बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

महात्मा गांधी हत्या केस-39

 

महात्मा गांधी हत्या केस-39

28 जनवरी, 1948

28 जनवरी को इंदिरा गांधी अपने चार साल के बेटे राजीव गांधी, बुआ कृष्णा हठी सिंह, नयनतारा पंडित और पद्मजा नायडू के साथ गांधीजी से मिलने बिड़ला हाउस गई थीं। उन सब को देखते ही गांधीजी खुशी से बोले थे…तो राजकुमारियाँ मुझसे मिलने आई हैं। इंदिरा गांधी की जीवनी लिखने वाली कैथरीन फ्रैंक के अनुसार, उनमें बात हो ही रही थी कि राजीव ने खेल खेल में आगंतुकों के लाए फूल गांधीजी के पैरों में बांधने शुरू कर दिए। गांधी ने मुस्करा कर राजीव के कान खींचे और कहा ऐसा मत करो बेटे। सिर्फ़ मरे हुए लोगों के पैर में फूल बाँधे जाते हैं। शायद गांधीजी को अपनी मौत का आभास हो चला था।

गांधीजी कुछ शांत और पुरानी यादों में खोए हुए थे। वे कस्तूरबा के बारे में, गाय का दूध न पीने के उस संकल्प के बारे में जो उन्होंने बहुत पहले लिया था, और राजा हरिश्चंद्र के बारे में बात कर रहे थे, वही राजा हरिश्चंद्र, जिनके नाटक ने उनकी जवानी के दिनों में उन्हें बहुत आनंदित किया था। राजकुमारी अमृत कौर ज़मीन पर बैठी उनकी बातें सुन रही थीं। बाद में, प्रार्थना सभा के बाद, राजकुमारी ने उनसे पूछा, “आज की प्रार्थना सभा में कोई शोर-गुल तो नहीं हुआ था?” "नहीं," उन्होंने जवाब दिया। "लेकिन तुम्हारे इस सवाल का मतलब है कि तुम मेरी चिंता कर रही हो। अगर मुझे किसी पागल इंसान की गोली से मरना ही है, तो मुझे मुसकुराते हुए मरना चाहिए। मेरे मन में कोई क्रोध नहीं होना चाहिए। मेरे दिल में और मेरे होंठों पर ईश्वर का नाम होना चाहिए। और अगर कुछ हो भी जाए, तो तुम्हें एक भी आंसू नहीं बहाना है।"

वे पाकिस्तान की ओर से किसी संकेत की प्रतीक्षा कर रहे थे, लेकिन कोई संकेत नहीं मिला। अंततः उन्होंने तय कर लिया कि जैसे ही उनकी सेहत थोड़ी बेहतर होगी, वे वर्धा स्थित अपने आश्रम चले जाएंगे। जाने की सटीक तारीख कुछ हद तक डॉक्टरों पर निर्भर थी, लेकिन यह उनकी अपनी मर्जी पर भी निर्भर था; उन्होंने फिलहाल 31 जनवरी को वर्धा के लिए रवाना होने का फैसला कर लिया था।

गांधीजी भविष्य के कांग्रेस का ब्ल्यू प्रिंट तैयार कर रहे थे। उसमें उन्होंने कुछ ज़रूरी संशोधन किया। इसके लिए गठित उप-समिति के सदस्यों आर.आर दिवाकर और आचार्य जुगल किशोर से बातचीत की। फिर नेहरू, राजेन्द्र प्रसाद और राजकुमारी अमृत कौर से मुलाक़ात की। शीन के इंटरव्यू को पूरा किया। शाम की सभा में उन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के हालातों पर चर्चा की। दक्षिण अफ़्रीका में भारतीय अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। उन्होंने उन सत्याग्रहियों की सफलता की कामना की और वहां की सरकार से अपील की कि सत्याग्रहियों के ख़िलाफ़ जुल्म न किया जाए।

हत्या की साज़िश

फ़्रंटियर मेल के तीसरे दर्ज़े के भीड़ वाले डिब्बे में बैठा करकरे दिल्ली की तरफ़ आ रहा था।

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ग्वालियर में परचुरे ने अपने बेटे नीलकंठ और बडीगार्ड रूपा को गंगाधर एस. दंडवते को बुलाने के लिए भेजा। दंडवते परचुरे वड़ा आ गया। दंडवते बंदूक बेचने वाले को जानता था। परचुरे ने दंडवते से उन दोनों का परिचय कराया और उसे एक पिस्तौल का बन्दोबस्त करने का अनुरोध किया। परचुरे के पास एक पिस्तोल था। दंडवते ने परचुरे से गोडसे को अपना पिस्तौल दे देने के लिए कहा। परचुरे ने साफ-साफ कहा, “मैं ऐसा मूर्ख नहीं हूं कि इन्हें अपना पिस्तौल दे दूं, जो बाद में जांच में साबित हो जाए कि मेरा है।” दंडवते यह कहकर चला गया कि वह शाम तक कोई न कोई इंतज़ाम करता है। अपने मेहमानों से यह कहकर कि वे उस पर पूरा भरोसा कर सकते हैं, वह पाटनकर बाज़ार स्थित अपनी डिस्पेंसरी चला गया।

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दोपहर 12.30 बजे हिन्दू महासभा का कार्यकर्ता मधुकर केशव काले परचुरे के घर आया। वह ग्वालियर के प्रशासन से संबंध रखता था। वह पांच साल से परचुरे को जानता था। वह हिन्दू राष्ट्र सेना का सदस्य था। वह दंडवते को भी जनता था। उसका परचुरे के घर आना-जाना लगा रहता था। वह जानना चाहता था कि महाराजा के कांग्रेस के साथ सरकार बनाने के निर्णय के ख़िलाफ़ महासभा का अगला कार्यक्रम क्या है? जब वह परचुरे के घर पर पहुंचा तो देखा कि परचुरे दो अनजान लोगों और दंडवते से बात कर रहा है। बाद में उसे पता चला कि अन्य दो आप्टे और नाथूराम थे। अनजान लोगों के हाथ में देसी कट्टा था। उसने देखा कि वे एक पिस्तौल की ट्रिगर दबाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें उसमें सफलता नहीं मिली, नाथूराम और आप्टे उसे ठीक से चला नहीं पा रहे थे। दंडवते ने कहा आइए आपको मैं इसके चलाने की विधि समझाता हूं। उन्हें चलाने की विधि दिखाने के लिए वह उन्हें घर के पीछे ले गया। परचुरे उधर नहीं गया। दंडवते ने एक पेड़ का निशान साध कर उसे चलाने की विधि समझाई। जब नाथूराम ने वैसा ही प्रयास किया, तो न तो ट्रिगर दबा और न ही गोली चली। नाथूराम ने दंडवते से अच्छी बन्दूक दिलाने के लिए कहा, और यह भी कहा कि वह उसकी अच्छी क़ीमत देगा। लेकिन उसने यह भी कहा कि उसे तीन बजे की गाड़ी से वापस जाना है, इसलिए जल्दी ही इंतज़ाम कर दे। दंडवते ने कहा कि वह शाम तक ही इंतज़ाम कर पाएगा, इसलिए उन्हें रात की गाड़ी से वापस जाना होगा। गोडसे इसके लिए तैयार हो गया। काले 13.30 बजे परचुरे के घर से चला गया। आप्टे-गोडसे ने अपने मेज़बान के साथ दोपहर का खाना खाया और उसके बाद 'मौजूदा राजनीतिक हालात' पर बातचीत की।

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दंडवते गन डीलर जगदीश प्रसाद गोयल के पास गया। कुछ ही दिनों पहले गोयल ने एक 9 एम.एम. बेरेट्टा सेमी औटोमैटिक पिस्तौल प्राप्त की थी। दंडवते उससे बोला, “मुझे एक पिस्तौल की ज़रूरत है। क्या तुम अपना पिस्तौल पांच सौ रुपयों में बेच सकते हो?” जगदीश प्रसाद राज़ी हो गया और उसने पांच सौ रुपए में सात गोलियों के साथ अपना पिस्तौल दंडवते को दे दिया। यह एक इटालियन पिस्तौल बरेटा M1934 संख्या -  606824 थी, जो लम्बाई में मात्र छः इंच थी। यह बेरेटा अपने नियत अंजाम तक पहुँचने के लिए दुनिया के आधे हिस्से का सफर तय करके आई थी। 1934 में इटली में बनी इस पिस्तौल को मुसोलिनी का एक अधिकारी एबिसिनिया ले गया था। इटली की रॉयल आर्मी का यह हथियार द्वितीय इटालियन-इथोपिया युद्ध (1935-37) में बहुत प्रयोग हुआ। ग्वालियर महाराज महाराजा जीवाजी राव सिंधिया की ग्वालियर सेना ब्रिटिश हुकुमत के लिए द्वितीय इटालियन-इथोपिया युद्ध में भाग ले रही थी, तब एक मोर्चे पर मुसोलिनी ने ब्रिटिश टुकड़ी के समक्ष समर्पण कर दिया। वहाँ से इसे चौथी ग्वालियर इन्फैंट्री के एक अधिकारी ने 'हासिल' कर लिया; यह रेजिमेंट उस सेना का हिस्सा थी जिसे इटालियनों का आत्मसमर्पण स्वीकार करने के लिए एबिसिनिया भेजा गया था। बटालियन के भारत लौटने के बाद, यह पिस्तौल कई हाथों से गुज़री। ग्वालियर में किसी के पास पिस्तौल होना कोई बड़ी बात नहीं थी; क्योंकि भले ही ग्वालियर रियासत में 'आर्म्स रजिस्ट्रेशन एक्ट' (हथियार पंजीकरण कानून) था, लेकिन इसे कभी सख्ती से लागू नहीं किया गया था। ब्रिटिश भारत की तरह यहाँ सिर्फ हथियार पास रखना कोई गंभीर आपराधिक जुर्म नहीं माना जाता था।

सेना की कमान संभाल रहे एक ब्रिटिश अधिकारी को युद्ध में बहादुरी के इनाम में यह पिस्तौल मिली, जिसे बाद में ग्वालियर के ही एक सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल वी बी जोशी ने 1934 में बने इस इटालियन बरेटा पिस्तौल को उस ब्रिटिश अफसर से खरीद लिया था। इसके बाद ग्वालियर निवासी जगदीश गोयल ने इसे उनके परिवार के एक सदस्य से खरीद लिया था। उस पिस्तौल की मैगज़िन में नौ गोलियां पहले से ही थीं। गांधीजी की ह्त्या के बाद शुरू में गोयल भाग गया था, लेकिन बाद में अप्रैल में उसे झांसी में गिरफ़्तार कर लिया गया। गोयल ने यह नहीं बताया कि उसे यह पिस्तौल कहाँ से मिली। ज़ाहिर है, जब यह पता चला कि गांधीजी की हत्या में इसी बेरेटा का इस्तेमाल हुआ था, तो कोई भी यह नहीं मानना ​​चाहता था कि कभी यह पिस्तौल उसके पास भी रही थी। हो सकता है कि गोयल ने उस व्यक्ति का नाम बताने से इनकार कर दिया हो जिसने उसे यह पिस्तौल बेची थी, ताकि वह व्यक्ति किसी मुसीबत में न फँसे। वैसे भी, चूंकि नाथूराम ने अपना जुर्म कबूल कर लिया था, इसलिए दंडवते के बेचने से पहले यह पिस्तौल किसके पास थी, इसका पता लगाने का कोई खास महत्व नहीं रह गया था।

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उसी शाम दंडवते फिर परचुरे के घर आया। इस बार उसके पास एक स्वचालित पिस्तौल और 10-12 राउंड गोलियां थीं। शाम से पहले दंडवते ने पिस्तौल और कारतूस गोडसे को दिया। आप्टे और गोडसे, दोनों की बाछें खिल गईं। नाथूराम ने गांधीजी की हत्या की जैसी योजना बनाई थी, उसके लिए इससे बेहतर हथियार मिलना मुश्किल था। दंडवते ने 500 रुपए मांगे। उनके पास इतना पैसा नहीं था। 300 रुपए और अपनी पुरानी बंदूक उसने दी। दंडवते क्रोध से आग बबूला हो गया और या तो पूरा कैश या फिर बंदूक वापस कर देने की बात करने लगा। गोडसे बोला कि यह पेशगी है, जल्द ही वह पूरा पैसा दे देगा। परचुरे के बीच में पड़ने से दंडवते किसी तरह माना। रात का भोजन करने के बाद 10.30 की बंबई-अमृतसर एक्सप्रेस पकड़ने के लिए गोडसे और आप्टे ग्वालियर स्टेशन की ओर चले। परचुरे अपने बेडरूम में गया और सो गया। दंडवते भी अपने घर चला गया।

रात के 11 बजे तक वे दोनों वापस रेलवे स्टेशन के अहाते में आ गए, जहाँ तांगे खड़े थे। तांगों के पीछे गोबर के उपलों की आग जल रही थी, जिससे पूर्णिमा की चाँदनी में धुएं की पतली लकीरें ऊपर उठ रही थीं। बॉम्बे-अमृतसर एक्सप्रेस को वहाँ पहुँचने में अभी 30 मिनट और लगने थे। लेकिन ट्रेन लगभग 3 घंटे लेट थी, और वे ग्वालियर से रात के 2 बजे के भी काफी बाद, यानी 29 तारीख की सुबह, वहाँ से निकल पाए।

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करकरे ने पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर ही सोकर रात गुज़ारी। वहां पर सैंकड़ों शरणार्थी भी शरण लिए हुए थे।

 

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मनोज कुमार

 

पिछली कड़ियां- महात्मा गांधी हत्या केस

संदर्भ : यहाँ पर

 

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