सोमवार, 2 नवंबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-44

 

महात्मा गांधी हत्या केस-44

30 जनवरी, 1948

... और 30 जनवरी को जब वह काल की घड़ी आई

 

गांधीजी के हत्यारे को लोगों ने वहीं पकड़ लिया। सारी दिल्ली में यह समाचार फैल गया। दिल्ली में हाहाकार मच गया। पागलों की तरह कोई दवा की थैली से एडरनलीन की गोली खोज रहा था। उसे वैसा कुछ न मिला। अफ़सोस तो ये देखिए कि बापू के साथ सुबह-शाम रहने वाली उनकी निजी चिकित्सक डॉक्टर सुशीला नैयर भी उस दिन नहीं थीं। वो पाकिस्तान गई हुई थीं और बहावलपुर से नहीं लौटी थीं। कोई डॉ. बी.पी. भार्गव को बुलाने चल दिया और 10 मिनट बाद वे पहुंच गए। वे सुशीला की आकस्मिक दवाइयों की पेटी में ‘एड्रेनेलिन’ खोज रहे थे। वह नहीं मिला। थोड़ी ही देर में डॉक्टर जीवाजी मेहता भी वहां पहुंच गए थे। तब तक तो बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने कहा, “इस धरती पर की कोई शक्ति उन्हें बचा नहीं सकती थी। भारत को राह दिखाने वाला प्रकाश-स्तंभ दस मिनट पहले ही बुझ चुका था।”

डॉ. जीवराज मेहता ने आते ही उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी। आभा और मनु फूट-फूट कर रोने लगीं। लेकिन जल्द ही उन्होंने खुद को संभाला और राम-नाम का जाप करने लगीं।

बाद में शाम को पुलिस ने अपना मेडिकल ऑफिसर भेजा। शरीर के आर-पार हो जाने वाली दो गोलियां प्रार्थना स्थल पर मिलीं, और तीसरी गोली उनके फेफड़ों में ही फंसी रह गई थी।

उनकी मौत वैसी ही हुई जैसी वह चाहते थे, अपने दुश्मन के सामने, मुसकुराते हुए और ईश्वर का नाम लेते हुए। इसे भाग्य की विडंबना ही कहेंगे कि अहिंसा के पुजारी की ऐसी हिंसक मृत्यु हुई।  पागलपन की हद तक भटके हुए एक युवक की तीन गोलियों ने विश्व से शान्ति का सबसे बड़ा दूत छीन लिया था। पूरा देश गांधीजी की हत्या से स्तब्ध था। ऐसा लगता था कि 30 जनवरी की शाम का सूरज अस्त होते समय देश का तमाम उजाला अपने साथ ले गया था।

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उनसे कुछ फ़ीट की दूरी पर सरदार पटेल भी बैठे हुए थे। सरदार पटेल, गांधीजी से मिलकर अपने घर पहुंचे ही थे कि उन्हें गांधीजी पर हुए हमले की ख़बर मिली। वो तुरंत अपनी बेटी मणिबेन के साथ वापस बिरला हाउस पहुंचे। गांधीजी की हत्या की खबर सुनकर सबसे पहले वही आए थे और किंकर्तव्यविमूढ़ होकर गांधीजी के पास ही पत्थर की तरह बुत बनकर बैठ गये। उनकी आँखें उस शख़्स पर गड़ी हुई थीं जिससे एक घंटे पहले वो बातें कर रहे थे। उन्होंने गांधीजी की कलाई को इस उम्मीद के साथ पकड़ा कि शायद उनमें कुछ जान बची हो।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने दफ्तर से भागे-भागे आए और ख़ून से लथपथ उनकी छाती पर अपना सिर रखकर बच्चों की भांति फूट-फूट कर रोने लगे। जवाहरलाल नेहरू ने कहा, “हमारे जीवन से रोशनी चली गई।”  बिड़ला हाउस के उस कमरे में जहाँ गांधीजी का शव रखा हुआ था नेहरू ज़मीन पर बैठे हुए थे। उनकी आँखों से लगातार आँसू निकल रहे थे। अचानक नेहरू उठे। उनके साथ सरदार पटेल भी उठे। दोनों ने एक दूसरे को अपनी बाँहों में भर लिया। थोड़ी ही देर में गांधीजी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी, शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, जयराम दास, राजकुमारी अमृत कौर, आचार्य कृपलानी और कन्हैयालाल मुंशी भी बिड़ला हाउस आ गए। महात्मा के सबसे छोटे बेटे देवदास ने अपने पिता का हाथ अपने हाथों में लिया और फूट-फूट कर रो पड़े। मनु ने गांधीजी का सिर अपनी गोद में लिया हुआ था और उस माथे को सहला रही थीं जिससे मानवता के हक़ में कई मौलिक विचार फूटे थे। तुरंत नेहरूजी बाहर निकले और  छलांग लगाकर दीवार पर चढ़ गए और उन्होंने घोषणा की कि “गांधीजी अब इस दुनिया में नहीं हैं।”

माउंटबेटन उस दिन मद्रास में थे। वे लेडी माउंटबेटन को वहां के अपने काम पूरे करने के लिए छोड़कर दिल्ली वापस आ गए। वह भी बिड़ला हाउस पहुंच गए। किसी ने गांधीजी का स्टील रिम का चश्मा उतार दिया था। मोमबत्ती की रोशनी में गांधी के निष्प्राण शरीर को बिना चश्मे के देख माउंटबेटन उन्हें पहचान ही नहीं पाया। उसने गाँधीजी के पार्थिव शरीर को सैल्यूट किया। किसी ने माउंटबेटन के हाथों में गुलाब की कुछ पंखुड़ियाँ पकड़ा दीं। लगभग शून्य में ताकते हुए माउंटबेटन ने वो पंखुड़ियां गांधीजी के पार्थिव शरीर पर गिरा दी। यह भारत के आख़िरी वायसराय की उस व्यक्ति को अंतिम श्रद्धांजलि थी जिसने उनकी परदादी के साम्राज्य का अंत किया था।

तनाव इतना था कि एक भी ग़ैर-ज़रूरी शब्द निकला नहीं कि अफ़वाह जंगल में आग की तरह फैल जाती। माउंटबेटन को देखते ही एक व्यक्ति चिल्लाया, "गांधी को एक मुसलमान ने मारा है।" उस समय तक माउंटबेटन को हत्यारे का नाम और धर्म के बारे में पता नहीं चल पाया था। लेकिन इसके बावजूद उसने तमक कर जवाब दिया, "यू फ़ूल, डोन्ट यू नो इट वाज़ ए हिंदू।" माउंटबेटन के साथ चल रहे उनके प्रेस अटैची कैंपबेल जॉनसन ने उससे पूछा, ‘आपको कैसे मालूम कि ये काम हिंदू ने किया है।’ माउंटबेटन का उत्तर था, ’मुझे वास्तव में नहीं मालूम’। जब वह गांधीजी के पार्थिव शरीर के पास पहुंचा, तो उसके मुंह से निकला, “सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया।”

जिस महात्मा ने इस सदी की शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक महारथी नेता के क्लर्क और चपरासी के रूप में अपनी सेवाएं अर्पित कर और जिसने कांग्रेस के अधिवेशन में भंगी का काम करके संडासों को साफ करके, इस देश में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की, बाद में जब उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन की डोर संभाली तो धीरे-धीरे लोगों के दिलों में जगह बनाने लगे और इस देश के राष्ट्रपिता बन गए, वह अपने ही किसी भाई की गोली का शिकार होकर आज चिर निद्रा में सो रह थे!

हर तरफ शोक छा गया। दुनिया भर में झंडे झुका दिए गए। गाँधी जी की मृत्यु से पूरे देश में कोहराम मच गया, चारों ओर गहरे शोक की लहर दौड़ गई। उस रात लाखों घरों में न तो खाना बनाया गया था और न ही खाया गया था, मानो लोगों के विचारों और भावनाओं पर अँधेरा छा गया था। भारत भर के राजनीतिक फलक पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई। जॉर्ज ऑरवेल तथा एलबर्ट आइंस्टीन जैसे विख्यात गैर-भारतीयों ने भी उनकी मृत्यु पर हृदयस्पर्शी शब्दों में शोक संदेश भेजे। महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने महात्मा गाँधी के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को यकीन ही नहीं होगा कि हाड़-माँस का ये व्यक्ति कभी पृथ्वी पर चला भी होगा। किंग जॉर्ज षष्टम ने संदेश भेजा, ''गांधीजी की मौत से भारत ही नहीं संपूर्ण मानवता का नुक़सान हुआ है।'' एक ज़माने में उनकी कद-काठी और कथित रूप से बेतुके विचारों के लिए गाँधीजी का उपहास करने वाली टाइम पत्रिका ने उनके बलिदान की तुलना अब्राहम लिंकन के बलिदान से की। पत्रिका ने कहा कि एक धर्मांध अमेरिकी ने लिंकन को मार दिया था क्योंकि उन्हें नस्ल या रंग से परे मानवमात्र की समानता में विश्वास था और दूसरी तरफ एक धर्मांध हिंदू ने गाँधी जी की जीवन लीला समाप्त कर दी क्योंकि गाँधीजी ऐसे कठिन क्षणों में भी दोस्ती और भाईचारे में विश्वास रखते थे, विभिन्न धर्मों को मानने वालों के बीच दोस्ती की अनिवार्यता पर बल देते थे। टाइम ने लिखा, दुनिया जानती थी कि उसने उनकी; गाँधी जी की मृत्यु पर वैसे ही मौन धारण कर लिया है जिस प्रकार उसने लिंकन की मृत्यु पर किया था, और यह समझना एक मायने में बहुत गहरा और बहुत साधारण काम है। बर्नाड शॉ ने कहा था, ''यह दिखाता है कि अच्छा होना कितना ख़तरनाक होता है।'' मोहम्मद अली जिन्ना ने अपने शोक संदेश में कहा, ''वह हिंदू समुदाय के महानतम लोगों में से एक थे।'' दक्षिण अफ़्रीका से गांधीजी के धुर विरोधी फ़ील्ड मार्शल जैन स्मट्स ने कहा, ''हमारे बीच का राजकुमार नहीं रहा।” पाकिस्तान से मियां इफ़्तिखारुद्दीन की तरफ़ से बड़ा ही भावुक संदेश आया, ''पिछले महीनों, हममें से हर एक जिसने मासूम मर्दों, औरतों और बच्चों के ख़िलाफ़ अपने हाथ उठाए हैं या ऐसी हरकत का समर्थन किया है, गांधीजी की मौत का हिस्सेदार है।''

ऑल इंडिया रेडियो (AIR) ने शाम को अपने नियमित कार्यक्रम रोक दिए और देश को इस महान क्षति की सूचना दी। ठीक 6 बजे रेडियो पर बहुत सोच-समझ कर तैयार की गई घोषणा सुनकर भारत के लोगों को पता चला कि जिस सीधे-सादे कोमल स्वभाव के शख़्स ने उन्हें आज़ादी दिलाई थी, वो इस दुनिया को अलविदा कह चुका था। समाचार बुलेटिन में बार-बार दोहराया गया कि उनको मारने वाला व्यक्ति हिंदू था। पटेल और नेहरू ने उस रात ऑल इंडिया रेडियो से देश और दुनिया को संबोधित किया। नेहरूजी ने कहा था, “मित्रों ... हमारे जीवन की ज्योति चली गई। अब सर्वत्र अंधकार छा गया है। ... हमारे प्यारे नेता, जिन्हें हम बापू कहते थे, हमारे राष्ट्रपिता अब नहीं रहे। ... जो ज्योति इस देश में प्रगटी और जली, वह साधारण ज्योति नहीं थी। जिस ज्योति ने इतने वर्षों तक इस देश को प्रकाशित रखा है, वह अनेक वर्षों तक इस देश को प्रकाशित करेगी, हज़ार वर्ष बाद भी इस देश में दिखाई देगी। वह ज्योति जीते-जागते सत्य का प्रतीक थी।”

एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि उनको मारने वालों को भारत के एक समर्पित सेवक महात्मा गांधी की मृत्यु से क्या लाभ हुआ? वह तो देशवासियों को एक अच्छे नागरिक का कर्त्तव्य सिखाते रहते थे। लोगों को देश सेवा के मार्ग पर अग्रसर होने का पाठ पढ़ाते थे। देश की राजनीति को सही दिशा दिखाते थे। कांग्रेस का संविधान बदल कर वास्तविक गणतंत्र का शिलान्यास रखना चाहते थे। पाकिस्तान जाकर वहां के दुखी, संतप्त और बरबाद हुए लोगों के घावों पर मलहम लगाना चाहते थे। उन्होंने ऐसी कौन सी त्रुटि कर दी थी कि उनको समाप्त कर देने की इतनी जल्दी थी लोगों को। गाँधीजी ने स्वतंत्र और अखंड भारत के लिए जीवन भर युद्ध लड़ा। फ़िर भी, जब देश विभाजित हो गया तो उनकी यही इच्छा थी कि दोनों देश एक-दूसरे के साथ सम्मान और दोस्ती के  संबंधों   को बनाए रखें। बहुत सारे भारतीयों को उनका यह सहृदय आचरण पसंद नहीं था। 

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मनोज कुमार

 

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संदर्भ : यहाँ पर