सूफ़ीमत के विभिन्न आयाम
22. सूफ़ी सिलसिला और भारत में सूफ़ीवाद-4
22.2 हज़रत शेख़ अली बिन
उस्मान अल-हुजविरी रह.( जन्म 1009 ईस्वी (400 हिजरी) मृ. 1073)
ग्यारहवीं शताब्दी के प्रथम चरण (1035 ई.) में महान इस्लामी विद्वान, सूफ़ी संत और फ़ारसी भाषा के प्रसिद्ध लेखक ख़्वाजा सय्यद अली हुजविरी रह.
का भारत आगमन हुआ। वे मौजूदा अफ़गानिस्तान के शहर गज़नी के निकट हुजविर
के रहने वाले थे। उनका असल नाम अली, कुन्नियत 'अबुल हसन' और वालिद का नाम सैय्यद उस्मान बिन अली था। अरबी
नामकरण पद्धति के अनुसार उनका पूरा नाम अबू अल-हसन अली इब्न उस्मान अल-जुल्लाबी
अल-हुजविरी है। ग़ज़नी में 'जलाब' और 'हुजवीर' नाम के दो मोहल्ले थे। उनका ननिहाल जलाब में और
ददिहाल हुजवीर में था, और इसी वजह से उनको 'अल-जुलाबी अल-हुजविरी' कहा जाता है। वह माता और पिता दोनों तरफ़ से
हसनी और हुसैनी सैय्यद थे, और उनका वंश सीधा हज़रत अली (रज़ि.) और इमाम हसन (रज़ि.) से मिलता है।
अपनी शुरुआती शिक्षा के बाद उन्होंने बग़दाद, निशापुर, दमिश्क और ख़ुरासान जैसे बड़े इस्लामी केंद्रों
का दौरा किया और अपने दौर के बड़े-बड़े सूफ़ी संतों से मुलाक़ात की। वह हनफ़ी
न्यायशास्त्र (फ़क़ीह) के जानकार थे और अपने
पीर-ओ-मुर्शिद हज़रत अबुल फ़ज़ल अल-ख़ुतली के ज़रिए जुनैदिया सूफ़ी सिलसिले
से जुड़े थे। वे अपने आध्यात्मिक गुरु (मुर्शिद) हज़रत शेख अबुल फजल अल-ख्त्तली
के आदेश पर गज़नी (अफगानिस्तान) से लाहौर आए थे। उस वक़्त लाहौर ज्ञान और
आध्यात्मिकता का एक बहुत बड़ा केंद्र बन गया, जहाँ उनके उपदेशों से हज़ारों लोग प्रभावित हुए।
निकोलसन के अनुसार, सन् 1039 ईस्वी में ग़ज़नवी (तुर्की) सेना के आक्रमण के दौरान उन्हें एक युद्धबंदी (Captive/Prisoner) के रूप में अपनी इच्छा के
विरुद्ध सिंधु नदी पार कर लाहौर लाया गया था। बाद में वह लाहौर में बस गए। उन्होंने सूफ़ी सिद्धांतों की रूप-रेखा प्रस्तुत
की। उन्हें पूरे दक्षिण एशिया में बेहद अदब और एहतराम के साथ दाता गंज बख़्श (खज़ाना बख़्शने वाले) के नाम से भी जाना जाता
है। फ़ारसी भाषा में कोष प्रदान करने वाले को “गंजबख़्श” कहते हैं। वे एक सूफ़ी साधक और विचारक थे। उनकी मृत्यु 1073 ई. में लाहौर में हुई। उनका मक़बरा लाहौर के
पास है। सुलतान महमूद गज़नी के पोते ने
उनकी मज़ार पर दरगाह बनवाई। उनकी दरगाह को दाता दरबार यानी देने वाले की
दरगाह कहा जाता है। उनकी मज़ार इस उपमहाद्वीप में आज भी आध्यात्मिक केंद्र के रूप
में मशहूर है।
उन्होंने “कश्फ़-अलमहजूब” (परदे वाले की बेपर्दगी), नाम से एक किताब लिखी जिसमें तसव्वुफ़ के मायने और इसका पालन करने वाले
सूफ़ियों के बारे में बताया गया है। इस किताब में उन्होंने सूफ़ी मत के सिद्धांतों, आत्मशुद्धि, विनम्रता और ईश्वरीय प्रेम को बहुत ही आसान और
सीधे तरीक़े से समझाया है। आज भी इस किताब को सूफ़ी मार्ग के मुसाफ़िरों के लिए एक
मुकम्मल गाइड (Manual of Sufism) माना जाता है। इस पुस्तक की सूफ़ी मत
में संविधान की स्थिति प्राप्त है, और इसमें उस समय तक प्रचलित 12 सम्प्रदायों की जानकारी दी गई है। उनके मसलक (पंथ) को मज़हब (धर्म) कहा गया। उन्होंने सूफ़ियों के जिन बारह
संप्रदायों की चर्चा की है उनमें से उनके अनुसार दस सही मार्ग पर थे, और दो भ्रष्ट थे। उनके अनुसार सूफ़ी परंपराएं
निम्न लिखित थीं,
22.2.1 मुहासबी पंथ – सूफीवाद (तसव्वुफ़)
में मुहासबी पंथ (या मुहासबी सिलसिला) एक प्रारंभिक और अत्यंत प्रभावशाली
आध्यात्मिक विचारधारा है। इसकी नींव नौवीं शताब्दी के महान सूफी संत, धर्मशास्त्री और मनोवैज्ञानिक हज़रत हारिस इब्न
असद अल-मुहासिबी रह. (781–857 ईस्वी) ने बगदाद
(इराक़) में रखी थी। उन्होंने शुद्ध तौहीद (एकेश्वरवाद) पर बल दिया था। वे इस्लामी
शरीअत और पैग़म्बर की सुन्नत (प्रथा, प्रणाली) के अनुयायी थे। यह पंथ सूफी इतिहास में
तपस्या (Asceticism) से रहस्यवाद (Mysticism) की ओर संक्रमण का
एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। उन्होंने सूफ़ीवाद में दर्शन को समाहित किया।
हज़रत मुहासिबी ने अपने जीवन की शुरुआत एक धर्मशास्त्री के रूप में की थी। उन्होंने
तर्क और बुद्धि के उपयोग की वकालत की। मुताज़िलियों के साथ विवादों में भी
उन्होंने इसी तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तरह देखा जाए तो वे अशआरियों के अग्रगामी
थे। पहली चीज़ जिसने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया, वह थी मुस्लिम
समुदाय का कई संप्रदायों और उप-संप्रदायों में विभाजन, जिनमें से प्रत्येक
ने मोक्ष के एकाधिकार का दावा किया था। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा इन
भिन्नताओं के बीच स्पष्ट मार्ग और सच्चे मार्ग की खोज के लिए समर्पित कर दिया। वह
हर तरह के लोगों से मिले, जो सत्य को जानने और उसका पालन करने का दावा करते
थे, लेकिन उनसे आश्वस्त न हो सके। तब उन्होंने कहा, "गहराई से
सोचने और लंबे समय तक विचार करने के बाद मैंने मार्गदर्शन के लिए ज्ञान की ओर देखा,
तब मुझे ईश्वर की पुस्तक और पैगंबर के अभ्यास और विश्वासियों की सहमति से यह
स्पष्ट हो गया था कि वासना आदमी को अंधा कर देती है और इसलिए उसे सही मार्ग की खोज
करने से रोकती है, और उसे सत्य से भटका देती है।" इस धारणा ने उन्हें
आत्म-परीक्षा (मुफ़्फ़िसबाह, जिसने उन्हें मुहासबी की उपाधि दी), आत्म-अनुशासन, और नैतिक परिवर्तन
के लिए प्रेरित किया। इस पंथ का पूरा दर्शन इसके नाम 'मुहासाबा' पर टिका है, जिसका अर्थ होता है
"अपने कर्मों, इरादों और आंतरिक
विचारों का निरंतर हिसाब-किताब करना"। हज़रत हारिस
को 'अल-मुहासिबी' उपनाम भी इसीलिए मिला क्योंकि वे हर वक्त
अपने नफ़्स (अहंकार/आत्मा) की कड़ी परीक्षा लेते थे।
इस पंथ के अनुसार, किसी भी बाहरी
इबादत (प्रार्थना) से पहले मन और नीयत (इरादे) की शुद्धि अनिवार्य है। साधक को रोज
खुद से यह सवाल करना चाहिए कि उसके द्वारा किए गए कार्य अल्लाह के लिए थे या
लोक-दिखावे (रिया) और घमंड के लिए। हज़रत अल-मुहासिबी को सूफी मनोविज्ञान का
जनक कहा जाता है। उन्होंने मानव मन की गहराइयों और धोखेबाज़ प्रवृत्तियों (नफ़्स/अहंकार)
का गहराई से अध्ययन किया। उनका मानना था कि इंसान के दिल में किसी भी काम को करने
का विचार (खातिर) सबसे पहले आता है। मुहासबी पंथ सिखाता है कि उस विचार पर
तुरंत अमल करने के बजाय, मन के दरवाजे पर रुककर उसकी जांच करनी चाहिए कि
वह विचार नेक है या बुरे नफ़्स (वासना) की तरफ से है।
उन्होंने महसूस
किया कि मोक्ष का मार्ग ईश्वर का भय, ईश्वर के अध्यादेशों का अनुपालन, ईश्वर के प्रति
ईमानदारी से आज्ञाकारिता और ईश्वर के पैगंबर के अनुकरण में निहित है।
जब उन्होंने
संतों के जीवन और आचरण में नियमों की खोज करने की कोशिश की, तो उन्हें फिर से
मतभेदों का सामना करना पड़ा। फिर भी वे आश्वस्त थे कि केवल वे लोग ही निश्चित
मार्गदर्शक हो सकते हैं, जो ईश्वर को जानकर, उसका आनंद प्राप्त
करने के लिए परिश्रम करते हैं। लेकिन ऐसे लोगों को
पाना उनके लिए लगभग असंभव साबित हुआ। फिर भी, उन्होंने अपनी खोज ज़ारी रखी, क्योंकि यह उनके
लिए जीवन और मौत का सवाल था। अंत में, ईश्वर की कृपा से वह अपनी खोज में सफल रहे
और ऐसे लोगों से मिले जो धर्मपरायणता के आदर्श थे। उनसे मिलकर उनमें व्यापक
परिवर्तन आया। इस परिवर्तन के बावजूद, रहस्यवाद के प्रति उनका दृष्टिकोण उनके
बौद्धिक दृष्टिकोण से प्रभावित था। बगदाद के उनके प्रसिद्ध शिष्य हज़रत जुनैद
बताते हैं कि कैसे वे रहस्यवाद के विभिन्न विषयों पर उनसे प्रवचन करते थे।
रहस्यवाद के
विज्ञान में मुहासिबी का एक महत्वपूर्ण योगदान उनकी ‘मुक़ाम’ और ‘हाल’
की परिभाषा और इन अवस्थाओं के बीच संतुष्टि (छुटकारा) को शामिल करना है। उनके
अनुसार ‘मुक़ाम’ अवस्था वह विशेष स्थिति है जिसे एक साधक
उस तक पहुँचने के लिए आवश्यक प्रयास करने के बाद प्राप्त करता है।
दूसरी ओर, ‘हाल’ एक ऐसी चीज़ है जो
मनुष्य अपने किसी भी प्रयास को शामिल किए बिना भगवान की कृपा से प्राप्त करता है। मुहासिबी
के अनुसार संतुष्टि (छुटकारा) मन की एक मनोवृत्ति है, जिसे मनुष्य अपने
स्वयं के प्रयासों से नहीं, बल्कि दैवीय कृपा से प्राप्त करने में सक्षम है।
वे कहते हैं, "संतोष हृदय की
सर्वोत्कृष्टता है, जो उन घटनाओं का सार है जो ईश्वरीय आदेश से प्रवाहित से होती
हैं।"
इस समस्या के संबंध
में कि क्या एक सूफ़ी के लिए ग़रीबी (फ़क़्र) या ऐश्वर्य या धन
का रवैया बेहतर है? मुहासिबी का मानना है कि बाद वाला रवैया बेहतर है। उनका तर्क
है कि धन भगवान का एक गुण है, जबकि ग़रीबी को ईश्वर के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। इसलिए, भगवान और मनुष्य के
लिए सामान्य विशेषता (ऐश्वर्य या धन) एक ऐसी विशेषता (निर्धनता) से श्रेष्ठ है जो
भगवान पर लागू नहीं होती है।
प्रारंभिक सूफियों
में कई लोग अत्यधिक वैराग्य या दुनिया को पूरी तरह छोड़ देने (तपस्या) पर जोर देते
थे। लेकिन मुहासबी पंथ ने बुद्धि/विवेक (अक्ल) और आध्यात्मिक संयम के बीच एक बेहतरीन
संतुलन बनाया। उन्होंने अपने अनुयायियों को भावुकता में बहने के बजाय तर्क और
धार्मिक ज्ञान के दायरे में रहकर रूहानियत हासिल करने की शिक्षा दी।
इस संप्रदाय में
केवल बाहरी धार्मिक चोले या दिखावे की तपस्या का कोई मूल्य नहीं माना गया। हज़रत
मुहासिबी का मानना था कि जब तक दिल के भीतर छिपी बीमारियां जैसे—पाखंड, ईर्ष्या और अहंकार
पूरी तरह खत्म नहीं हो जाते, तब तक ईश्वर की सच्ची निकटता प्राप्त नहीं की जा
सकती।
इसी तरह, रहस्यवादी के लिए
उपस्थिति/विद्यमान (हुज़ूर) या अदृश्य/अनुपस्थिति (ग़ैबत) के बारे में
विवाद में उनका रवैया यह है कि उपस्थिति अनुपस्थिति से बेहतर है, क्योंकि सभी
उत्कृष्टता उपस्थिति से बंधे हैं। उनका कहना है कि
स्वयं से अनुपस्थिति रहस्यवादी पथ पर एक प्रारंभिक चरण है जो धीरे-धीरे भगवान के
सामने उपस्थिति की ओर ले जाती है, और लक्ष्य तक पहुंचने के बाद पथ उसके लिए
अपूर्णता बन जाता है।
मुहासबी पंथ ने बाद के रूढ़िवादी और शास्त्रीय सूफीवाद (Orthodox Sufism) को
आकार देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इस्लाम के सबसे प्रसिद्ध सूफी संतों में से एक, हज़रत जुनैद बगदादी
रह., हज़रत मुहासिबी के ही शिष्य थे। जुनैद बगदादी ने मुहासाबा के
सिद्धांतों को आगे बढ़ाया। आगे चलकर इमाम अल-ग़ज़ाली रह. ने जब अपनी कालजयी
किताब 'इह्या उलूम अल-दीन' (The Revival of the Religious Sciences) लिखी, तो उन्होंने
आत्म-शुद्धि के लिए मुहासबी पंथ के सिद्धांतों और हज़रत अल-मुहासिबी के लेखन को
अपना मुख्य आधार बनाया। मुहासबी पंथ सूफीवाद का वह वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप
है जो इंसान को समाज से भागने के बजाय, अपने स्वयं के भीतर झांकने और आत्म-सुधार
करने पर जोर देता है।
हज़रत हारिस इब्न असद अल-मुहासिबी रह. न केवल एक महान
सूफी संत थे, बल्कि एक असाधारण
लेखक और इस्लामी मनोविज्ञान व दर्शन के अग्रदूत भी थे। उन्होंने
आत्म-शुद्धि (तज़किया-ए-नफ़्स), नैतिकता और रूहानियत पर लगभग 200
से अधिक छोटी-बड़ी किताबें और शोध निबंध
लिखे। अर-रिआया
लि-हुक़ूक अल्लाह (The Observance of
God's Rights) हज़रत अल-मुहासिबी की सबसे प्रसिद्ध और कालजयी (Masterpiece) रचना है। सूफी साहित्य और इस्लामी नैतिकता में इस
किताब को एक मील का पत्थर माना जाता है। इस पुस्तक में बहुत ही बारीक मनोवैज्ञानिक
विश्लेषण के साथ यह समझाया गया है कि मनुष्य अपने दैनिक जीवन और इबादत में अल्लाह
के अधिकारों (हुक़ूक) को कैसे पूरा करे। किताब अत-तवाहुम (The
Book of Conception / Imagination) सूफी
साहित्य की सबसे
अनूठी और कल्पनाशील पुस्तकों में से एक है।
इसमें उन्होंने मृत्यु के बाद के जीवन का एक जीवंत और रोंगटे खड़े कर देने वाला
चित्रण किया है। यह साधक को एक गहरा मानसिक अनुभव (Visualization)
प्रदान करती है, जहाँ
पाठक मृत्यु के क्षण, कब्र की स्थिति, क़ियामत (न्याय का दिन),
हिसाब-किताब के समय के भय और अंततः जन्नत (स्वर्ग) व जहन्नम (नरक) के
दृश्यों की कल्पना करता है। इसका मुख्य उद्देश्य मनुष्य के दिल में ईश्वर का भय और
आख़िरत (परलोक) के प्रति जागरूकता पैदा करना है,
ताकि वह सांसारिक मोह-माया से बच सके। अदब अन-नफ़्स (The
Discipline of the Soul) पुस्तक
पूरी तरह से मानव
स्वभाव और सूफी मनोविज्ञान पर केंद्रित है। इसमें हज़रत
मुहासिबी ने नफ़्स (अहंकार/आंतरिक इच्छाओं) को अनुशासित और नियंत्रित करने की
विधियाँ बताई हैं। किताब
अल-मसाएल फी आमाल अल-कुलूब (The Book of
Questions on the Actions of the Heart) किताब
दिल की आंतरिक अवस्थाओं और उसकी आध्यात्मिक क्रियाओं पर आधारित है। इसमें सूफी
मार्ग पर चलने वाले शिष्यों (मुरीदों) द्वारा पूछे गए व्यावहारिक और आध्यात्मिक
प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। रिसाला अल-मुस्तरशिदीन (Treatise
for the Seekers of Guidance) एक
संक्षिप्त लेकिन बेहद व्यावहारिक और शिक्षाप्रद पुस्तिका (Treatise) है। यह उन नए साधकों के लिए एक नियमावली (Manual) है जो रूहानियत के रास्ते पर कदम रखना
चाहते हैं।
22.2.2 क़सारी या मलामती पंथ – सूफ़ीवाद (तसव्वुफ़) में मलामती
पंथ (मलामत्तिया) या क़सारी
सिलसिला एक बेहद अनोखी, रहस्यमयी और क्रांतिकारी विचारधारा है। इसकी शुरुआत 9वीं शताब्दी के अंत में
निशापुर (ख़ुरासान, वर्तमान ईरान) में हुई थी। इस
पंथ के पुरोधा थे ख़्वाजा अबूसालेह-बिन-अहमद-बिन-अमारा-अलक़सार रह. (मृ. 884 ई.)। इसी कारण इसे 'क़सारी' संप्रदाय भी कहा जाता है।
'मलामत' शब्द का अरबी में अर्थ होता है "निंदा, फटकार या बुराई सुनना"। उनका मानना था कि आत्मशुद्धि के लिए लोगों के बीच निंदनीय होना अनिवार्य है।
इस पंथ के सूफ़ी साधकों का मानना था कि समाज में प्रशंसा और सम्मान मिलने से इंसान
के भीतर अहंकार (नफ़्स) और पाखंड (रिया) जन्म लेता है, जो ईश्वर की राह में सबसे बड़ी बाधा है। वे कहा
करते थे कि ऐसा आचरण करो कि लोग उसकी निंदा करें और प्रताड़ित करने की कोशिश करें,
लेकिन ध्यान रहे इस काम में धर्मशास्त्र की अवहेलना न हो। हो सकता है इनका तर्क इस
बात पर आधारित हो कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. को अरब के लोग ईमानदार,
सत्यवादी और अपना परम मित्र समझते थे। लेकिन ज्योंही उन्होंने नबी होने की घोषणा
की, तभी उन्हें वही लोग पागल और शत्रु कहने लगे। इस पंथ का मानना है कि अहं ने
ईश्वर से लोगों की दूरी पैदा कर दी है। निंदा अहं को जड़ से उखाड़ फेंकती है।
मलामती सूफ़ियों का सबसे बड़ा सिद्धांत यह था कि उनकी इबादत (प्रार्थना) और
रूहानी कमाल केवल उनके और अल्लाह के बीच होने चाहिए (इख़लास/पूर्ण निष्ठा), दुनिया को इसकी भनक भी नहीं लगनी चाहिए। वे अपनी
रातों की इबादतों, वज़ीफ़ों और आध्यात्मिक
अवस्थाओं को पूरी तरह छुपा कर रखते थे। अपने नफ़्स (अहंकार) को पूरी तरह
कुचलने के लिए ये सूफ़ी समाज में जानबूझकर ऐसी सामान्य हरकतें करते थे जिससे लोग
उन्हें पाखंडी, गुनहगार या साधारण समझें और
उनकी निंदा (मलामत) करें। उदाहरण के लिए, वे रमज़ान के अलावा आम
दिनों में (जब वे नफ़्ली रोज़ा रखते थे) लोगों के सामने जानबूझकर कुछ खा लेते थे
ताकि लोग समझें कि यह व्यक्ति रोज़ा नहीं रखता और उसकी निंदा करें। वे कभी भी
सूफ़ियों जैसा विशेष चोगा या पोशाक नहीं पहनते थे ताकि वे अलग से न दिखें। वे आम
लोगों या मज़दूरों की तरह साधारण कपड़े पहनते थे और मेहनत-मज़दूरी करके हलाल रोज़ी
कमाते थे। मलामती सूफ़ी एक तरह से दोहरी ज़िंदगी जीते थे। दुनिया की नज़रों में वे
एकदम सामान्य, कभी-कभी लापरवाह या शरीयत
के नियमों के प्रति उदासीन दिखाई देते थे (हालांकि वे आंतरिक रूप से कभी शरीयत का
उल्लंघन नहीं करते थे)। उनका दिल हर पल अल्लाह की याद (ज़िक्र) और गहरे रूहानी
तजुर्बों में डूबा रहता था। इस पंथ के प्रणेता हम्दून अल-क़सार बोलकर या ज़ोर से
किए जाने वाले ज़िक्र (ज़िक्र-ए-जहरी) के सख़्त ख़िलाफ़ थे। उनका मानना था
कि ज़ोर से अल्लाह का नाम लेने में यह इच्छा छुपी हो सकती है कि कोई दूसरा हमारी
इबादत को सुने। इसलिए वे केवल 'ज़िक्र-ए-ख़फ़ी' (दिल ही दिल में चुपचाप किया जाने वाला स्मरण) को ही सही मानते थे। मलामती सूफ़ी अपने इस दर्शन का आधार पवित्र क़ुरान की
सूरह अल-क़ियामा की आयत नंबर 2 को मानते हैं: "व ला उक़्सिमु बिन-नफ़्सिन लव्वामा" (अर्थात: और मैं शपथ लेता हूँ उस नफ़्स की जो
अपने आप को कोसती/मलामत करती है)। वे मानते थे कि अपनी आत्मा की कमियों को देखना
और खुद को दोषी मानना ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग है।
शुरुआत में यह आंदोलन स्वतंत्र था, लेकिन बाद में 10वीं शताब्दी के अंत तक यह बगदाद के मुख्यधारा के सूफ़ीवाद में
विलीन हो गया। महान सूफ़ी विद्वानों (जैसे शेख अली हुजविरी रह. और इमाम
सुलामी) ने सच्चे मलामती सूफ़ियों की बहुत तारीफ़ की है और उन्हें 'इख़लास' (सच्चाई) का सर्वोच्च शिखर
बताया है। बाद के दौर में कई ढोंगी लोगों ने मलामती विचारधारा की आड़ में शरीयत के
बुनियादी नियमों (जैसे नमाज़ छोड़ना या खुलेआम गुनाह करना) का उल्लंघन करना शुरू
कर दिया, जिसके कारण रूढ़िवादी उलेमा
और मुख्यधारा के सूफ़ियों ने इसकी कड़ी आलोचना भी की। फिर भी इस पंथ का महत्त्व कम
नहीं हो जाता, क्योंकि मलामती या क़सारी
पंथ सूफ़ीवाद का वह कठिन रास्ता है जहाँ साधक अल्लाह की मोहब्बत में अपनी सामाजिक
प्रतिष्ठा, सम्मान और नाम-ओ-नमूद की
बलि दे देता है ताकि उसका घमंड पूरी तरह ख़त्म हो जाए।
22.2.3 तैफ़ूरी पंथ – सूफीवाद (तसव्वुफ़)
में तैफ़ूरी पंथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण, रहस्यमयी और आध्यात्मिक रूप से आवेशपूर्ण विचारधारा
है। इसके प्रवर्तक 9वीं शताब्दी के महान सूफी संत ख़्वाजा अबूयज़ीद
तैफ़ूर-बिन-सरोशान बिस्तामी रह. थे। हज़रत बायज़ीद बस्तामी का असल नाम 'तैफ़ूर इब्न ईसा' था, इसी कारण उनके अनुयायियों और इस विचारधारा को 'तैफ़ूरी' कहा जाता है। यह पंथ सूफी
इतिहास में अपनी अनूठी रूहानी अवस्थाओं और दर्शन के लिए जाना जाता है।
इस पंथ का विश्वास सुकुर (सुक्र/मूर्च्छा) में है। 'सुक्र' का अर्थ होता है "अल्लाह की मोहब्बत में पूरी तरह मदहोश या मस्त
हो जाना"। इस पंथ के अनुसार सुकुर में बंदे का
ईश्वर से समागम हो जाता है और वह सभी सांसारिकता से विरक्त हो कर ईश साधना में लीन
हो जाता है। जब साधक अल्लाह के प्रेम की पराकाष्ठा पर पहुँचता है, तो वह अपनी सुध-बुध खो बैठता है। वे इस अवस्था
को 'सह्ब' (Sobriety/होश) से बेहतर मानते थे, क्योंकि उनका मानना था कि होश में रहने पर इंसान का 'अहंकार' (Self) बाकी रहता है, जबकि मदहोशी में केवल ईश्वर का अस्तित्व बचता है।
हज़रत बायज़ीद बस्तामी पहले ऐसे सूफी थे जिन्होंने 'फ़ना-फ़िल्लाह' (अल्लाह की जात में खुद को
पूरी तरह मिटा देना) के सिद्धांत को विस्तार से समझाया। तैफ़ूरी दर्शन कहता है कि
जैसे पानी का एक कतरा समंदर में मिलकर अपना अस्तित्व खो देता है, वैसे ही साधक को अपनी पहचान, इच्छाएं और अहंकार अल्लाह की मर्जी में विलीन कर
देने चाहिए। रूहानी मदहोशी (सुक्र) की हालत में तैफ़ूरी सूफियों के मुख से
कुछ ऐसे शब्द या वाक्य निकल जाते थे जो ऊपरी तौर पर शरीयत (धार्मिक नियमों) के
खिलाफ या अजीब लगते थे, सूफी शब्दावली में इन्हें 'शथियात' कहा जाता है। उदाहरण के लिए,
हज़रत बायज़ीद बस्तामी का एक प्रसिद्ध कथन है, "सुब्हानी मा आ'ज़मा शानी" (पाक है मेरी जात, और कितनी महान है मेरी शान!)। बाहरी तौर पर यह
घमंड जैसा लग सकता है, लेकिन तैफ़ूरी संतों का
मानना है कि इस अवस्था में बोलने वाला इंसान खुद नहीं होता, बल्कि उसके भीतर से अल्लाह की नूरी ताकत बोल रही
होती है (ठीक वैसे ही जैसे जलती हुई झाड़ी से हज़रत मूसा अलै. ने अल्लाह की आवाज
सुनी थी)।
महान सूफी विद्वान हज़रत दाता गंज बख्श रह. ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'कश्फ़ुल महजूब' में तैफ़ूरी संप्रदाय का
विशेष रूप से उल्लेख किया है। उन्होंने हज़रत बायज़ीद बस्तामी के मुकाम की बेहद
तारीफ की है, लेकिन साथ ही नए साधकों को
यह भी समझाया है कि बिना पूरी तैयारी और गुरु के मार्गदर्शन के 'सुक्र' (मदहोशी) के रास्ते पर चलना खतरनाक हो सकता है। हम कह सकते हैं, तैफ़ूरी पंथ सूफीवाद का वह मार्ग है जो तर्क और
बुद्धि से ऊपर उठकर, अल्लाह के इश्क में पूरी
तरह डूब जाने और अपनी हस्ती को मिटा देने का संदेश देता है। भारत में सत्तारिया
परंपरा में भी इस विचार को मान्यता मिली , बल्कि इसे एक नए शिखर पर
पहुँचाया गया।
22.2.4 जुन्नैदी पंथ – सूफीवाद (तसव्वुफ़)
में जुनैदी पंथ इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण, व्यापक और मुख्यधारा का सूफी संप्रदाय माना जाता
है। 9वीं शताब्दी के महान सूफी संत और इस्लामी विद्वान ख़्वाजा अबुलक़ासिम
जुनैद-बिन-मुहम्मद बग़दादी रह. (830-910 ई.) इस पंथ के
संस्थापक थे। उन्होंने इसकी स्थापना बगदाद (इराक़) में की थी। इन्हें सूफी परंपरा
में 'सय्यदुत तायफा' (सूफियों के सरदार) और 'ताऊसुल उलेमा' (विद्वानों के मोर) जैसी महान उपाधियों से नवाजा गया है। जुनैदी पंथ को सूफीवाद का "शास्त्रीय
और संतुलित" मार्ग माना जाता है।
इस पंथ की मान्यता थी कि मूर्च्छावस्था में मनुष्य बुद्धि और विवेक खो देता
है। वह अच्छे-बुरे के बीच फ़र्क़ करने की स्थिति में
नहीं होता। इसलिए वे ‘सह्ब’ (चैतन्य) को सुकुर
की अपेक्षा सही मानते थे। चिंतन द्वारा सत्य तक पहुंचने के लिए सह्ब की
ज़रूरत होती है। यह विचार पूरी तरह से तैफ़ूरी पंथ के 'सुक्र' (रूहानी मदहोशी) के विपरीत है। हज़रत जुनैद बगदादी का मानना था कि अल्लाह की
मोहब्बत में मदहोश हो जाना आध्यात्मिक मार्ग की केवल एक 'शुरुआती अवस्था' है, सर्वोच्च मुकाम नहीं। उनके अनुसार, सच्चा सूफी वह है जो दिव्य प्रेम के चरम पर पहुँचने के बाद भी अपने पूर्ण
होश (सह्ब) में वापस आए, ताकि वह समाज में रहकर लोगों का मार्गदर्शन कर सके। जुनैदी संप्रदाय ने इस बात
पर सबसे ज़्यादा ज़ोर दिया कि सूफीवाद (तरीक़त) और इस्लामी कानून (शरीयत)
एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। हज़रत जुनैद का एक प्रसिद्ध कथन है: "हमारा यह सूफी मार्ग पवित्र कुरान और पैगंबर
मुहम्मद (सल्ल.) की सुन्नत (परंपराओं) के नियमों से बंधा हुआ है. जो कुरान नहीं
पढ़ता और हदीस नहीं सीखता, वह इस रास्ते पर नहीं चल सकता।" उन्होंने साफ किया कि कोई भी आध्यात्मिक अनुभव या चमत्कार (करामत) यदि शरीयत
के बुनियादी नियमों के खिलाफ है, तो वह अमान्य है।
जहाँ कई सूफी सिलसिले केवल 'फ़ना' (ईश्वर में खुद को मिटा
देने) को ही अंतिम लक्ष्य मानते थे, वहीं जुनैदी पंथ ने 'बक़ा-बिल्लाह' का सिद्धांत दिया। फ़ना अपनी सांसारिक
इच्छाओं और अहंकार को अल्लाह की इच्छा में विलीन कर देना है। बक़ा स्वयं को
मिटाने के बाद ईश्वर की मर्जी के साथ समाज में 'पुनर्जीवित' होना है। यानी, एक आम इंसान की तरह दुनिया के फर्ज़ निभाना, लेकिन दिल को हमेशा अल्लाह से जोड़े रखना। मलामती
पंथ की तरह समाज से निंदा मोल लेना या वैरागियों की तरह दुनिया छोड़कर जंगलों में
चले जाने को जुनैदी पंथ सही नहीं मानता। यह पंथ सिखाता है कि समाज का एक जिम्मेदार
हिस्सा बनकर, हलाल रोज़ी कमाकर और
इंसानों की सेवा करते हुए भी अल्लाह को पाया जा सकता है। जुनैदी संप्रदाय को
सूफीवाद की "मातृ-शाखा" कहा जा सकता है। दुनिया के अधिकांश प्रसिद्ध और
बड़े सूफी सिलसिले (जैसे कादिरिया, चिश्तिया, सोहरावर्दी और नक्शबंदी)
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हज़रत जुनैद बगदादी के सिद्धांतों और उनकी
आध्यात्मिक श्रृंखला (शजरा) से जुड़े हुए हैं। महान सूफी विद्वान हज़रत अली
हुजविरी (दाता गंज बख्श) रह. ने अपनी किताब 'कश्फ़ुल महजूब' में जुनैदी पंथ को सूफियों के लिए सबसे सुरक्षित
और प्रामाणिक मार्ग बताया है।
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मनोज कुमार

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