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रविवार, 28 अक्टूबर 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 128


भारतीय काव्यशास्त्र – 128
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में यमक अलंकार के भेदोपभेद पर चर्चा की गई थी। इस अंक में यमक अलंकार के संदर्भ में पुनरुक्तवदाभास पर चर्चा करने का विचार था। लेकिन यह एक मात्र उभयालंकार है, अर्थात् इसमें शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों की विशेषताएँ पाई जाती हैं। बाद में विचार आया कि पहले शब्दालंकारों की चर्चा समाप्त कर ली जाए, फिर इस अलंकार पर चर्चा ठीक रहेगी। अतएव इस अंक में श्लेष अलंकार पर चर्चा अभिप्रेत है। विषय पर आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि श्लेष शब्दालंकार भी है और अर्थालंकार भी। यहाँ शब्द-श्लेष पर ही चर्चा होगी।
काव्यप्रकाश में आचार्य मम्मट ने श्लेष शब्दालंकार का लक्षण इस प्रकार किया है-
वाच्यभेदेन  भिन्ना  यद्  युगपद्भाषणस्पृशः।
श्लिष्यन्ति शब्दाः श्लेषोSसावक्षरादिभिरष्टधा।। 
अर्थात् अर्थ-भेद के कारण भिन्न-भिन्न शब्द एक साथ उच्चरित होने से जब आपस में मिल जाते हैं, तो उसे श्लेष अलंकार कहते हैं।
“अर्थभेदेन शब्दभेदः अर्थात् अर्थ के भेद के कारण शब्दों का भेद होता है” तात्पर्य यह कि प्रत्येक अर्थ के लिए अलग-अलग शब्द का प्रयोग किया जाता है या वाक्य में प्रयुक्त एक शब्द एक ही अर्थ का बोध कराता है। इस सिद्धांत के अनुसार काव्य में उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वरों के भेद के कारण शब्दों का भेद नहीं होता है। इन स्वरों के आधार पर शब्दों का भेद केवल वेदों में ही माना जाता है। इस नियम के चलते, अर्थात् काव्य में उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वरों का बिना विचार किए जब शब्द एक साथ उच्चारण के कारण परस्पर जुड़ जाते हैं या दूसरे शब्दों में अपने स्वरूप की भिन्नता को छोड़ देते हैं, तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि दो या अधिक अर्थों के लिए एक ही शब्द पर्याप्त होने पर उसका कई बार प्रयोग न कर एक बार ही प्रयोग किया जाता है, तो उसे शब्द-श्लेष अलंकार कहते हैं। कवि उन्हें एक बार प्रयोग कर दो या अधिक अर्थों को अभिव्यक्त करता है।
साहित्यदर्पण में इसकी परिभाषा निम्नवत दी गई है- श्लिष्टैः पदैरनेकार्थाभिधाने श्लेष इष्यते। अर्थात् श्लिष्ट पदों से अनेक अर्थों का अभिधान (संकेत) होने पर श्लेषालंकार होता है।
जबकि हिन्दी में कहा जाता है कि जहाँ एक शब्द अनेक अर्थ श्लिष्ट (चिपके) हों, तो वहाँ श्लेष अलंकार होता है। व्यावहारिक तौर दोनों एक ही हैं। अन्तर इतना है कि संस्कृत परिभाषाओं के अनुसार पद (शब्द) श्लिष्ट होते हैं, जबकि हिन्दी में दो या अधिक अर्थ के श्लिष्ट होने की बात बताई जाती है।
संस्कृत में शब्द-श्लेष अलंकार के निम्नलिखित आठ भेद बताए गए हैं- वर्णश्लेष, पदश्लेष, लिंगश्लेष, भाषा-श्लेष, प्रकृति-श्लेष, प्रत्यय-श्लेष, विभक्ति-श्लेष और वचन-श्लेष। हिन्दी में शब्द-श्लेष अलंकार को केवल एक अलंकार ही माना गया है। इसका कारण दोनों भाषाओं की प्रकृति है। क्योंकि हिन्दी और संस्कृत - दोनों भाषाओं की प्रकृति काफी भिन्न है।
इस अंक में बस इतना ही। अगले अंकों में शब्द-श्लेष के विभिन्न रूपों पर चर्चा की जाएगी।
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रविवार, 21 अक्टूबर 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 127


भारतीय काव्यशास्त्र – 127
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में अनुप्रास अलंकार पर चर्चा समाप्त की गई थी। इस अंक में शब्दालंकार के अन्तर्गत यमक अलंकार पर चर्चा अभीष्ट है।
काव्यप्रकाश में यमक अलंकार कि निम्नलिखित परिभाषा की गई है -
अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः यमकम्
अर्थात् अर्थयुक्त होने पर भिन्नार्थक वर्णों की उसी क्रम में आवृत्ति को यमक अलंकार कहते हैं।
साहित्यदर्पणकार कुछ इसी प्रकार यमक का लक्षण बताते हैं -
सत्यर्थे पृथगर्थायाः स्वरव्यञ्जनसंहतेः।
क्रमेण तेनैवावृत्तिर्यमकं विनिगद्यते।।
अर्थात् अर्थयुक्त होने पर भिन्न अर्थवाले स्वर और व्यंजन के समुदाय की उसी क्रम में आवृत्ति हो, तो यमक अलंकार होता है।
आचार्य मम्मट ने यमक के ग्यारह भेद बताए हैं-
1. प्रथम चरण की द्वितीय चरण में आवृत्ति को मुख यमक,
     2. प्रथम चरण की तृतीय चरण में आवृत्ति को सन्दंश यमक,
3. प्रथम चरण की चतुर्थ चरण में आवृत्ति को आवृत्ति यमक,
4. द्वितीय चरण की तृतीय चरण में आवृत्ति होने पर गर्भ यमक,
5. द्वितीय चरण की चतुर्थ चरण में आवृत्ति होने पर सन्दष्ट यमक,
6. तृतीय चरण की चतुर्थ चरण में आवृत्ति होने पर पुच्छ यमक,
7. प्रथम चरण की आवृत्ति द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चरणों में होने पर 
        पंक्ति यमक,
     8. प्रथम चरण की द्वितीय चरण में और तृतीय चरण की चतुर्थ चरण में
        आवृत्ति होने पर युग्मक यमक,
     9. प्रथम चरण की चतुर्थ चरण में और द्वितीय चरण की तृतीय चरण में
   आवृत्ति होने पर परिवृत्ति यमक,
10. श्लोक के पूर्वार्ध की उत्तरार्ध में आवृत्ति को पादभागावृत्ति और
11. श्लोक की आवृत्ति को श्लोकावृत्ति यमक नाम दिया गया है।
हालाँकि श्लोक की आवृत्ति को पादभागावृत्ति (चरणभागावृत्ति) में नहीं माना गया है। अतएव यमक के ग्यारह के स्थान पर दस भेद ही शेष बचते हैं। इसके अतिरिक्त श्लोक के चरणों के अंश की आवृत्ति के स्थान को आधार मानकर काव्यप्रकाश में अनेक भेद किए गए हैं। चालीस की संख्या तो आचार्य मम्मट ने गिनाई है और कहा है कि इस प्रकार यमक के अनेक भेद किए जा सकते हैं। वैसे, आचार्य मम्मट ने दिखाने के लिए उदाहरण स्वरूप आठ यमक                                                 अलंकारों के उद्धरण दिए हैं। साहित्यदर्पणकार ने भी यमक अलंकार के पादावृत्ति, पदावृत्ति, अर्धावृत्ति, श्लोकावृत्ति आदि भेदों के अनेक भेदों की चर्चा की है। अतएव यहाँ यमक अलंकार के इस विस्तार को छोड़कर उदाहरण के रूप में साहित्यदर्पण में उद्धृत महाकवि माघकृत शिशुपालवध का यह श्लोक दिया जा रहा है, जो यमक अलंकार की परिभाषा को सार्थक करता है। इसमें रैवतक पर्वत पर वसन्त के स्वरूप का भगवान कृष्ण की दृष्टि से वर्णन किया गया है -
नवपलाशपलाशवनं  पुरः   स्फुटपरागपरागतपङ्कजम्।
मृदलतान्तलतान्तमलोकयत्स सुरभिं सुरभिं सुमनोभरैः।।
अर्थात् जिसमें पलाशों का वन नवीन पलाश के पत्तों से युक्त हो गया है और कमल परागकणों की अधिकता से सम्पन्न हैं, लताओं की छोरें कोमल और विस्तृत होकर पुष्पों की बहुलता से झुक गई हैं और पुष्पों की सुगन्ध से युक्त वसन्त ऋतु को इस रूप में भगवान कृष्ण ने रैवतक पर्वत पर देखा।
यहाँ पदावृत्ति यमक है। इसमें पलाश पलाश और सुरभिं सुरभिं दोनों पद सार्थक हैं, जबकि लतान्त लतान्त में पहला पद निरर्थक है। पहले पद का ल मृदुल शब्द का है। पराग पराग में दूसरा पद गत का अंश है।
हिन्दी में यमक पर इतनी विस्तृत चर्चा नहीं हुई है। लेकिन इस तरीके से सोचा जाय तो सम्भवतः हिन्दी साहित्य में भी यमक का यह रूप देखा जा सकता है। वैसे, हिन्दी में यमक की परिभाषा की गई है कि जहाँ एक ही शब्द की आवृत्ति हो और जितनी बार आवृत्ति होती है, उसके उतने ही अर्थ होते हैं, तो वहाँ यमक अलंकार होता है। इसके लिए काफी प्रचलित दोहा यहाँ उदाहरण के लिए लिया जा रहा है-
कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।
वा  खाए  बौरात नर,  वा   पाए   बौराय।।
अगले अंक में पुनरुक्तवदाभास आदि अलंकारों पर चर्चा करेंगे।

रविवार, 7 अक्टूबर 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 126


भारतीय काव्यशास्त्र – 126
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में अनुप्रास अलंकार पर चर्चा की गई थी। कुछ आचार्य अनुप्रास के तीन भेद- छेकानुप्रास, वृत्त्यानुप्रास और लाटानुप्रास मानते हैं। कुछ आचार्य इसके पाँच भेद, अर्थात् उक्त तीन के अतिरिक्त दो और मानते हैं - श्रुत्यानुप्रास और अन्त्यानुप्रास। पिछले अंक में छेकानुप्रास, वृत्त्यानुप्रास और लाटानुप्रास पर चर्चा की जा चुकी है। इस अंक में श्रुत्यानुप्रास और अन्त्यानुप्रास  पर चर्चा की जाएगी। 
पिछले अंक में लाटानुप्रास पर चर्चा करते समय कुछ बातें छूट गई थीं। आगे बढ़ने के पहले उन्हें यहाँ पूरी कर लेते हैं। काव्यप्रकाश में अनुप्रास के केवल तीन भेद ही बताए गए हैं, जिनकी चर्चा पिछले अंक में की जा चुकी है। हाँ, इसमें लाटानुप्रास के पाँच भेद बताए गए हैं -
1.     जहाँ अनेक पदों की आवृत्ति हो,
2.     जहाँ केवल एक पद की आवृत्ति हो,
3.     जहाँ एक ही समास में पद की आवृत्ति हो,
4.     जहाँ दो अलग-अलग समासों में एक ही पद की आवृत्ति हो और
5.     जहाँ पद की आवृत्ति समास में और फिर बिना समास के हो।
इन सभी को आचार्य मम्मट ने काव्यप्रकाश में सोदाहरण स्पष्ट किया है। पर, अन्य आचार्यों ने लाटानुप्रास को इस रूप में नहीं देखा है। चूँकि हिन्दी में संस्कृत भाषा की तरह समासों का प्रयोग नहीं होता है। इसलिए इसे यहीं छोड़ा जा रहा है। जहाँ तक मुझे देखने को मिला, हिन्दी में लाटानुप्रास के भेदों की चर्चा नहीं की गई है। आचार्य विश्वनाथ ने अनुप्रास के पाँच भेद मानते हुए श्रुत्यानुप्रास और अन्त्यानुप्रास की चर्चा की है। हिन्दी में भी आचार्यों ने इनकी चर्चा की है। अतएव इनपर यहाँ चर्चा की जा रही है।
आचार्य विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में श्रुत्यानुप्रास की परिभाषा इस प्रकार की है -
उच्चार्यत्वाद्यद्येकत्र  स्थाने  तालुरादिके।
सादृश्यं व्यञ्जनस्यैव श्रुत्यानुप्रास उच्यते।।      
अर्थात् तालु, कण्ठ, मूर्धा, दन्त आदि किसी एक स्थान से उच्चरित होनेवाले व्यंजनों की जहाँ आवृत्ति हो, तो वहाँ श्रुत्यानुप्रास होता है। जैसे -
दृशा  दग्धं  मनसिजं  जीवयन्ति दृशैव याः।
विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुमो वामलोचनाः।।
अर्थात् दृष्टि से जले हुए कामदेव को जो दृष्टि से ही जीवित करती है, अर्थात् भगवान शिव को, जिनके तीसरे नेत्र से भस्मीभूत कामदेव जिन सुलोचनाओं के कटाक्ष से पुनः जीवित हो जाते हैं, प्रसन्न करनेवाली उन वामलोचनाओं की हम स्तुति करते हैं।
यहाँ तालु से उच्चरित होनेवाले वर्ण ज, य तथा दन्त वर्ण स, त आदि की आवृत्ति होने के कारण श्रुत्यानुप्रास अलंकार है। हिन्दी में तुलसीदास जी की निम्नलिखित पंक्ति में श्रुत्यानुप्रास देखा जा सकता है -
तुलसिदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई।
यहाँ त, ल, न, द आदि दन्त-वर्णों की आवृत्ति होने से श्रुत्यानुप्रास है। इसके अतिरिक्त त, स आदि की एक बार से अधिक आवृत्ति होने के कारण यहाँ वृत्यानुप्रास भी है।
जहाँ पद या चरण के अन्त में यथासम्भव स्वर, विसर्ग, अनुस्वार आदि सहित व्यंजन की आवृत्ति हो, तो उसे अन्त्यानुप्रास कहते हैं। साहित्यदर्पण में अन्त्यानुप्रास की परिभाषा निम्नवत् की गई है -
व्यञ्जनं  चेद्यथावस्थं  सहाद्येन स्वरेण तु।
आवर्त्यतेSन्त्ययोज्यत्वादन्त्यानुप्रास एव तत्।।
इसके लिए निम्नलिखित उदाहरण दिया गया है-
केशः काशस्तबकविकासः कायः प्रकटितकरभविलासः।
चक्षुर्दग्धवराटककल्पं त्यजति न चेतः काममनल्पम्।।
अर्थात् कास के फूल के समान केश सफेद हो चुके हैं। शरीर दो पैरों पर खड़े ऊँट के बच्चे की तरह हो गया है। आँखें जली कौड़ी की तरह हो गई हैं। फिर भी कामना को चित्त जरा भी नहीं छोड़ता।
इस श्लोक में पहले दो चरणों में आसः की विकासः और विलासः में आवृत्ति हुई है। इसी प्रकार तीसरे और चौथे चरण में ल्पम् की कल्पम् और अल्पम् के रूप में आवृत्ति हुई है। अतएव यहाँ श्रुत्यानुप्रास है। निम्नलिखित सोरठा हिन्दी में उदाहरण स्वरूप दिया जा रहा है -    
   कुंद इंदु सम देह, उमा रमन करुना अयन।
   जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मर्दन मयन।।
     इसमें पहले और तीसरे चरण में देह और नेह तथा तीसरे और चौथे चरण में अयन तथा मयन में श्रुत्यानुप्रास है। वैसे सोरठा में प्रायः प्रथम एवं तृतीय चरणों में ही अन्त्यानुप्रास देखने को मिलता है। पर इस सोरठे के दूसरे और चौथे चरणों में भी अन्त्यानुप्रास है। इसके अतिरिक्त कुंद, इंदु पदों के अंत में भी अन्त्यानुप्रास है।
     अन्त्यानुप्रास के कई भेद किए जा सकते हैं - 1. पद के अंत में, 2. सभी चरणों के अन्त में (सवैया), 3. विषम और सम चरणों के अंत में (चौपाई छंद), 4. सम चरणों के अन्त में (दोहा), 5. विषम चरणों के अंत में (प्रायः सोरठा में) समान वर्णों की आवृत्ति होती है। यहाँ सम चरण का अर्थ दूसरा और चौथा, विषम चरण का अर्थ पहला और तीसरा है।
     इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में यमक और पुनरुक्तवदाभास अलंकारों पर चर्चा होगी।   
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मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

कविता - श्रद्धा-सुमन


श्रद्धा-सुमन
आचार्य परशुराम राय




क्या कहूँ
बापू,
आपके बन्दरों ने
जीना हराम कर दिया -
एक सुनता नहीं,
एक देखता नहीं
और
एक कुछ कहता नहीं।
जो देखता है, बोलता नहीं,
जो बोलता है, सुनता नहीं
और
जो सुनता है,
वह न देखता है, न बोलता है।


इन तीनों से
आ मिले हैं
दो और बन्दर,
एक बात-बात पर
देता रहता है
बन्दर-घुड़की
और दूसरा
सब कुछ
छीन लेता है।

अब तो
इनकी जनसंख्या भी
इतनी हो गई है
कि क्या कहूँ,
इनके आतंक से
त्रस्त जनता
किंकर्तव्यविमूढ़ है।
इनके द्वारा
आपकी समाधि पर
चढ़ाने के लिए फूल
लाए गए हैं
उजाड़कर
फुलवारियों को।
पर, पास मेरे
जो बचे श्रद्धा सुमन,
स्वीकार करें इनको
बापू।
**** 
       

रविवार, 30 सितंबर 2012

भारतीय काव्यशास्त्र – 125


भारतीय काव्यशास्त्र – 125
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में वक्रोक्ति अलंकार पर चर्चा की गयी थी। इस अंक में अनुप्रास अलंकार पर चर्चा की जाएगी।
वर्णों की समानता (आवृत्ति) को अनुप्रास कहा गया है- वर्णसाम्यमनुप्रासः। भले ही व्यंजनों के साथ संयुक्त स्वरों में समानता न हो, लेकिन व्यंजनों में समानता होनी चाहिए। ऐसा होने पर अनुप्रास अलंकार होगा। अनुप्रास की व्युत्पत्ति की गई है - अनुगतं प्रकृष्टश्च न्यासः इति अनुप्रासः। इसका अभिप्राय वही है जो ऊपर दिया गया है। अनुप्रास  के तीन भेद किए गए हैं- छेकानुप्रास, वृत्त्यानुप्रास और लाटानुप्रास।
छेक का अर्थ होता है चतुर। शायद इसका प्रयोग चतुर लोग ही करते हों। छेकानुप्रास में वर्णों की आवृत्ति एक बार होती है। जैसे-
ततोSरुणपरिस्पन्दमन्दीकृतवपुः  शशी।
दध्रे कामपरिक्षामकामिनीगण्डपाण्डुताम्।।
हिन्दी की निम्नलिखित कविता इसके लिए उद्धृत की जा रही है-
बगरे  बीथिन  में  भ्रमर, भरे अजब अनुराग।
कुसुमित कुंजन में फिरत, फूल्यो स्याम सभाग।।
जहाँ एक या अनेक वर्णों की एक बार से अधिक आवृत्ति हो, वहाँ वृत्त्यानुप्रास होता है। वृत्त्यानुप्रास में वृत्ति शब्द समझना आवश्यक है। यहाँ वृत्ति का अर्थ रीति, संघटना, शैली या मार्ग से है। इसमें  गुण का भी समन्वय देखा जाता है। आचार्य उद्भट ने अपने काव्यालङ्कार-संग्रह नामक ग्रंथ में तीन प्रकार की वृत्तियों का उल्लेख किया है - उपनागरिका (मधुरा), कोमला और परुषा।
आचार्य मम्मट ने उपनागरिका की परिभाषा यों की है- माधुर्यव्यञ्जकैर्वर्णैरु-पनागरिकोच्यते, अर्थात् माधुर्य व्यंजक वर्णों की जहाँ आवृत्ति हो, वहाँ उपनागरिका वृत्त्यानुप्रास होता है। आचार्य वामन ने इसे वैदर्भी कहा है। इसके लिए आचार्य मम्मट ने निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है-
अनङ्गरङ्गप्रतिमं  तदङ्गं   भङ्गीभिरङ्गीकृतमानताङ्ग्याः।
कुर्वन्ति यूनां सहसा यथैताः स्वान्तानि शान्तापरचिन्तनानि।।
अर्थात्  कामदेव की रंगशाला की तरह स्तनों के भार से नतांगी (झुके हुए शरीरवाली) की चेष्टाओं ने उसके (नायिका के) शरीर को अपने अधीन कर लिया है कि ये चेष्टाएँ (हाव-भाव) युवकों के चित्त को तुरन्त अन्य विषयों की चिन्ता से मुक्त कर अपने में रमा लेती हैं।
हिन्दी में कवि देव रचित निम्नलिखित कवित्त उपनागरिका वृत्त्यानुप्रास के लिए उद्धृत किया जा रहा है-
मंद-मंद चढ़ि चल्यो चैत-निसि चंद चारु,
मंद-मंद  चाँदनी  पसारत  लतन तें। 
मंद-मंद जमुना-तरंगिनि हिलोरैं लेति,
मंद-मंद मोद मंजु-मल्लिका-सुमन तें।
देव कवि मंद-मंद सीतल सुगंध पौन,
देखि छबि छीजत मनोज छन छन तें।
मंद-मंद मुरली बजावत अधर धरे,
मंद-मंद निकस्यौ मुकुंद मधुबन तें।।
मानस की ये पंक्तियाँ इस वृत्त्यानुप्रास का एक आदर्श उदाहरण हैं-
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय गुनि।
कोमला वृत्त्यानुप्रास में माधुर्य और ओज में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों को छोड़कर अन्य वर्णों की आवृत्ति होती है, अर्थात् य, र, ल, व, स आदि वर्णों की आवत्ति पाई जाती है। कुछ लोग इसे ग्राम्या वृत्ति भी कहते हैं। आचार्य उद्भट इसे कोमला और आचार्य वामन पाञ्चाली मानते हैं। इसके लिए काव्यप्रकाश में निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया गया है। इसमें एक वियोगिनी बाला की दशा का वर्णन किया गया है-
अपसारय घनसारं  कुरु हारं दूर एव किं कमलैः।
अलमलमालि मृणालैरिति वदति दिवानिशं बाला।।
अर्थात् रात-दिन बाला यही कहती रहती है कि हे सखि, कपूर को हटाओ, हार को तो दूर ही रखो, इन कमल के फूलों का क्या काम, अर्थात् ये भी व्यर्थ हैं।
हिन्दी में एक कविता की निम्नलिखित पंक्तियाँ इस वृत्त्यानुप्रास का उदाहरण हैं-
नवल कँवल हू ते कोंवल चरन हैं।
परुषा वृत्यानुप्रास में ओज गुण में प्रयुक्त होनेवाले कठोर वर्णों और संयुक्ताक्षरों की आवृत्ति होती है। इसलिए भयानक, वीर, रौद्र आदि रसों में इसका प्रयोग किया जाता है। आचार्य वामन इसे गौडी और आचार्य उद्भट परुषा कहते हैं। काव्यप्रकाश में निम्नलिखित श्लोक इसके लिए उद्धृत किया गया है। यह श्लोक हनुमन्नाटकम् में रावण की उक्ति है -
मूर्ध्नामुद्वृत्तकृत्ताविरलगलद्रक्तसंसक्तधारा-
धौतेशाङ्घ्रिप्रसादोपनतजयजगज्जातमिथ्यामहिम्नाम्।
कैलासोल्लासनेच्छाव्यतिकरपिशुनोत्सर्पिदर्पोधुराणां
दोष्णां चैषां किमेतत्फलमिह नगरीरक्षणे यत्प्रयासः।
अर्थात् उद्धत होकर लगातार कंठ से बहती अविरल रक्त की धार से भगवान शिव के चरणों के धोने से उनकी कृपा से प्राप्त विजय से जगत में मिथ्या महत्ता को प्राप्त मेरे इन दस सिरों और कैलास को उठाने की इच्छा से आविष्ट उत्कट अभियान के गर्व से युक्त मेरी भुजाओं का क्या यही फल है कि अपनी इस नगरी की रक्षा के लिए मुझे प्रयास करने की आवश्यकता आ पड़ी।
हिन्दी के लिए मानस की निम्नलिखित पंक्तियाँ इसके लिए उदाहरण रूप में ली जा सकती हैं -
जाना प्रताप ते रहे  निर्भय  कपिन्ह  रिपु माने फुरे।
चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे।।
हनुमंत अंगद नील नल  अतिबल  लरत रन बाँकुरे।
मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह  कपट  भू भट अंकुरे।।
जहाँ पदों की आवृत्ति होती है, वहाँ लाटानुप्रास होता है। पदों की आवृत्ति में पुनरुक्ति दोष तथा पुनरुक्तवदाभास अलंकार होने की सम्भावना बनती है। आचार्य मम्मट ने इसकी परिभाषा इस प्रकार की है -
शाब्दस्तु लाटानुप्रासो भेदे तात्पर्यमात्रतः।
अर्थात् तात्पर्य मात्र से भेद होने पर शब्द की आवृत्ति हो, तो लाटानुप्रास होता है।
दक्षिणी गुजरात को लाट देश कहा जाता था। वहाँ के लोगों प्रिय होने या वहाँ के कवियों द्वारा ऐसा प्रयोग किए जाने के कारण ही इसे लाटानुप्रास कहा जाता है। इसके लिए काव्यप्रकाश में निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया गया है-
यस्य न सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनदीधितिस्तस्य।
यस्य न सविधे दयिता दवदहनस्तुहिनदीधितिस्तस्य।।
अर्थात् जिसके समीप प्रियतमा नहीं है, चन्द्रमा उसके लिए दावानल की तरह हो जाता है और प्रियतमा जिसके पास होती है, दावानल उसके लिए चन्द्रमा की तरह शीतल अर्थात् आनन्ददायक होता है।
हिन्दी की निम्नलिखित कविता इसके उदाहरण के रूप में द्रष्टव्य है-
राम हृदय जाके नहीं, बिपति सुमंगल ताहि।
राम हृदय जाके, नहीं बिपति सुमंगल ताहि।।
इस अंक में बस इतना ही। अगले अंक में अनुप्रासालंकार पर कुछ और चर्चा होगी।

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

आँच –119


आँच –119
                       आचार्य परशुराम राय 
                     
आँच के पिछले अंक में श्री देवेन्द्र पाण्डेय की कविता पहिए की गयी समीक्षा पर विद्वान मित्रों एव पाठकों ने काफी रोचक टिप्पणियाँ की हैं। मैंने कुछ बातों का प्रत्युत्तर दिया और बाद में अपने ही उत्तरों पर बहुत क्षोभ हुआ। यह सोचकर कि क्या यह आवश्यक था। हो सकता है मेरे उत्तर से उन्हें ठेस पहुँची हो। कवि धूमिल या आदरणीय डॉ.नामवर सिंह आदि के नाम पर मनोनुकूल विचार नहीं बनाए जा सकते। उस समय धूमिल की कविताएँ मेरे पास नहीं थीं। इसलिए साक्ष्य के अभाव में बातें करना या प्रत्युत्तर देना उचित नहीं जान पड़ा। पर प्रत्युत्तर दे डाला। फिर एकाएक विचार आया क्यों न इस पर एक अलग से आँच का उपांक लिखा जाए।

सबसे पहले कविता में प्रवाह की बात करते हैं। जब कविता में प्रवाह की बात की जाती है, तो पता नहीं लोग बिदक क्यों जाते हैं। माना जाता है कि हिन्दी में छन्द-मुक्त कविता का प्रारम्भ महाकवि निराला ने किया। इस प्रकार की कविता के विषय में अपनी पुस्तक पंत और पल्लव में उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि आधुनिक कविता का आधार कवित्त (एक प्रकार का वार्णिक वृत्त या छंद) है। हालाँकि उनकी छन्दमुक्त कविताओं में मात्रिक छंदों का प्रयोग भी मिलता है। यह एक अलग चर्चा का विषय है। इसे उनकी रचनाओं को लेकर देखा जा सकता है। यहाँ  सवैया, कवित्त और दोहा की एक-एक पंक्ति लेकर छन्दमुक्त कविता के रूप में ढालकर देखते हैं -

सवैया                                 कवित्त
पुर ते                                 चंचला चमाके
निकसी रघुबीर बधू                       चहुँ ओरन ते
धरि धीर                               चरजि गई थी
दए मग में डग द्वै।                      फेरि
                                     चरजन लागी री।
दोहा
सुनहुँ भरत
भावी प्रबल
बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

आप निराला की किसी कविता को लें, इसी प्रकार की प्रांजलता मिलेगी। प्रवाह गद्य में भी पाया जाता है। लेकिन दूसरे प्रकार का। इसके लिए किसी भी सशक्त लेखक को ले सकते हैं, चाहे डॉ. विद्यानिवास मिश्र हों या डॉ. नामवर सिंह। वैसे गद्य प्रवाह का आनन्द जितना परमपूज्य आचार्य रजनीश जी या परमपूज्य श्री जे. कृष्णमूर्ति में मुझे मिला उतना अन्य में नहीं। कविता में प्रांजलता और बिम्बों को अछूत समझने वाले लोगों के लिए मैं यहाँ कविवर धूमिल की कविताओं से कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ-    

भलमनसाहत 
और मानसून के बीच में 
ऑक्सीजन का कर्ज़दार हूँ
मैं अपनी व्यवस्थाओं में 
बीमार हूँ                                                                                   (उसके बारे में)
        
जो छाया है, सिर्फ़ रात है
जीवित है वह - जो बूढ़ा है या अधेड़ है
और हरा है - हरा यहाँ पर सिर्फ़ पेड़ है

चेहरा-चेहरा डर लगता है
घर बाहर अवसाद है
लगता है यह गाँव नरक का
भोजपुरी अनुवाद है।                                                     (गाँव)

हवा गरम है
और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का
इंतज़ार कर रहा है
कठुआये हुए चेहरों की रौनक
वापस लाने के लिए
उठो और हरियाली पर हमला करो
जड़ों से कहो कि अंधेरे में
बेहिसाब दौड़ने के बजाय
पेड़ों की तरफदारी के लिए
ज़मीन से बाहर निकल पड़े
बिना इस डर के कि जंगल
सूख जाएगा।
यह सही है कि नारों को
नयी शाख नहीं मिलेगी
और न आरा मशीन को
नींद की फुरसत
लेकिन यह तुम्हारे हक में हैं
इससे इतना तो होगा ही
कि रुखानी की मामूली-सी गवाही पर
तुम दरवाज़े को अपना दरवाज़ा
और मेज़ को
अपनी मेज कह सकोगे। 
                                                         (सिलसिला)
     कविवर धूमिल बिम्बों को अछूत नहीं मानते थे। इनकी शब्द-योजना में लाक्षणिक प्रयोग की बहुलता है। या यों कहिए कि इनकी कविताओं में नए मुहावरे और लक्ष्यार्थ पाठक को अभिभूत कर देते हैं। इनकी कविताओं में प्रांजलता का कहीं अभाव नहीं है। यह याद दिलाना चाहता हूँ इनका काल साठोत्तरी कविताओं का काल है। छंदों के ज्ञाता यदि इन कविताओं में एक सतर्क नजर डालें, तो उन्हें इनमें भी छंद नजर आएँगे।

इसे दुर्भाग्य कहा जाय या सौभाग्य कि इनकी रचनाओं को एक विशेष खेमे द्वारा हाइजैक कर लिया गया और अन्य खेमों ने इनकी ओर देखने का कष्ट नहीं किया या इनकी कविताओं का अध्ययन उस खेमे से बाहर करने का कोई साहस नहीं जुटा पाया। हो सकता है ऐसा हुआ भी हो और मुझे पढ़ने का सुअवसर न मिल सका हो। जहाँ तक मुझे पढ़ने को मिला एक खेमे विशेष के हितों को सिद्ध करनेवाले आयामों का विश्लेषण ही किया गया है। इनकी कविताओं के ऐसे कई पहलू हैं, जिनपर विद्वान लोग चर्चा करें, तो अच्छा रहेगा।

कविता के विषय में उनके मन्तव्य को समग्रता में देखना होगा। अपने मन के अनुकूल एक वाक्य को लेकर उनकी पूरी दृष्टि को वैसा ही मान लेना बेमानी होगा। श्री अनूप शुक्ल के फुरसतिया ब्लॉग पर उद्धृत आभार सहित कविता के विषय में उनके कुछ विचार यहाँ दिये जा रहे हैं- 

1.  कविता
घेराव में
किसी बौखलाये हुये
आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।
2.  कविता
भाष़ा में
आदमी होने की
तमीज है।
3.  कविता
शब्दों की अदालत में
अपराधियों के कटघरे में
खड़े एक निर्दोष आदमी का
हलफनामा है।

  धूमिल की काव्यशैली, भाव-भंगिमा आदि को समझने के लिए मात्र एक चश्मे से देखने के बजाय खुली आँख और खुले मन से देखने और समझने की आवश्यकता है, अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए नहीं।

     अब आगे बढ़ते हैं इस (/) चिह्न की ओर जिसको लेकर काफी हाय-तौबा मची। इसकी शुरुआत, जहाँ तक मेरी समझ है, व्यावसायिक पत्रों में अपनी अनभिज्ञता को ढकने के लिए प्रयोग हुआ और आज भी हो रहा है, ताकि अपने मनोनुकूल उसे व्याख्यायित किया जा सके। जहाँ तक मैंने हिन्दी भाषा पढ़ी है, विराम चिह्नों में इसका उल्लेख नहीं किया गया है। वर्तमान में केन्द्रीय विद्यालय के लिए प्रकाशित दो ख्यातिलब्ध विद्वानों द्वारा लिखित व्याकरण की पुस्तक में विराम चिह्नों पर चर्चा तक नहीं हुई है। भाषा के प्रारम्भिक दौर में इनका प्रयोग नहीं होता था। परन्तु लिखित भाषा को समझने में कठिनाई को दूर करने के लिए इनका प्रचलन शुरु हुआ। इनके अभाव में प्रायः सही भाव समझने में कठिनाई होती है और पाठक कुछ का कुछ समझ लेता है, जैसे इस वाक्य को देखिए- उसे रोको मत जाने दो। इसे पढ़कर पाठक क्या समझेगा - उसे जाने देना है या रोकना है, विराम चिह्न के सही प्रयोग के बिना समझना कठिन है।

जैसा कि पाठक विद्वानों ने चर्चा की है कि (/) का प्रयोग समकालीन कविता में ऐसे विन्यासपरक संकेतों का चलन समाप्त हो चुका है और इसके स्थान पर पंक्ति बदलकर लिखना या (/) चिह्न का प्रचलन शुरु हो गया है। इस विषय में कुछ कहना उचित नहीं है। क्योंकि शायद समकालीन कविता मैंने नहीं पढ़ी है। इसका प्रयोग कविता में ब्लॉग पर ही देखा है, अन्यत्र नहीं।
कुछ मित्रों ने तो यहाँ तक कह डाला है कि कविता एकदम परफेक्ट है और आचार्य परशुराम राय के विचारों से सहमत नहीं हैं। यहाँ पाठकों के लिए तो नहीं, हाँ कवि के लिए मेरा सुझाव है कि प्रशंसक और विरोधी दोनों ही मनुष्य के विकास में बाधक होते हैं। पहिए कविता में बिखराव बहुत है। रिक्शेवालों के लिए चीटियों की तरह अन्नकण मुँह में दबाए विशेषण का प्रयोग पूरे सन्दर्भ में अनावश्यक है, अतएव कवि को सदा जागरूक होकर लोगों के विचारों को ग्रहण करना चाहिए। क्योंकि भीड़-भाड़ में प्रायः सभी वाहन धीरे-धीरे चलने लगते हैं। यदि आदरणीय सलिल वर्मा की बात मान लें कि बालकनी से देखा गया दृश्य हो सकता है, तो और भी वाहन, जैसे सायकिल आदि के लिए क्यों नहीं लिखा गया। कहने का तात्पर्य यह कि कविता लिखने के बाद उसमे प्रयुक्त सभी पदों का उपयुक्तता के आधार पर मूल्यांकन स्वयं करना चाहिए। यही नहीं और भी ऐसे पद अनावश्यक पड़े हैं। एक पंक्ति में यही कहूँगा कि इसे कविता योग्य रूप देने के लिए पुनरावलोकन करने की आवश्यकता है। पूरी कविता का निचोड़ यह है कि कविता उतनी स्तरीय नहीं है, जैसा प्रशंसकों ने बताया है। केवल एक तथ्य को प्रकाशित करने के लिए कि पहियों पर दौड़नेवाले मनुष्य की अन्तिम यात्रा बिना पहिए की होती है, के लिए जो विस्तार दिया गया है, उसकी जरूरत नहीं है। क्योंकि वर्णन सामान्य है, अन्यथा बाह्य प्रकृति का भी समावेश होता।

 कवि के बचाव पक्ष में कमर कसने का कोई कारण नहीं समझ में आया। क्योंकि कोई ऐसी अनर्गल बातें उसमें नहीं लिखी गई थीं और न ही उसे कूड़ा कहा गया है। कुछ मित्रों की टिप्पणियाँ मुद्दे से हटकर थीं। उनका उद्देश्य जो भी रहा हो, कोई मायने नहीं रखता। नये विचार सुविधाजनक हों, कोई बात नहीं, लेकिन पुरातन इतने खटकने नहीं चाहिए। बिजली चली जाती है तो सुविधाकारक नवीन उपकरण काम नहीं करते। प्राकृतिक सुविधाएँ ही काम करती हैं। पाठ्यक्रमों में हम सूर, तुलसी, कबीर आदि को स्थान देना पिछड़ेपन की पहिचान समझते हैं। इसलिए उन्हें पाठ्यक्रमों से हटाने के लिए मुर्दाबाद, जिन्दाबाद के नारे लगाने में हम नहीं हिचकते। लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि इनसे अधिक कौन आधुनिक है। रामचरितमानस का पाठ करते हैं। पर कविवर धूमिल आदि को पढ़ते हैं। एक बहुत बड़ा तबका है जो मानस का पाठकर मुक्ति की आशा करता है। लेकिन कविवर धूमिल को पढ़कर नहीं। कविवर धूमिल, आदरणीय डॉ.नामवर सिंह आदि जिनके नाम लिए गए हैं, वे ही केवल काव्य-जगत के नियन्ता नहीं हैं। दूसरी बात कि जो कविता लिखते हैं, उनमें से कितनों ने इन्हें पढ़ा है या जो इनको समझते हैं। मैं यह भी बता दूँ कि मैंने उक्त रचनाकार एवं आलोचक को पढ़ा है और उनका आदर करता हूँ, और उनके विचार कालातीत नहीं हैं।

       अंत में एक हाइकू व उसके दो अनुवाद दिए जा रहे हैं। एक जापानी हाइकू के अंग्रेजी अनुवाद का हिन्दी के दो प्रसिद्ध कवियों द्वारा किए गए अनुवाद नीचे दिए जा रहे हैं। मैं उनके नाम यहाँ जानबूझकर नहीं दे रहा हूँ। टिप्पणी में कहीं दूँगा -
The old pond      एक पुराना तालाब                   ताल पुराना 
A frog jumps in   और उछलते मेढक की आवाज         कूदा दादुर
Plop.           पानी के अन्दर।                    गडुप।         
  
आप सभी काव्य-मर्मज्ञों से अनुरोध है कि बताएँ कौन सा अनुवाद अच्छा है, चाहे शैली की दृष्टि से या शिल्प या काव्यात्मकता की दृष्टि से या ओवर आल।

यहाँ नाम इसलिए नहीं दे रहा हूँ कि खेमेबाजी न शुरु हो जाय।

इस अंक का समापन निम्न पंक्तियों से करते हुए इस स्तम्भ से विदा ले रहा हूँ-


बन्दउ ब्लॉग प्रमुख गन चरना।

छमहु जानि दास निज सरना।।

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