मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

कविता - श्रद्धा-सुमन


श्रद्धा-सुमन
आचार्य परशुराम राय




क्या कहूँ
बापू,
आपके बन्दरों ने
जीना हराम कर दिया -
एक सुनता नहीं,
एक देखता नहीं
और
एक कुछ कहता नहीं।
जो देखता है, बोलता नहीं,
जो बोलता है, सुनता नहीं
और
जो सुनता है,
वह न देखता है, न बोलता है।


इन तीनों से
आ मिले हैं
दो और बन्दर,
एक बात-बात पर
देता रहता है
बन्दर-घुड़की
और दूसरा
सब कुछ
छीन लेता है।

अब तो
इनकी जनसंख्या भी
इतनी हो गई है
कि क्या कहूँ,
इनके आतंक से
त्रस्त जनता
किंकर्तव्यविमूढ़ है।
इनके द्वारा
आपकी समाधि पर
चढ़ाने के लिए फूल
लाए गए हैं
उजाड़कर
फुलवारियों को।
पर, पास मेरे
जो बचे श्रद्धा सुमन,
स्वीकार करें इनको
बापू।
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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

चर्खी हुई चाकरी

चर्खी हुई चाकरी

श्यामनारायण मिश्र

छूटे खेत खाद

सावन के मेह

चर्खी हुई चाकरी निचुड़ी गन्ने जैसी देह।

 

लापरवाही वाले लमहे

ओसारे की खाट

पर्वों के मेले

कस्बे की हफ़्तेवारी हाट

दूर छोड़ आई है गाड़ी अपने ग्यौंड़े गेह।

 

अपने मस्तक और हाथ हैं

नाम दफ़्तरों के

हम तो बकरी भेड़

चढ़े हैं नाम अफ़सरों के

उबर नहीं पाता अपने ही बच्चों को स्नेह।