सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद
“और जो लोग ईश्वर के मार्ग में बलिदान देते हैं, उन्हें मृत न कहो, वरन वे जीवित हैं, परन्तु तुम्हें उनके जीवन का विवेक ही नहीं है।” (क़ुरआन सूरा 2/आयत 154)
उसकी
शक्ति की निशानियों में से ये भी है कि तुम्हारे लिए उत्पन्न किये, तुम्हीं में जोड़े, ताकि तुम शान्ति प्राप्त करो उनके पास
तथा वास्तव में तुम्हारे बीच उत्पन्न कर दिया प्रेम तथा दया, इसमें कई निशानियाँ हैं उन लोगों के
लिए, जो
सोच-विचार करते हैं। (क़ुरआन सूरा 30/आयत 21)
इतिहासकार द’ ओसन (D’ Ohsson) का कहना है हिज़री सं के पहले ही वर्ष में मक्का के पैंतालीस और मदीना के उतने ही
लोगों के एक दल ने पैग़म्बर के प्रति वफादारी की शपथ ली। हजारीप्रसाद द्विवेदी जी की पुस्तक 'धूलि-धूसरित' (या साधना और साहित्य निबंध
संकलन) में इस बात का उल्लेख मिलता है। उन्होंने यह भी प्रण लिया कि प्रतिदिन वे
कुछ विशेष धार्मिक साधनाएं भी करेंगे। इन लोगों ने अपने लिए ‘सूफ़ी’ नाम रखा। धीरे-धीरे सूफ़ीवाद एक मत के रूप में स्थापित हो गया और सूफ़ी-साधकों की अनेक ख़ानक़ाहें अस्तित्व में आती गईं। सूफ़ियों
के बीच एक सिद्धांत प्रतिपादित हुआ जिसे “तबक़ात-ए-रिजाल-अलग़ैब” (समस्त ब्रह्मांड का एक विशेष आधार है) कहा गया। “तबक़ात-ए-रिजाल-अल-ग़ैब” का अर्थ "परमेश्वर के गुप्त
पुरुषों (या अदृश्य संतों) का वर्गीकरण या पदानुक्रम" है। सूफ़ी रहस्यवाद
(तसव्वुफ़) में यह एक बेहद महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवधारणा है, जो ब्रह्मांड की व्यवस्था और उसके संचालन से
जुड़ी है। सूफ़ी मान्यताओं के अनुसार, अल्लाह ने दुनिया को व्यवस्थित रखने और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने के लिए
कुछ खास पवित्र आत्माओं (संतों) को नियुक्त किया है। इन्हें 'रिजाल-अल-ग़ैब' (अदृश्य पुरुष) कहा जाता है।
ये संत आम लोगों के बीच ही रहते हैं, लेकिन आम इंसान इनकी आध्यात्मिक स्थिति या वास्तविक पहचान को नहीं पहचान सकते।
कई बार वे खुद भी अपनी इस स्थिति से अनजान होते हैं। इन अदृश्य संतों को एक
आध्यात्मिक पदानुक्रम (Hierarchy) में विभाजित किया गया है।
इस सिद्धांत के अनुसार इन औलिया (वली एक वचन औलिया बहुवचन) की मध्यस्थता के कारण पृथ्वी पर के संकट टलते हैं। अगर वह न हों तो विनाश हो
जाएगा। उनका चयन ईश्वर के द्वारा (मंसूर-मिन-अलवली) होता है। ऐसे लोग
प्रसिद्ध सूफ़ी संत सय्यद अली हजवेरी के अनुसार निम्नानुसार है –
अख़ियार (शुभ) – 300
अबदाल (धर्मनिष्ठ) – 40, जब एक अब्दाल की मृत्यु होती है, तो दूसरा उसकी जगह ले लेता है। इनके कारण ही दुनिया में बारिश होती है और
विपत्तियां टलती हैं।
अबरार (सत्यनिष्ठ) – 7
औताद (धर्मप्रचारक) – 4, इन्हें दुनिया के चार कोनों (दिशाओं) का स्तंभ माना जाता है।
नक़ीब (प्रचारक) – 3
क़ुतुब (धर्माधार) या ग़ौस (कष्ट निवारक) – 1
क़ुतुब या ग़ौस ही वह मध्यस्थ परंपरा है, जिसके
कारण पृथ्वी पर संकट टलते हैं और वही समस्त ब्रह्मांड का आधार है। क़ुत्ब या ग़ौस
इस पदानुक्रम का सर्वोच्च पद है। 'क़ुत्ब' का अर्थ है 'धुरी'। पूरे ब्रह्मांड का आध्यात्मिक केंद्र यही एक सर्वोच्च संत होता है, जिसके माध्यम से ईश्वर की कृपा दुनिया तक
पहुँचती है। सूफ़ी मत के अनुसार, यह पूरी सृष्टि केवल भौतिक नियमों से नहीं, बल्कि इन संतों की आध्यात्मिक ऊर्जा और
प्रार्थनाओं से टिकी हुई है। ईश्वर की एक गुप्त आध्यात्मिक शासन व्यवस्था है, जो दुनिया में शांति, न्याय और मानवता की भलाई के लिए अदृश्य रूप से
काम करती रहती है।
प्रायः सभी सूफ़ी सम्प्रदाय (जिन्हें 'सिलसिला' कहा जाता है) हज़रत मुहम्मद सल्ल. से ही अपने
सम्प्रदाय का आविर्भाव बताते और साथ ही साथ उनमें यह प्रयास भी ज़ोर पकड़ने लगा कि
सूफ़ीमत को इस्लाम-विरोधी मत न समझा जाए। सूफ़ी-संतों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि उनका
संप्रदाय इस्लामी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद ‘सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम’ से या उनके किसी ख़लीफ़ा हज़रत अली ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ और हज़रत अबूबकर ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ से आरंभ होता है।
अधिकांश सूफ़ी हज़रत अली को सूफ़ीमत का मूल स्रोत मानते हैं। सूफ़ी परंपराओं
में उन्हें आदरपूर्वक "फादर ऑफ सूफ़ीज्म" (सूफीमत के पिता) या "शाह-ए-विलायत" (आध्यात्मिक संप्रभुता के
राजा) कहा जाता है। हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि
वसल्लम की एक बेहद प्रसिद्ध हदीस (कथन) है: "मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा
(प्रवेश द्वार) हैं।" सूफ़ियों का मानना है कि
पैगंबर साहब ने इस्लाम का जो आंतरिक, रहस्यवादी और गुप्त आध्यात्मिक ज्ञान (बातिन या मारिफ़ात) अपने सीने से
हस्तांतरित किया, उसके मुख्य पात्र और
संरक्षक हज़रत अली ही थे। सूफ़ी दर्शन में 'विलायत' (Sainthood) का सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण है। सूफ़ियों के
अनुसार, पैगंबर साहब के बाद
आध्यात्मिक विलायत का सिलसिला हज़रत अली से ही शुरू होता है। चाहे इब्न अरबी हों
या दाता गंज बख्श (अली अल-हुजविरी), सभी बड़े सूफ़ी चिंतकों ने हज़रत अली को इस मार्ग का सर्वोच्च शिखर माना है।
प्रसिद्ध सूफ़ी संत हज़रत जुनैद बग़दादी ने कहा था कि "सिद्धांतों और आध्यात्मिक साधनाओं (तसव्वुफ़) के
मामले में हज़रत अली हमारे शेख (गुरु) हैं।" लगभग 90% से अधिक सूफ़ी
सिलसिले (जैसे चिश्ती, क़ादरिया, सुहरावर्दी, शाज़िलिया आदि) अपनी आध्यात्मिक वंशावली (शजरा)
को बिना टूटे हज़रत अली के माध्यम से ही पैगंबर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) तक पहुँचाते
हैं। केवल नक़्शबंदिया सिलसिला ही ऐसा है जो हज़रत अबू बक्र के मार्ग से जाता है, लेकिन वे भी हज़रत अली का अत्यधिक सम्मान करते
हैं।
हज़रत अली की परंपरा को “सिलसिलातुलज़हब” (स्वर्णिम-श्रृंखला) कहा जाता है। जब हज़रत अली के वंशज और शिया व
सूफी परंपरा के महान संत इमाम अली अल-रज़ा (8वें इमाम) ईरान के निशापुर शहर से गुज़र रहे थे, तो हज़ारों विद्वानों ने उनसे कोई हदीस सुनाने
का आग्रह किया। उन्होंने जो हदीस सुनाई, उसकी प्रामाणिक श्रृंखला उनके पिता और पूर्वजों से होते हुए सीधे हज़रत अली
और फिर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) से होती हुई स्वयं अल्लाह तक पहुँचती थी। क्योंकि
इस श्रृंखला के सभी हस्तांतरणकर्ता पैगंबर साहब के पवित्र परिवार (अहल-ए-बैत) के महान और मासूम इमाम (संत) थे, इसलिए इस पूरी वंशावली और हदीस को "स्वर्णिम श्रृंखला" (Golden Chain) कहा गया।
हज़रत अली से पांच शाखाएं चलती हैं, जिन्हें सूफ़ियों के पारिभाषिक शब्दों में 'ख़ानवादे' कहा जाता है। हज़रत अली से
निकलने वाली 5 मुख्य आध्यात्मिक शाखाएँ
(ख़ानवादे) निम्नलिखित हैं,
1.
हज़रत इमाम हसन (रज़ि.) की शाखा: हज़रत अली के बड़े पुत्र। इनके माध्यम से विलायत (संतत्व) की एक विस्तृत कड़ी
आगे बढ़ी। विशेष रूप से क़ादरिया सिलसिले की कुछ कड़ियाँ और शाज़िलिया
सिलसिला इमाम हसन के वंशजों से जुड़ता है।
2.
हज़रत इमाम हुसैन (रज़ि.) की शाखा: हज़रत अली के छोटे पुत्र। इनसे सूफ़ीमत की सबसे महत्वपूर्ण और
केंद्रीय आध्यात्मिक कड़ी चली, जिसे 'सिलसिला-ए-अहल-ए-बैत' भी कहते हैं। इमाम हुसैन के बाद उनके पुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन, इमाम मुहम्मद बाक़िर और इमाम जाफ़र अल-सादिक़ इसी कड़ी का हिस्सा बने, जिन्होंने तसव्वुफ़
की बौद्धिक और आध्यात्मिक नींव रखी।
3.
हज़रत ख़्वाजा हसन बसरी (रह.) की
शाखा: हज़रत अली के सबसे प्रमुख और लाडले आध्यात्मिक
शिष्यों (मुरीदों) में से एक। सूफ़ी इतिहास के अनुसार, ख़्वाजा हसन बसरी से ही आगे चलकर "चौदह ख़ानवादे" (14 मुख्य सूफ़ी शाखाएँ) विकसित हुए, जिनमें चिश्ती, सुहरावर्दी और क़ादरिया जैसे महान सिलसिले शामिल
हैं।
4.
हज़रत कुमैल इब्न ज़ियाद (रह.) की
शाखा: कुमैल इब्न ज़ियाद हज़रत अली के बहुत करीबी और
राज़दार साथी थे। हज़रत अली ने इन्हें 'दुआ-ए-कुमैल' जैसी रहस्यवादी प्रार्थनाएँ
और गहरा गुप्त आध्यात्मिक ज्ञान सिखाया। इनसे सूफ़ी संतों की एक विशिष्ट गुप्त
विचार-धारा (शाखा) चली।
5.
हज़रत अम्र बिन मयूमद या हज़रत उवैस
क़रनी (रूहानी संबंध): कुछ सूफ़ी दस्तावेज़ों में पांचवीं शाखा के रूप में हज़रत अली के एक अन्य
शिष्य हज़रत अम्र बिन मयूमद अल-अज़दी का नाम आता है। वहीं, कुछ सूफ़ी परंपराएँ हज़रत अली और हज़रत उवैस
क़रनी के बीच के रूहानी रिश्ते (उवैसी संबंध) को भी एक स्वतंत्र आध्यात्मिक धारा
मानती हैं।
इन शुरुआती 5 शाखाओं ने आगे चलकर पूरी
दुनिया में सूफ़ी सिद्धांतों को फैलाया। इन्हीं पांच सोतों (मशराबों) से
आगे चलकर भारत, मध्य एशिया और अरब जगत में
प्रसिद्ध चिश्ती, क़ादरिया, सुहरावर्दी और नक़्शबंदिया (इमाम जाफ़र अल-सादिक़ के माध्यम से) जैसे विशाल पेड़ खड़े हुए। शुरू के जो साधकों का दल था वह बराबर एक जगह से
दूसरी जगह घूमते रहते थे। बाद में चलकर ये अत-तरीक
(पथ) या ख़ानवाद
(आध्यात्मिक परिवार) कहे जाने लगे। उन्हें ही आजकल सम्प्रदाय कहा जाता है। “मसायले-तसव्वुफ़” में “चार-पीर” और “चौदह ख़ानवादे” (ख़ानवादे – आध्यात्मिक परिवार) की चर्चा की गई है। सूफ़ी
रहस्यवाद में पीरी-मुरीदी (गुरु-शिष्य) की व्यवस्था, आंतरिक शुद्धता और आध्यात्मिक वंशावली की वैधता को साबित करने के लिए यह
बुनियादी आधार स्तंभ माना जाता है। पैग़म्बर साहब के पहले चार उत्तराधिकारियों (“ख़िलाफ़ते-राशिदा”) को “चार-यार” भी कहा गया है। सूफ़ी साहित्य में जिन्हें “चार-पीर” कहा गया है, वे हैं इमाम हसन, इमाम हुसैन, हसन बसरी और क़ुमैल-बिन-ज़याद।
कहा जाता है कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब ने अपना ख़िरका (सम्मान-वस्त्र)
इन्हीं चारों को प्रदान की थी। चौदह ख़ानवादे से मतलब वे चौदह आध्यात्मिक परंपराएं
हैं, जो ख़्वाजा हसन बसरी से संबद्ध हैं। तीन प्रमुख सूफ़ी सम्प्रदाय चिश्ती, कादिरी और सुहरावर्दी इसी से सबद्ध हैं। हज़रत
अबूबकर ‘रज़ियल्लाहु अन्हु’ से संबंध जोड़ने वाले सम्प्रदाय हैं बित्तामी, बख्तशी, और नक्शबंदी।
हज़रत इमाम हसन के दो प्रमुख शिष्यों से दो सम्प्रदाय हुए –
1.
ख़्वाजा अब्दुल वाहिद बिन जैद से जैदिया सम्प्रदाय,
और
2.
हज़रत हबीबुल अजमी से हबीबिया सम्पदाय
जैदिया से निम्नलिखित चार सम्प्रदाय हुए –
1.
इयाज़िया (या अयाज़िया) – प्रवर्तक ख़्वाजा फुजैल बिन इयाज़ या अयाज़
2. अधमिया – प्रवर्तक हज़रत अबू इसहाक इब्राहिम बिन
अधम
3. हुबैरिया – प्रवर्तक हज़रत अमीनुद्दीन हुबैर तूल
बसरी
4. चिश्तिया – प्रवर्तक ख़्वाजा अबू इसहाक शामी
चिश्ती
हबीबिया से निम्नलिखित आठ सम्प्रदाय हुए –
1.
करखिया – प्रवर्तक शेख़ मारूफ करखी
2. सकतिया – प्रवर्तक ख़्वाजा हसन सारी अस्सक़ती
3. तैफूरिया – प्रवर्तक हज़रत अबू मजीद तैफूरूल बिस्तामी
4. जुनैदिया – प्रवर्तक अबुल कासिमुल जुनैद
5. गाज़रुनिया – प्रवर्तक ख़्वाजा अबू इसहाक गाज़रूनी
6. तरतबसिया – प्रवर्तक अबुल फरह तरतबसी
7. सुहरवर्दिया – प्रवर्तक शेख़ जियाउद्दीन अबू नजीब
सुहरवर्दी
8. फिरदौसिया या कुब्रबिया – प्रवर्तक अबुल्जनाब
अहमद बिन उमरुल खिबकी जो नाज़मुद्दीन कुबरा के नाम से प्रसिद्द थे।
“मसायले-तसव्वुफ़” में यह स्पष्ट किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति जो सूफ़ी मार्ग (तरीक़त) पर आगे बढ़ना चाहता है, उसका रूहानी संबंध इन्हीं "चार पीर और चौदह
ख़ानवादे" में से किसी एक प्रामाणिक कड़ी से जुड़ा होना चाहिए। इसे रूहानियत
का 'शजरा' (Lineage) कहा जाता है जो मुरीद के दिल को सीधा पैगंबर साहब के नूर से जोड़ता है।
सूफ़ी लोग एक ही समय में एक से अधिक आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े रहे। दूसरी
परंपराओं के विचारों से जुड़े होने के साथ-साथ
तसव्वुफ़ ने दूसरी विचारधाराओं के प्रभाव का इस्लामीकरण भी किया। यदि कोई सूफ़ी किसी
कारण से विशिष्ट हो जाता, तो उसके नाम से एक नई परंपरा शुरू हो जाती। इसके
परिणामस्वरूप सूफ़ीमत का कई सम्प्रदायों में विभाजन
हुआ। अपने अध्यात्मिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कई सूफ़ियों ने बारहवीं शताब्दी
में अपने-अपने संप्रदाय स्थापित किए। इन
संप्रदायों की संख्या में समय के साथ वृद्धि होती गई। कुछ विद्वानों ने इनकी
संख्या 175 से भी अधिक बताई है। इसे सिलसिला
भी कहा जाता है। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है ज़ंजीर, जो शेख़ और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते का
द्योतक है, जिसकी अटूट कड़ी पैग़म्बर
मुहम्मद से जुडी है। इस कड़ी के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक
पहुंचता है।
कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों कि मौलिक व्याख्या के आधार पर नए
आन्दोलनों की नींव रखी। खानक़ाह को छोड़कर ये रहस्यवादी फ़क़ीर की ज़िन्दगी बिताते थे।
निर्धनता और ब्रह्मचारी का जीवन जीते थे। इनमें से कुछ मशहूर सम्प्रदाय हैं, कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी आदि। शरिया की अवहेलना करने के कारण उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। वे इस्लामी
रूढ़िवादी कानून (शरीयत) के बाहरी बंधनों, औपचारिकताओं और सामाजिक नियमों का पालन नहीं
करते थे। ये सूफ़ी संत नमाज़, रोज़ा या मस्जिदों के बाहरी धार्मिक कर्मकांडों को अनिवार्य नहीं मानते थे।
उनका मानना था कि ईश्वर (अल्लाह) को केवल दिल की पवित्रता, अगाध प्रेम और आत्म-विस्मृति (आध्यात्मिक मस्ती)
के ज़रिए ही पाया जा सकता है। बे-शरिया सूफ़ी ख़ानक़ाहों की व्यवस्था को ठुकरा
देते थे। वे किसी एक जगह टिकने के बजाय फकीरों की तरह बंजारा या घुमक्कड़ जीवन
जीते थे। ये संत दुनियावी धन-दौलत, आराम और सामाजिक प्रतिष्ठा से पूरी तरह दूर रहते थे। वे घोर वैराग्य का जीवन
जीते थे, ब्रह्मचर्य का पालन करते थे
और अक्सर न्यूनतम कपड़ों या फटे-पुराने लबादों में रहते थे।
जो शरिया का पालन करते थे उन्हें बा-शरिया कहा जाता था। फ़ारसी भाषा में 'बा' का अर्थ होता है 'साथ' या 'सहित', यानी जो शरीयत के साथ
चलकर सूफ़ी मार्ग (तरीक़त) पर आगे बढ़ते थे। सूफ़ी आंदोलन के इतिहास में
बा-शरिया संतों को ही मुख्यधारा का सूफ़ी माना गया है। बा-शरिया सूफ़ियों का यह
दृढ़ विश्वास था कि इस्लामी शरीयत (जैसे नमाज़ पढ़ना, रोज़ा रखना, ज़कात देना और हज़ करना) को छोड़े बिना ही ईश्वर
की प्राप्ति की जा सकती है। वे शरीयत को बुनियादी सीढ़ी मानते थे और उनका कहना था
कि "शरीयत के बिना तरीक़त (आध्यात्मिक मार्ग) का कोई अस्तित्व नहीं है।" बा-शरिया सूफ़ी एक निश्चित स्थान पर व्यवस्थित होकर रहते थे, जिसे ख़ानक़ाह कहा जाता था। ये ख़ानक़ाहें
सामाजिक, आध्यात्मिक और दान-पुण्य के
बड़े केंद्र हुआ करती थीं, जहाँ आम लोगों और मुरीदों (शिष्यों) को आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा दी जाती
थी। ये सूफ़ी संत समाज से अलग-थलग या बंजारों की तरह नहीं रहते थे। वे गृहस्थ जीवन
(शादी-ब्याह) अपनाते थे, समाज के बीच रहकर लोगों का मार्गदर्शन करते थे और अक्सर सुल्तानों या शासकों
के साथ भी (एक निश्चित दूरी बनाकर) संवाद रखते थे। भारत और दुनिया भर में सूफ़ी मत
का जो व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, वह मुख्य रूप से इन्हीं बा-शरिया सिलसिलों के कारण हुआ।
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मनोज कुमार

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