बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

सूफ़ीमत... 22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-3

 

सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम


22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-3

22.1 क. इस्लाम के प्रसार में सूफियों का योगदान

सल्तनत काल और मध्यकालीन भारत में इस्लाम के प्रसार में सूफ़ी संतों का योगदान सबसे गहरा, शांतिपूर्ण और स्थायी था। हालांकि सातवीं सदी के अंत तक मुसलमान अरब मालाबार तट पर आकर बसने लगे थे। स्थानीय लोगों से इनका वैवाहिक संबंध भी स्थापित होता गया। नवीं सदी तक ये पश्चिमी तट पर फैल गए। आठवीं से लेकर पंद्रहवीं सदी तक अनेक मुसलमान संत और फ़क़ीर भारत के विविध भागों में आकर बसते रहे। जहाँ सैन्य अभियानों और राजनीतिक विजय ने इस्लाम को केवल शासक वर्ग के धर्म के रूप में स्थापित किया था, वहीं सूफ़ी संतों ने इसे आम भारतीय जनता के दिलों तक पहुँचाया। सूफ़ी संत इस्लाम के प्रशंसनीय एवं सुंदर कार्यों के समर्थक थे। उनके ऊंचे चरित्र, इस्लाम के सरल धार्मिक सिद्धांत ने अनेक जगहों पर अनेक भारतवासियों को इस्लाम स्वीकार करने को प्रेरित किया। इतिहास से बिल्कुल स्पष्ट है कि महमूद ग़ज़नवी के हमले से पहले इस्लाम इस देश में काफ़ी फैल चुका था। सूफ़ीमत के प्रचारकों की सत्यवादिता, न्यायप्रियता, त्याग, सच्चरित्रता और इस्लाम मत के सीधे-सादे सिद्धांतों ने उस समय के लोगों को काफ़ी आकर्षित किया। राज दरबार के शोर और शान-शौकत से बहुत दूर रहकर सूफ़ी संतों ने अपने विचारों का प्रचार किया। उनकी उदारवादिता ने कट्टरवादी धार्मिकता की सीमाएं तोड़ दीं। वे हिंदू जनमानस में घुल-मिल गए। स्थानीय बोलियों में उन्होंने वार्तालाप किया। कट्टरपंथी इस्लामी विद्वान (उलेमा) केवल अरबी और फारसी भाषा पर ज़ोर देते थे, जिसे आम भारतीय जनता नहीं समझ सकती थी। इसके विपरीत, सूफ़ी संतों ने स्थानीय भाषाओं को अपनाया। उन्होंने हिंदवी (प्रारंभिक हिंदी/उर्दू), बंगाली, पंजाबी और दक्खिनी में अपने उपदेश दिए और कविताएँ लिखीं। बाबा फ़रीद की पंजाबी कविताएँ और अमीर ख़ुसरो की हिंदवी रचनाओं ने आम जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित किया, जिससे इस्लाम का संदेश लोगों के लिए सुलभ हो गया।

सूफियों ने संगीत से ‘समाअ’ की महफ़िलें सजाईं। भारतीय समाज में संगीत की जड़ें बहुत गहरी थीं। सूफ़ियों (विशेषकर चिश्ती सिलसिले) ने 'समा' (आध्यात्मिक संगीत/कव्वाली) को ईश्वर की इबादत का माध्यम बनाया। अमीर ख़ुसरो जैसे सूफ़ियों ने भारतीय और पारसी संगीत के मिश्रण से कव्वाली की नींव रखी। ईश्वर के प्रेम में गाए जाने वाले इन गीतों ने जाति और धर्म की दीवारों को तोड़ दिया। क़व्वाली सुनने के लिए भारी संख्या में गैर-मुस्लिम भी खानकाहों (मठों) में आने लगे और वे सूफ़ियों के आध्यात्मिक प्रभाव में आ गए।

उस समय का भारतीय समाज कठोर जाति-व्यवस्था और छुआछूत से ग्रसित था। समाज के निचले पायदान पर मौजूद लोगों के लिए सूफ़ियों की खानकाहें एक वरदान साबित हुईं। खानकाहों में 'लंगर' (मुफ़्त सामूहिक रसोई) की व्यवस्था होती थी, जहाँ राजा से लेकर रंक और उच्च जाति से लेकर अछूत माने जाने वाले लोग एक साथ ज़मीन पर बैठकर खाना खाते थे। इस अभूतपूर्व सामाजिक समानता और सम्मान से प्रभावित होकर लाखों वंचित लोगों ने स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपना लिया। सूफ़ियों के चमत्कारों (करामात), उनकी दुआओं और बीमारों के इलाज की कहानियों ने लोक-मानस में उन्हें भगवान के दूत या 'वली' के रूप में स्थापित कर दिया। लोग उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मानने लगे, जिससे धीरे-धीरे उनका धर्म परिवर्तन स्वाभाविक रूप से होता गया। मध्यकालीन भारत में इस्लाम का प्रसार तलवार के बल पर नहीं, बल्कि सूफ़ियों के प्रेम, संगीत, सामाजिक समानता और मानवीय सेवा के बल पर हुआ। उन्होंने इस्लाम का एक ऐसा 'भारतीय चेहरा' तैयार किया जो इस देश की साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) का आधार बना।

जाफ़र रज़ा सहित कई विद्वानों ने इस बात को स्वीकारा है कि भारत में मुसलमानों का राज क़ायम हो जाने के बाद भी प्रजा को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना अधिकांश नये मुसलमान शासकों के हित और उनकी रुचि, दोनों के विरुद्ध था। प्रसिद्ध इतिहासकारों (जैसे सतीश चंद्र, रोमिला थापर और रिचर्ड ईटन) के शोध के अनुसार, मध्यकालीन भारत के अधिकांश मुस्लिम शासकों के लिए प्रजा को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाना न तो उनके राजनीतिक और आर्थिक हित में था और न ही इसमें उनकी कोई रुचि थी। मध्यकालीन इस्लामी शासन व्यवस्था में गैर-मुस्लिम प्रजा (जिम्मी) से 'जिज़िया' और कृषि पर 'खराज' नामक कर वसूला जाता था। यह कर मुस्लिम शासकों की आय का बहुत बड़ा जरिया था। इस्लामी कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति इस्लाम अपना लेता था, तो वह जिज़िया कर के दायरे से बाहर हो जाता था और उसे भूमि कर में भी छूट मिल जाती थी। इसलिए, यदि बहुसंख्यक हिंदू आबादी ज़बरदस्ती मुसलमान बना दी जाती, तो शाही खजाना पूरी तरह खाली हो जाता। शासकों के आर्थिक हित इसी में थे कि प्रजा अपने मूल धर्म में बनी रहे और कर चुकाती रहे। दूसरी बात यदि शासक बड़े पैमाने पर ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन का अभियान चलाते, तो स्थानीय राजपूत राजा, जमींदार और आम जनता एकजुट होकर विद्रोह कर देती। इतने बड़े साम्राज्य में हर समय विद्रोहों को दबाना किसी भी राजा के लिए असंभव था। साम्राज्य को स्थिरता देने के लिए अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक और अकबर जैसे व्यावहारिक शासकों ने धर्म को राजनीति से अलग रखा। उन्होंने स्थानीय हिंदू सामंतों और अधिकारियों (जैसे पटवारी, चौधरी और राजाओं) का सहयोग लेकर शासन चलाया। अधिकांश शासकों की मुख्य रुचि अपने साम्राज्य का विस्तार करने, धन इकट्ठा करने, भव्य इमारतें बनाने और अपनी सत्ता को मजबूत करने में थी, न कि लोगों का धर्म बदलने में। सल्तनत काल में कट्टर धार्मिक विद्वान (उलेमा) अक्सर सुल्तानों पर दबाव डालते थे कि वे भारत को 'दार-उल-इस्लाम' (इस्लामी भूमि) बनाने के लिए सख्त नीतियां अपनाएं। लेकिन इतिहास गवाह है कि सुल्तानों (जैसे इल्तुतमिश, बलबन और अलाउद्दीन खिलजी) ने उलेमाओं की इन मांगों को हमेशा यह कहकर खारिज कर दिया कि भारत की परिस्थितियां अलग हैं और यहाँ व्यावहारिक राजनीति ही चल सकती है। ऐसा नहीं है कि धर्म परिवर्तन बिल्कुल नहीं हुआ, लेकिन उसका तरीका ज़बरदस्ती (तलवार के बल पर) होने के बजाय संस्थागत और सामाजिक-आर्थिक अधिक था। कुछ कट्टर शासकों (जैसे फ़िरोज़ शाह तुग़लक या सिकंदर लोदी) ने मंदिर तोड़े और कुछ क्षेत्रों में दबाव बनाया, लेकिन यह पूरे भारत या पूरे कालखंड की नीति नहीं थी। इतिहासकार प्रोफेसर मुजफ्फर आलम और अन्य विद्वानों के अनुसार, भारत में मुस्लिम शासन का चरित्र मुख्य रूप से "राजनीतिक और प्रशासनिक" था, न कि "मज़हबी"।

तेरहवीं सदी के अंत से सोलहवीं सदी के प्रारंभ तक, कुछेक मिसालों को छोड़कर, यह नहीं कहा जा सकता कि राजनैतिक या अन्य किसी बातों से प्रेरित होकर भारत के मुसलमान नरेशों ने अपने अधिकारों का अनुचित प्रयोग किया। बल्कि जैनुल आबदीन, शेरशाह सूरी, बाबर, अकबर, जहांगीर, औरंगज़ेब के साथ-साथ अधिकांश मुसलमान शासकों के फ़रमानों से पता चलता है कि वे अपनी हिंदू और मुसलमान प्रजा को समान दृष्टि से देखते थे। इतिहास से स्पष्ट है कि उस समय के मुसलमान फ़क़ीरों, पीरों और दरवेशों की सच्चरित्रता और इस्लाम की सामाजिक समता और समानता ने अधिकांश लोगों को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया। प्रो. के. एम. अशरफ़ ने अपनी अमर और ऐतिहासिक कृति 'लाइफ एंड कंडीशंस ऑफ द पीपल ऑफ हिंदुस्तान' (1200-1550 ईस्वी) में उन सभी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सूत्रों का बहुत बारीकी से और वैज्ञानिक परीक्षण किया है, जिनके माध्यम से मध्यकाल में हिंदू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के आम लोग एक-दूसरे के नज़दीक आए और एक-दूसरे के जीवन और रीति-रिवाज़ों को प्रभावित किया। डॉ. अशरफ़ भारत के उन शुरुआती इतिहासकारों में से थे, जिन्होंने इतिहास को केवल राजाओं की लड़ाइयों और महलों की साज़िशों से बाहर निकालकर "आम जनता के सामाजिक इतिहास" के रूप में देखा। प्रो. अशरफ़ ने विस्तार से रेखांकित किया है कि दिल्ली सल्तनत काल में आम हिंदू और मुसलमान एक ही तरह के सामाजिक परिवेश में रहते थे। दोनों समुदायों के आम लोग एक-दूसरे के धार्मिक त्योहारों, जैसे कि वसंत पंचमी, होली और मुहर्रम व ईद के मेलों में खुलकर हिस्सा लेते थे। जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़े कई सामाजिक रीति-रिवाज (जैसे शादियों में संगीत, हल्दी की रस्म, और पहनावे के तौर-तरीके) दोनों धर्मों के लोगों ने एक-दूसरे से सीखे और अपनाए। उन्होंने धार्मिक समन्वय के सबसे बड़े सूत्र के रूप में सूफी संतों और भक्ति आंदोलन की भूमिका का गहरा विश्लेषण किया। उन्होंने दिखाया कि कैसे सूफियों की खानकाहें और लंगर आम जनता (हिंदू और मुसलमान दोनों) के मिलने का साझा ठिकाना बन गए थे, जहाँ जाति और धर्म का भेद पूरी तरह समाप्त हो जाता था। प्रो. के. एम. अशरफ़ का यह शोध ऐतिहासिक रूप से यह साबित करता है कि ऊपरी स्तर पर भले ही राजनीतिक संघर्ष चल रहे थे, लेकिन ज़मीनी स्तर पर भारत के आम लोगों ने नफ़रत के बजाय आपसी समन्वय और सह-अस्तित्व की एक साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) का निर्माण कर लिया था, जिसने भारतीय समाज को एक अटूट ताने-बाने में पिरो दिया। प्रो. हरिश्चन्द्र वर्मा मानते हैं, “इस काल के अध्ययन से पता चलता है कि समस्त लोगों के बीच आपसी मतैक्य की एक अनंत धारा धीरे-धीरे पर निर्बाध गति से बह रही थी। धार्मिक विद्वेष के प्रदूषण से मुक्त यह हिंद-इस्लामी सम्मिलन की धारा थी।”

22.1 ख. सुल्तान इल्तुतमिश के शासनकाल (1210-1235 ई.) में सूफि़यों का प्रभाव अभूतपूर्व और अत्यधिक गहरा था। इल्तुतमिश पहला ऐसा मुस्लिम शासक था जिसने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया। इस दौर में मंगोल आक्रमणों के भय से मध्य एशिया के कई महान सूफ़ी संत और विद्वान भागकर दिल्ली आए, जिससे दिल्ली को 'कुब्बत-उल-इस्लाम' (इस्लाम का गुंबद/केंद्र) कहा जाने लगा। इल्तुतमिश मूल रूप से एक ग़ुलाम (ममलुक) था, इसलिए रूढ़िवादी उलेमा और कुछ तुर्क अमीर उसकी सत्ता को पूरी तरह वैध नहीं मानते थे। अपनी सत्ता को नैतिक और धार्मिक वैधता देने के लिए इल्तुतमिश ने सूफ़ी संतों के आध्यात्मिक प्रभाव का सहारा लिया। सूफ़ी संतों द्वारा सुल्तान का समर्थन किए जाने के कारण आम जनता और सैनिकों के बीच इल्तुतमिश की स्वीकार्यता बहुत बढ़ गई। इल्तुतमिश के काल में चिश्ती सिलसिले के महान संत ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी दिल्ली में आकर बस गए थे। सुल्तान उनका बहुत आदर करता था और उन्हें राजकीय पदों का प्रस्ताव भी दिया था। हालांकि, चिश्ती परंपरा के अनुसार बाबा काकी ने राजसी ठाट-बाट और धन स्वीकार करने से साफ मना कर दिया और आम जनता के बीच सादगी से रहे। इल्तुतमिश ने बाबा काकी के सम्मान में ही दिल्ली की ऐतिहासिक मीनार का नाम 'क़ुतुब मीनार' रखा और उनके लिए 'गंधक की बावली' (एक प्रसिद्ध स्टेपवेल) का निर्माण कराया। उन दिनों सूफ़ी संत शेख़ बहाउदीन ज़करिया (मृ 1262 ई.) और शेख़ जलालउद्दीन तबरेजी़ (मृ. 1226 ई.) की सक्रियता के उल्लेख मिलते हैं। सुल्तान इल्तुतमिश को सूफ़ी संतों के प्रति अपार श्रद्धा थी। उसका इन संतों के प्रति उदारतापूर्ण व्यवहार रहता था। मुल्तान के प्रसिद्ध सूफ़ी संत बहाउद्दीन ज़करिया का इल्तुतमिश के साथ बहुत घनिष्ठ संबंध था। सुहरावर्दी सिलसिले के संत चिश्तियों के विपरीत राजनीति और प्रशासन में सक्रिय भूमिका निभाने में विश्वास रखते थे। जब मुल्तान का स्थानीय शासक नासिरुद्दीन क़बाचा इल्तुतमिश के खिलाफ विद्रोह कर रहा था, तब शेख़ बहाउद्दीन ज़करिया ने खुले तौर पर इल्तुतमिश का समर्थन किया था। इस राजनीतिक और आध्यात्मिक मदद से खुश होकर इल्तुतमिश ने मुल्तान विजय के बाद शेख़ बहाउद्दीन ज़करिया को 'शेख़-उल-इस्लाम' (साम्राज्य का सर्वोच्च धार्मिक पद) की प्रतिष्ठित उपाधि से नवाज़ा था। शेख़ तबरेज़ी के स्वागत के लिए इल्तुतमिश नगर के बाहर तक गया तथा घोड़े से उतरकर उनका हाथ चूमने लगा। इल्तुतमिश स्वयं रूहानियत (आध्यात्मिकता) में गहरी रुचि रखता था। उसने दिल्ली और उसके आस-पास सूफ़ी संतों के रहने और उपदेश देने के लिए कई खानकाहों और दरगाहों का निर्माण करवाया। उसने सूफ़ियों के आध्यात्मिक संगीत (समा/कव्वाली) के आयोजन की रक्षा की, जिसका रूढ़िवादी उलेमा अक्सर विरोध करते थे। इल्तुतमिश के शासनकाल में सूफ़ी संत केवल धार्मिक उपदेशक नहीं थे, बल्कि वे साम्राज्य के सांस्कृतिक और नैतिक स्तंभ बन चुके थे। इल्तुतमिश के संरक्षण के कारण ही दिल्ली भारत में सूफ़ी आंदोलन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरी।

22.1 ग. सुल्तान ग़यासउद्दीन बलबन (1266-1287 ई.) के समय में बाबा फरीद गंजशकर (मृ. 1269 ई.) का उल्लेख है। सुल्तान ग़यासउद्दीन बलबन के शासनकाल में सूफ़ियों का प्रभाव और सुल्तान के साथ उनके संबंध बेहद जटिल, कूटनीतिक और दोहरे चरित्र वाले थे। हालांकि बलबन अपनी कठोरता के लिए काफ़ी प्रसिद्ध रहा है, (बलबन अपनी 'लौह और रक्त' की नीति और राजशाही की निरंकुश प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए जाना जाता था) फिर भी वह सूफ़ी संतों की भक्ति के लिए भी मशहूर है। उसने उलेमा (कट्टर धार्मिक विद्वान) और दरबारियों को राजनीति से पूरी तरह दूर रखा, लेकिन सूफ़ियों के मामले में उसने एक बहुत ही व्यावहारिक और कूटनीतिक नीति अपनाई। बलबन जानता था कि आम जनता सूफ़ियों से बेहद प्यार करती है और उनके वचनों पर भरोसा करती है, इसलिए उसने अपने शासन को 'दैवीय अधिकार' (न्याबत-ए-खुदाई) के रूप में पेश तो किया, लेकिन साथ ही उसने सूफ़ियों के प्रति अत्यधिक सम्मान का दिखावा भी किया ताकि मुस्लिम प्रजा और सेना के बीच उसकी धार्मिक छवि मजबूत रहे। बलबन के काल में चिश्ती सिलसिले के महान संत बाबा फ़रीद (जो पंजाब के पाकपट्टन में रहते थे) का प्रभाव अपने चरम पर था। बाबा फ़रीद के समक्ष बलबन हाथ बांधे, गुनहगारों की तरह खड़ा रहता था। बलबन ने सूफ़ी संतों के आध्यात्मिक प्रभाव को अपने करीब लाने के लिए अपनी बेटी हुज़ैरा (या बीबी नीहार गुज़ा) का विवाह बाबा फ़रीद से कर दिया था। हालांकि बलबन का दामाद होने के बावजूद बाबा फ़रीद ने कभी शाही महलों का सुख स्वीकार नहीं किया। उन्होंने बलबन द्वारा दिए जाने वाले महंगे उपहारों और धन को ठुकरा दिया और अपना पूरा जीवन गरीबी और सादगी में ही बिताया। यह भी कहा जाता है कि सूफ़ी शैख़ अली ने जब दिल्ली से वापस चिश्त जाने की घोषणा की तो बलबन ने उनके क़दमों पर सर  रखकर क़सम खाई कि यदि वे चिश्त वापस गए तो वह राज-काज त्याग कर बाक़ी के दिन उनके चरणों में गुज़ारेगा। चिश्ती संतों के विपरीत, मुल्तान के सुहरावर्दी सूफ़ी संत (जैसे शेख़ बहाउद्दीन ज़करिया के उत्तराधिकारी) राजनीति और राजकीय पदों को स्वीकार करने में विश्वास रखते थे। मुल्तान और सिंध का क्षेत्र दिल्ली सल्तनत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर था, जहाँ लगातार मंगोलों के आक्रमण का खतरा रहता था। बलबन ने सुहरावर्दी संतों के प्रभाव का उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति व्यवस्था बनाए रखने और स्थानीय विद्रोहों को दबाने के लिए किया। सुहरावर्दी खानकाहें बलबन के लिए प्रशासनिक और गुप्तचर तंत्र में भी सहायक साबित हुईं। बलबन  दिल्ली के प्रमुख सूफ़ियों के जनाज़ों में खुद शामिल होता था और उनकी दरगाहों पर चादर चढ़ाता था। जब वह सूफ़ी संतों की मजलिस (सभाओं) में जाता था, तो वह एक साधारण भक्त की तरह व्यवहार करता था। वह सूफ़ी संतों से अपने बेटों (शहज़ादा मुहम्मद और बुग़रा ख़ाँ) के लिए दुआएं मांगता था। इसी काल में युवा शेख़ निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली आए थे और बाबा फ़रीद के शिष्य बनकर सूफ़ी मत को एक नई ऊँचाई पर ले जाने की तैयारी कर रहे थे।

22.1 घ. सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी (1296–1316 ई.) की ख़्वाजा निज़ामउद्दीन औलिया (मृ. 1324 ई.) के प्रति श्रद्धा की चर्चा इतिहासकारों ने की है। उसने अपने दो बेटों ख़िज़्र ख़ान और शादी ख़ान को उनकी शरण में दे दिया था। वह उनकी समाअ की सभाओं में भी शिरकत करता। सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी  का शासनकाल भारत में सूफ़ीमत (विशेषकर चिश्ती सिलसिले) का स्वर्ण काल माना जाता है। इस दौर में दिल्ली के सबसे प्रसिद्ध और महान सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (महबूब-ए-इलाही) का आध्यात्मिक प्रभाव अपने चरम पर था। उनकी खानकाह (ग़ियासपुर, दिल्ली) में हर दिन हज़ारों लोगों के लिए लंगर चलता था, जहाँ समाज के हर वर्ग के लोग आते थे। अलाउद्दीन ख़िलजी और सूफ़ियों का यह रिश्ता मध्यकालीन इतिहास के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक है, क्योंकि सुल्तान अपनी निरंकुश सत्ता और कठोर बाज़ार नियंत्रण के लिए जाना जाता था, जबकि सूफ़ी संत महलों से पूरी तरह दूर रहते थे। अलाउद्दीन ख़िलजी एक बेहद शंकालु शासक था। जब उसने देखा कि निज़ामुद्दीन औलिया का प्रभाव जनता पर उससे भी ज़्यादा है, तो उसने शेख़ से मिलने की इच्छा जताई। लेकिन चिश्ती सिद्धांतों के पक्के शेख़ ने सुल्तान से मिलने से साफ मना कर दिया। जब अलाउद्दीन ने ज़बरदस्ती मिलने की कोशिश की, तो निज़ामुद्दीन औलिया ने एक ऐतिहासिक बयान दिया: "मेरे घर के दो दरवाज़े हैं, अगर सुल्तान एक दरवाज़े से अंदर आएगा, तो मैं दूसरे दरवाज़े से बाहर निकल जाऊँगा।" इस घटना ने साबित किया कि सूफ़ियों का प्रभाव राजसी सत्ता के डर से बिल्कुल आज़ाद और स्वतंत्र था। बाद में अलाउद्दीन ने शेख़ की आध्यात्मिक शक्ति को स्वीकार किया और उनके मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया। महान कवि और संगीतकार अमीर ख़ुसरो इस काल के सबसे बड़े सांस्कृतिक सेतु थे। वे एक तरफ अलाउद्दीन ख़िलजी के दरबारी कवि और प्रिय मित्र थे, तो दूसरी तरफ हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे चहेते आध्यात्मिक शिष्य (मुरीद) थे। ख़ुसरो के माध्यम से सुल्तान और शेख़ के बीच एक परोक्ष (अप्रत्यक्ष) सम्मान का रिश्ता बना रहा। ख़ुसरो ने इसी काल में कव्वाली और साझी संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) को बुलंदियों पर पहुँचाया। अलाउद्दीन ख़िलजी के सेनापति मलिक काफ़ूर ने जब दक्षिण भारत (दक्कन) पर सैन्य अभियान शुरू किए, तो इन सैन्य मार्गों के सहारे सूफ़ी संत भी पहली बार बड़े पैमाने पर दक्षिण भारत पहुँचे। निज़ामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य शेख़ मुंतजबुद्दीन ज़र ज़री ज़र बख़्श और बाद में उनके भाई बुरहानुद्दीन ग़रीब ने महाराष्ट्र (दौलताबाद/औरंगाबाद) के क्षेत्रों में जाकर चिश्ती सिलसिले की नींव रखी, जिसने आगे चलकर दक्षिण भारत के सामाजिक और धार्मिक इतिहास को बदल दिया। जहाँ चिश्ती सूफ़ी (निज़ामुद्दीन औलिया) ने अलाउद्दीन से दूरी बनाए रखी, वहीं मुल्तान के सुहरावर्दी सूफ़ी संत (जैसे शेख़ रुकनुद्दीन अबुल फ़तह) और दिल्ली सल्तनत के साथ कूटनीतिक और दोस्ताना संबंध बनाए हुए थे। अलाउद्दीन उनका बहुत आदर करता था और सीमावर्ती क्षेत्रों (पंजाब/सिंध) में शांति बनाए रखने के लिए उनके राजनीतिक प्रभाव का उपयोग करता था।

22.1 च. सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुगलक़ (1351–1388 ई.) के शासनकाल में सूफ़ियों का प्रभाव और सुल्तान के साथ उनके संबंध पिछले शासकों (जैसे अलाउद्दीन ख़िलजी या मुहम्मद बिन तुग़लक) की तुलना में बहुत बदल चुके थे। फ़ीरोज़शाह तुग़लक अपनी कट्टर सुन्नी धार्मिक नीतियों और उलेमा (कट्टरपंथी इस्लामी विद्वानों) को खुश करने की कोशिशों के लिए जाना जाता था। उसके शासनकाल में सूफ़ियों के प्रभाव के दो अलग-अलग पहलू सामने आए, एक तरफ तो उसने मुख्यधारा के सूफ़ियों को भारी राजकीय संरक्षण दिया, लेकिन दूसरी तरफ उसने लीक से हटकर चलने वाले या उदारवादी सूफ़ियों का दमन भी किया। फ़ीरोज़शाह के चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुग़लक की नीतियों से उलेमा और सूफ़ी दोनों बहुत नाराज़ थे। इसलिए जब फ़ीरोज़शाह गद्दी पर बैठा, तो उसने अपनी सत्ता को सुरक्षित करने के लिए सूफ़ियों और धार्मिक नेताओं का समर्थन मांगा। फ़ीरोज़शाह ने रूढ़िवादी और मुख्यधारा के सूफ़ी संतों को भारी मात्रा में धन, वज़ीफ़े और कर-मुक्त ज़मीनें (जागीरें) दान में दीं। उसने दिल्ली और उसके बाहर सूफ़ियों के रहने के लिए नई ख़ानक़ाहें और मदरसे बनवाए। इस आर्थिक और प्रशासनिक संरक्षण के कारण कई सूफ़ी सिलसिले (जैसे सुहरावर्दी और चिश्ती सिलसिले का एक धड़ा) सुल्तान के बहुत करीब आ गए। इस काल में चिश्ती सिलसिले के महान संत ख्वाजा बंदानवाज़ गेसूदराज़ दिल्ली में सक्रिय थे। फ़ीरोज़शाह तुग़लक उनका बहुत सम्मान करता था और उनसे अपने राज्य के लिए दुआएं मांगता था। हालांकि, जब फ़ीरोज़शाह के शासनकाल के उत्तरार्ध में दिल्ली का माहौल बहुत अधिक रूढ़िवादी और घुटन भरा होने लगा, तो गेसूदराज़ जैसे स्वतंत्र विचारों वाले सूफ़ी संत दिल्ली छोड़कर दक्षिण भारत (गुलबर्गा, बहमनी साम्राज्य) की ओर चले गए। फ़ीरोज़शाह तुग़लक ने उलेमाओं के प्रभाव में आकर ऐसे कई सामाजिक और सांस्कृतिक रिवाजों पर रोक लगा दी, जिन्हें रूढ़िवादी मुस्लिम विद्वान 'ग़ैर-इस्लामी' मानते थे। इसी कड़ी में उसने मुस्लिम महिलाओं के सूफ़ी संतों की मज़ारों और दरगाहों पर जाने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। उसका मानना था कि मज़ारों पर महिलाओं का जाना और वहाँ का माहौल शरीयत (इस्लामी क़ानून) के खिलाफ है। इससे सूफ़ियों के उस लोकप्रिय लोक-सांस्कृतिक प्रभाव को ठेस पहुँची जो समाज के हर वर्ग को अपनी ओर खींचता था। फ़ीरोज़शाह का शासनकाल सूफ़ियों के लिए केवल संरक्षण का काल नहीं था, बल्कि कुछ सूफ़ियों के लिए यह दमन का काल भी था। जो सूफ़ी संत रूढ़िवादी सीमाओं को तोड़कर 'अनलहक़' (मैं ही सत्य/ईश्वर हूँ) या अत्यधिक उदारवादी विचारों (जैसे महदवी आंदोलन या रूढ़िमुक्त सूफ़ी मत) का प्रचार करते थे, सुल्तान ने उन्हें मौत की सज़ा दी या प्रताड़ित किया। इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी और स्वयं फ़ीरोज़शाह की आत्मकथा (फ़ुतूहात-ए-फ़ीरोज़शाही) में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ कुछ सूफ़ी गुरुओं (जैसे अहमद बिहारी और रुक्न) को भटकाव फैलाने और कट्टरपंथ के खिलाफ जाने के आरोप में मृत्युदंड दिया गया। सुल्तान द्वारा राज्य प्रशासन को 'शरीयत' के ढांचे में ढालने के बावजूद, आम जनता (हिंदू और मुसलमान दोनों) के बीच सूफ़ियों के प्रति श्रद्धा कम नहीं हुई। आम लोग अभी भी अपनी मन्नतें लेकर ख़ानक़ाहों में जाते थे, लेकिन राजकीय दबाव के कारण सूफ़ी आंदोलन का वह खुलापन और विद्रोही तेवर कुछ हद तक कमज़ोर ज़रूर हुआ जो अलाउद्दीन ख़िलजी या मुहम्मद बिन तुग़लक के समय दिखाई देता था। उसके राज्य में ख़्वाजा जहांनियां-जहांगश्त (मृ. 1383 ई.) प्रत्येक दूसरे-तीसरे वर्ष दिल्ली पधारते तो सुल्तान शहर से बाहर जाकर उनका स्वागत करते। वह राजमहल के द्वार पर खड़ा हो जाता, जब तक ख़्वाजा जहांनियां-जहांगश्त न बैठते वह ख़ुद भी न बैठता। जब वे विदा होते, उनको विदा करने राजमहल के बाहर आता और जब तक ख़्वाजा जहांनियां-जहांगश्त उसकी आंखों से ओझल न हो जाते वह वहीं खड़ा रहता। जब वह उनकी ख़ानक़ाह में जाता और अगर वे इबादत कर रहे होते तो वह वहीं खड़ा रहता। बैठता नहीं। फ़ीरोज़शाह तुग़लक के काल में सूफ़ीमत का प्रभाव "संस्थागत और अनुशासित" हो गया था। सुल्तान ने उन्हीं सूफ़ियों को बढ़ावा दिया जो उसकी प्रशासनिक व्यवस्था और धार्मिक रूढ़िवादिता में बाधा नहीं बनते थे। इस काल ने सूफ़ी संतों को आर्थिक रूप से समृद्ध तो बनाया, लेकिन उनके उस स्वतंत्र और सर्व-समावेशी चरित्र को सीमित कर दिया जिसने भारत में इस्लाम के लोक-स्वरूप को गढ़ा था।

22.1 छ. शेख़ सफ़ीउद्दीन गाज़रूनी : भारत में सूफ़ी संत मध्य एशिया से आए और उत्तर-पश्चिम के इलाक़े में बस गए। शेख़ सफ़ीउद्दीन गाज़रूनी (या शेख़ सफ़ी-अल-दीन काज़रूनी) सिंध घाटी के ऊछ में बसे। सिंध पर मुसलमानों का शासन मुहम्मद-बिन-क़ासिम के काल (711-714 ई.) में ही स्थापित हो चुका था। पर उसका शासन काल अस्थिरता का काल था। उसके बाद ज़ैदियों और इस्माइलियों का शासन काल शुरू होता है। वे शीया सम्प्रदाय के अंतर्गत आते थे। लेकिन उनकी सूफ़ियों से उतनी आत्मीयता नहीं थी। बाद में जब इमामिया शीओं और सूफ़ियों के बीच आत्मीयता बढ़ी तो सूफ़ियों का आना भी बढ़ा। शेख़ गाज़रूनी का आना इसी काल में (1025 ई.) हुआ। वे मध्यकालीन भारत में सक्रिय रहे प्रसिद्ध 'काज़रूनिया सिलसिले' के एक महान सूफ़ी संत थे। अपने गुरु और चाचा शेख़ अबू इसहाक़ के आदेश पर, वे सूफ़ी मत के प्रचार-प्रसार के लिए भारत की ओर रवाना हुए। जब वे भारत आ रहे थे, तो उनके गुरु ने उन्हें एक ऊँट पर बिठाया और कहा कि जहाँ यह ऊँट रुक जाए, वहीं बस जाना। वह ऊँट पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में मुल्तान के पास एक निर्जन स्थान पर रुका। शेख़ सफ़ीउद्दीन वहीं ठहर गए और उन्होंने वहाँ 'उच' शहर की स्थापना की। उन्होंने वहाँ काज़रूनिया सिलसिले की पहली बड़ी ख़ानक़ाह बनाई। देखते ही देखते यह स्थान एक वीराने से बदलकर मुस्लिम आबादी और सूफ़ी साधना का एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक केंद्र बन गया। शेख़ सफ़ीउद्दीन भारत आने वाले काज़रूनिया सिलसिले के पहले सबसे प्रमुख सूफ़ी संत थे। बाद के काल में, दिल्ली सल्तनत के सुल्तान (जैसे अलाउद्दीन ख़िलजी और मुहम्मद बिन तुग़लक) भी काज़रूनिया सिलसिले के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे।

सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने जब पंजाब को ग़ज़नी साम्राज्य में मिला लिया, तो सूफ़ियों के आने का सिलसिला और भी बढ़ा। जुनैदिया परम्परा के सूफ़ी शेख़ अबुल फ़ज़ल मुहम्मद-बिन-हरून ख़त्तली ने अपने शिष्य शेख़ हुसैन ज़नजानी को लाहौर में धर्म सेवा के काम के लिए नियुक्त किया। फिर उनकी सहायता के लिए अपने युवा शिष्य सय्यद अबुल हसन अली-बिन-उस्मान हजवेरी को भेजा। इस तरह हज़रत अली हजवेरी का भारत आगमन होता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जिस रात वे लाहौर पधारे, उसी रात हज़रत ज़नजानी का स्वर्गवास हो गया। उन्हें लाहौर के निकट चाहमीरां में दफ़न किया गया। इतिहासकारों का दूसरा वर्ग यह मानता है कि शेख़ ज़नजानी सय्यद अली हजवेरी के स्वर्गवास तक जीवित रहे। अपने तर्क के समर्थन में वे बताते हैं कि ख़्वाजा मुईनउद्दीन चिश्ती एक बार लाहौर में उनके साथ ठहरे थे।

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मनोज कुमार

पिछली कड़ियां- सूफ़ीमत

संदर्भ : यहाँ पर   

 

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