाओं में से एक है। “रसीदी टिकट” में दिए जीवन के ब्योरे में यथार्थ की अनुगुंज अधिक सुनाई पड़ती है और सबकुछ अपनी मुट्ठी में बंद करने की ऊर्जा भी सक्रिय दिखती है। लेकिन उनकी इस पुस्तक “अक्षरों के साये” तक आते-आते उनकी परिपक्वता चरमोत्कर्ष पर है। सबसे नायाब चीज़ उन्हें प्रेम का मोती मिला, उसकी चमक आध्यात्मिक चमक के रूप में आलोकित करने का प्रयास किया है। कहती हैं,

“मुहब्बत का अग्नि-कण कवि को मिलता है, पर यह अग्नि-कण जब कविता बन जाता है, अपनी किस्मत का प्याला, उसे भी अपने होठों से पीना होता है….”

उन्होंने इस अत्मकथा में मानवता की स्थापना पर अपनी बेबाक टिप्पणी लिखी है। साम्प्रदायिकता को भी दरकिनार कर दिया है, और एक मुक्कमल लेखिका के रूप में हमारे सामने प्रकट होती हैं।

कोई अपने हाथ में पत्थर उठाता है

तो पहला ज़ख्म इंसान को नहीं,

इंसानियत को लगता है।

और सड़क पर जो पहली लाश गिरती है,

वह किसी इंसान की नहीं होती, इंसानियत की होती है…

उनका मानना है मज़हब के नाम पर जितना कत्लो-खून हुआ वह हमारे देश की स्वंतंत्रता का बहुत बड़ा उलाहना है …

जैसे इश्क की ज़बान पर एक छाला उभर आया हो

जैसे सभ्यता की कलाई से एक चूड़ी टूट गई हो

इसी तरह इस पुस्तक में कलम के कर्म के बारे मे बताते हुए कहती हैं कि इसके अनेक रूप होता है:

वह बचकाने शौक में से निकले तो जोहड़ का पानी हो जाता है;

अगर सिर्फ़ पैसे की कामना में से निकले तो नकली माल हो जाता है;

अगर सिर्फ़ शोहरत की लालसा में से निकले तो कला का कलंक हो जाता है;

अगर बीमार मन में से निकले तो ज़हरीली आबोहवा हो जाता है;

अगर किसी सरकार की ख़ुशामद में से निकले तो जाली सिक्का हो जाता है।

वो एक मात्र कवयित्री हैं जो तुलिका से कविता को चित्रित करती हैं और उसके रंगों का चयन देख कर दांतों तले उंगली चली जाती है। बानगी देखिए ज़रा, लग रहा है मानों सारे अक्षर चांद पर से गिर रहे हैं।

मेरी खामोशी की गली से

अक्षरों के साए गुजरते रहे

चांद की मटकी से जब-

कतरे से कुछ गिरते रहे

रात की दहलीज़ पर-

तारे दुआ करते रहे…

अज्ञेय रचित “शेखर एक जीवनी” उपन्यास की पंक्ति है “दर्द से भी बड़ा विश्‍वास है।” …. यही विश्‍वास अमृता प्रीतम के लेखन में दिखता है और यही बल उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाता है।

कभी तो कोई इन दीवारों से पूछे-

कि कैसे इबादत गुनाह बन गई थी