महात्मा गांधी हत्या केस-38
27 जनवरी,
1948
27 जनवरी को
गांधीजी फूलवालों की सैर में मेहरौली के पास सूफ़ी संत ख़्वाजा सैयद क़ुबुद्दीन
बख़्तियार काकी की दरगाह पर गए। दिल्ली से सात मील दक्षिण में, बहुत ही सुंदर
माहौल के बीच महरौली बसा है, जो
इतिहास में पृथ्वीराज की प्राचीन राजधानी के रूप में मशहूर है। ख्वाजा सैयद
कुतुबुद्दीन बख्तियार की दरगाह का पवित्रता और सम्मान के मामले में, अजमेर में स्थित
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की विश्व प्रसिद्ध दरगाह के बाद, इसी दरगाह का स्थान आता है।
दरअसल
इस दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी। इससे गांधीजी आहत थे। हालाँकि वहाँ अभी
भी काफी नुकसान के निशान दिखाई दे रहे थे, खासकर संगमरमर की जालियों पर तोड़फोड़
के निशान थे, फिर भी, यह
दरगाह एक बार फिर अपने असली मालिकों के पास आ गई थी। दिल्ली प्रशासन ने दरगाह
परिसर और उसके आसपास के इलाकों की सफाई करवाई, और दंगों के दौरान दरगाह को जो नुकसान
पहुँचा था, उसे जहाँ तक संभव
हो सका, ठीक करवाया।
गांधीजी
ने अपना उपवास तोड़ने के लिए जो शर्तें रखी थीं, उनमें से एक यह थी कि दरगाह पर लगने
वाला सालाना मेला शांतिपूर्ण ढंग से आयोजित होने दिया जाए। उस दिन के क़ौमी मेल-जोल
को देख कर गांधीजी काफ़ी प्रसन्न थे। हिंदू, सिख, मुसलमान स्वयंसेवक के कंधे से
कंधा मिलाकर लोगों का स्वागत कर रहे थे। हिंदू-सिख स्त्रियां मेले में निरापद घूम
रहे थे। गांधीजी अपनी महिला शिष्याओं के एक छोटे से समूह के साथ वहाँ पहुँचे। चूंकि
आमतौर पर महिलाओं को दरगाह के भीतरी हिस्से में जाने की अनुमति नहीं थी, इसलिए गांधीजी ने
मौलवियों से पूछा कि महिलाओं को कहाँ तक रुक जाना चाहिए। वे मुसकुराए, उन्हें मिठाइयाँ
दीं और कहा: "वे यहाँ महिलाओं के रूप में नहीं, बल्कि महात्मा की बेटियों के रूप में आ
रही हैं, इसलिए वे दरगाह के
भीतरी हिस्से में जा सकती हैं।" इस तरह, मौके की गंभीरता के अनुरूप बहुत
धीरे-धीरे चलते हुए, महिलाएं
दरगाह के अंदर गईं। वहां उन्होंने क्षतिग्रस्त पर्दे देखे और कुरान की कुछ आयतें
पढ़ीं। कोई विश्वास नहीं कर सकता था कि एक हफ़्ते पहले की यह वही दिल्ली थी। वहाँ
का माहौल हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे सुनहरे दिनों की याद दिला रहा था।
मुसलमानों
के इस धर्मस्थल के मंच से उन्हें भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। गांधीजी
ने मेले में इकट्ठा हुए हजारों लोगों को संबोधित किया। गांधीजी ने कहा कि वे यहां
तीर्थयात्रा पर आए थे, भाषण
देने नहीं। मेले में आए हिंदुओं से कहा गया कि वे मुसलमानों के साथ भाईचारे से
रहें, क्योंकि "हम
सब एक ही पेड़ के पत्ते हैं।" वहीं,
मुसलमानों से कहा गया कि वे पाकिस्तान में अपने भाइयों को
पत्र लिखें और उनसे आग्रह करें कि वे अपने दिलों से नफरत निकाल दें और हिंदुओं का
कत्लेआम न करें। हमारे इस विशाल देश में रहने वाले सभी वर्गों और समुदायों को
एकजुट करना मेरे बचपन से ही सपना रहा है,
और जब तक यह सपना पूरा नहीं हो जाता, मेरी आत्मा को चैन नहीं मिल सकता।
सुबह
ही उन्होंने एक प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया था, जिसमें कांग्रेस से खुद को भंग करने का
आह्वान किया गया था। उन्हें जिस बात का सबसे ज़्यादा डर था, वही सच हो गई थी:
कांग्रेस एक ऐसी पार्टी बन गई थी जिसे विशेष अधिकार प्राप्त थे, और जो धांधली भरे
चुनावों के ज़रिए अपना अस्तित्व बनाए रखती थी। भ्रष्टाचार हर तरफ फैला हुआ था; कांग्रेस के
पदाधिकारी खुद को भारी-भरकम वेतन दे रहे थे, जबकि आधा भारत भूखा मर रहा था। यह शहर
में रहने वालों की पार्टी बन गई थी, जो
7,00000 गांवों को
पूरी तरह भूल चुकी थी। वे चाहते थे कि पार्टी में आमूल-चूल बदलाव हो और
विशेषाधिकार व सत्ता पाने की होड़ हमेशा के लिए खत्म हो जाए। "कांग्रेस को अब
खुद से और पूरी दुनिया से यह घोषित कर देना चाहिए कि वह केवल ईश्वर की सेवक है।
अगर वह सत्ता पाने की इस भद्दी खींचतान में उलझी रही, तो एक दिन अचानक उसे पता चलेगा कि उसका
अस्तित्व ही मिट चुका है।"
यू.एन.ओ.
में जिस तरह से कश्मीर मामले में भारत का पक्ष रखा जाना चाहिए था, वैसा नहीं हो
रहा था और उलटे भारत को कश्मीर से सेना हटाने के लिए कहा जा रहा था। लौटते वक़्त
इससे गांधीजी काफी क्षुब्ध थे। गांधीजी ने अपने सहयोगी से कहा, “यू.एन.ओ. पं. नेहरू की सरकार के लिए
समस्याएं खड़ी कर रही है।”
दोपहर
में एक ब्रिटिश पत्रकार किन्गसले मार्टिन ने गांधीजी का इंटरव्यू लिया। गांधीजी ने
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अहिंसात्मक स्वरूप पर अपने विचार रखे और यह भी कहा
कि लोग दिल से पूरी तरह से अहिंसा का पालन नहीं कर सके, इसी का परिणाम है कि
जगह-जगह हिंसा हो रही
है। अगर यह 'शक्तिशाली लोगों की अहिंसा' होती, तो हाल ही में हुई जैसी भीषण हिंसा या कत्लेआम कभी न हो
पाता। उन्हें इस बात का अहसास नोआखाली में अपनी पदयात्रा के दौरान हुआ था, और तब से वे लगातार सभी को यही बात समझा रहे थे। उनका मानना था कि
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अहिंसा केवल एक रणनीति (उपाय) थी; अंग्रेजों के खिलाफ अहिंसक तरीके से विरोध इसलिए किया गया, क्योंकि हमारे पास उनसे लड़ने के लिए कोई सैन्य शक्ति नहीं थी।
शाम की प्रार्थना सभा में उन्होंने कश्मीर में स्त्रियों
पर हो रहे अत्याचारों की चर्चा की और कहा कि कोई धर्म नहीं सिखाता कि स्त्रियों पर
इस तरह के अत्याचार किए जाएं। इसके बाद उन्होंने अमेरिकी लेखक विन्सेंट शीन को
इंटरव्यू दिया। वे गांधीजी के साथ अहिंसा के विषय पर चर्चा करना चाहते थे। उन्होंने
धर्म के प्रभाव और लक्ष्य और उसकी प्राप्ति के साधनों के दर्शन पर चर्चा की। खासकर
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बल के प्रयोग के विरोध में उन्होंने अपना मत दिया। उनका
कहना था कि यदि बुराई कभी-कभी अच्छे परिणाम देती लगती हो, तब भी मेरा अनुमान यह होगा कि नियोजित साधन शायद ग़लत थे। अच्छे परिणाम
उत्पन्न करने के लिए अच्छी कार्रवाई का साधन शुद्ध होना चाहिए। काफी देर हो चुकी
थी। इंटरव्यू को दूसरे दिन के लिए मुलतवी कर दिया गया।
हत्या की साज़िश
दोपहर में करकरे ने जोशी के घर को छोड़ दिया। वह बंबई सेन्ट्रल स्टेशन
आया। उसने फ़्रंटियर मेल के तृतीय श्रेणी का टिकट लिया। गाड़ी छूटने में अभी तीन
घंटे की देरी थी। वह प्लेटफॉर्म पर प्रतीक्षा करने लगा।
***
27 तारीख को नाथूराम और आप्टे हवाई जहाज़ से दिल्ली के
लिए निकले। मुख्य षड्यंत्रकारियों ने अपने आप को छिपाने का कोई प्रयत्न नहीं किया
था। हमेशा की तरह नाथूराम गोडसे अनगिनत लोगों से अपनी योजना की चर्चा कर रहा था।
यहाँ तक कि बम्बई से दिल्ली की हवाई यात्रा के लिए उसने अपना नाम एन विनायकराव
लिखवाया, उसका पूरा नाम था नाथूराम विनायक गोडसे। इसी
प्रकार आप्टे ने डी नारायण के नाम से यात्रा की, उसका पूरा नाम था नारायण दत्तात्रेय आप्टे। आप्टे और नाथूराम ने दिल्ली जाने के विमान
पर सबसे पिछली सीट पर जगह ली। आदत से लाचार आप्टे एयरहोस्टेस लोर्ना
वुडब्रिज
से फ़्लर्ट करने लगा। दिल्ली पहुंचने से पहले रास्ते भर वह उस सुन्दर
युवती से पीने के लिए कॉफी और खाने के लिए मीठा मांगता रहा । उस एयरहोस्टेस को
आप्टे का चेहरा भलीभाँति याद रहा। दिल्ली की इस यात्रा के तीन हफ़्ते बाद, उस एयर होस्टेस मिस
लोर्ना वुडब्रिज ने शपथ लेकर बताया कि उसे वे दोनों यात्री याद हैं, जिन्होंने अपना नाम
'डी. नारायण राव' और 'एन. विनायक राव' बताया था। उसने
बताया कि वे पीछे की तरफ़ डबल सीटों वाली कतारों में बैठे थे, और यह भी कि
नाथूराम खिड़की के पास बैठा था, जबकि
आप्टे खिड़की से दूर बैठा था। उसने बताया कि उसे उन दोनों में से एक, आप्टे—इसलिए
ख़ास तौर पर याद रहा, क्योंकि
उसने उनसे 'आम यात्रियों के
मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बार कॉफ़ी या मिठाइयाँ' माँगी थीं। फ़रवरी 1948 के आख़िर में
बॉम्बे में हुई एक पहचान परेड (आइडेंटिटी परेड) के दौरान, मिस वुडब्रिज ने बिना किसी हिचकिचाहट
के न सिर्फ़ उस यात्री को, बल्कि
उसके बगल में बैठे व्यक्ति को भी पहचान लिया। लोर्ना वुडब्रिज को हर बात को पूरी तरह याद रखने की अद्भुत क्षमता थी।
इस वजह से आप्टे की वह सोची-समझी योजना पूरी तरह नाकाम हो गई, जिसके ज़रिए वह
ख़ुद को किसी दूसरी जगह पर साबित करने (एलिबाई बनाने) की कोशिश कर रहा था। अगर
आप्टे और नाथूराम ने भूलेश्वर मंदिर के उन दो भाइयों से मुलाक़ात न की होती और मिस
वुडब्रिज ने उन्हें न देखा होता, तो
अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूशन) के लिए यह साबित करना थोड़ा और मुश्किल हो जाता कि
आप्टे, नाथूराम के साथ
दिल्ली गया था और जब नाथूराम ने गांधीजी की गोली मारकर हत्या की, तब वह उसके ठीक बगल
में खड़ा था।
गोडसे
और आप्टे दोपहर 12.40 बजे विमान से दिल्ली पहुंचे। हवाई अड्डे से, आप्टे और नाथूराम
सीधे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचे,
जहाँ वे 'दिल्ली-बॉम्बे
एक्सप्रेस' पकड़ने के लिए
काफ़ी समय रहते पहुँच गए थे। वहां से वे ग्वालियर चले
गए। इस रियासत का भारत में सम्मिलन की प्रक्रिया चल रही थी। ट्रेन रात 10.38 बजे ग्वालियर
स्टेशन पर रुकी। उस समय, फर्स्ट
और सेकंड क्लास के निकास द्वार से बाहर निकलने वाले कुछ गिने-चुने यात्रियों में
वे दोनों भी शामिल थे। बाहर यार्ड में,
चाँदनी रात में जल रही गोबर के उपलों की आग के पीछे, लगभग एक दर्जन
ताँगे सवारियों के इंतज़ार में खड़े थे;
ताँगे वाले ठंड से बचने के लिए कई परतों वाले कंबल ओढ़े हुए
थे। वे ताँगे वालों के पास गए और पूछा कि क्या उनमें से कोई डॉ. परचुरे का घर
जानता है।
ग़रीबा
नाम का तांगावाला एक रुपए के भाड़ा पर उन्हें ले जाने के लिए तैयार हो गया। रास्ते
में तांगे का लगाम टूट गया , जिसके
कारण तांगा आगे जाने की स्थिति में नहीं था। गरीबा ने ही आगे की यात्रा के लिए जुम्मा नाम के एक दूसरे
तांगेवाले का इंतजाम किया। डॉक्टर परचुरे के घर तक पहुँचने की आगे की यात्रा
उन्हें जुम्मा के तांगे से करनी पड़ी। गांधीजी की हत्या की जांच के दौरान पुलिस ने
इन दोनों तांगेवालों को मुख्य गवाह बनाया था। अप्रैल 1948 में शिनाख्त परेड (Identification Parade) के
लिए गरीबा और जुम्मा दोनों को बॉम्बे
(मुंबई) ले जाया गया था। वहां गरीबा ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे दोनों की सही-सही
पहचान की थी, जबकि जुम्मा ने केवल गोडसे को
पहचाना था और आप्टे की जगह किसी अन्य व्यक्ति पर उंगली रख दी थी। यह गवाही अदालत
में आरोपियों की ग्वालियर मौजूदगी को साबित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण कड़ी बनी
थी।
***
साज़िशकर्ताओं
के छोटे से दल का तीसरा सदस्य, करकरे, उस समय
बॉम्बे-दिल्ली फ्रंटियर मेल के खचाखच भरे थर्ड-क्लास डिब्बे में बैठा था। उसने
सुबह का समय जोशी के घर पर कुछ पत्र लिखने में बिताया था। दोपहर से ठीक पहले, वह अपना सामान लेकर
सेंट्रल स्टेशन पहुँच गया था, अपनी ट्रेन छूटने से कम से कम तीन घंटे पहले। हत्या
के समय उसकी भूमिका केवल एक दर्शक की थी, एक ऐसी भूमिका जिसके लिए वह खुद आगे आया
था। और, गांधीजी की हत्या
होते हुए देखने के इस 'मौके' के लिए, यह शांत स्वभाव
वाला, मूल रूप से दयालु
और उदार व्यक्ति मानो अपनी जान ही दांव पर लगा रहा था।
***
डॉ. दत्तात्रेय
सदाशिव परचुरे
ग्वालियर का रहने वाला डॉ.
दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे एक डॉक्टर था। वह अपनी पत्नी और बच्चों के
साथ-साथ अपने कई भाइयों के परिवारों के सदस्यों के साथ ग्वालियर के लश्कर (छावनी
क्षेत्र) में स्टेशन रोड पर स्थित एक बहुत बड़ी हवेली में रहता था। वह 47 साल का था।
एक डॉक्टर के तौर पर बस ठीक-ठाक ही सफल था। ग्वालियर की राजनीति में वह सबसे विवादित व्यक्ति था। उसके
कई ताकतवर दोस्त थे, तो कुछ कट्टर दुश्मन भी। उसके पिता राज्य के शिक्षा विभाग
में एक उच्च पद पर थे और एक बहुत सम्मानित व्यक्ति थे। उसका परिवार पूना का रहने
वाला शिक्षकों का परिवार था। बाद में उसका परिवार ग्वालियर की रियासत में आकर बस
गया। उसने स्कूल और स्नातक की पढ़ाई पूना से की थी और बंबई से मेडिकल की डिग्री
हासिल करने के बाद ग्वालियर आ गया था। परचुरे ने बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड सर्जरी के रूप
में योग्यता प्राप्त की, और राज्य चिकित्सा सेवा में शामिल हो गया। 1934 में उसे
बर्खास्त कर दिया गया और निजी तौर पर अभ्यास करना शुरू कर दिया। वह एक शिक्षाप्राप्त
एलोपैथिक डॉक्टर था, फिर भी आयुर्वेदिक और होम्योपैथी की प्रैक्टिस किया करता था।
उसकी डिस्पेन्सरी पाटन्कार बाज़ार में थी। वह रक्त को शुद्ध करने और श्वसन रोगों के
लोगों को ठीक करने के लिए घर-निर्मित दवा बेचा करता था। परचुरे ग्वालियर में हिन्दू महासभा का संस्थापक था और
हिन्दू राष्ट्र सेना के मुखिया के रूप में उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाया करता था। वह हर सुबह हिन्दू महासभा के द्वारा आयोजित परेड में भाग लेता था।
उसका चेहरा गोल था, जिसमें चश्मे के पीछे से उसकी बड़ी-बड़ी
काली आँखें कुछ बेजान सी नज़र आती थीं। उसका चश्मा इतना मोटा था कि उसके पार देखना मुश्किल था।
वह बड़े-बड़े बाल और काफी लंबी दाढ़ी रखता था जिससे वह साधु की तरह दिखता था। वह एक
साथ संत और खतरनाक, दोनों तरह का लगता था, किसी असली गुरु से भी कहीं
ज़्यादा 'गुरु' जैसे दिखने वाला, लेकिन साथ ही ऐसा इंसान जिसमें गुस्सा, ज़हर और कट्टरता कूट-कूट कर भरी थी। वह काफी बदमाश
था। वह गुस्सैल भी था।
ग्वालियर की राजनीति
में वह काफी सक्रिय रहता था। ब्रिटिश राज के दौरान, हैदराबाद और
कश्मीर की तरह ग्वालियर भी एक बड़ी रियासत थी। सत्ता हस्तांतरण के बाद, यह अपने आप
कांग्रेस के शासन में नहीं आ गई थी। महाराजा ही इसके शासक बने रहे, और उन्होंने नेहरू
सरकार के साथ केवल एक 'स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट' (यथास्थिति समझौता)
पर हस्ताक्षर किए थे। कांग्रेस, जो रियासतों को
भारत में मिलाने के लिए बहुत बेताब थी, इन रियासतों में
लोकतांत्रिक आंदोलनों को बढ़ावा देने और समर्थन देने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर
रही थी, जिसे कई राजा-महाराजा अपने शासन को खत्म करने की एक चाल मानते थे। और, चूंकि कांग्रेस के
लिए 'लोकतांत्रिक शासन' का मतलब 'कांग्रेस पार्टी
का शासन' था, इसलिए वह ग्वालियर
रियासत में भी अपनी सरकार (मंत्रिमंडल) बनाना चाहती थी। ग्वालियर में जनमत का
प्रतिनिधित्व करने के कांग्रेस के दावे को हिंदू महासभा ने कड़ी चुनौती दी। चूंकि
उस समय कोई आम चुनाव नहीं हुए थे, इसलिए यह पता
लगाने का कोई तरीका नहीं था कि किसका दावा ज़्यादा ठोस या सही है। हिंदू महासभा के
पास यह मानने के लिए ठोस आधार था कि वह राज्य में बहुसंख्यक पक्ष का प्रतिनिधित्व
करती है।
ग्वालियर
हिंदू महासभा को लगभग पूरी तरह से डॉ. परचुरे ने ही शून्य से खड़ा किया था। वह इसका
सचिव होने के साथ-साथ मुख्य आयोजक भी था। वह महासभा की ग्वालियर इकाई के उग्र विंग
का प्रमुख भी था, जो खुद को 'हिंदू राष्ट्र
सेना' (इंडियन नेशनल आर्मी) कहती थी। सेना का दावा था कि उसके
पास तीन हजार लोगों की ताकत है। जब देश स्वतंत्र हुआ तो परचुरे को मालूम था कि
ग्वालियर के महाराज जियाजीराव सिंधिया के दिन गिने चुने हैं। उसे लग रहा था कि
महाराज हिन्दू महासभा को सरकार बनाने के लिए निमंत्रित करेंगे, लेकिन सिंधिया ने
कांग्रेस को निमंत्रित किया। कांग्रेस ने महासभा के साथ संयुक्त मंत्रिमंडल बनाने
से मना कर दिया। यह 24 जनवरी की बात थी। ग्वालियर रियासत में कांग्रेस का
मंत्रिमंडल बन गया। परचुरे ने तो ग्वालियर का मुख्यमंत्री बनने का सपना पाल रखा
था। यह सब देखकर उसे बहुत ही निराशा हाथ लगी। उसने लाल कोठी पर एक प्रदर्शन भी
किया था। कांग्रेस के प्रति उसके दिल में नफ़रत भरी हुई थी। परचुरे बहुत गुस्से में
था।
महासभा
के महाराष्ट्र के पदाधिकारी के रूप में गोडसे से उसकी मुलाक़ात होती रहती थी। पिछली
बार उन्होंने सावरकर के ‘हिन्दू राष्ट्र दल’ और परचुरे की ‘सेना’ को मिलाकर एक नए दल के गठन की संभावनाओं पर विचार किया
था, लेकिन नेतृत्व के सवाल पर बात नहीं बनी। लेकिन इस दौरान यह बात सामने आई कि
जीवन के अपने मिशन के कई पहलुओं को लेकर दोनों की सोच और भावनाएं बिल्कुल एक जैसी
थीं। दिसंबर 1947 में महासभा-आर.एस.एस. की अलवर में एक संगोष्ठी हुई थी, जिसमें
दोनों मिले थे और यहां गोडसे ने अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण लिया था। जब
गोडसे ने उसे गांधीजी की हत्या की योजना के बारे में बताया तो उसका गांधीजी के
प्रति गुस्सा और नफ़रत बाहर आ गया। जीवन के अपने मिशन के कई पहलुओं को लेकर दोनों
की सोच और भावनाएं बिल्कुल एक जैसी थीं। नाथूराम ने इसी व्यक्ति के पास जाने का
फैसला किया, ताकि वह गांधीजी की हत्या के लिए उससे कोई हथियार मांग
सके।
दत्तात्रेय परचुरे ने
ही गांधीजी के हत्यारों, आप्टे एवं गोडसे को इटली में बनी 9mm बेरेटा स्वचालित पिस्टल मुहैया कराई थी।
जब परचुरे के घर के दरवाज़े पर नाथूराम ने दस्तक दी उस
समय रात के साढ़े बारह बज रहे थे। वह नाथूराम गोडसे के
बारे में 1939 से सुनता आया था, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर उससे 1941 में मिला था।
दरवाज़ा परचुरे के बेटे नीलकंठ ने खोला। जब नीलकंठ ने अपने पिता को बताया कि कोई
नाथूराम मिलने आया है, तो आधी नींद से जगता हुआ और गुस्से से झुंझलाता हुआ परचुरे
अपने कमरे से बाहर आया। परचुरे ने उन्हें चाय की पेशकश की, जिसे आप्टे ने खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया, लेकिन नाथूराम ने - जो कॉफी पीने का शौकीन था - मना कर दिया।
उसने नाथूराम से बिना बुलाए आने का कारण पूछा। बिना किसी
लाग-लपेट के नाथूराम ने साफ-साफ स्वरों में कहा कि वह
एक बहुत ही महत्वपूर्ण मिशन पर आया है।
वह गांधीजी की हत्या करने आया है और उसे एक पिस्तौल की ज़रूरत है। हालाकि उसके पास एक रिवाल्वर था, लेकिन वह अपने काम को
अंजाम देने के लिए उससे बेहतर रिवाल्वर ख़रीदना चाहता था। बंदूक उपलब्ध
कराने में वह परचुरे की सहायता चाहता था।
परचुरे ने उसे अपना रिवाल्वर देने से मना कर दिया,
लेकिन उसने भरोसा दिलाया कि अगली सुबह उसके लिए कुछ इंतज़ाम कर देगा। उसने
दोनों को उसके घर में रात बिताने के लिए कहा। वे
डॉक्टर परचुरे के यहां रातभर ठहरे।
***
27 जनवरी को दोपहर बाद अंततः राणा एक लंबी
यात्रा पूरी कर बंबई में पहुंचा। जब बंबई पहुंचा, तब तक गैंग के तीन सदस्य बंबई
छोड़ चुके थे। राणा सीधे नागरवाला के घर गया। असल में, वे नागरवाला के मेहमान बनकर रहे और उन्हें
मदनलाल से हुई पूछताछ की पूरी रिपोर्ट दी, जिसमें 'हिंदू राष्ट्र' के संपादक के साज़िश में शामिल होने का ज़िक्र था। लेकिन
नागरवाला अभी भी अपनी इस थ्योरी पर अड़े हुए थे कि साज़िश गांधी की हत्या की नहीं, बल्कि उन्हें अगवा करने की थी, और उन्होंने अपने मेहमान को भी इस बात के
लिए मना लिया कि दिल्ली पुलिस ग़लत रास्ते पर चल रही है। नागरवाला ने दिल्ली में
संजीवी से फोन पर बात की और बताया कि वे जांच कर रहे हैं, और किसी भी प्रगति की
जानकारी उन्हें देते रहेंगे। नागरवाला ने अपनी थ्योरी परोसते हुए संजीवी को बताया
कि असल साज़िश अपहरण की थी। बीस लोगों का एक कोर ग्रुप है। इस ग्रुप के हरेक सदस्यों
को बीस-बीस समर्पित स्वयं-सेवक मदद करते हैं। उसने यह भी डींग हांकी कि वह जल्द ही
पूरी साज़िश का पर्दाफ़ाश कर देगा और नागरवाला ने यह भी कहा कि उसे उस इकबालिया बयान
पर कोई काम करने की ज़रूरत ही नहीं है, क्योंकि जल्द ही वह प्रमुख साज़िशकर्ताओं को
गिरफ़्तार कर लेगा। उसने संजीवी को गांधीजी की सुरक्षा के लिए अधिक सावधानी बरतने
की चेतावनी दी। नागरवाला पारेल स्थित हिन्दू महासभा के ऑफिस की निगरानी करवा रहा
था, जबकि अपराधी दादर स्थित कार्यालय का उपयोग कर रहे थे। संजीवी ने भी नागरवाला
पर ज़्यादा दवाब न डालते हुए उसके रिपोर्ट की प्रतीक्षा करना ज़्यादा उचित समझा। हो
सकता है कि तथाकथित साज़िश की हिम्मत और उसमें शामिल लोगों की संख्या देखकर संजीवी
हैरान रह गए हों, लेकिन ऐसा नहीं लगा कि उन्होंने अपहरण की
थ्योरी में कोई कमी निकाली हो, उसे खारिज किया हो, या उसके खिलाफ़ कोई तीखी प्रतिक्रिया दी हो। संजीवी ने
बस इतना किया कि नागरवाला से अगले दिन रिपोर्ट भेजने को कहा। ‘नागरवाला ने तीन दिन
बाद रिपोर्ट भेजी, और संजीवी को नागरवाला की रिपोर्ट 31
तारीख़ की सुबह में मिली, गांधीजी की हत्या के अगले दिन। तब तक गांधीजी की हत्या
हुए बारह घंटे से अधिक का समय बीत चुका था। वैसे भी, इस रिपोर्ट में ‘हत्यारों के बारे में कोई जानकारी नहीं
थी।’
***
आज़ादी मिलने के बाद से ही, देश की राजधानी में
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 144 लागू कर
दी गई थी। इस धारा के तहत अधिकारियों को यह अधिकार मिल जाता है कि वे ऐसी किसी भी
सार्वजनिक सभा पर रोक लगा सकें, जो उनकी राय में शांति भंग कर सकती
हो। उस समय के तनावपूर्ण माहौल में, इसका सीधा मतलब यह था कि सभी तरह
की सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। फिर भी, गांधीजी के उपवास
वाले व्यस्त सप्ताह के दौरान, दिल्ली पुलिस ने धारा 144 को उतनी
सख्ती से लागू नहीं किया, जितनी वे आमतौर पर
करते थे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नागरिकों के कई समूह सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति
अपना उत्साह दिखाने के लिए आगे आए थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी
थी। अगर पुलिस उनकी सभाओं पर भी रोक लगा देती, तो ऐसा लगता मानो पुलिस
गांधी-विरोधी या मुस्लिम-विरोधी गुटों के साथ मिली हुई है।
चूंकि एक तरह की सार्वजनिक सभाओं
को होने दिया गया था, इसलिए हिंदू महासभा
की दिल्ली इकाई ने अधिकारियों की इस ढील का फायदा उठाने का सोचा। उन्होंने अपनी एक
सभा आयोजित करने की योजना बनाई, ताकि दिल्ली की जनता को यह बताया
जा सके कि उनका संगठन उस 'सात-सूत्रीय शांति
संकल्प'
(seven-point Peace Pledge) का समर्थन नहीं करता, जिसे गांधीजी का
उपवास तुड़वाने के लिए तैयार किया गया था।
27 जनवरी की दोपहर चार बजे, राजधानी के शॉपिंग
सेंटर, कनॉट प्लेस के बीचों-बीच मौजूद एक बड़े खुले मैदान में भारी
भीड़ जमा हो गई। सभा के दौरान महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के खिलाफ अत्यंत
आक्रामक और तीखे भाषण दिए गए थे। इस बैठक में हिंदू महासभा के प्रमुख नेता महंत दिग्विजयनाथ ने उपस्थित जनसमूह
को संबोधित किया था। महंत दिग्विजयनाथ ने अपने भाषण में महात्मा गांधी को
"हिंदू-विरोधी तत्व" बताते हुए उन्हें पाकिस्तान चले जाने की बात कही
थी। वहां मौजूद कुछ पुलिसकर्मियों को यह समझने में भी देर लग गई कि यह कोई
ऐसी-वैसी सभा नहीं है, जिसे किसी सामाजिक समूह ने सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश
देने के लिए बुलाया हो। एक के बाद एक वक्ता खड़े हुए और गांधीजी की कड़ी आलोचना
की। उन्होंने आरोप लगाया कि गांधीजी ने सरकार पर दबाव डालकर उसे एक ऐसे देश को 55 करोड़ रुपये देने के लिए मजबूर किया, जो भारत के साथ
युद्ध कर रहा था। उन्होंने सरकार की भी आलोचना की कि उसने गांधीजी को अपनी शर्तें
थोपने दीं। एक वक्ता ने तो गांधीजी की तुलना हिटलर से कर दी और भविष्यवाणी की कि
उनका अंजाम भी हिटलर जैसा ही होगा। सभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें 'शांति संकल्प' (पीस प्लेज) को खारिज
कर दिया गया और पाकिस्तान को नकद राशि देने के लिए सरकार की निंदा की गई। सभा का
समापन इन नारों के साथ हुआ: 'हिंदू एकता
जिंदाबाद! मुसलमानों को बाहर निकालो! मदनलाल जिंदाबाद!'
सरकार इस घटना से स्तब्ध थी। धारा 144 लागू होने के बावजूद ऐसी सभा कैसे हो सकती थी? कांग्रेस नेताओं ने
कड़ा रुख अपनाया, अधिकारी घबरा गए और किसी न किसी को बलि का बकरा खोजने लगे; जवाब-तलब किए गए और
फटकार लगाई गई। प्रशासन की ओर से दबी जुबान में यह स्वीकार किया गया कि उनसे एक 'बेहद खेदजनक चूक' हो गई है। इस
विवादित सभा और उसमें लगाए गए आपत्तिजनक नारों की सूचना मिलने के तुरंत बाद, प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने
उसी दिन (27 जनवरी, 1948 को) दिल्ली के
खुफिया/पुलिस प्रमुख टी.जी. संजीव को पत्र लिखकर चिंता व्यक्त की थी और हिंदू
महासभा की इन बढ़ती आक्रामक गतिविधियों पर जानकारी व कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी
थी। इसके ठीक तीन दिन बाद, 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी
गई थी।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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