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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

आंच-121 : माँ और भादो

आंच-121

माँ और भादो

मेरा फोटोमनोज कुमार

मेरा फोटोअरुण चन्द्र रॉय की ताज़ी कविता “मां और भादो” को पढ़ते ही लगा कि इसे आंच पर लिया जाए। मां को केन्द्रीत इस कविता में कवि ने जहां यह दर्शाने की कोशिश की है कि भादो के मास में जहां एक ओर वर्षा नहीं वहीं दूसरी ओर सरकार ने कई ऐसे निर्णय ले डाले हैं, जिससे आम जन को कोई खास राहत नहीं मिलने वाली है। एक ओर एफ़.डी.आई. आदि जैसे निर्णय हैं, जो बहुराष्ट्रीय विदेशी कंपनियों को प्रतयक्ष रूप से लाभ पहुंचाएगा वहीं ग्रामीण कृषक और निर्धन वर्ग अभाव और संत्रास को झेल रहा है। इन सब के बीच मां है जो जिस देवता को पूजती है, इस बार उसे ही कोस रही है, कि तेरी चमक ने हर ओर आग लगा दी है और लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। इस कविता में कवि ने मां के रूप में ऐसा बिम्ब लिया है जिसे जितने रूपों में सोचा जाए साकार हो जाता है। इस कविता को पढ़ते हुए जो भाव अनायास मन में उपजे उन्हें टिप्पणी के रूप में मैं कुछ इस प्रकार लिख गया :

ये एक ऐसा भादो है
जिसमें सिर्फ़ कादो-ही-कादो है
सत्ता की बेरुख़ी है
मां दुखी है
जग, समाज, निज-का संताप लिए
जल रहा सूरज
चमक और ताप लिए
अब हमें बाज़ार जाना नहीं है
घुस आया है बाज़ार हमारे घर में
और
मुस्कुरा रहा सूरज
नीले अम्बर में!

आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई थी। उस समय सुधार-समर्थकों ने कहा था कि इसका एक मानवीय चेहरा भी होगा। जिन लोगों ने इसकी आलोचना तब की थी, आज भी कर रहे हैं। उन्होंने तब कहा था कि इनके मार्फ़त सांस्कृतिक हमले भी किए जाएंगे। आज दो दशक के बाद कम-से-कम यह तो पक्का हो ही गया है कि इनमें मानवीय चेहरे लापता हैं। ... और जो सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं उसका तो कहना ही क्या!

ऊंचे पदों पर हो रहे भ्रष्टाचार में कहीं न कहीं इन तथाकथित आर्थिक सुधारों का बहुत बड़ा हाथ है। हर बड़े घोटाले के तथाकथित लाभ पाने वाले पर अगर नज़र डालें तो पाएंगे कि इन सुधारों का सबसे ज़्यादा फ़ायदा इन्हें ही पहुंचता रहा है। क्या आज ग़रीब आत्मसम्मान से सिर ऊंचा रख पा रहा है? सुधारों के द्वारा सौंपी जा रही जीवनशैली ने कितना भला किया है – हमारे आपसी संबंधों का? क्या बाज़ार की डोर हमारे आपसी संबंधों की पतंग को नहीं काटे दे रही है? दरसल मुनाफ़ा कमाने का सिलसिला हमारे घरों के भीतर ही नहीं हमारे मन के दरवाज़े से दिल के भीतर भी घुस आया है और बाहर से ताला जड़ दिया गया है। आम आदमी मैंगो पिपल बना दिया गया है जो अपने रोटी, कपड़ा और मकान की फ़िकर में ही दिन-रात घुला जा रहे हैं।

अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के नाम पर पिछले दिनों खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की मंज़ूरी दी गई। और फिर कंपनी बिल और पेंशन बिल को भी आगामी संसद सत्र में पेश करने का ऐलान कर दिया गया है। आर्थिक सुधारों के नाम पर इन फैसलों के तहत किन क्षेत्रों पर निगाहें हैं, वह कवि (अरुण चन्द्र रॉय) की नज़रों से छिपा नहीं है। कंपनी बिल के नाम पर लिया जाने वाला फैसला कंपनियों, निवेशकों और अन्य साझीदारों के हितों को बेहतर तरीक़े से रक्षा करने के उद्देश्य से लिया गया है। गांव का गवर्नेन्स भले रसातल में जा रहा हो, कॉर्पोरेट जगत के गवर्नेन्स में कोई कमी नहीं आनी चाहिए!

अरुण चन्द्र रॉय की आलोच्य कविता “माँ” पर केन्द्रीत है। माँ – मातृभूमि भी हो सकती है, देश भी, वह गांव भी है, गांव की धरती भी, ज़मीन और खेत भी। माँ – जिसने हमें अस्तित्व में लाया, उसी के अस्तित्व को हम समाप्त करने पर तुले हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो अपने मूल को ही नष्ट कर रहे हैं हम। ज़मीन है, तो हम हैं। उस ज़मीन से कटे और उखड़े लोगों की पीड़ा को, उन्हें विस्थापित करने की प्रक्रिया को इस कविता में स्वर दिया गया है। मां की चिंताओं के बहाने एक दिन में आर्थिक सुधार के नाम पर लिए गए फैसले की ओर इशारा करते हुए कवि कहता है –

न जाने माँ की
कैसी कैसी चिंताएं हैं
जो इस शोर में
दब कर रह जाती हैं

और इस बीच सरकार

एक दिन में ले लेती है

कई जरुरी निर्णय

जिसमे भादो के नहीं बरसने का

जिक्र नहीं होता

भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक, वस्तु एवं सेवा कर विधेयक, खाद्य सुरक्षा विधेयक, खान और खनिज (विकास और विनियमन) विधेयक, प्रतिस्पर्धा (संशोधन) विधेयक, और बीमा क़ानून विधेयक – ही वे विधेयक हैं, जिन पर एक दिन में निर्णय लिया गया। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को अनुमति देने के बाद कैबिनेट ने बीमा क्षेत्र में भी विदेशी निवेश की मंज़ूरी दे दी है। चिंता जताने वाले यह चिंता जता रहे हैं कि विदेशी कंपनियां लोगों के निवेश पर रिटर्न की गारंटी नहीं देंगी। उनकी नीतियाँ भारत की तमाम बचत को अपनी तरफ़ खींच लेंगी। इससे भारत के बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए पूंजी की कमी हो जाएगी और आम निवेशक के लिए असुरक्षा बढ़ जाएगी। संभवतः कवि की मां की यही चिंता का कारण है।

फ़िल्म एक काल्पनिक दुनिया है और कवि की कविता में मां वास्तविक संसार में रहती है। उसके इस संसार में भादो ही भादो है, लेकिन इस भादो को भी सूखा का ग्रहण लग गया है, सावन तो फ़िल्मी परदों पर ही बरस रहा है, या यूं कहें कि कुछ खास लोगों की दुनियां में उसकी रिमझिम फुहार की नज़रे इनायत है।

बिजली क्षेत्र सरकार की भ्रामक नीतियों के कारण घुप अंधेरे में फंसा हुआ है और सुधार के नाम पर हर बार बिजली दरों में इजाफ़ा किया जाता रहा है। ‘सुरुज देव’ की आराधना करती मां भादों के बरसने का इंतज़ार ही करती रह गई है, उन किसानों की तरह जो सरकार की तरफ़ से किसी राहत पैकेज का इंतज़ार करते-करते गले में फांसी का फंदा लगाने को विवश हो गए हैं। हो भी क्यों नहीं यह पैकेज कुछ घंटे के लिए उजाले का दीदार करने वाले लोगों को अंधेरे में डुबोने का इंतजाम करता है। गांव का खेतिहर ऋण के बोझ तले दबा है, ग़रीबी के दुष्चक्र में इस कदर फंसा है, कि आत्महत्या तक की नौबत आ जाती है। बिजली नहीं, तो पानी नहीं, पानी नहीं तो धान नहीं, धान नहीं तो भुखमरी और आत्महत्या, यानी जीवन नहीं। ऐसे में मां का ‘सुरुज देव’ से नाराज़ होना जायज़ ही है। रोशनी का वितरण ऐसा कि जो रोशन हैं, रोशनी वहीं है, और जो अंधेरे में हैं वे घुप अंधेरे में घिरते जा रहे हैं, और आर्थिक सुधार के नाम पर उनके लिए सिर्फ उजाले का सपना लगातार बेचा जा रहा है। यह मुक्त अर्थव्यवस्था, मुक्त बाजार के कारण है क्योंकि उनकी योजना के केंद्र में है सिर्फ मुनाफा। अपनी विशाल प्रतिद्वन्द्विता और मुनाफे की होड़ में इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के यहां इन भूखे बेबस लोगों के लिए कोई जगह नहीं बन पाती।

मां का ‘सुरुज देव’ को कोसने में मुझे भूमिहीन मज़दूरों और आदिवासियों के सड़क पर उतर आने के सत्याग्रह आंदोलन की झलक दीखती है। यह इस बात का परिचायक है कि केन्द्रीय सत्ता ने उनकी समस्याओं का समाधान की ओर कोई पहल नहीं की है। इस आंदोलन ने लोगों के सामने यह सत्य उजागर किया है कि शोषित-वंचित तबके के हितों के ऊपर सरकार का कोई खास ध्यान नहीं है और वे जीवनयापन की बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं।

अरूण जी की कविताएं अकसर हाशिए पर पड़े लोगों की न सिर्फ़ सुधि लेती है बल्कि उनके सरोकारों को हमारे सामने लाती हैं। इनकी कविताओं में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी रहती है। वे जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत कर देते हैं। प्रस्तुत कविता भी इसी की एक कड़ी है और इस कविता के ज़रिए अरुण जी ने एक बार फिर अपने समय के ज्वलंत प्रश्नों को समेट बाज़ारवादी आहटों और मनुष्य विरोधी ताकतों के विरुद्ध एक आवाज़ उठाई है। आसन्न संकटों की भयावहता से हमें परिचित कराती यह कविता बताती है कि इंडिया और भारत की खाई इन आर्थिक सुधारों के नाम पर, जहां यह उम्मीद की गई थी कि समय के साथ समृद्ध वर्ग और शोषित-वंचितों के बीच की खाई कम होगी, वहीं दो दशकों का हमारा अनुभव यही कहता है कि इन प्रयोगों और नीतियों के द्वारा कितनी चौड़ी और गहरी कर दी गई है। समय के बदलते इस दौर में आज एक अलग तरह की भूख पैदा हो गई है। समृद्ध वर्ग के लोग निम्‍नवर्ग के लोगों का शोषण कर अपनी क्षुधा तृप्त करते हैं। इसलिए इनकी स्थिति सुधरती नहीं। विकास के जयघोष के पीछे इन्‍हें आश्‍वासन के सिवा कुछ भी नहीं मिलता। इनकी किस्‍मत की फटी चादर का आज कोई रफुगर नहीं। किसानों के इस देश में किसानों की दुर्दशा किसी भी छिपी नहीं है।

अर्थव्यवस्था की चुनौतियों और आर्थिक सुधारों के नाम पर उठाए जा रहे कदमों के बीच विसंगति को उजागर करती अरुण जी की कविता हमें यह बताती है कि सरकार के सुधार एजेंडे की ताजा कोशिशें आर्थिक चुनौतियों से कोई तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं और नेतृत्व की नाकामी की ओर इशारा करती है। तभी तो आर्थिक विषमता भारत में समृद्धि की नई पहचान है। इस कविता की आख़िरी पंक्तियों में आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता से उत्पन्न वर्गों के आंतरिक संसार के द्वंद्व रेखांकित होते हैं। इन वर्गों के अस्तित्व रक्षा की बेचैनी और असहाय चिंता के विवरण मां के चेहरे की झुर्रियों की तरह स्पष्ट हैं और कवि के ही शब्दों में ‘कोई मेकप नहीं बना / जिसे छुपाने के लिए’।

अरुण जी आप एक ज़रूरी कवि हैं – अपने समय व परिवेश का नया पाठ बनाने, समकालीन मनुष्य के संकटों को पहचानने तथा संवेदना की बची हुई धरती को तलाशने के कारण। आपकी यह कविता मौजूदा यथार्थ का सामना करने की कोशिश का नतीजा है। इस कविता में आप अपना ही पुराना प्रतिमान (कील पर टँगी बाबूजी की कमीज़) तोड़ते नजर आते हैं। आज की इस कवितागिरी के दौर में, जहां कविता-लेखन मात्र एक नारा या फैशन बनकर रह गया है, अरुण जी की कविता में कथ्य और शिल्प की सादगी मन को छू लेने वाली है और आज की ‘आंच’ का अंत अमृता जी की टिप्पणी के द्वारा अरुण जी को कहना चाहूंगा, कि अरुण जी “कितनी सहजता से आप गंभीर बात को कह देते हैं जो कि भीतर तक हाहाकार मचा देती है।” गद्य में विचारों को विस्तार देने की स्वतंत्रता होती है, इसलिए वह तनावों को कम करने में अधिक सक्षम होता है। लेकिन अरुण जी ने इस कविता में एक नहीं देश की कई ज्वलंत समस्याओं को घनीभूत कर दिया है। आठ-दस पन्ने में रंगा गद्य पहले मस्तिष्क को झकझोरता है फिर यदि सक्षम हुआ तो हृदय को। अरुण जी की यह कविता पहले हमारे हृदय में प्रवेश करती है, और फिर हृदय से मस्तिष्क की ओर जाती है। इस कविता में विडम्बनाओं का मारक और मर्मस्पर्शी प्रयोग है, इसलिए कविता काफ़ी बेधक हो गई है। यह पाठक को गुदगुदाती नहीं, झकझोरती है, तिलमिलाती है, आक्रोश भर देती है।

बधाई अरुण जी!!

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

आंच-120 : चांद और ढिबरी

आंच-120

चांद और ढिबरी

मेरा फोटोमनोज कुमार

मेरा फोटो

जिन्होंने वी.एस.नायपॉल, ए पी जे अब्दुल कलाम, रोहिणी नीलेकनी, पवन के वर्मा सहित कई लेखकों की पुस्तकों का हिंदी अनुवाद किया हो, उनकी साहित्यक सूझ-बूझ को अलग से रेखांकित करने की ज़रूरत मैं नहीं समझता। भारत सरकार में अनुवादक के पद का कार्यभार ग्रहण करने के पहले इन्होंने तीन साल तक प्रिंट मीडिया में काम कर के जीवन की जटिलता को काफ़ी क़रीब से समझने का अनुभव भी प्राप्त किया है। इनका नाम है दीपिका रानी। इस बार की आंच पर हमने इनकी कविता “चांद और ढिबरी” को लिया है। यह कविता इनके ब्लॉग ‘एक कली दो पत्तियां’ पर 20 सितम्बर 2012 को पोस्ट की गई थी।

दीपिका जी के ब्लॉग ‘एक कली दो पत्तियां’ पर पोस्ट की गई कविताएं पढ़ते हुए मैंने महसूस किया है कि कविता के प्रति दीपिका जी की प्रतिबद्धता असंदिग्ध है और उनकी लेखनी से जो निकलता है वह दिल और दिमाग के बीच कशमकश पैदा करता है। इस ब्लॉग पर मैंने यह भी पाया है कि ज़मीन से कटी, शिल्प की जुगाली करने वाली कविताओं के विपरीत उन्होंने सामाजिक सरोकारों के साथ कविताएं लिखी है। “चांद और ढिबरी” भी ऐसी ही एक रचना है।

यह कविता बहुत सरल भावभूमि पर रची गई है। ‘रचना से रचनाकार तक’ यदि इस आम जुमले को मानकर चलें तो कह सकते हैं कि दीपिका जी भी एक सरल जीवन जीने की अभ्यस्त हैं और ज़मीन से जुड़े होने के कारण ग़रीब और हाशिए पर पड़े लोगों में उनका मन रमता है। साथ ही उनके दुख-सुख हर्ष-विषाद को लेकर अपनी संवेदना को कविता में विस्तार देती हैं। आलोच्य कविता का केन्द्र एक गरीब परिवार है। मां बुधिया, अपनी नन्हीं बच्ची, मुनिया के साथ एक झोंपड़ी में रहती है। बच्ची को अंधेरे से भय लगता है। बच्ची रात को जब डरकर उठती है, तो अंधेरे के कारण उसे मां की दुलार भरी आंखें और उसके माथे की लाल बिंदी नहीं दिखती। वह रो-रो कर अपनी भावना व्यक्त करती है और मां अपने अभाव का अफ़सोस। अपनी बच्ची को तसल्ली देने के लिए बुधिया अपनी झोंपड़ी में रात भर रोशनी रखना चाहती है। रात भर ढिबरी जलाए रखने के लिए उसे पहले से ही अपने अभावग्रस्त जीवन में और भी कई कटौतियां करनी पड़ती है, क्योंकि रात भर ढिबरी में मिट्टी तेल जलने से घर में जरूरत की अन्य चीजों में कटौती हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में चांद की रोशनी घर में आ जाने से उसे किसी कृत्रिम रोशनी की जरूरत नहीं होती, और यह छोटी सी बात भी उसके लिए एक बड़ी राहत का सबब होती है। यहां अंधेरा अभावग्रस्त जीवन की ओर संकेत करता है और चांद की रोशनी एक दिलासा, एक वादा, एक सपने की ओर, जो आती तो है लेकिन रोज़ कम होती जाती है और आखिर में एक दिन घुप्प अंधेरा दे जाती है।

दीपिका जी ने “चांद और ढिबरी” में जीवन के जटिल यथार्थ को बहुत ही सहजता के साथ प्रस्तुत किया है। यह कविता किसी तरह का बौद्धिक राग नहीं अलापती, बल्कि अपनी गंध में बिल्‍कुल निजी है। इस कविता में बाज़ारवाद और वैश्वीकरण के इस दौर में अधुनिकता और प्रगतिशीलता की नकल और चकाचौंध की चांदनी में किस तरह अभावग्रस्त निर्धनों की ज़िन्दगी प्रभावित हो रही है, उसे कवयित्री ने दक्षता के साथ रेखांकित किया है।

imagesपरेशान बुधिया

अपनी झोंपड़ी में

रात भर जलाती है ढिबरी

हवाओं से आग का नाता

उसकी पलकें नहीं झपकने देता

रात भर जलती ढिबरी

कटौती कर जाती है

बुधिया के राशन में

कविता का अंत, वर्त्तमान समय के ज्वलंत प्रश्नों को समेट बाज़ारवादी आहटों और मनुष्य विरोधी ताकतों के विरुद्ध एक आवाज़ उठाता है। यह आवाज़ अपनी उदासीनताओं के साथ सोते संसार की नींद में खलल डालती है। कविता का अंत बताता है कि सपने देखने वाली बुधिया की आंखों की चमक और तपिश बरकरार है।

महबूब का चेहरा या

बच्चे का खिलौना नहीं

बुधिया का चांद तो एक ढिबरी है।

बुधिया जैसे लोग हमारे बी.पी.एल. समाज के चरित्र हैं, जो अपने बहुस्तरीय दुखों और साहसिक संघर्ष के बावजूद जीवंत है। इस कविता में ममतामयी मां के लिए बेटी की खुशियां मायने रखती हैं, उसका अपना अर्थशास्त्र नहीं, अपनी अन्य ज़रूरतें नहीं। यही जज़्बा उन्हें जीवन्त बनाए रखता है।

जब चांद की रोशनी

उसकी थाली की रोटियों में

ग्रहण नहीं लगाती

सोती हुई मां की बिंदी में उलझी मुनिया

खिलखिलाती है

इस कविता में त्रासद जीवन की करुण कथा है जिसमें कथ्य और संवेदना का सहकार है। कवयित्री ने ग़रीबों के जीवन के दुख की तस्वीर और आम जन की दुख-तकलीफ को बड़ी सहजता के साथ सामने रखा है। यह कविता अभावग्रस्त लोगों की दुनिया की थाह लगाती है। इसमें मां की ममता और निर्धनता का द्वन्द्व नहीं, स्पष्ट विभाजन है, जहां ममता के आगे सब कुछ पीछे छूट जाता है।

पारसाल तीज पर खरीदी

कांच की चूड़ियां भी

बस दो ही रह गई हैं।

चूड़ियों की खनक के बगैर

खुरदरी हथेलियों की थपकियां

मुनिया को दिलासा नहीं देतीं

यह एक ऐसी संवेद्य कविता है जिसमें हमारे यथार्थ का मूक पक्ष भी बिना शोर-शराबे के कुछ कह कर पाठक को झकझोर देता है। इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें ‘सामाजिक-बोध’ को यथार्थवादी ढंग से चित्रित करने का प्रयास दिखाई देता है। कवयित्री का दृष्टिकोण रूमानी न होकर यथार्थवादी है। इन्होंने साधारण जनता की बदहाली को किताबी आँखों से नहीं, बल्कि यथार्थ-बोध की आँख से अनुभव किया है।

काजल लगी बड़ी बड़ी आंखें

जब अंधेरे से टकरा कर लौट जाती हैं

मां के सीने से लगकर भी सोती नहीं

अंधेरी रातों में

कितना रोती है मुनिया

इस कविता को पढ़ने के बाद मुझे यह लगा कि इन मुद्दों पर लिखने की ज़रूरत है। हम सब मानते हैं कि समाज और संसार न्यायसंगत नहीं है। आम आदमी सामाजिक, राजनैतिक, प्रशासनिक व्यवस्था की चक्की के नीचे पिसता जा रहा है। इन मुद्दों को नज़रंदाज़ कर हवाई कविताएं लिखना भी उचित नहीं है। इसलिए जो है उससे बेहतर चाहिए, तो हमें इन मुद्दों को उठाना ही होगा, ताकि परिवर्तन आए। इस सहज-सरल कविता की अंतर्ध्वनियां देर तक और दूर तक हमारे मन मस्तिष्क में गूंजती रहती है। जीवन के बुनियादी मुद्दों पर केंद्रीत यह कविता हमें विचलित तो नहीं करती पर, यह सोचने के लिए बाध्य ज़रूर करती है कि अपने आसपास की जिंदगी से सरोकार रखने वाली इन स्थितियों के प्रति क्या हम असंवेदनशील हैं? मुझे लगता है कि इस कविता की धमक दूर तलक जाएगी।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

आँच –119


आँच –119
                       आचार्य परशुराम राय 
                     
आँच के पिछले अंक में श्री देवेन्द्र पाण्डेय की कविता पहिए की गयी समीक्षा पर विद्वान मित्रों एव पाठकों ने काफी रोचक टिप्पणियाँ की हैं। मैंने कुछ बातों का प्रत्युत्तर दिया और बाद में अपने ही उत्तरों पर बहुत क्षोभ हुआ। यह सोचकर कि क्या यह आवश्यक था। हो सकता है मेरे उत्तर से उन्हें ठेस पहुँची हो। कवि धूमिल या आदरणीय डॉ.नामवर सिंह आदि के नाम पर मनोनुकूल विचार नहीं बनाए जा सकते। उस समय धूमिल की कविताएँ मेरे पास नहीं थीं। इसलिए साक्ष्य के अभाव में बातें करना या प्रत्युत्तर देना उचित नहीं जान पड़ा। पर प्रत्युत्तर दे डाला। फिर एकाएक विचार आया क्यों न इस पर एक अलग से आँच का उपांक लिखा जाए।

सबसे पहले कविता में प्रवाह की बात करते हैं। जब कविता में प्रवाह की बात की जाती है, तो पता नहीं लोग बिदक क्यों जाते हैं। माना जाता है कि हिन्दी में छन्द-मुक्त कविता का प्रारम्भ महाकवि निराला ने किया। इस प्रकार की कविता के विषय में अपनी पुस्तक पंत और पल्लव में उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि आधुनिक कविता का आधार कवित्त (एक प्रकार का वार्णिक वृत्त या छंद) है। हालाँकि उनकी छन्दमुक्त कविताओं में मात्रिक छंदों का प्रयोग भी मिलता है। यह एक अलग चर्चा का विषय है। इसे उनकी रचनाओं को लेकर देखा जा सकता है। यहाँ  सवैया, कवित्त और दोहा की एक-एक पंक्ति लेकर छन्दमुक्त कविता के रूप में ढालकर देखते हैं -

सवैया                                 कवित्त
पुर ते                                 चंचला चमाके
निकसी रघुबीर बधू                       चहुँ ओरन ते
धरि धीर                               चरजि गई थी
दए मग में डग द्वै।                      फेरि
                                     चरजन लागी री।
दोहा
सुनहुँ भरत
भावी प्रबल
बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

आप निराला की किसी कविता को लें, इसी प्रकार की प्रांजलता मिलेगी। प्रवाह गद्य में भी पाया जाता है। लेकिन दूसरे प्रकार का। इसके लिए किसी भी सशक्त लेखक को ले सकते हैं, चाहे डॉ. विद्यानिवास मिश्र हों या डॉ. नामवर सिंह। वैसे गद्य प्रवाह का आनन्द जितना परमपूज्य आचार्य रजनीश जी या परमपूज्य श्री जे. कृष्णमूर्ति में मुझे मिला उतना अन्य में नहीं। कविता में प्रांजलता और बिम्बों को अछूत समझने वाले लोगों के लिए मैं यहाँ कविवर धूमिल की कविताओं से कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-    

भलमनसाहत 
और मानसून के बीच में 
ऑक्सीजन का कर्ज़दार हूँ
मैं अपनी व्यवस्थाओं में 
बीमार हूँ                                                                                   (उसके बारे में)
        
जो छाया है, सिर्फ़ रात है
जीवित है वह - जो बूढ़ा है या अधेड़ है
और हरा है - हरा यहाँ पर सिर्फ़ पेड़ है

चेहरा-चेहरा डर लगता है
घर बाहर अवसाद है
लगता है यह गाँव नरक का
भोजपुरी अनुवाद है।                                                     (गाँव)

हवा गरम है
और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का
इंतज़ार कर रहा है
कठुआये हुए चेहरों की रौनक
वापस लाने के लिए
उठो और हरियाली पर हमला करो
जड़ों से कहो कि अंधेरे में
बेहिसाब दौड़ने के बजाय
पेड़ों की तरफदारी के लिए
ज़मीन से बाहर निकल पड़े
बिना इस डर के कि जंगल
सूख जाएगा।
यह सही है कि नारों को
नयी शाख नहीं मिलेगी
और न आरा मशीन को
नींद की फुरसत
लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं
इससे इतना तो होगा ही
कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर
तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा
और मेज़ को
अपनी मेज कह सकोगे। 
                                                         (सिलसिला)
     कविवर धूमिल बिम्बों को अछूत नहीं मानते थे। इनकी शब्द-योजना में लाक्षणिक प्रयोग की बहुलता है। या यों कहिए कि इनकी कविताओं में नए मुहावरे और लक्ष्यार्थ पाठक को अभिभूत कर देते हैं। इनकी कविताओं में प्रांजलता का कहीं अभाव नहीं है। यह याद दिलाना चाहता हूँ इनका काल साठोत्तरी कविताओं का काल है। छंदों के ज्ञाता यदि इन कविताओं में एक सतर्क नजर डालें, तो उन्हें इनमें भी छंद नजर आएँगे।

इसे दुर्भाग्य कहा जाय या सौभाग्य कि इनकी रचनाओं को एक विशेष खेमे द्वारा हाइजैक कर लिया गया और अन्य खेमों ने इनकी ओर देखने का कष्ट नहीं किया या इनकी कविताओं का अध्ययन उस खेमे से बाहर करने का कोई साहस नहीं जुटा पाया। हो सकता है ऐसा हुआ भी हो और मुझे पढ़ने का सुअवसर न मिल सका हो। जहाँ तक मुझे पढ़ने को मिला एक खेमे विशेष के हितों को सिद्ध करनेवाले आयामों का विश्लेषण ही किया गया है। इनकी कविताओं के ऐसे कई पहलू हैं, जिनपर विद्वान लोग चर्चा करें, तो अच्छा रहेगा।

कविता के विषय में उनके मन्तव्य को समग्रता में देखना होगा। अपने मन के अनुकूल एक वाक्य को लेकर उनकी पूरी दृष्टि को वैसा ही मान लेना बेमानी होगा। श्री अनूप शुक्ल के फुरसतिया ब्लॉग पर उद्धृत आभार सहित कविता के विषय में उनके कुछ विचार यहाँ दिये जा रहे हैं- 

1.  कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।
2.  कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।
3.  कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।

  धूमिल की काव्यशैली, भाव-भंगिमा आदि को समझने के लिए मात्र एक चश्मे से देखने के बजाय खुली आँख और खुले मन से देखने और समझने की आवश्यकता है, अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए नहीं।

     अब आगे बढ़ते हैं इस (/) चिह्न की ओर जिसको लेकर काफी हाय-तौबा मची। इसकी शुरुआत, जहाँ तक मेरी समझ है, व्यावसायिक पत्रों में अपनी अनभिज्ञता को ढकने के लिए प्रयोग हुआ और आज भी हो रहा है, ताकि अपने मनोनुकूल उसे व्याख्यायित किया जा सके। जहाँ तक मैंने हिन्दी भाषा पढ़ी है, विराम चिह्नों में इसका उल्लेख नहीं किया गया है। वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालय के लिए प्रकाशित दो ख्यातिलब्ध विद्वानों द्वारा लिखित व्याकरण की पुस्तक में विराम चिह्नों पर चर्चा तक नहीं हुई है। भाषा के प्रारम्भिक दौर में इनका प्रयोग नहीं होता था। परन्तु लिखित भाषा को समझने में कठिनाई को दूर करने के लिए इनका प्रचलन शुरु हुआ। इनके अभाव में प्रायः सही भाव समझने में कठिनाई होती है और पाठक कुछ का कुछ समझ लेता है, जैसे इस वाक्य को देखिए- उसे रोको मत जाने दो। इसे पढ़कर पाठक क्या समझेगा - उसे जाने देना है या रोकना है, विराम चिह्न के सही प्रयोग के बिना समझना कठिन है।

जैसा कि पाठक विद्वानों ने चर्चा की है कि (/) का प्रयोग समकालीन कविता में ऐसे विन्यासपरक संकेतों का चलन समाप्त हो चुका है और इसके स्थान पर पंक्ति बदलकर लिखना या (/) चिह्न का प्रचलन शुरु हो गया है। इस विषय में कुछ कहना उचित नहीं है। क्योंकि शायद समकालीन कविता मैंने नहीं पढ़ी है। इसका प्रयोग कविता में ब्लॉग पर ही देखा है, अन्यत्र नहीं।
कुछ मित्रों ने तो यहाँ तक कह डाला है कि कविता एकदम परफेक्ट है और आचार्य परशुराम राय के विचारों से सहमत नहीं हैं। यहाँ पाठकों के लिए तो नहीं, हाँ कवि के लिए मेरा सुझाव है कि प्रशंसक और विरोधी दोनों ही मनुष्य के विकास में बाधक होते हैं। पहिए कविता में बिखराव बहुत है। रिक्शेवालों के लिए चीटियों की तरह अन्नकण मुँह में दबाए विशेषण का प्रयोग पूरे सन्दर्भ में अनावश्यक है, अतएव कवि को सदा जागरूक होकर लोगों के विचारों को ग्रहण करना चाहिए। क्योंकि भीड़-भाड़ में प्रायः सभी वाहन धीरे-धीरे चलने लगते हैं। यदि आदरणीय सलिल वर्मा की बात मान लें कि बालकनी से देखा गया दृश्य हो सकता है, तो और भी वाहन, जैसे सायकिल आदि के लिए क्यों नहीं लिखा गया। कहने का तात्पर्य यह कि कविता लिखने के बाद उसमे प्रयुक्त सभी पदों का उपयुक्तता के आधार पर मूल्यांकन स्वयं करना चाहिए। यही नहीं और भी ऐसे पद अनावश्यक पड़े हैं। एक पंक्ति में यही कहूँगा कि इसे कविता योग्य रूप देने के लिए पुनरावलोकन करने की आवश्यकता है। पूरी कविता का निचोड़ यह है कि कविता उतनी स्तरीय नहीं है, जैसा प्रशंसकों ने बताया है। केवल एक तथ्य को प्रकाशित करने के लिए कि पहियों पर दौड़नेवाले मनुष्य की अन्तिम यात्रा बिना पहिए की होती है, के लिए जो विस्तार दिया गया है, उसकी जरूरत नहीं है। क्योंकि वर्णन सामान्य है, अन्यथा बाह्य प्रकृति का भी समावेश होता।

 कवि के बचाव पक्ष में कमर कसने का कोई कारण नहीं समझ में आया। क्योंकि कोई ऐसी अनर्गल बातें उसमें नहीं लिखी गई थीं और न ही उसे कूड़ा कहा गया है। कुछ मित्रों की टिप्पणियाँ मुद्दे से हटकर थीं। उनका उद्देश्य जो भी रहा हो, कोई मायने नहीं रखता। नये विचार सुविधाजनक हों, कोई बात नहीं, लेकिन पुरातन इतने खटकने नहीं चाहिए। बिजली चली जाती है तो सुविधाकारक नवीन उपकरण काम नहीं करते। प्राकृतिक सुविधाएँ ही काम करती हैं। पाठ्यक्रमों में हम सूर, तुलसी, कबीर आदि को स्थान देना पिछड़ेपन की पहिचान समझते हैं। इसलिए उन्हें पाठ्यक्रमों से हटाने के लिए मुर्दाबाद, जिन्दाबाद के नारे लगाने में हम नहीं हिचकते। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि इनसे अधिक कौन आधुनिक है। रामचरितमानस का पाठ करते हैं। पर कविवर धूमिल आदि को पढ़ते हैं। एक बहुत बड़ा तबका है जो मानस का पाठकर मुक्ति की आशा करता है। लेकिन कविवर धूमिल को पढ़कर नहीं। कविवर धूमिल, आदरणीय डॉ.नामवर सिंह आदि जिनके नाम लिए गए हैं, वे ही केवल काव्य-जगत के नियन्ता नहीं हैं। दूसरी बात कि जो कविता लिखते हैं, उनमें से कितनों ने इन्हें पढ़ा है या जो इनको समझते हैं। मैं यह भी बता दूँ कि मैंने उक्त रचनाकार एवं आलोचक को पढ़ा है और उनका आदर करता हूँ, और उनके विचार कालातीत नहीं हैं।

       अंत में एक हाइकू व उसके दो अनुवाद दिए जा रहे हैं। एक जापानी हाइकू के अंग्रेजी अनुवाद का हिन्दी के दो प्रसिद्ध कवियों द्वारा किए गए अनुवाद नीचे दिए जा रहे हैं। मैं उनके नाम यहाँ जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ। टिप्पणी में कहीं दूँगा -
The old pond      एक पुराना तालाब                   ताल पुराना 
A frog jumps in   और उछलते मेढक की आवाज         कूदा दादुर
Plop.           पानी के अन्दर।                    गडुप।         
  
आप सभी काव्य-मर्मज्ञों से अनुरोध है कि बताएँ कौन सा अनुवाद अच्छा है, चाहे शैली की दृष्टि से या शिल्प या काव्यात्मकता की दृष्टि से या ओवर आल।

यहाँ नाम इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि खेमेबाजी न शुरु हो जाय।

इस अंक का समापन निम्न पंक्तियों से करते हुए इस स्तम्भ से विदा ले रहा हूँ-


बन्दउ ब्लॉग प्रमुख गन चरना।

छमहु जानि दास निज सरना।।

*****

                                                             

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

आँच – 118 - पहिए


आँच – 118 - पहिए
आचार्य परशुराम राय
आँच के इस वर्तमान अंक को प्रारंभ करने के पहले अमृता जी की कविता पर मेरे द्वारा की गई समीक्षा (आँच-116) में अपने एक वक्तव्य छंद शब्द से छंदित शब्द नहीं बनेगा के लिए मैं उनसे और पाठकों से क्षमा माँगता हूँ। संस्कृत में भी छन्द् धातु का बिरले प्रयोग देखने में आता है। इसलिए यह चूक हो गई। इसका संकेत करने के लिए अमृता जी का आभार। उन्होंने कुछ शंका-समाधान करना चाहा है। इसका उत्तर उन्हें मैं पत्र द्वारा दूँगा। हाँ, यह जरूर कहूँगा कि कविता में जिस ढंग से यह शब्द प्रयोग किया गया है, वह काफी भ्रामक है। क्योंकि छन्द् क्रिया शब्द के विरोधी अर्थ हैं, जैसे प्रसन्न होना, तुष्ट करना, फुसलाना, षडयन्त्र करना, बहकाना आदि। कवयित्री की शब्दयोजना किसी एक अर्थ में उस शब्द को नियोजित करने समर्थ नहीं हो सकी है। दूसरी बात, कि हिन्दी में इस धातु से व्युत्पन्न शब्दों का प्रयोग कहीं नहीं मिलता और जिस शब्द का कदाचित प्रयोग हुआ हो या कभी नहीं हुआ हो, साहित्य में ऐसे शब्दों का प्रयोग वर्जित है। अन्यथा अप्रयुक्तत्व दोष माना जाता है। अमृता जी का एक बार पुनः आभार।     
आँच के वर्तमान अंक पर चर्चा के लिए श्री देवेन्द्र पाण्डेय की कविता पहिये लिया जा रहा है। यह कविता उनके ब्लॉग बेचैनआत्मा पर 29-06-2011 को प्रकाशित हुई थी। वैसे यह समीक्षा के लिए बहुत पहले चुनी गयी थी। पर हरीश जी की व्यस्तता के कारण थोड़ा बिलम्ब हो गया। उन्होंने यह काम मुझे सौंपा है। अतएव आज के लिए आँच की अभीष्ट कविता है पहिये।
              इस कविता की भावभूमि अधिक विस्तृत नहीं है, बल्कि गहरी है। शहर की सड़कों पर दौड़ती या दिखाई देनेवाली विभिन्न प्रकार की गाड़ियों और उसी पर पैदल गुजरती बिना पहिए की शवयात्रा के माध्यम से कवि ने इसमें जीवन के यथार्थ को तलाशने का प्रयास किया है। जीवन के निहितार्थ को तलाशने के अनेक साधन हो सकते हैं, पर कवि ने सड़क की हलचल से यह कार्य करने का प्रयास किया है। इस कविता में कुल आठ बन्द हैं। पहले बन्द में तरह-तरह के पहियों से चलनेवाली गाड़ियों का सामान्य उल्लेख है। इसके बाद के छः बन्दों में बस, ट्रक, ट्रैक्टर, ऑटो, रिक्शा, कार आदि गाड़ियों पर चलनेवालों और चलानेवालों के व्यवहारों का रनिंग कमेंट्री की तरह स्वाभाविक वर्णन है। अन्तिम बन्द में पहियों के बिना लोगों के कंधों पर पैदल पूरी की जा रही जीवन की अन्तिम यात्रा (शवयात्रा) देखकर अचानक कवि के ठहर जाने के साथ कविता समाप्त हो जाती है और यहाँ पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाता। यहाँ सड़क की धक्कमधुक्की जीवन की यात्रा है, जिसका अन्त शवयात्रा में होता है। फिर भी सड़क पर चलनेवाले शव को नमन कर अपन कारोबार में फिर व्यस्त हो जाते हैं। कविता की यही पूरी भावभूमि है।
     किसी टिप्पणीकार ने यक्ष-प्रश्न की ओर संकेत किया है। सम्भवतः यक्ष-प्रश्न के सम्बन्ध में सभी जानते हैं। फिर भी प्रसंगवश यहाँ उल्लेख करना समीचीन होगा। यक्ष ने युधिष्ठर से अनेक प्रश्न किए हैं। उनमें से एक है- किमाश्चर्यम्, अर्थात् आश्चर्य क्या है? धर्मराज युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- मनुष्य देखता है कि प्राणी रोज अनेक प्राणियों मरते हुए देखता है, फिर भी जीने की कामना करता है, यही आश्चर्य है। युधिष्ठिर के इस कथन का सर्वमान्य अर्थ यह लिया गया कि एक दिन सभी को मरना है, फिर हाय-तौबा क्यों। पर डॉ.हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसका अलग अर्थ किया है और काफी चौंकानेवाला। कादम्बरी में प्रकाशित एक लेख में उन्होंने लिखा था कि प्रतिदिन अनेक प्राणियों मरते हुए देखकर भी मनुष्य जीना चाहता है, इसके पीछे उसकी जिजीविषा (जीने की इच्छा) है और यही आश्चर्य है। दोनों ही अर्थ की दिशा अलग दिखाई अवश्य पड़ रही है। परन्तु कोई अन्तर नहीं है। लक्ष्य एक है। रोजमर्रे की जिन्दगी में मरने की बात सोच-सोचकर कोई सुखी नहीं रह सकता। यह ईश्वर की सृष्टि बुरी नहीं है। यह सृष्टि मंगलमयी है। लेकिन विवेक से अलग होकर इसे जीना निश्चित रूप से आत्मघाती और दुखद है। दुख-दर्द से भरे जीवन में जिजीविषा ही मानव को अन्तिम लक्ष्य भगवत्ता की ओर प्रेरित कर उसे उपलब्ध कराने में सहायक होती है। ये दोनों तथ्य इस कविता की गहराई को व्यक्त करते हैं। क्योंकि यह देखते हुए भी कि इतनी आपाधापी के बावजूद सबका अन्त होना है, आपाधापी बढ़ी है, कम नहीं हुई। एक अधिकारी मेरे मित्र हैं। वे कहते हैं कि मरने के बाद स्वर्गीय ही सबके लिए प्रयोग किया जाता, नरकीय नहीं। यह अनुदात्त में उदात्त की जिजीविषा है। 
कविता प्रसाद गुण से ओतप्रोत है। पढ़ने के साथ ही पाठकों को इसका अर्थ स्वतः हृदयंगम हो जाता है। शब्द-योजना भी सीधी-सादी है। पहिए का लाक्षणिक अर्थ में प्रयोग अच्छा है। कहने का तात्पर्य कि पहिए का अर्थ विभिन्न प्रकार के पहियों से चलनेवाले वाहनों पर बैठे लोगों से लिया गया है। शैली-विज्ञान की दृष्टि से कविता का स्वरूप आकर्षित करनेवाला है, क्योंकि बस, ट्रक, ट्रैक्टर, ऑटो, रिक्शा, कार आदि में कोई क्रम नहीं रखा गया। जैसे स्वचालित गाड़ियों ट्रक, बस आदि के बाद मनुष्य के द्वारा या जानवरों द्वारा खींचे जानेवाले वाहन या चौपहिया के बाद दुपहिया वाहन। बस और ट्रक के बाद आटो, फिर रिक्शा और फिर कार, स्कूटर, सायकिल आदि का वर्णन किया गया है। सड़क पर गाड़ियों के चलने का भी कोई क्रम देखा नहीं जाता, कम से कम भारतीय उपमहाद्वीप के शहरों में। इस प्रकार पूरी कविता सड़क के प्रतिरूप में दिखाई दे रही है। हाँ, जानवरों को जोतकर चलनेवाले वाहन का उल्लेख नहीं हुआ है। जबकि बनारस में अभी भी ताँगे चलते हैं।
उपर्युक्त विशेषताओं के बावजूद कविता में कुछ कमियाँ है, कई स्थानों पर प्रवाह का अभाव है। अननुशासित जीवन के बावजूद सड़क की सीमा है। वैसे ही कविता के कुछ अनुशासन - प्रांजलता, शब्द-संयम (economy of words) आदि कविता में आवश्यक होते हैं। ‘रस्ते में .......... बस, ट्रक या ट्रैक्टर के’ तक कविता अपनी गति के साथ प्रवाहमान है लेकिन उसके आगे ‘गिलहरी की तरह ........ छिपकली की तरह......... चींटियों की तरह .........’ में पदों में एकरूपता है। इसलिए मध्यभाग ‘.............. बचते-बचाते भागते / कारों के’ में शब्दों की तुलना में अर्थाल्पता होने के कारण अभिव्यक्ति विरल हो गई है। कुछ स्थानों पर कुछ शब्द कविता के प्रवाह को केवल भंग ही नहीं करते, बल्कि कहीं-कहीं अर्थ में भ्रम भी पैदा कर देते हैं जैसे ‘आटो के / चींटियों की तरह / अन्नकण मुँह में दबाए’  में ‘आटो के’ अपने प्रयोग के कारण यहाँ अनावश्यक-सा है और प्रवाह में बाधक प्रतीत होता है यदि इसके पश्चात पूर्णविराम लगाया गया होता तो इसकी अन्विति पूर्व पद से होकर अर्थ को ग्राह्य बनाती। इसी प्रकार का प्रयोग ‘काँपते/हाँफते/घिसटते/दौड़ते’ में भी देखने में आता है। हालाँकि इस कविता में अर्थ-भ्रम पैदा करनेवाले अनावश्यक शब्द नहीं हैं तथापि बिखराव तो है ही। इसके अतिरिक्त, बन्द के अन्त में पूर्ण-विराम का अभाव है, जिसे कवि को प्रयोग करना चाहिए था। अल्प-विराम के स्थान पर (/) चिह्न का प्रयोग भ्रम पैदा करता है। क्योंकि इस चिह्न का प्रयोग अथवा एवं और दोनों ही अर्थों में लोग प्रयोग करते हैं। इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ ‘काँधे-काँधे / बड़े करीब से गुजर जाती है / बिन पहिए के ही / अंतिम यात्रा ’ सबसे अधिक आकर्षक और अर्थपूर्ण है।
इस समीक्षा में व्यक्त विचार मेरे अपने हैं। कवि एवं पाठकों का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।  
        

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

आँच- 117 : केतकी का सुवास पूरे वातावरण में खुशबू भर देता है!

आँच- 117
केतकी का सुवास पूरे वातावरण में खुशबू भर देता है!
Salil Varma की प्रोफाइल फोटोसलिल वर्मा
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“केतकी” कहानी की लेखिका हैं श्रीमती अनुलता राज नायर यह कहानी उनके ब्लॉग “माई ड्रीम्स एन’ एक्सप्रेशंस” पर दिनांक १४.०८.२०१२ को प्रकाशित हुई. अनुलता जी को इनके ब्लॉग पाठक अनु के नाम से जानते हैं और इन्हें इनकी कविताओं से पहचानते हैं. यह इनकी दूसरी कहानी है. अपने बारे में कहती हैं कि मध्य प्रदेश में पली-बढ़ी हैं (शायद इसी कारण मूलतः मलयाली होते हुए भी हिन्दी में अभिव्यक्ति बहुत स्पष्ट है) और मेरी ही तरह रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर हैं अर्थात साहित्य से कोई सीधा सम्बन्ध न होते हुए भी (ब्लॉग जगत में बहुतायत है ऐसे रचनाकारों की) स्तरीय कविताएं और कहानियाँ लिख रही हैं.

“केतकी” उनकी इस कथा की मुख्य-पात्र है. कॉलेज में पढ़ने वाली और ज़िंदगी से लबरेज. एक ऐसी लड़की जिसे हर कोई पहली मुलाक़ात में ही अपना दोस्त बनाने को मचल जाए. उसके जीने का अन्दाज़ भी बड़ा अनोखा है. एक ऐसा अन्दाज़ जो उसे अपने जैसी और लडकियों से अलग करता है. अंश नाम का एक लड़का बचपन से ही उसके साथ ही पढता है और उसका सबसे अच्छा दोस्त है. धीरे-धीरे यह दोस्ती प्यार में बदल जाती है. दोनों महसूस करते हैं पर कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. बाद में उसके जोर देने पर अंश किसी और जगह शादी कर लेता है और वो गोवा चली जाती है. अंश को शादी की रात ही खबर मिलती है कि केतकी ने समुद्र में जलसमाधि ले ली. कारण उसका यह (अंध)विश्वास कि उसके जन्म के समय उसकी माता की मृत्यु, फिर पिता, फिर उसके मौसा-मौसी का बे-औलाद रहना और अंश का प्रणय निवेदन के दिन दुर्घटना ग्रस्त होना. निष्कर्ष के तौर पर अपने नाम की सचाई बताना कि केतकी का फूल महादेव को नहीं चढाया जाता, और यह उम्मीद कि शायद अगले जन्म में वो हरसिंगार बने.

इस कहानी की केन्द्रीय पात्र है केतकी. मगर कहानी कहने वाला है अंश. कहानी के आधे भाग में उसके चरित्र को स्थापित करने की चेष्टा की गयी है. कथावस्तु में नवीनता भले ही न हो, किन्तु जिस तरह से उसका ट्रीटमेंट किया है अनु जी ने वह बेहद सराहनीय है. पढते हुए ऐसा लगता है मानो उन्हीं की कविताओं के अलग-अलग हिस्से पढ़ रहे हों. दरसल पूरी कहानी उस लड़की का पोर्ट्रेट है, जिसकी हँसी और चंचलता, खुलेपन और सचाई, बिंदासपन और चुलबुलेपन के पीछे एक गहरी उदासी छिपी है. और उस उदासी का अंत, उसके जीवन के अंत के साथ होता है. कहानी पर कई फ़िल्मों का प्रभाव दिखाई पड़ता है. एक दुखांत कथा, नायिका के चरित्र को मजबूती से स्थापित करने के लिए, उसकी आत्महत्या और सुसाइड नोट पर पटाक्षेप.

लेखिका की यह कथा कम से कम यह आभास नहीं देती कि उन्होंने यह दूसरी कहानी ही लिखी है. उनकी अभिव्यक्ति बहुत ही स्पष्ट है, जैसा कि उनकी कविताओं में होता है. इसलिए इस कथा में भी कहीं भटकाव नहीं है, कहानी की मुख्य पात्र केतकी है और चूँकि घटनाक्रम उसी के इर्द-गिर्द बुने गए हैं इसलिए उसके चरित्र के साथ न्याय हुआ है. मगर इस क्रम में वे अन्य पात्रों के साथ न्याय नहीं कर पायी हैं. नायक अंश, पूरी घटनाओं को याद कर रहा है लेकिन स्वयं उसके चरित्र, उसकी मनःस्थिति, उसकी प्रतिक्रियाएं और उसके मनोभावों का खुलकर पता नहीं चलता. ऐसा लगता है कि कहानी कहने वाला भले ही पुरुष हो (नायक अंश) किन्तु वास्तव में कहने वाली कोई महिला है.

यह कथा यदि वर्णनात्मक न होकर संवादों में हमारे समक्ष प्रस्तुत की गयी होती तो दोनों चरित्र खुलकर सामने आ पाते, बल्कि चरित्र स्वयं अपना परिचय होते और घटनाएँ परत दर परत खुलकर सामने आतीं. लेखिका की अनुपस्थिति, चरित्रों को उजागर करने में सहायक होती. कुछ बातें और हैं जो खटकती हैं, जैसे केतकी को खुली किताब की तरह बताया गया है और अदृश्य रोशनाई से लिखी किताब भी, अंधविश्वास के प्रति गहरा विश्वासी भी बताया है (जिसे चाहती है उसे जीवन साथी नहीं बना पाती और आत्महत्या कर लेती है) और सारी उँगलियों में अंगूठी पहनने वाली भी. अंधविश्वास को सच मानकर अपना जीवन समाप्त कर लेना कहीं से भी सराहा नहीं जा सकता. मगर दूसरी ओर कुछ संवादों पर बरबस वाह निकल जाती है, जैसे – “क्षितिज से उगता सूरज कभी ओल्ड फैशन हो सकता है भला!” या फिर “नहीं अंश, मेरे हाथ में कोई लकीर नहीं....सब बह गयी पानी में.” जो इन वक्तव्यों को लिख सकता है उसने संवादों में इतनी कंजूसी क्यों की, समझ नहीं आता.

अंत में यही कहा जा सकता है कि केतकी नाम की सार्थकता के लिए और उससे जुडी मान्यताओं के लिए तो यह कहानी सही है, किन्तु किसी ने यह समझने की कोशिस क्यों नहीं की कि भले ही केतकी देवता पर न चढाई जाती हो, किन्तु उसका सुवास पूरे वातावरण में केवड़े की खुशबू भर देता है!