महात्मा गांधी हत्या केस-40
29 जनवरी,
1948
29 जनवरी की सुबह जयप्रकाश नारायण गांधीजी
से मिलने आए। समाजवादी नेता को पता था कि
गांधीजी के कांग्रेस के साथ मतभेद हैं, और वे सोशलिस्ट पार्टी के भविष्य
के बारे में चर्चा करना चाहते थे। अतीत में गांधीजी ने समाजवादी
विचारों को कुछ शर्तों के साथ अपनी सहमति दी थी। जयप्रकाश नारायण के अनुसार, अब समय आ गया है कि कांग्रेस के
भ्रष्ट नौकरशाही शासन से हटकर, युवा
समाजवादियों के स्वच्छ शासन की ओर एक बड़ा और अचानक बदलाव लाया जाए। क्या
गांधीजी एक समाजवादी राज्य के प्रति अपनी निष्ठा घोषित करने के लिए तैयार थे? क्या धन की असमानताएँ बनी रहतीं? क्या अमीरों और ताकतवर लोगों के
शासन से कोई छुटकारा नहीं मिलने वाला था? बातचीत के दौरान जयप्रकाश नारायण
को एहसास हुआ कि गांधीजी का समाजवाद के समर्थन में खुलकर सामने आने का कोई इरादा
नहीं था। वह अब भी अमीरों को उनकी संपत्ति
का ट्रस्टी मानते थे, और
उनका मानना था कि गरीबों के प्रति ऐसा करना कोई पाप नहीं है। एक समय समाजवादी
रहे नेहरू ने अपनी पूर्व समाजवादी मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया था। जयप्रकाश नारायण इस भावना के साथ बैठक से निकले कि गांधीजी
सरकार के कैदी थे।
और
भी लोग आए, लोगों का मानो
तांता सा लग गया। दोपहर में दृष्टिहीन लोगों का एक समूह आया, और उनके बाद गांधीजी से मिलने
बन्नू से विस्थापित शरणार्थी आए थे। ये गांधीजी के उपवास से पहले गुजरात स्टेशन पर
रेल में हुए हत्याकांड से बचे हुए लोग थे। उनमें से एक ने कहा, “आप आराम क्यों नहीं
करते? आपने हमें एकदम बरबाद कर डाला है। अब हम लोगों पर कृपा करके आप हिमालय चले
जाइए।”
गांधीजी ने उत्तर दिया, “मैं
किसी कहने पर रिटायर नहीं हो सकता। मैंने खुद को भगवान की एकमात्र आज्ञा के तहत
रखा है।”
उस दिन की प्रार्थना सभा में इस बात का उल्लेख करते हुए गांधीजी ने कहा था, दिल्ली
में इतने सारे दुखी लोगों को छोड़कर मैं कैसे हिमालय जा सकता हूं?
गांधीजी
ने प्यारेलाल को कहा, जाकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्रिमंडल के
मंत्री डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से मिलो। उनसे कहना उनके कार्यकर्ता बड़े उत्तेजक
भाषण देते हैं। वे कांग्रेसी नेताओं का नाम लेकर उनकी हत्या करने की बात करते हैं।
आप उनके नेता हैं, उन लोगों को ऐसी बातें करने से रोक सकें तो ठीक रहेगा।
प्यारेलाल जी ने डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी से मिलने के बाद आकर गांधीजी को बताया
कि उन्होंने कुछ स्पष्ट हामी नहीं भरी और बात को टाल गए। साथ ही उन्होंने गांधीजी
से यह भी कहा कि वह (प्यारेलाल) नोआखाली जाना चाहते हैं। गांधीजी ने कहा, मेरे
सेवाग्राम जाने के बाद जाना और जब मैं पाकिस्तान जाने लगूं तब मेरे साथ चलना। शायद
2 फरवरी को जा सकते हो।
शाम
तक वे काफी थक चुके थे। उस शाम उन्हें ज़ोरों की खांसी उठी, और उन्होंने
पेनिसिलिन की वे गोलियां लेने से इनकार कर दिया, जिन्हें डॉ. सुशीला नायर उनके लिए छोड़
गई थीं। वे बहुत कमज़ोर और थके हुए लग रहे थे। कांग्रेस में भ्रष्टाचार के बढ़ते
सबूतों को देखकर वे बहुत परेशान थे। उन्होंने कहा, "हम दुनिया के सामने किस मुंह से जाएंगे? पूरे देश की
इज़्ज़त उन लोगों पर टिकी है, जिन्होंने
आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। अगर वे भी अपनी ताक़त का गलत इस्तेमाल करेंगे, तो हमारा आधार ही
डगमगा जाएगा। मैं कहाँ खड़ा हूँ और मैं क्या कर रहा हूँ?"
कांग्रेस-कार्य
समिति का विधान का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी भी उन्होंने ले रखी थी। उसकी ओर
इशारा करते हुए उन्होंने आभा से कहा, “मेरा
सिर चकरा रहा है, फिर भी मुझे इसे पूरा करना ही होगा। आज मुझे देर तक जगना होगा।” उसी रात, यानी
धरती पर अपनी आख़िरी रात में उन्होंने अपनी पौत्री मनु से कहा था, “अगर मैं बीमारी से
मरूं, भले ही वह फुंसी ही क्यों न हो, तो तुम दुनिया से चिल्ला-चिल्लाकर कहना कि
मैं एक झूठा महात्मा था। दूसरी ओर यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे
अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।”
यह
कोई भविष्यवाणी नहीं थी। वास्तव में तो उन्होंने तीन दिन बाद वर्धा आश्रम जाने का
एक कार्यक्रम बनाया था। वे वहां से पाकिस्तान जाना चाहते थे। उन्हें जिन्ना की
मुस्लिम लीग सरकार को यह विश्वास दिला सकने की आशा थी कि जिन्ना के और उनके देश का
कल्याण आपसी सदिच्छा और विश्वास में निहित है।
लेकिन जब मनु ने सुझाया कि उनके तीन दिन बाद पहुंचने की ख़बर वर्धा भेज दी
जाए, तो उन्होंने ऐसा नहीं करने दिया और बोले, “कौन जानता है, कल
क्या होने वाला है?”
गांधीजी कविता पढ़ने के शौकीन नहीं थे। लेकिन उस रोज़ प्रसिद्ध शायर नज़ीर अक़बरावादी
का शे’र मनु को सुनाने लगे,
है
बहारे-बाग़-दुनिया चंद रोज़।
देख लो इसका तमाशा
चंद रोज़॥
ये बातें उन्होंने रात के लगभग दस बजे
कही थीं। एक घंटे बाद वे सो गए।
हत्या की साज़िश
पुरानी
दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म पर सोये करकरे की नींद खुली। वह शौच आदि से निवृत्त
होकर चाय की दुकान पर नाश्ता किया। फिर,
अपने एक नए बने शरणार्थी दोस्त से अपना बिस्तर-बिस्तर (बिस्तर
का बंडल) संभालने को कहकर, वह
क्वीन्स गार्डेन पार्क की तरफ चला गया ताकि वहाँ नज़र रख सके। वहां शरणार्थियों ने
डेरा जमा रखा था। वह इधर-उधर घूमता रहा और चाय वाले से बात करता रहा। सुबह का मौसम
ठंडा और बादलों से भरा था; फव्वारे
के किनारे बैठे करकरे को ठंड लग रही थी और वह सिगरेट पी रहा था। कुछ घंटों बाद, वह पार्क में
धीरे-धीरे टहलने लगा और हर कुछ सेकंड में मुड़कर प्रवेश द्वार की तरफ देखने लगा।
वह वहाँ बिल्कुल अकेला नहीं था, क्योंकि
स्टेशन से बहुत से शरणार्थी 'क्वींस
गार्डन' में आ गए थे और
बड़े-बड़े पेड़ों के नीचे डेरा जमा लिया था, जिससे वह पार्क किसी गंदे खानाबदोशों
के पड़ाव जैसा लगने लगा था।
अपने
एक चक्कर के दौरान, करकरे
ने एक आदमी को केरोसिन (मिट्टी के तेल) का स्टोव जलाकर चाय बनाते हुए देखा। फिर, उस आदमी ने एक बोरे
से कुछ कप और तश्तरियाँ निकालीं और उन्हें धूल भरी ज़मीन पर रख दिया। जब करकरे
दोबारा वहाँ से गुज़रा, तो
उसने देखा कि वहाँ रहने वाले चार-पाँच लोग, पुरुष और महिलाएँ, इकट्ठा होकर चाय पी
रहे थे। करकरे रुका और उस आदमी से पूछा कि क्या वह चाय बेच रहा है। कपों की ओर
इशारा करते हुए उस आदमी ने कहा, "हाँ
बाबूजी, अभी-अभी अपनी चाय
की दुकान लगाई है।" करकरे ने हैरानी से पूछा, "दुकान?" उस आदमी ने जवाब दिया, "अपना गुज़ारा करने
के लिए और क्या चाहिए?" फिर
उसने आगे कहा, "अब मेरा कोई नहीं
है, देखिए! मेरे दोनों
बेटे मेरी आँखों के सामने मारे गए, और
मेरी पत्नी को भी डंडों से पीट-पीटकर मार डाला गया।"
करकरे
के पास करने को कुछ नहीं था। बाकी ग्राहकों के जाने के बाद, वह नीचे उकड़ू बैठ
गया और एक और चाय के पैसे दिए, जबकि
वह आदमी अपनी बात कहता रहा। अजीब बात यह थी कि उसकी बातों से करकरे को लगा कि वे
जो करने जा रहे हैं, वह
हिंदुओं और सिखों द्वारा झेली गई सारी तकलीफों का एक तरह से जवाब होगा। यह
शरणार्थियों की एक और कहानी थी, जिसमें
बस थोड़े-बहुत फर्क थे। इसे बिना किसी कड़वाहट या गुस्से के, बल्कि एक तरह के
समझौते (कि जो होना था, हो
गया) के भाव के साथ सुनाया गया था। अपने घर से खदेड़े जाना, फिर सैनिकों द्वारा
बचाए जाना और वहाँ से भारत तक का सफर और उस सफ़र में पूरे दिन बिना खाने-पानी के
रहना और फिर एक सूखा बिस्कुट मिलना ... वह मंजर जब हजारों लोग रोटी लिए एक आदमी पर
भेड़ियों की तरह टूट पड़े थे... और आखिरकार दिल्ली पहुंचना, मानो किसी नर्क से
छुटकारा मिल गया हो। दिल्ली में उसे रहने के लिए एक जगह मिल गई... बस एक
झोपड़ीनुमा जगह, जिसमें एक आदमी के
ठीक से पैर पसारने की भी मुश्किल से ही जगह थी। "मैंने वहां अपनी चाय की
दुकान लगाई; और फिर मुझे वहां
से निकाल दिया गया।" वह अपना आपा खो बैठा। उसने एक अपशब्द कहा, जिससे पहली बार
उसके भीतर नफरत और गुस्से की झलक दिखी। "निकाल दिया गया?" "जी
हां - हमारे अपने ही सैनिकों ने, संगीनों
के जोर पर! एक 'महान' व्यक्ति ने इसलिए
अनशन कर दिया था क्योंकि मैंने एक मुसलमान का घर ले लिया था। हा! तो उन्होंने मुझे
वहां से बाहर फेंक दिया - जबरदस्ती उठाकर।" करकरे ने उसे शुभकामनाएं दीं और
उठ खड़ा हुआ। फिर उसने कहा, "पता
है, मैंने भी बिल्कुल
वहीं से शुरुआत की थी, जहां
आप अभी हैं। हां, मैंने
भी एक चाय की दुकान ही शुरू की थी। फिर मैं तरक्की करता गया।" "बाबूजी, मुझे तरक्की नहीं
करनी - बस किसी तरह अपने बाकी दिन गुजारने हैं।" करकरे वापस फव्वारे के पास
अपनी जगह पर लौट आया। धूप की वजह से पत्थर अब गर्म हो गया था। वह वहां बैठकर
सिगरेट पीने लगा। पांच बजने के कुछ ही देर बाद सूरज ढल गया और ठंडी हवा चलने लगी।
शरणार्थियों ने शाम की रोटियां पकाने के लिए गोबर के उपलों की आग जला ली थी। तभी, धुएं के बीच उसे वे
लोग दिखाई दिए।
***
दिल्ली
आने वाली गाड़ी काफी लेट हो चुकी थी और सुबह के बजाय वह दोपहर में दिल्ली पहुंची। नाथूराम
टिकट खिड़की तक गया, अपना
द्वितीय श्रेणी का टिकट दिखाया और दो बिस्तरों वाला एक रिटायरिंग रूम बुक करने के
लिए कहा। ड्यूटी पर मौजूद क्लर्क सुंदरीलाल ने उसे बताया कि एक घंटे में एक कमरा
खाली हो जाएगा। बुकिंग क्लर्क सुन्दरीलाल ने उसे कमरा नं. 6 दिया। कमरा एन. विनायकराव के नाम से बुक किया गया।
गोडसे-आप्टे ने स्टेशन पर ही एक घंटा बिताया और एक बजे के तुरंत बाद, कमरा नंबर 6 में पहुंचे। कमरा बड़ा और ऊंची छत वाला था और उसमें बाथरूम की
सुविधा भी थी। दोनों ने गर्म खाना खाया और कमरे में विश्राम किया। उन्हें करकरे से
मिलने की जल्दी नहीं थी। शाम के 6.00 बजे रूम अटेन्डेन्ट हरि किशन को बुलाकर नाथूराम ने कुछ कपड़े दिए धोने के
लिए। हरि किशन ने एक जूता पॉलिश करने वाले जन्नू को वे कपड़े दे दिए और बोला साफ कर
रूम नं. 6 में दे देना।
***
करकरे दिन भर में अनेक चाय और बीड़ी पी चुका था। वह सात
घंटे से ज़्यादा समय से इंतज़ार कर रहा था। तभी उसकी नज़र पास आ रहे नाथूराम और
आप्टे पर पड़ी। नाथूराम और आप्टे करकरे के निकट आए; उनके चलने के अंदाज़ से ही वह समझ गया कि उन्हें रिवॉल्वर मिल गई है।
गोडसे ने उसे बताया कि पिस्तौल की व्यवस्था हो गयी है और
योजना को अंतिम रूप देने के लिए सब कुछ तैयार है। नाथूराम ने कहा, "चलो!" और तीनों पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़े। तीनों
रिटायरिंग रूम में चले गए। जैसे ही आप्टे ने दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगाई, नाथूराम ने अपने छोटे से स्टील के बक्से को खंगाला। उसने करकरे से कहा, "देखो!" उसके हाथों में एक चमकदार नीले-काले रंग का हथियार था, जैसा उसने पहले कभी नहीं देखा था। करकरे की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने
पूछा, "लेकिन इसमें तो कोई चक्का (सिलेंडर) नहीं है?" नाथूराम ने जवाब दिया, "यह ऑटोमैटिक
है। बस ट्रिगर दबाते रहो और गोलियाँ चलती रहेंगी।" "और कारतूस?" जवाब में, नाथूराम ने एक रुमाल में बँधा पैकेट दिखाया। मानो कोई
जीती हुई ट्रॉफी हो, बेरेटा (पिस्तौल) एक हाथ से दूसरे हाथ में घूमती रही, और फिर नाथूराम ने उसे वापस रख दिया। उसने कहा, "हम सुबह इसे आज़माकर देखेंगे।"
गोडसे गंभीर मूड में था। उसने सारा बोझ अपने ऊपर लेने के
उद्देश्य के बारे में समझाना शुरू किया। “आप्टे के ऊपर बहुत सारे जिम्मेदारियां हैं। उसकी पत्नी और बच्चा है। मेरा
कोई परिवार नहीं है। इसके अलावा मैं एक लेखक और वक्ता हूँ। मैं अपने कृत्यों को
न्यायोचित ठहरा सकता हूँ। मैं गांधी की हत्या में अपनी सद्भावना को सरकार और अदालत
को प्रभावित करने में सक्षम होऊंगा। आप्टे दुनियादारी वाला एक आदमी है। वह लोगों
से संपर्क में रह सकता है और हिंदू राष्ट्र को आगे बढ़ा सकता है। तुम को अखबार के
संचालन में उसकी मदद करनी चाहिए और हिंदू महासभा के काम को आगे बढ़ाना चाहिए।”
थोड़ी देर बाद तीनों चांदनी चौक तक टहलते हुए गए। नाथूराम
ने फोटो खिंचवाई। उसने फोटोग्राफर को एक घंटे में फोटो की तीन कॉपी तैयार करने का
आदेश दिया। उन्होंने पास के ही एक शाकाहारी रेस्तरां में खाना खाया और फिर अलग हो
गए। लौटते समय नाथूराम ने अपने फोटो लिए और रिटायरिंग रूम में आकर आराम करने लगा।
भोजन के बाद दिमाग की शांति के लिए आप्टे और करकरे फ़िल्म देखने चले गए, गोडसे वहीं विश्राम गृह में ही एक
क़िताब पढ़ता रहा। सिनेमा देखने के बाद आप्टे ने ख़ुद को करकरे से अलग किया। वह
दिल्ली के रेड लाइट एरिया में जा रहा था। करकरे पिछली रात की तरह प्लेटफॉर्म पर ही
सो गया। नाथूराम अपनी फ़ोटो लेने चला गया।
***
बाद में करकरे को फिल्म के बारे में बस इतना ही याद रहा
कि वह हिंदी में थी, रवींद्रनाथ टैगोर की एक कहानी पर आधारित थी, और बहुत लंबी थी क्योंकि खत्म होने तक आधी रात बीत चुकी थी। जब वे वापस
रेलवे स्टेशन की ओर जा रहे थे, तो क्वींस रोड
पर ट्रैफिक लगभग पूरी तरह थम चुका था। प्रवेश द्वार पर, आप्टे अचानक रुक गया और करकरे से कहा कि वह ऊपर कमरे में नहीं जा रहा है।
‘हो सकता है कि वह सो रहा हो, और एक आजाद
इंसान के तौर पर उसकी आखिरी रात में अगर मैंने उनकी नींद खराब की, तो मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाऊंगा।’ करकरे ने आप्टे को चांदनी चौक की
ओर वापस जाते देखा; उसे कभी पता नहीं चला कि उसने वह रात कहां बिताई। वह खुद
प्लेटफॉर्म पर शरणार्थियों के बीच सो गया। सुबह जब वह रिटायरिंग रूम में गया, तो देखा कि आप्टे वहां पहले ही पहुंच चुका था।
***
29 तारीख़ को राणा ने मदनलाल के द्वारा दी गई जानकारियों
की बात रावसाहेब गुर्टू से की। गुर्टू ने तुरंत बताया कि ‘हिन्दू राष्ट्र’ और
‘अग्रणी’ का संपादक नाथूराम गोडसे है और प्रकाशक नारायण आप्टे। उसने शस्त्र भंडार
के मालिक बड़गे के बारे में भी बताया। उसने आप्टे और करकरे के फोटो भी राणा को दिए।
राणा ने इन जानकारियों को न तो नागरवाला और न ही संजीवी से साझा किया। कपूर कमीशन
को उसने बताया कि उसे टेलीफोन सिस्टम पर भरोसा नहीं था, क्योंकि ऑपरेटर कान लगाकर
बातें सुन लेते थे। जब उससे यह पूछा गया कि उसने बंबई पहुंचने में इतना वक़्त क्यों
लगाया तो उसने जवाब दिया था कि संजीवी ने उसे गुपचुप तरीक़े से जाने के लिए कहा था,
इसलिए उसने वाया इलाहाबाद जाना उचित समझा। वैसे तो उचित यह होता कि संजीवी ख़ुद
अपनी जांच अपने लोगों से कराते। उन्हें दिल्ली पुलिस को इस काम पर लगाना चाहिए था।
गांधीजी की हत्या के बाद जांच का इंचार्ज नागरवाला को बनाया गया, जिसने गांधीजी के
अपहरण की थ्योरी प्रस्तुत की थी।
मरीना होटल में जो प्रेस रिलीज़ मिली थी, वह साफ-साफ बयान
करती थी कि साज़िशकर्ताओं का संबंध हिन्दू महासभा से है। दिल्ली पुलिस को उस प्रेस
रिलीज़ के हस्ताक्षरकर्ता आशुतोष लाहिड़ी से बात करनी चाहिए थी। बात करते ही गोडसे,
आप्टे और करकरे का नाम सामने आ जाता। और कमीशन को लाहिड़ी ने बताया कि 20 से 30 के
बीच में दिल्ली पुलिस ने उनसे एक बार भी इस विषय में पूछताछ नहीं की। एक और प्रमुख
चूक यह रही कि बंबई, पूना या अहमदनगर पुलिस के किसी अधिकारी को जांच में सहयोग
देने के लिए दिल्ली नहीं बुलाया गया। उनसे बिड़ला भवन पर निगरानी में भी सहयोग लिया
जा सकता था, ताकि अपराधियों की शिनाख़्त हो सके। आप्टे और करकरे ने इसका संदेह किया
भी और 30 तारीख़ को घटना का अंजाम देने के पहले उन्होंने बिड़ला भवन का एक चक्कर भी
लगाया था। बंबई की पुलिस का मानना था कि सहयोग की मांग दिल्ली पुलिस की तरफ़ से आनी
चाहिए थी, पुलिस सर्विस नियमों के अनुसार वे अपनी तरफ़ से दिल्ली पुलिस की जांच में
अपने अधिकारी नहीं थोप सकते थे। लेकिन 1 फरवरी को पूना पुलिस द्वारा बिना दिल्ली
पुलिस की मांग के चार हवलदार विमान द्वारा दिल्ली भेजे गए ताकि वे आप्टे और करकरे
को खोज सकें।
नागरवाला ने
मदनलाल के बयान के आधार पर 24 जनवरी को बड़गे की गिरफ़्तारी का आदेश ज़ारी
किया था। बंबई-पूना पुलिस की आपसी तालमेल के अभाव में एक सप्ताह तक यह आदेश अधर
में झूलता रहा, और अंत में गांधीजी की हत्या हो जाने के बाद 31 जनवरी को बड़गे की
गिरफ़्तारी हुई। पुलिस का कहना था कि वह पूना के आसपास के जंगलों में छिपा हुआ था,
जबकि बड़गे का बयान था कि दिल्ली से 22 को लौटने के बाद से वह पूना में घर में ही
था।
प्यारेलाल और तुषार गांधी दोनों ने ही पुलिस की तरफ़ से
की गई चूकों के ऊपर अपनी-अपनी पुस्तकों में विस्तृत चर्चा की है। इंस्पेक्टर रज़क
द्वारा 9 जनवरी को ही मदनलाल और करकरे की गिरफ़्तारी की संस्तुति की गई थी, लेकिन
विभाग द्वारा तीन दिन बाद उसे स्वीकृत किया गया, तब तक दोनों अहमदनगर छोड़ चुके थे।
न्यायाधीश आत्माचरण ने भी पुलिस की भूमिका पर सख़्त टिप्पणी की थी, खास कर 20 जनवरी
से 30 जनवरी के बीच की गई जांच पर। अगर दिल्ली और बंबई पुलिस ने थोड़ी सी भी रुचि
दिखाई होती, तो शायद 30 को होने वाला हादसा टल जाता। 1965 में गठित जे.एल. कपूर
आयोग ने भी पुलिस की भूमिका पर कई तल्ख टिप्पणियां की थीं।
***
29 तारीख को परचुरे ने अपने बड़े भाई कृष्णराव परचुरे को उस पिस्तौल के बारे में बताया जिससे गोडसे और आप्टे गांधीजी की हत्या करने वाले थे। दो लोग मेरे पास आए थे, जिनकी योजना दिल्ली में गांधीजी की हत्या करने की थी, और मैंने उनके लिए एक पिस्तौल का इंतजाम कर दिया था। उसका भाई यह सुन सदमे में आ गया। उसने परचुरे से कहा, इन करतूतों में तू ने ख़ुद को क्यों शामिल कर लिया है।
*** *** ***
मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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