खड़ा शीश पर नौटंकी का
कालू
श्यामनारायण
मिश्र
हो गया कलेऊ
कोई दिन ब्यालू
बूढ़ी चाची
कहती बेटे
सबके राम दयालू
सोच-सोचकर
हुआ अजीरन
मन है खट्टा-खट्टा
अभी रसोई मेंकल के लिये सुरक्षित
बाक़ी है
चूल्हा और सिलबट्टा
सींके पर
रक्खे दो आलू
धनिया के
आलिंगन का सुख
दुख ने बढ़ा दिया है
यौवन जैसाउसने भी
ज्वार देह में
ज्वर ने चढ़ा दिया है
कर दिया विदा
अपना स्वभाव झगड़ालू
रात बिताई
अंधकार में
इच्छायें खेते
थिगड़े कंबलखड़ा शीश पर
में अपनी ही
गर्मी सेते-सेते
हरिश्चन्द की
नौटंकी का कालू
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