सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 19. सूफ़ी रहस्यवाद-1

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


19. सूफ़ी रहस्यवाद-1

“और सूर्य चन्द्रमा एवं नक्षत्र सब उसी के आदेशपालक हैं। प्रत्येक वस्तु अल्लाह की सिरजी हुई है तथा आदेश भी अल्लाह ही का है, वह वरदान देने वाला ईश्वर है जो अनेक जगतों का पालनहार है।” (क़ुरआन : 7/54)

यही ग़ैब की बातें हैं, जिन्हें (हे नबी!) हम आपकी ओर प्रकाशना (वह़्यी) कर रहे हैं। इससे पूर्व न तो आप इन्हें जानते थे और न आपकी जाति। अतः आप सहन करें। वास्तव में, अच्छा परिणाम आज्ञाकारियों के लिए है। (क़ुरआन : 11/49)

रहस्यवाद सभी धर्मों के मूल में निहित है। रहस्यवाद की अवधारणा अंतिम सत्य के साथ आत्मा के साक्षात्कार की चाहत से निकली है। इस विचार को अक्सर 'शाश्वत दर्शन' कहा जाता है, जिसके अनुसार दुनिया के सभी धर्म अलग-अलग रास्तों से होते हुए एक ही परम सत्य (ईश्वर, ब्रह्म या चेतना) तक पहुँचते हैं। रहस्यवादी पारंपरिक धार्मिक क्रिया-कलापों जैसे प्रार्थना, उपवास और तीर्थयात्रा से ही संतुष्ट नहीं होते। उनके लिए बिना रहस्यवादी अनुभूति के धर्म अर्थहीन है। उन्हें गहरी और विस्तृत अनुभूति की पिपासा होती है। रहस्यवाद मूल रूप से शब्दों, कर्मकांडों और ग्रंथों से परे जाकर उस परम सत्ता का सीधा, व्यक्तिगत और आंतरिक अनुभव करने का मार्ग है। धर्म जहाँ एक सामाजिक और बाहरी ढांचा प्रदान करता है, वहीं रहस्यवाद उसकी आंतरिक आत्मा है। जब कोई साधक अपने धर्म की बाहरी परतों (नाम, रूप, नियम) को छोड़ देता है, तो वह उसी गहरे आध्यात्मिक सत्य पर पहुँचता है जहाँ सभी धर्म आपस में मिल जाते हैं। इसलिए, रहस्यवाद को सभी धर्मों का साझा धागा माना जा सकता है। सूफी संत बाहरी नियमों (शरीयत) से आगे बढ़कर तरीकत (आंतरिक मार्ग) को अपनाते हैं। वे संगीत, नृत्य (जैसे दरवेशों का घूमना) और प्रेम के माध्यम से अल्लाह से सीधे मिलन (फना) की बात करते हैं।

माना जाता है कि सूफ़ीवाद ईराक़ के बसरा नगर में जन्मा। बसरा में दसवीं सदी में कुछ तेजस्वी लोगों का एक दल था, जिसे इख़्वानुस्सफ़ा (पवित्र बिरादरी) कहा जाता था। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य धर्म और दर्शन, तथा विज्ञान और आस्था के बीच समन्वय स्थापित करना था। इस बिरादरी का मानना था कि इंसानी आत्मा ज्ञान और दर्शन के माध्यम से ही पवित्र (शुद्ध) हो सकती है और मोक्ष प्राप्त कर सकती है। रूढ़िवादी धार्मिक विरोध से बचने के लिए इसके सदस्यों ने हमेशा अपनी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी। यद्यपि यह एक गैर-सांप्रदायिक बौद्धिक आंदोलन था, अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि इस संगठन का गहरा झुकाव रहस्यवादी सूफीमत की ओर था, जो धार्मिक ग्रंथों के बाहरी अर्थ के बजाय उनके आंतरिक या गुप्त (बातिन) अर्थ पर अधिक जोर देते हैं। इख़्वानुस्सफ़ा ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'रसाइल' में एक आदर्श मनुष्य की कल्पना एक वैश्विक और बहु-सांस्कृतिक दृष्टिकोण से की है। उनके अनुसार, एक परिपूर्ण या आदर्श मनुष्य किसी एक संस्कृति, देश या धर्म की सीमाओं में बंधा नहीं होता, बल्कि वह दुनिया की सभी सभ्यताओं और आध्यात्मिक परंपराओं के बेहतरीन गुणों का एक अद्भुत मिश्रण होता है।

एक आदर्श मनुष्य की चर्चा करते हुए इस बिरादरी ने लिखा है, 

“एक आदर्श आदमी वह है, जिसमें इस तरह की उत्तम बुद्धि और विवेक हो जैसे कि वह ईरानी मूल का हो, अरब आस्था का हो, धर्म में सीधी राह की ओर प्रेरित हनफ़ी (इस्लामी धर्मशास्त्र की सबसे तार्किक और उदार शाखा के मानने वाले) हो, शिष्टाचार में इराक़ी हो, परम्परा में यहूदी हो, सदाचार में ईसाई हो, समर्पण में सीरियाई हो, ज्ञान में यूनानी हो, दृष्टि में भारतीय हो, ज़िन्दगी जीने के ढंग में रहस्यवादी (सूफ़ी) हो।”

यह वक्तव्य इस्लामी संस्कृति को स्पष्ट करता है। उसके उदार प्रवृत्ति को उजागर करता है। विविधता में एकता की कल्पना को साकार करता है। दुनिया भर की अच्छी-अच्छी विचार-धाराओं को अपनाकर सूफ़ियों ने विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाया। सूफ़ीमत जिसका उदय पैगम्बर मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ माना जाता है, उसके विकास में इस उदार मानसिक माहौल का बहुत बड़ा योगदान था। प्रारंभिक सूफ़ी संन्यासी थे। पैग़म्बर मुहम्मद सल्ल. के कई साथियों ने उनके जीवन काल में ही संसार का त्याग कर दिया और सीधा-सादा पवित्र जीवन जीने लगे थे। उन्होंने स्वेच्छा से दारिद्र्य को अपना लिया था। वैराग्य सूफ़ीमत में एक अनिवार्य तत्व के रूप में अपना लिया गया था। सूफ़ियों ने तौबा (पश्चाताप) और तवक्कुल (ईश्वर में आस्था) पर अधिक बल दिया। वे ईश्वर की उत्कृष्टता की धारणा से काफ़ी प्रभावित थे। ऐसे कई पुण्यात्मा थे जिन्हें सत्य से साक्षात्कार की लगन लगी। ब्रह्म से व्यक्तिगत और सीधे अनुभूति की उनकी आकांक्षा थी। आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए वे रहस्यवाद की तरफ़ मुड़े। निश्चित रूप से सूफ़ी मत का स्रोत पैगम्बर मुहम्मद स. हैं। उनकी प्रकाशना के दो स्तर हैं, एक क़ुरआन, जिसे इल्मे-ए-सकीना (किताबी ज्ञान) कहा गया है, और यह सबके लिए है। दूसरा इल्म-ए-सिना (गुह्य ज्ञान) जो सूफ़ियों के लिए है। यह वह ज्ञान है जो किताबों (सफीना) को पढ़ने से नहीं, बल्कि एक गुरु (मुर्शिद या पीर) के दिल से सीधे शिष्य के दिल (सीना-दर-सीना) में स्थानांतरित होता है। इख़्वानुस्सफ़ा का मानना था कि आत्मा को मुक्त करने के लिए केवल बाहरी विज्ञान ही काफी नहीं है। आदर्श मनुष्य वही है जो अपनी आत्मा को पवित्र करके इस आंतरिक 'गुह्य ज्ञान' (इल्म-ए-सीना) को जाग्रत कर ले। इस ज्ञान के अनुसार, ईश्वर या परम सत्य को बुद्धि के तर्कों से सिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे केवल हृदय की शुद्धता से महसूस किया जा सकता है। सूफी संत बुल्ले शाह का एक प्रसिद्ध दोहा इस अंतर को स्पष्ट करता है:

"पढ़ पढ़ इल्म हज़ार किताबें,

कदे अपने आप नूं पढ़िया ई नहीं।"

अर्थात—हजारों किताबी ज्ञान पढ़ लिए, पर अपने भीतर के गुह्य ज्ञान को कभी नहीं जाना। इल्मे सीना वह आध्यात्मिक रोशनी या अंतर्ज्ञान है जो मनुष्य के भीतर के अहंकार को मिटाकर उसे सीधे परम चेतना (ईश्वर) से जोड़ती है। यह ज्ञान 'जानने' का नहीं, बल्कि 'हो जाने' का नाम है।

19.1 ख़िज़्रवाद

आगे बढ़ने के पहले सूफ़ियों के ख़िज़्रवाद के सिद्धांत पर एक नज़र डाल लें। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और रहस्यमयी अवधारणा है, जो सीधे तौर पर 'इल्म-ए-लदुन्नी' (ईश्वर द्वारा सीधे दिया गया गुह्य ज्ञान) और आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन से जुड़ी है। यह सिद्धांत पूरी तरह से क़ुरान के सूरह अल-कहफ़ में वर्णित पैगंबर मूसा और हज़रत ख़िज़्र की यात्रा पर आधारित है। इस कथा में, पैगंबर मूसा (जो शरीयत या बाहरी नियमों के प्रतीक हैं) हज़रत ख़िज़्र (जो बातिन या छिपे हुए ईश्वरीय रहस्यों के प्रतीक हैं) के साथ यात्रा करते हैं। ख़िज़्र कुछ ऐसे काम करते हैं जो इंसानी बुद्धि और कानून (ज़ाहिर) के हिसाब से गलत लगते हैं (जैसे एक नाव को तोड़ना, एक बच्चे की जान लेना, एक ढहती हुई दीवार को मुफ्त में ठीक करना)। लेकिन अंत में वे साबित करते हैं कि उनके इन कार्यों के पीछे एक गहरा, अदृश्य ईश्वरीय न्याय (बातिन) छिपा था। सिद्धांत का निचोड़ यह है कि इंसानी तर्कशास्त्र या बाहरी नियम हमेशा परम सत्य को नहीं समझ सकते। सच्चा ज्ञान (इल्मे सीना/लदुन्नी) तर्कों से परे होता है।

यह सिद्धांत उनके बाह्य ज्ञान (इल्म) और आंतरिक ज्ञान (मारिफ़) का प्रतीक है। धर्मशास्त्री (उलमा) दोनों के बीच कोई अंतर नहीं मानते हैं, जबकि सूफ़ियों का मानना है कि एक को दूसरे को लेकर हमें भ्रमित नहीं होना चाहिए। इल्म साधारण ज्ञान है। परमात्मा विषयक सूफ़ियों के रहस्यमय ज्ञान जिसे मारिफ़ कहते हैं, आध्यात्मिक और सच्चा ज्ञान है। जो हम आँखों से देखते हैं, वह सांसारिक ज्ञान है, इल्म है। इल्म की प्राप्ति मनुष्य की चेष्टा और शिक्षक की सहायता से होती है। जो ह्रदय जान पाता है वह सच्चा ज्ञान है। आंतरिक ज्ञान ईश्वर के विशेष ज्ञान का एक अंग है और इसे ईश्वर अपने विशेष बंदों को देता है। परमात्मा का ज्ञान जिसे ‘इल्म-ए-मारिफ़त’ कहा जाता है, के द्वारा परमात्मा को उसके पैग़म्बर और संत जान पाते हैं। यह सम्पूर्ण रूप से परमात्मा की इच्छा और अनुग्रह पर निर्भर करता है। यह उसे ही मिलता है जो इसके योग्य होते है। इन्हें ‘आरिफ़’ (ज्ञानी) कहते है। जिन्हें आंतरिक ज्ञान प्राप्त होता है वे वली (उत्तराधिकारी) कहलाते हैं। इनके प्रतिनिधि हज़रत ख़िज़्र अलैहिस्सलाम हैं। खिज्र शब्द का अर्थ समुद्री रंग का हरापन होता है। कहा जाता है कि वे जहां बैठते थे वहाँ का रंग हरा हो जाता था। हरापन सूफ़ियों के लिए आत्मा के पुनर्जीवन और आंतरिक ताज़गी का प्रतीक है। वाह्य ज्ञान के प्रतिनिधि हज़रत मूसा अलैहि. हैं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल. में ये दोनों ज्ञान (बाह्य और आंतरिक) एकत्र हो गए।

जो वाह्य ज्ञान के धारक हैं उन्हें आंतरिक ज्ञान के लिए वली की ओर आकृष्ट होना पड़ता है। उन्हें अपने धर्मगुरु पर कभी कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए, उसे पैगम्बर मूसा की तरह पूर्ण धैर्य रखना चाहिए। भले ही गुरु की कोई बात या क्रिया उसकी बुद्धि को समझ न आए, ईश्वर तक पहुंचने के लिए धर्मगुरु का अनुपालन अनिवार्य है। उसे गुरु के आंतरिक ज्ञान पर भरोसा करना चाहिए, क्योंकि गुरु की दृष्टि 'ज़ाहिर' (दिखने वाले) से आगे 'बातिन' (अदृश्य भविष्य) को देख रही होती है। कुछ सूफ़ी संप्रदाय का मानना है कि ईश्वर अपने विशेष बंदों को सभी आंतरिक और वाह्य ज्ञान प्रदान करता है। सूफ़ियों का ख़िज़्रवाद यह स्थापित करता है कि आध्यात्मिक मार्ग पर एक ऐसा क्षण आता है जहाँ इंसानी बुद्धि और किताबें काम नहीं आतीं। वहाँ केवल वही ईश्वरीय अंतर्ज्ञान काम आता है जो समय और स्थान की सीमाओं से परे है, और हज़रत ख़िज़्र इसी सार्वभौमिक, शाश्वत और अदृश्य ईश्वरीय मार्गदर्शन के जीवंत प्रतीक हैं।

हज़रत खिज्र एक बहुत बड़े संत थे। उन्हें परमात्मा विषयक ज्ञान का पता था। वे परमात्मा के गुप्त नाम को जानने वाले थे। हज़रत खिज्र में सूफ़ियों को बहुत विश्वास है। परमात्मा के अनुग्रह प्राप्त संतों को परमात्मा के गुप्त नाम से परिचय कराना उनका काम था। ख़िज़्रवाद में हज़रत ख़िज़्र को 'अमर' माना जाता है। सूफ़ियों के अनुसार, उन्होंने 'आबे हयात' (अमरता प्रदान करने वाले जल) का पान किया था। इसलिए ऐसा माना जाता है कि संसार के अंत होने तक वे जीवित रहेंगे। यहाँ 'आबे हयात' कोई भौतिक पानी नहीं है, बल्कि यह ईश्वरीय चेतना और अमर आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है।

उनका नाम हज़रत अबुल अब्बास मलकान था, वे हज़रत मल्क़ान अलैहि. के पुत्र थे। हज़रत ख़िज़्र नूह अलैहिस्सलाम की आने वाली पीढ़ियों (वंशजों) में से थे। बताया जाता है कि हज़रत नूह़ अलैहिस्सलाम प्रथम मनुष्य हज़रत आदम अलैहिस्स्लाम के दसवें वंश में थे। उनके कुछ पहले तक लोग इस्लाम पर चले आ रहे थे। फिर अपने धर्म से फिर गये और अपने पुनीत पूर्वजों की मुर्तियाँ बना कर पूजने लगे। तब अल्लाह ने हज़रत नूह़ अलैहि. को भेजा। किन्तु कुछ के सिवा किसी ने उन की बात नहीं मानी। अन्ततः सब डुबो दिये गये। फिर हज़रत नूह़ अलैहि. के तीन पुत्रों से मानव वंश चला। इसलिये उन को दूसरा आदम भी कहा जाता है। हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के इतिहास में प्रसिद्ध बेटों के नाम साम, हाम, याफ़िस और याम/कनआन (जो सैलाब में डूब गए थे) मिलते हैं।

आम तौर पर सूफ़ी मत में किसी भौतिक गुरु (पीर या मुर्शिद) का होना अनिवार्य माना जाता है। लेकिन ख़िज़्रवाद के तहत एक विशेष अपवाद है जिसे 'उवेसी' सिलसिला कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, यदि कोई साधक सच्चा है और उसे कोई भौतिक गुरु नहीं मिल पा रहा है, तो हज़रत ख़िज़्र स्वयं अदृश्य रूप से प्रकट होकर उसे दीक्षा देते हैं और उसका मार्गदर्शन करते हैं। महान सूफ़ी दार्शनिक इब्न अरबी ने स्वयं दावा किया था कि उन्हें आध्यात्मिक वस्त्र (ख़िरक़ा) सीधे हज़रत ख़िज़्र से प्राप्त हुआ था।

परमात्मा को बिना परमात्मा की सहायता के नहीं जाना जा सकता। प्रसिद्ध सूफी विद्वान ज़ुन्नून मिस्री का एक बहुत विख्यात कथन है: "मैंने परमात्मा को परमात्मा के ही माध्यम से जाना, और यदि परमात्मा न होते, तो मैं परमात्मा को कभी न जान पाता।" इसलिए ‘मारिफ़’ परमात्मा के द्वारा ही मिलता है। सूफी मानते हैं कि साधक (मुरीद) चाहे जितनी भी कठिन साधना, उपवास, या ध्यान (ज़िक्र) कर ले, वह अपने बलबूते परम सत्य को नहीं पा सकता‌। इंसानी प्रयास केवल हृदय के दर्पण को साफ़ करने के लिए हैं‌। उस साफ़ दर्पण में परमात्मा का जो प्रकाश चमकेगा, वह पूरी तरह से ईश्वरीय कृपा (फ़ज़्ल) पर निर्भर करता है‌। जब तक परमात्मा स्वयं को प्रकट नहीं करता, मनुष्य उसे नहीं जान सकता‌। सूफ़ी मारिफ़ को प्रकाश मानते हैं। इसके द्वारा ह्रदय आलोकित हो उठता है। जिसने ज्योतिस्वरूप परमात्मा से प्रकाश पाया है वह परमात्मा के एकत्व को देखने में समर्थ होता है। यह ज्ञान परमात्मा की ज्योति से ही ज्योतिवाला है इसलिए अंत में यह परमात्मा की ज्योति में ही जाकर मिल जाता है। इसलिए सूफ़ी प्रार्थना करता है, “हे परमात्मा, मेरे ह्रदय में प्रकाश दो, और मेरी कब्र में प्रकाश दो। मेरे श्रवन, मेरी दृष्टि और मेरे शरीर में प्रकाश दो। मेरे अन्तर की ज्योति को तीव्र कर दो। मेरे अंतर को प्रकाशित कर दो।” अपनी बुद्धि के द्वारा जो उस परमात्मा को जानना चाहता है वह एक सीमा तक ही आगे बढ़ पाता है। उसके बाद उसे अपनी असहाय अवस्था का बोध होने लगता है। वह परमात्मा से दया की भीख मांगता है। परमात्मा की दया से ही साधक उसे जान पाता है। सूफी मत में परम ज्ञान को मारिफ़त कहा जाता है‌। यह कोई ऐसा ज्ञान नहीं है जिसे इंसान अपनी बुद्धि, तर्कों या किताबों को पढ़कर 'अर्जित' कर सके‌। इसे 'इल्मे लदुन्नी' (वह ज्ञान जो सीधे ईश्वर की ओर से उपहार स्वरूप मिलता है) कहा जाता है‌। सूफी संत सहल अल-तुस्तरी ने लिखा है कि वास्तविक स्मरणकर्ता मनुष्य नहीं, बल्कि स्वयं परमात्मा है जो मनुष्य के हृदय में अपना स्मरण जगाता है‌।

परमात्मा की सहायता (आकर्षण या जज़्बा) साधक के झूठे 'मैं' को मिटा देती है, जिसे सूफी 'फ़ना' (अहंकार का विलय) कहते हैं‌। जब इंसान का अस्तित्व ही नहीं बचता, तब केवल परमात्मा ही बचता है, और इस प्रकार परमात्मा ही स्वयं को जानता है‌। सूफियों का मानना है कि इंसान के दिल में ईश्वर के प्रति प्रेम भी उसकी अपनी इच्छा से पैदा नहीं होता‌। परमात्मा स्वयं अपने आनंद के लिए मनुष्य के हृदय में प्रेम की चिंगारी उत्पन्न करता है‌। कुरान की एक आयत का सूफी रहस्यवादी इस तरह अनुवाद करते हैं: "तुम ईश्वर को याद करते हो, क्योंकि ईश्वर ने तुम्हें याद किया है"‌। सूफीवाद में मनुष्य की स्थिति एक प्यासे की तरह है, लेकिन वह कुआँ तक तभी पहुँच सकता है जब पानी स्वयं उसे अपनी ओर खींचे। इसलिए, सूफी साधना में स्वयं के प्रयासों से अधिक परमात्मा की दया, प्रेम और सहायता की प्रार्थना की जाती है‌।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

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