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शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

चिठियाना-टिपियाना संवाद-६

चिठियाना-टिपियाना संवाद-६

(अनबन-बनबन)

12012010005 मनोज कुमार

(१) चिठियाना-टिपियाना संवाद
(२) चिठियाना-टिपियाना संवाद : द्वितीय अध्याय
(३) चिठियाना-टिपियाना संवाद : तृतीय अध्यायः
(४)चिठियाना-टिपियाना संवाद : अध्याय – 4

(५) चिठियाना टिपिआना वाद-विवाद .... आंखों देखा हाल .... लाईव फ़्रॉम ब्लॉगियाना मंच -- कमेंटेटर -- छदामी लाल और निर्धन दास

उस दिन छदामी लाल के क़दम मिलन पार्क के अंदर पड़े ही थे कि उसने देखा टिपियाना एक कोने में गुमसुम उदास बैठा है और चिठियाना उसकी तरफ़ बढ रहा है।

चिठियाना-क्या हुआ भाई टिपियाना! आज मिलन पार्क के इस कोने में, गुमसुम, गंभीर, अकेले।

टिपियाना-भाई! आज सच में बिल्कुल अलग-थलग और अकेला महसूस कर रहा हूं।

चिठियाना-क्यों, क्या हुआ?

टिपियाना-हमारे ऊपर गंभीर संकट छा गया है।

चिठियाना-ऐसा क्या हुआ मेरे भाई?

टिपियाना-भाई मत कहो! तुम्हारे मुंह से भाई का संबोधन, अच्छा नहीं लगता।

चिठियाना-लो, कर लो बात! अब मुझसे क्यों ख़फ़ा हो रहे हो? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?

टिपियाना-तुम्हारे मुंह से यह सब सुनना अच्छा नहीं लगता। तुम हमें आस्तीन के सांप समझते हो। गया था गले मिलने, दुआ-सलाम करने और तुम मेरी इस हरकत को यह समझ बैठे कि इसमें मेरा स्वार्थ है। निहितार्थ है।

चिठियाना-ऐसा कब कहा हमने? यह क्यों कर आया तुम्हारे मन में?

टिपियाना-सब कहने से ही होता है क्या? हम तो तुम्हारा हर लिखा, अन-लिखा सब पढते हैं, पढ लेते हैं! पर तुम …. तुम तो हमारी सीधे-सादे ढंग से कही बात का कुछ “और” ही अर्थ लगाते हो….!

चिठियाना-कभी ऐसा कहा हमने?

टिपियाना-….. और क्या? कहा नहीं तो ….. तुम ही बताओ जब तुम ख़ुद के बीमार होने की बात करोगे तो  मैं तो यही कहूंगा ना कि … … ‘तुम्हारे साथ जीवन के हर पल का आनंद मिला है। तुम जल्‍दी स्‍वस्‍थ हो जाओ ताकि हम फिर से खुशियों को महसूस कर पाएं।’ … … या फिर … … ‘तुम्हारा आस-पास न होना बेहद अखर रहा है। जल्‍द ठीक हो जाओ।’

चिठियाना-हां।

टिपियाना-पर मेरे इस कहे के पीछे तुम सोचोगे कि ….‘हां-हां तुम तो यही चाहते हो कि मैं स्वस्थ हो जाऊं ज़ल्द से ज़ल्द ताकि तुम्हारे यहां जाकर तुम्हारा मन बहलाऊं।’

चिठियाना-अरे-रे-रे—!! नहीं! नहीं!! भाई!!! ऐसा क्यों कहूंगा? कभी नहीं।

टिपियाना-मैं समझता नहीं क्या? सब समझता हूं। अब जब तुम स्वस्थ और तरो ताज़ा दिखोगे तो यही तो कहूंगा कि बहुत अच्छा दिख रहे हो, स्वस्थ, हृष्ट-पुष्ट और सही-सलामत!

चिठियाना-हां! इसमें ऐतराज़ वाली कोई बात नहीं है।

टिपियाना-पर मैं जानता हूं कि मन ही मन तुम कह रहे होगे …. ‘हां-हां, बीमारी में मेरे पास आकर दो-चार सेव-फल लाते थे …. अब बच गया! … इसी लिए इतने चहक रहे हो!! खुद कितने प्रफुल्लित लग रहे हो कि मिला छुटकारा व्यर्थ के इस खर्च से!!’

चिठियाना-भाई टिपियाना …..

टिपियाना-भाई मत कहो! जब भी भाई कह कर मैं गले लगता हूं तो तुम इसका भी कोई और ही मतलब निकालते हो जैसे …. जैसे …. ‘आज तो गला दबाने के लिए ही गले पड़ रहा है।’

चिठियाना-यह सरासर आरोप है मुझ पर! ये आज तूने कौन सा मुद्रा अख़्तियार कर लिया है?

टिपियाना-आरोप नहीं, मिस्टर चिठियाना! मेरा अब यही रूप तुम्हें देखने को मिलेगा।

चिठियाना-क्या बकते हो?

टिपियाना-बकता नहीं हूं! तुम्हें आगाह कर रहा हूं। जब तुम बीमार पड़ोगे तो कहूंगा --- ‘अच्छी और तगड़ी बीमारी है! थोड़ी और तगड़ी और अच्छी हो जाए यह बीमारी तो मज़ा आ जाए! शायद फिर उसका ईलाज इंडिया में संभव ही न हो। फिर तो इसी बहाने विदेश यात्रा का तुम्हारा  भी योग बन जाएगा!’

चिठियाना-अरे! शुभ-शुभ बोलो!

टिपियाना-हां-हां, जब तुम तरो-ताज़ा दिखोगे तो शुभ-शुभ ही बोलूंगा … कहूंगा …. ‘इतने दिनों के बाद यह चमक तुम्हारे चेहरे पर अच्छी नहीं लगती। आंखों को खटक रही है। इसकी तेज को कम करो। फिर से बीमार पड़ो। बीमार थे तो कितना ऐश-ओ-आराम था। कितने सारे लोग पूछने आते थे। अब स्वस्थ हो गए हो, तो  कोई पूछने भी नहीं आएगा। फिर इधर-उधर घूमते-भटकते फिरोगे।

चिठियाना-भाई तुम्हारा आज सिर फिर गया है।

टिपियाना-फिरा नहीं है, अब होश आया है। हमारा क्या है, हम तो फिर भी कुछ न कुछ टिपिया लेंगे। आपस में ही बतिया लेंगे। तुम अपना सोचो, दुकान सजा कर बैठे रहोगे, हम सामने से गुज़र जाएंगे। न दुआ, न सलाम, फिर …. …

चिठियाना-बहुत हुआ! अब बस करो …!
टिपियाना-हां-हां! बस ही करता हूं….
चिठियाना-हुंह!
टिपियाना-हुंह!!
चिठियाना-….. …..
टिपियाना-…. ……
चिठियाना-????
टिपियाना-????
चिठियाना-!, @, #, $, \, ~
टिपियाना-!, @, #, $, \, ~
चिठियाना-%, ^,-*, (, ), /,
टिपियाना-%, ^,-*, (, ), /,
चिठियाना-<, >
टिपियाना-<, >

अब छदामी लाल से रहा नहीं गया। सामने आया और बोला, “यार! तुम दोनों मिलजुल कर रहो। वरना हमारे ब्लॉगियाना के आंगन में सिर्फ़ संकेत ही रह जाएंगे, कोई संवाद नहीं रहेगा …..”

(इतिश्री ब्लोगर-खंडे नवरात्रोपलक्ष्ये चिठियाना-टिपियाना अनबन-बनबन वार्ता नाम षष्ठो अध्यायः !!)

मंगलवार, 18 मई 2010

चिठियाना टिपिआना वाद-विवाद .... आंखों देखा हाल .... लाईव फ़्रॉम ब्लॉगियाना मंच -- कमेंटेटर -- छदामी लाल और निर्धन दास

 

चिठियाना टिपिआना

वाद-विवाद

.... आंखों देखा हाल

.... लाईव फ़्रॉम

ब्लॉगियाना मंच --

कमेंटेटर -- छदामी लाल

और निर्धन दास

image नमस्कार दोस्तों! मैं छदामी लाल आपका वेलकम करता हूँ। ब्लॉगियाना मंच पर आपका स्वागत है। अद्भुत, अनोखा और अभूतपूर्व खेल यहां खेला जाने वाला है। हम सब उस ऐतिहासिक घड़ी का गवाह बनेंगे। सामने मंच पर अभी हरा पर्दा पड़ा हुआ है जो कुछ ही क्षणों में उठेगा और आज की कार्रवाई शुरु हो जाएगी।

मैं निर्धन दास आपको नमस्कार करता हूं। मंच के ठीक सामने दो सोफा लगे हैं जिस पर मुख्य अतिथि बस पधारने ही वाले हैं। पीछे श्रोताओं के खड़े होने का इंतज़ाम किया गया है। पूरा दर्शकदिर्घा खचाखच भरा हुआ है। दोनों मुख्य अतिथियों के समर्थकों के लिए हॉल के दोनों ओर दो शामियाने लगे हुए हैं। अभी उसमें कोई खास चहल-पहल नहीं है। छदामी मैं पीछे देख रहा हूं कि मुख्य द्वार से कोई पूरे आराम से चहलकदमी करते हुए आ रहा है। आप कुछ कहना चाहेंगे उनके बारे में।

जी हां निर्धन दास। ये हैं आज के पहले मुख्य अतिथि चिठियाना।

चिठियाना … कौन चिठियाना?

निर्धन दास जी इनकी अलमस्त चाल पर नहीं जाइए, ये हमारे ब्लॉगियाना मंच के बहुत पुराने और पहुंचे हुए खिलाड़ी हैं! हां थोड़ा आराम तलबी हैं पर एक बार खेल शुरु हुआ नहीं कि एक से एक धांसू आइडिआ फेंक देते हैं और सारा ब्लॉगियाना उसे पकड़ते-जकड़ते, खांसते-बांचते रहते हैं।

ओह! पर उस दूसरे गेट से कौन आ रहा है?

वो हमारे दूसरे मुख्य अतिथि हैं टिपियाना।

छदामी जी उनके बारे में भी हमारे श्रोताओं को कुछ बताइए।

अरे! निर्धन दास जी ये तो बड़े ही प्रसिद्ध खिलाड़ी हैं। न सिर्फ़ सारा ब्लॉगियाना इनके ऊपर फ़िदा है बल्कि ये भी अपने प्यार से सबको सम्मोहित किए रहते हैं। सबके घर जा-जा कर उनसे गले मिलते हैं, दिल से उन्हें चाहते हैं, अपना हाल-चाल सुनाते हैं और उनकी खोज-खबर लेते रहते हैं!

हूं! अभी मैं देख रहा हूं कि दोनों ने अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया है। दोनों के चेहरे पर प्रसन्नता भी है, गाम्भीर्य भी। उनका आपस में बतियाना ज़ारी है। उधर मंच से पर्दा धीरे-धीरे उठ रहा है और वहां पधार रहे हैं आज के कार्यक्रम के संचालक। यह बता दूं कि इस कर्यक्रम का आयोजन भी उन्होंने ही किया है। उन्होंने घोषणा करनी शुरु कर दी है। बता रहे हैं कि विद्वानों, सुधि जनों और बुद्धिजीवियों की इस सभा में एक वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है।

इस वाद-विवाद प्रतियोगिता का विषय है कौन है नम्बर वन – चिठियाना या टिपियाना? लोग अपने विचार या तो विषय के पक्ष में या फिर विपक्ष में रख सकते हैं। पर ये मैं क्या देख रहा हूँ? ज्यों ही विषय का ऐलान हुआ, हॉल में मौज़ूद ब्लॉगियना दो दलों में बंट गये हैं। एक दल चिठियाना शामियाने की ओर देख कर बढ-बढ़ कर, चढ़-चढ़ कर आवाज़ लगा रहे हैं। तो वहीं दूसरा दल टिपियाने की ओर देख कर बढ-बढ़ कर, चढ़-चढ़ कर आवाज़ लगा रहे हैं।

छदामी जी क्या इसी को कहते हैं वाद और विवाद?

जी हां निर्धन दास जी आप देख ही रहे हैं एक तरफ़ है वाद और दूसरी तरफ़ है विवाद। और … और … बीच में … बीच में ….

छदामी जी! बीच मे फंस गया है संवाद।

जी हां दोस्तों, कुछ .. कुछ तीव्र बुद्धि वाले ब्लॉगियाना ने तटस्थता की स्थिति बना रखी है, और वे संवादहीनता की दिव्य भावना से ग्रस्त हैं। अब आगे का हाल छदामी जी बताएंगे।

हां दोस्तों! दोनों खेमा अपने-अपने शामियाने में समा, ..  नहीं जमा हो चुके हैं। बीच में बुद्धिमान श्रोता वर्ग है जो इस पूरे आयोजन को बड़े मनोयोग से देख रहा है। वाद-विवाद अपने पूर शवाब पर है। दोनों तरफ़ से तर्कों का एक-से-बढ़कर शब्द वाण फेंके जा रहे हैं। ऐसा रंग जमा है कि देखते बनता है। यहां तक कि अब मुख्य अतिथि भी अपने आप को रोक नहीं पा रहे हैं। निर्धन दास जी बिल्कुल उनके पास पहुंच गये हैं और वहीं से आगे का हाल सुना रहे हैं … …

मैं मंच के सामने हूँ और देख रहा हूं कि मुख्य अतिथि का आपस में बतियाना बंद हो चुका है। वे अब सोफ़े पर से उठ चुके हैं और अपने-अपने तंबू की और जमा अपने समर्थकों से शांत होकर वार्तालाप करने की अपील कर रहे हैं। उन्हों ने भोंपू भी पकड़ रखी है। दोनों अपने अपने विचारों का प्रासार भोंपू से कर रहे हैं। उधर क्या हाल है छदामी जी?

निर्धन दास जी इधर का हाल तो पूरा बेकाबू है। श्रोताओं ने अपने-अपने पक्ष का न सिर्फ़ ज़ोर-शोर से प्रचार किया बल्कि अपने नेता से सामने आकर उनके समर्थन में कुछ कहने का आग्रह भी किया है। निर्धन दास जी मैं देख रहा हूं उधर मंच की तरफ़ कुछ हलचल है।

जी हां छदामी जी! इधर मंच पर चिठियाना आ चुके हैं और उन्होंने एक लंबा भाषण दे डाला है।

क्या कहा है उन्होंने?

चिठियाना ने काफ़ी लंबा वक्तव्य रखा है। उसका सारंश यही है कि इस ब्लॉगियना में पहले वो आये हैं। उनका अस्तित्व सबसे ऊपर है। वो हैं तो टिपियाने की ज़रूरत पड़ती है। इसलिए चिठियाना बड़ा है। उधर का आप बताएं छदामी जी।

इधर तो हलचल और बढ़ गई है। टिपियाना पक्ष भी टिपियाना से पुरज़ोर अपील कर रहा है कि इधर से भी वक्तव्य रखा जाए और ये क्या टिपियाना भी मंच की तरफ़ प्रस्थान कर गये हैं। निर्धन दास जी ज़रा मंच से हाल बताएं।

छदामी जी मंच से टिपियाना ने ऐलान किया है कि बिना टिपियाने के द्वारा स्तुति गायन के चिठियाना की हैसियत दो कौड़ी का है। इसलिए टिपियाना बड़ा है।

निर्धन दास जी इस बयान के आ जाने के बाद दोनों पक्ष के समर्थक एक-दूसरे पर फिर से पिल पड़े हैं। स्थित्ति हाथ से बाहर जाते दिख रही है।

छदामी जी इधर मंच पर मैं देख रहा हूं कि चिठियाना और टिपियाना दोनों एक दूसरे से बतियाने में मशगुल हैं।

निर्धन दास जी दोनों को बतियाते देख इधर समर्थक एक बार फिर से अपने-अपने तंबू में चले गए हैं। लगता है स्थिति कुछ नियंत्रण में है।

अच्छा! छदामी जी लगता है इस स्थिति से प्रफुल्लित हो चिठियाना और टिपियाना ने अपना-अपना पैंतरा बदल लिया है।

चिठियाना ने मंच से टिपियाना के सम्मान में आरती गाना शुरु किया है। जय टिप्पा भैया, तुम सबके रक्षक, पार लगओ नैया। जय टिप्पा भैया।

image उनकी आरती गायन की समाप्ति पर टिपियाना की तरफ़ से ज़ोरदार तालियों की आवाज़ आई है। अब टिपियाना ने चिठियाना को माला पहनाया और फिर भजन गाया है तुम हमरे हो गुरु और हम हैं शिष्य तेरे, राह जो तू ने दिखाई, भाग फिरे मेरे!

अब दोनों गले मिल रहे हैं। 

निर्धन दास जी इस हार्दिक मिलन के अवसर पर दोनों पक्ष के समर्थक हतप्रभ हैं। ठगे से महसूस कर रहे हैं। और जो तटस्थ दर्शक थे लुटे-पिटे अपने-अपने रास्ते लौट रहे हैं

हां छदामी जी, आख़िर दोनों पक्षों की वार तो वो ही झेल रहे थे।

पर निर्धन दास जी मैं देख रहा हूं, इस वाद-विवाद के आयोजक मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं।

छदामी जी ये क्या? चिठियाना तो अपनी क़ीमती गाड़ी में आराम से लेटकर इस स्थान से प्रस्थान कर गये हैं।

हां निर्धन दास जी। टिपियाना भी अपनी गाड़ी में बैठ चुके हैं और उनकी गाड़ी देखते ही देखते हवा से बातें करने लगी है।

बुद्धिजीवी ब्लॉगियाना वर्ग किं-कर्तव्यविमूढ़ है।

(धीरे-धीरे पर्दा गिरता है) 

नेपथ्य से आवाज़ आती है -- “नाटक अभी बाक़ी है दोस्तों!”
दृश्य परिवर्तन

समय – गोधूलि

स्थल – ब्लॉगियाना सितारा होटल

पात्र – चिठियाना, टिपियाना, और आयोजक-संचालक।

क्रिया कलाप --

ठंढ़े पेय पदार्थों के बीच गंभीर किंतु सहज ढ़ंग से विचारमग्न! तीनों मान रहे हैं कि आयोजन सफल रहा। सफल नहीं “हिट!!!” अब उन्हें तीन बातों का निर्णय लेना है

१. ब्लॉगियाना उथल-पुथल को कौन सी दिशा दी जाए?

२. अगले वाद-विवाद की तिथि का निर्धारण।

३. इस बार संचालन की भूमिका कौन निभाएगा?

(बत्ती धीरे-धीरे डिम होती जाती है!)

अंधेरा गहराता जाता है।

पूर्ण प्रकाश। मंच पर कोई नहीं है।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

चिठियाना-टिपियाना संवाद : अध्याय - 4

चिठियाना-टिपियाना संवाद : अध्याय - 4

-- मनोज कुमार


उस दिन चिठियाना बहुत उदास बैठा था। पता नहीं किस उलझन में था.... । छदामी लाल ने उदासी का कारण जानना चाहा....। लेकिन उदास चिठियाना ने कुछ जवाब नहीं दिया। तभी टिपियाना का आविर्भाव हुआ। आज अपने चिर-सखा को उदास देख टिपियान को बहुत सदमा लगा। टिपियाना को देख चिठियाना को भी कुछ संबल मिला। उसने सोचा चलो पुराने यार से बातें कर के उलझन सुलझे न सुलझे..... दिल तो हल्का हो जाएगा । दुआ-सलाम के बाद शुरू हुआ दोनों का संभाषण !


चिठियाना : भाई सिक्कों की खनक तो सुनी ही होगी तुमने। सिक्के एक, दो, पांच के मूल्य वाले हैं पर आवाज़ ज़्यादा निकालते हैं। वहीं दस, बीस, पचास, सौ, पांच सौ और हज़ार के नोट शांत होते हैं, ख़ामोश रहते हैं।

टिपियाना : हाँ ! क्यूंकि उनका मूल्य अधिक होता है। जैसे-जैसे महत्व एवं उपयोगिता बढ़ती जाती है व्यक्ति उत्तेजनारहित और शांत होता जाता है। यह स्थिति तो ज्ञान के संचय से ही आती है। इस अवस्था में जीवन सुंदर होता है।

चिठियाना : सुंदर जीवन बस यूं ही नहीं हो जाता। इसे रोज़ बनाना पड़ता है अपनी प्रार्थनाओं से, नम्रता से, त्याग से एवं प्रेम से। जीवन में हर कोई सफलता की ऊँचाई प्राप्त करना चाहता है। पर आप कितनी ऊँचाई प्राप्त कर सकते हैं तबतक नहीं जान पाते जबतक आप उड़ान भरने के लिए अपने पंख नहीं फैलाते।

टिपियाना : हाँ, यार ! ज़िन्दगी चॉकलेट के बक्से की तरह है। चॉकलेट के बक्से का प्रत्येक चॉकलेट ज़िन्दगी के एक हिस्से के समान होता है। कुछ क्रंचि (करड़-मरड़ की आवज़) है, तु कुछ नट्टी (काष्ठफल के स्वाद वाला), वहीं कुछ हिस्स सॉफ्ट (मुलायम) है। पर सारे के सारे स्वादिष्ट! अतः जीवन के हर पल को एन्ज्वाय करें, मज़े लें, आनंद उठाएं।

चिठियाना : ज़िन्दगी में हम विभिन्न प्रकार के लोग से मिलते हैं। कुछ लोग अन्य की तुलना में हमारे ज़्यादा प्रिय हो जाते हैं। ऐसा क्यों होता है? इसका कारण यह नहीं है कि जब आप ऐसे लोग से मिलते हैं तो आपको अधिक ख़ुशी, प्रसन्नता का अनुभव होता बल्कि जब वे आपके पास नहीं होते, ईर्द-गीर्द नहीं होते तो आप बड़ा ख़ाली-ख़ाली महसूस करते हैं, अकेलापन का अनुभव करते हैं। ऐसे लोगों से ज़िन्दगी के मतलब बदल जाते हैं। ऐसे लोग हमारे हृदय तंतुओं को छूते हैं। हममें मधुर भावनाओं का संचार होता है।

टिपियाना : हाँ, लेकिन संबंध मधुर हो इसके लिए वाणी का भी बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान होता है। वाणी यदि कठोर हो तो किसी कोमल हृदय को क्या छूएगा? हां, कोमल वाणी से किसी भी कठोर हृदय प्राणी के दिल को जीता जा सकता है। इसलिए मधुर बोलें, मीठा बोलें, जग जीत जाएंगे।


चिठियाना : हमें ख़ुशी चाहिए। प्रसन्नता चाहिए। ज़िन्दगी हमें यूं ही ख़ुशियां नहीं दे देती। इसे हमें पाना होता है। ज़िन्दगी तो हमें टाइम और स्पेस देती है। यह तो हम पर निर्भर करता है कि हम इसे कैसे भरते हैं। जीवन के रास्ते सदैव समतल तो नहीं ही होते। कभी-कभी ऊँची चढ़ाई भी चढ़नी होती है। अब लोग कहते हैं भगवान का नाम लेकर चढ़ जाओ। भगवान का नाम लेकर चढने से पहाड़ छोटा नहीं हो जाता, हां हो सकता है चढना थोड़ा आसान हो जाए। मुश्किलें हल्की हो जाएं। पर यदि भगवान को याद ही करना है तो मुश्किलें आसान हो जाएं यह मांगने के वजाए हामारी पीठ और मज़बूत हों, यह मांगना चाहिए। ताकि जीवन की दुश्‍वारियों का सामना हम दृढ़ता से कर सकें। प्रार्थना से परिस्थिति नहीं बदल जाती। हां इससे परिस्थिति के प्रति हमारी सोच में बदलाव आ सकता है। हम और मज़बूत इरादों के साथ समस्या के सम्मुख खड़े हो पाते हैं।

टिपियाना : सही कहा भाई ! कई बार हम ऐसी परिस्थितियों में घिर जाते हैं कि हमें कोई राह नहीं सूझता। समस्या के समाधान को ले कर एक मत नहीं होता। मुद्दे पर आपस में तकरार शुरु हो जाता है। तरह-तरह की दलीलें आती हैं। किसी प्रश्‍न का अगर हल ढ़ूढ़ना हो तो तर्क-दलील से काम नहीं चलता। इसके लिए विचार-विमर्श ज़रूरी है। तर्क-दलील से हम यह तो पता लगा सकते हैं कि कौन सही है पर विचार-विमर्श से हमें यह पता चलेगा कि क्या सही है।

चिठियाना : ऐसा नहीं है कि ज्यों-ज्यों हम उम्रदराज़ होते जाते हैं तो हमारी मुस्कान कम होती जाती है। बल्कि सच तो ये है कि हम बूढ़े इसलिए दिखते हैं क्योंकि हमने मुस्कुरते रहना कम कर दिया है। इसलिए हम अपने आप को मुस्कान का उपहर दें और लंबी ज़िन्दगी जिएं।


टिपियाना : सत्य वचन ! आज मैं तुम्हारे बातों से सौ प्रतिशत सहमत हूँ। हम अगर जिन्दगी को मुस्कराने का मौका दें तो जिन्दगी हमें जिन्दगी भर मुस्कुराने का मौका देगी।


अमूमन चिठियाना-टिपियाना के तू-तू-मैं-मैं को बड़े मनोयोग से सुनने वाले छदामी लाल को आज दोनों के एकसुरी वार्ता सुन कर रहा नहीं गया। अचानक कह उठे, "धन्य हो महापुरुषों ! आपकी वाणी मिथ्या हो ही नहीं सकती !! जय हो !!!


(इतिश्री ब्लोगर-खंडे चिठियाना-टिपियाना संवादे मुस्कुराना नाम चतुर्थो अध्यायः!)


शनिवार, 16 जनवरी 2010

चिठियाना-टिपियाना संवाद : द्वितीय अध्याय

-- मनोज कुमार
ऊ दिन छदामी लाल को घर में रहना किसी रणभूमि के आखाड़े से कम नहीं लग रहा था। ख़ुद्दे से नाराज़ छदामी घरे से निकल लिए मानसिक शांति खोजे ख़ातिर। बहुत देर इम्हर-ओम्हर भटकने के बाद मैदान पहुंचे। हरियर घास के चादर पर पीयर-पीयर फैलल धूप देखकर तो उनका वहीं पर लेटने का मन बन गया। तभिए सामने एक कोने में चिठियाना को लेटे-लेटे कुछ लिखते देखे। छदामी लाल के मन में चिठियाने के प्रति और उस से भी बढ़कर उसके विचारों के प्रति अगाध श्रद्धा है। उन्होंने सोचा चल कर आज आभार प्रकट कर ही दूं। ज्यों ही क़दम बढ़ाये कि आंधी-तूफान की-सी गति से टिपियाना का वहां पदार्पण हुआ।

टिपियाना - लो, तुम यहां बैठे हो, और मैंने तुम्हें कहां कहां नहीं ढ़ूंढ़ा।
चिठियाना – क्यों, क्या ऐसी बात हो गई जो तुम मुझे इतनी बेसब्री से ढ़ूंढ़ रहे थे।

टिपियाना – आज मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आ रहा है और मैं अपने आप से
बहुत ख़फ़ा हूं।
चिठियाना - क्या हुआ ?

टिपियाना - यार मैं किसी से कुछ कहता हूं तो लोग बात का बतंगड़ निकाल लेते हैं और फिर मेरी फ़ज़ीहत कर डालते हैं।
चिठियाना - किसने की तेरी फ़ज़ीहत ?

टिपियाना - आज तो बात घर की ही है !

चिठियाना - घर की ? .. भाभी जी … !

टिपियाना - हां ..!

चिठियाना - अब तुछ तफसील से बताओगे भी ...!?

टिपियाना - आज लंच में परोसे गए आहार को चख कर मैंने उनके पाकशास्त्र पर अपनी प्रतिक्रिया क्या दे दी, बस वही मेरा यह टिपियाना मेरे लिए दिन भर जी का जंजाल बना रहा। सब्जी में मिर्च की अधिकता से आहत मुंह इतना ही तो बका था – “आज यह क्या बना डाली हो? मिर्ची ही मिर्ची, - सब्जी नहीं आग है।” मेरा यह बोलना था कि उनको ही मिर्ची लग गई। तब से घर का तो यह आलम है कि पूछो ही मत। उसने कहां-कहां नहीं इसकी चर्चा कर डाला है। मैं कहीं मुंह दिखाने के क़ाबिल नहीं रहा।

चिठियाना - तेरे बेवकूफ दिमाग में यह बात क्यों नहीं आई कि उन्हें तेरी यह प्रतिक्रिया नहीं भाएगी। अब इस तरह की खड़ी-खोटी प्रतिक्रिया दोगे तो कौन लाइक करेगा।

टिपियाना - अरे मेरी तो मति ही मारी जाती है जो मैं सब जगह टिपियाते फिरता हूं।
चिठियाना - तो क्या मामला नहीं थमा
टिपियाना - उनकी जुबान से आज अमृत वर्षा थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। इसीलिए मैं घर से भागा-भागा फिर रहा हूं और तुम्हें ढ़ूंढ़ रहा था। ताकि कुछ सही सलाह मिल जाए।

चिठियाना - अरे .. रे.. रे... यह तो बहुत ही बुरा हुआ। अब .. अब ...
टिपियाना - अब तो समझो मेरा दाना पानी ही बंद होने वाला है। बोल रही थी मैं अब तुम्हारे इस जगत से आज ही चली जाऊंगी। अब तुम्ही बताओ कि इतनी तीखी सब्जी परोस कर कोई पूछे बताओ कैसी है ? तो मैं क्या कहता ?

चिठियाना - ऐसे संवेदशील मामलों में समझदारी से काम लेनी चाहिए। अरे तुझे तो यह बोलना चाहिए था – वाह मज़ा आ गया। क्या चटपटी सब्जी बनी है। मुंह तो मुंह कानों को भी स्वाद आ गया। इस तरह से बोलने से तेरा क्या जाता ?

टिपियाना - मेरा क्या जाता .. तुम क्या समझोगे हम टिपियानों की ज़ज़्बात .. अरे अगर हम उसी समय और उसी लहजे में नहीं टिपियाते तो हमारा तो रातों की नींद और दिन का चैन छिन जाता।

चिठियाना - अब कयूं अपनी भूल का अहसास हो रहा है ? पूरे स्वाद के साथ उस स्वीट डिश का आनंद लो !
टिपियाना - अरे यार तुम अभी तक मामले की गंभीरता को समझ नहीं रहो हो। उन्होंने जाने का ऐलान कर दिया है। पलायन !! और इस बार न आने की बातें भी कह रही थी।

चिठियाना - तो उनके चले जाने से तुम्हारा क्या जाता है ? वो जा रही है तो जाने दो। जी भर के, स्वीट डिश की प्याली भर-भर के खाना।

टिपियाना - तुम अब भी मेरी मज़बूरी नहीं समझ रहे हो। वो नहीं रहेंगी तो मैं टिपिआऊंगा किसके साथ ? मेरे अस्तित्व की रक्षा के लिए उनका यहां होना बहुत ज़रूरी है।

चिठियाना - तो तुम क्या करना चाहते हो ?

टिपियाना - सीज़फायर ... मैं अपनी तरफ से सीज़फायर ही करना उचित समझता हूं।

चिठियाना - वो तुम कर सकोगे।
टिपियाना - हा। करूंगा। करना ही पड़ेगा।

चिठियाना - देखो यह कोई मामूली बात नहीं है। एक निति है। और इस नीति का दृढ़ता से पालन करना होगा।
टिपियाना - करूंगा।

चिठियाना - मुझे तो नहीं लगता कि बिना कोई ऐसी वैसी प्रतिक्रिया दिए तुम रह पाओगे।
टिपियाना - रह लूंगा यार। अब तो लगता है न टिपियाने में ही समझदारी है।
चिठियाना - तुम तो ज़ज़्बाती हो रहे हो। पर साथ ही तुम्हें दूसरों के ज़ज़्बातों को समझना चाहिए।
टिपियाना - समझता तो हूं।
चिठियाना - तुम कुछ समझते नहीं ।

टिपियाना - तुम ठीक से समझाते नहीं। इतना घुमा फिराकर बात रखते हो कि मेरी समझ में कुछ नहीं आता।

चिठियाना - अच्छा मैं सरल शब्दों में तुम्हें समझाता हूँ – मान लो कि तुम एक श्रेष्ठ चिट्ठाकार हो …..

टिपियाना - ये मान लेने वाली क्या बात … मुझे इससे बड़ी चिढ़ है … मैं हूँ ही …।

चिठियाना - ठीक है … फिर तुमसे भी तो कोई श्रेष्ठ होंगे।

टिपियाना - हां क्यूं नहीं होंगे … डेफिनेटली होंगे।
चिठियाना - तो उनकी श्रेष्ठता का सम्मान करे।
टिपियाना - अच्छा…..
चिठियाना - यदि कोई विद्वान चिट्ठाकार है तो उसकी विद्वता का सम्मान करो।
टिपियाना - अच्छा … ।
चिठियाना - यदि कोई वरिष्ठ चिट्ठाकार है तो उनकी वरिष्ठता का सम्मान करे।
टिपियाना - बहुत खूब... !

चिठियाना - यदि कोई बड़ा चिट्ठाकार है तो उसकी बड़प्पन का सम्मान करो।
टिपियाना - हूँ ..
चिठियाना - यदि कोई बाल चिट्ठाकार है तो उसके बालपन का सम्मान करो।
टिपियाना - कमाल है ..
चिठियाना - यदि कोई महिला चिट्ठाकार है तो उसके मातृत्व का सम्मान करो।
टिपियाना – वाह-वाह। यदि कोई तेरे जैसा मित्र चिट्ठाकार है तो उसकी मित्रता का सम्मान करूं।

चिठियाना - बिलकुल। यही समझाना चाह रहा था मैं तुम्हें कि हमें दूसरों की भावनाओं को समझना चाहिए। उसका सम्मान करना चाहिए।
टिपियाना - बस-बस बहुत हो गया। यदि सबका मैं सम्मान ही करता रहूँ तो – मेरा तो टिपियाना किसी काम का नहीं रहा और हां कान खोल कर सुन लो मिस्टर चिठियाना तुम ऐसा कहके मेरा अपमान कर रहे हो ।

छदामी लाल को इससे ज़्यादा मानसिक शांति की न तो उम्मीद थी न ज़रूरत। वो घर के लिए प्रस्थान कर गए। उनको फिर एक मसाला मिल गया था अपने नए पोस्ट के लिए।
(इतिश्री चिठियाना-टिपियाना मान-न-मान मैं तेरा महमान नामो द्वितीयो अध्यायः !!)