महात्मा
गांधी हत्या केस-34
23 जनवरी,
1948
अपने
पोते कांति गांधी को गांधीजी ने पत्र लिखकर बताया कि उपवास के कारण उनके शरीर को
बहुत नुकसान पहुंचा है। 20 तारीख को मैं मर गया होता, लेकिन ईश्वर ने मुझे बचा
लिया। शायद वह मुझसे कुछ और काम कराना चाहता है। बस मेरी यही इच्छा है कि मैं सत्य
और अहिंसा के मार्ग पर चलता रहूं और मानवता की सेवा करता रहूं।
23
जनवरी नेताजी का जन्मदिन था। और उसी दिन राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक आयोजित की गई थी। गांधीजी ने उसमें भाग लिया। गांधीजी
ने नेताजी के योगदान को याद करते हुए कहा कि हमने हमेशा एक-दूसरे की आस्थाओं का
सम्मान किया। वे एक महान देशभक्त थे। उन्होंने देश की ख़ातिर अपना बलिदान दिया।
प्रांतीयता और जाति भेद के लिए उनके पास कोई उपयोग नहीं था। उनकी नज़रों में सभी
भारतीय थे और देश के सेवक थे। सुभाष बाबू ने अपनी बहादुर सेना में बिना किसी भेदभाव के
पूरे भारत से पुरुषों और महिलाओं को शामिल किया था और उनमें ऐसा स्नेह और निष्ठा
जगाई थी, जो बहुत कम लोग जगा पाए हैं।
हत्या की साज़िश
21
जनवरी की सुबह 11:30 बजे आप्टे-गोडसे ने कानपुर से लखनऊ-झाँसी मेल पकड़ी थी, जिससे उन्हें झाँसी में दिल्ली-बॉम्बे पंजाब
मेल का कनेक्शन मिल गया। 23 जनवरी की शाम पंजाब मेल से नाथूराम गोडसे और आप्टे
बंबई के विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन पहुंचे। उन्होंने सैंडहर्स्ट ब्रिज के लिए
टैक्सी लिया। वे आर्य पथिक आश्रम में ठहरे। इसका मैनेजर, गया प्रसाद दुबे, आप्टे को एक खास ग्राहक मानता था, क्योंकि आप्टे हमेशा अपने लिए पूरा कमरा लेता
था और उसका पूरा किराया देता था। आप्टे उसमें पहले भी मनोरमा के साथ आता रहा था।
लेकिन इस बार कोई रूम नहीं ख़ाली था, इसलिए उन्हें डॉरमेटरी में अन्य छह यात्रियों
के साथ ठहरना पड़ा। होटल मैनेजर ने वादा किया कि अगली सुबह उनके लिए कुछ बेहतर
इंतज़ाम करेगा। आप्टे ने रजिस्टर में अपना असली नाम दर्ज़ किया और दूसरे के लिए
दोस्त लिखा। होटल में सामान रखकर वे मनोरमा के पास गए। मनोरमा को लेकर वे ठाने
जी.एम. जोशी के घर गए, जहाँ करकरे अक्सर बॉम्बे आने पर रुका करता था। उन्होंने
उससे करकरे के बारे में पूछा। जोशी ने उसकी कोई जानकारी नहीं होने की बात कही। जोशी
ने करकरे को तब से नहीं देखा था जब से वह दिल्ली गया था। उन्होंने एक-दो जगह और
पूछ-ताछ की लेकिन कुछ भी हाथ नहीं लगा। करकरे से संपर्क करने की उनकी बेचैनी अजीब
लगती है, लेकिन मदनलाल की गिरफ्तारी के बाद से उनका
संपर्क टूट गया था और उन्हें यह भी नहीं पता था कि बाकी लोग अभी भी आज़ाद हैं या
नहीं। हालांकि नई योजना में किसी अन्य साथी की ज़रूरत
नहीं थी, लेकिन फिर भी गोडसे एक बार फिर से पूरे गैंग से मिलना चाह रहा था। उनका यह भी निश्चित नहीं था कि वे बॉम्बे में
ही रुकेंगे या पूना चले जाएंगे, और इसलिए उन्होंने उन घरों में करकरे के लिए कोई निर्देश
नहीं छोड़ा कि जब वह आए तो उनसे कैसे संपर्क करे। शाम को उन्होंने एक दोस्त को
पूना भेजा ताकि गोपाल को खबर दी जा सके कि वे बॉम्बे पहुँच गए हैं और मिस मनोरमा
साल्वी को पता होगा कि वे कहाँ ठहरे हैं।
***
23
जनवरी को करकरे दिल्ली से निकला, लेकिन उसके मन में यह भारी पछतावा था कि वह अपने दोस्त को
अकेला छोड़ रहा है। करकरे
दिल्ली से बंबई के लिए चला तो था, लेकिन किसी अपराधी की तरह, जो पीछा करने वाली पुलिस से बचने के लिए मथुरा
में ट्रेन से उतर गया था और बस से आगरा आ गया था। वहाँ से उसने एक और ट्रेन ली। रात
के समय उसने दो बार ट्रेन बदली - एक बार इटारसी जंक्शन पर और दूसरी बार कल्याण में
- और 25 तारीख की सुबह, जो
रविवार था, वह ठाणे रेलवे स्टेशन पर उतरा।
***
जब
बिड़ला हाउस के गार्ड्स ने मदनलाल को काबू में करके हथकड़ी पहनाई थी और उसे गर्व
के साथ गेट के बाहर अपने टेंट में ले गए, तो उसने नफ़रत भरी आवाज़ में उनसे
कहा: ‘फिर आएगा!’ (‘वे फिर आएंगे!’) इस धमकी से पुलिस चौंक गई। तो यह मामला सिर्फ़
एक सनकी रिफ़्यूजी का नहीं था जो चौंकाने वाले और नए तरीके से अपना विरोध जता रहा
था। उसके साथी भी थे। वे फिर आएंगे। कौन? कब? दिल्ली पुलिस के चीफ़, टी.जी. संजीव ने तुरंत बिड़ला हाउस
में गार्ड्स की संख्या पांच से बढ़ाकर छब्बीस करने का आदेश दिया। इनमें से सात
सादे कपड़ों में थे। उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन अफ़सरों को यह पता लगाने का काम
सौंपा कि मदनलाल के साथी कौन थे और वे क्या करने वाले थे। दिल्ली पुलिस के लगभग एक
दर्जन अफ़सरों ने बारी-बारी से मदनलाल से पूछताछ की। अगले दस दिनों तक लगभग लगातार
पूछताछ चलती रही। उन दस दिनों के दौरान, दिल्ली में जांच करने वाले अफ़सर
अपने अकेले पकड़े गए आरोपी से पूछताछ में इतने डूबे हुए थे कि उन्होंने जानकारी के
एक ऐसे स्रोत को नज़रअंदाज़ कर दिया जो कम असहयोगी और ज़्यादा भरोसेमंद साबित हो
सकता था — नई दिल्ली में हिंदू महासभा का ऑफ़िस। आख़िरकार, मदनलाल की गिरफ़्तारी के कुछ ही
घंटों के भीतर, उन्हें
मरीना होटल के कमरे में आशुतोष लाहिड़ी के पिछले दिन के बयान की एक कॉपी मिल गई
थी। अगर वे इस नतीजे पर जल्दी पहुँचने के बजाय कि इस बयान से पता चलता है कि हत्या
की साज़िश में महासभा का हाथ था, उस
बयान के लेखक से सफ़ाई मांगते, तो वह
कम से कम उन्हें यह तो बता ही देता कि मदनलाल ने जिस एडिटर का ज़िक्र किया था, वह कोई और नहीं बल्कि ‘हिंदू
राष्ट्र’ का नाथूराम गोडसे था।
जांच
का स्तर ऊंचा नहीं था और इससे ऐसा लगा कि दिल्ली पुलिस पूरी तरह से बेबस हो गई थी।
हिंदू महासभा भवन की कोई जांच नहीं की गई, जहां ज़्यादातर साज़िशकर्ता ठहरे
हुए थे... और न ही आशुतोष लाहिड़ी की जांच हुई, जो नाथूराम गोडसे और आप्टे को
अच्छी तरह जानते थे। और मदनलाल ने भी उन्हें ज़्यादा कुछ नहीं बताया। उससे पूछताछ
करने वाले अफ़सरों की केस-डायरी में उसके अड़ियल रवैये का साफ़ ज़िक्र है; बताया
गया है कि उसने अलग-अलग या विरोधाभासी बयान दिए और अपने साथियों के बारे में
जानकारी नहीं दी, जिसके लिए, डायरी
के अनुसार, उसे उचित निर्देश दिए गए थे। एक और
डायरी में ज़्यादा चिंताजनक बात लिखी थी कि उसे सिविल लाइन्स ले जाया गया और सलाह
दी गई कि वह सच बताए और ग़लत बयान न दे। मदनलाल ने भी माना है कि जब वह संभल गया, तो
उसने ज़्यादा जानकारी नहीं दी। लेकिन, गिरफ़्तारी के दिन उसने पुलिस को
बताया था कि उसके छह और साथी थे और उसने उनका हुलिया बताया था, उस
टैक्सी की जानकारी दी थी जिससे वे बिड़ला हाउस गए थे, अहमदनगर
के करकरा सेठ का नाम साथियों में से एक के तौर पर लिया था और यह भी बताया था कि एक
और साथी हिंदू राष्ट्र या अग्रणी का एडिटर था, जो बॉम्बे या पूना से छपने वाला
मराठी अख़बार था।
***
23 जनवरी की दोपहर को, दिल्ली के दो पुलिसकर्मियों को फिर से नागरवाला
के सामने बुलाया गया। याद होगा कि उन्हें पूना जाकर CID के असिस्टेंट डिप्टी इंस्पेक्टर-जनरल रावसाहेब गुर्टू से
मिलने का आदेश दिया गया था, जो
एडिटर की पहचान का राज़ तुरंत खोल सकते थे, और
वे दोनों पूना जाने के लिए तैयार भी थे। लेकिन बंबई के पुलिस मुख्यालय में दिल्ली
पुलिस के दोनों अधिकारियों को नागरवाला ने समय बरबाद किए बिना दिल्ली वापस चले
जाने का आदेश दिया। वे इस आदेश की पालना करते हुए बंबई से दिल्ली के लिए रवाना
हुए।
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मनोज कुमार
पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस
संदर्भ : यहाँ पर
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