श्रद्धा-सुमन
आचार्य
परशुराम राय
क्या कहूँ
बापू,
आपके बन्दरों ने
जीना हराम कर दिया -
एक सुनता नहीं,
एक देखता नहीं
और
एक कुछ कहता नहीं।
जो देखता है, बोलता नहीं,
जो बोलता है, सुनता नहीं
और
जो सुनता है,
वह न देखता है, न बोलता है।
इन तीनों से
आ मिले हैं
दो और बन्दर,
एक बात-बात पर
देता रहता है
बन्दर-घुड़की
और दूसरा
सब कुछ
छीन लेता है।
इनकी जनसंख्या भी
इतनी हो गई है
कि क्या कहूँ,
इनके आतंक से
त्रस्त जनता
किंकर्तव्यविमूढ़ है।
इनके द्वारा
आपकी समाधि पर
चढ़ाने के लिए फूल
लाए गए हैं
उजाड़कर
फुलवारियों को।
पर,
पास मेरे
जो बचे
श्रद्धा सुमन,
स्वीकार
करें इनको
बापू।
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