रविवार, 10 अप्रैल 2011

भारतीय काव्यशास्त्र – 61

भारतीय काव्यशास्त्र – 61

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में भावशान्ति, भावोदय, भावसंधि और भावशबलता पर चर्चा की गयी थी। इस अंक पर चर्चा करने के पहले एक बार पुनः एक बार अबतक हुई चर्चा का स्मरण कर लेना आवश्यक है। यहाँ याद दिलाया जा रहा है कि यह चर्चा ध्वनि काव्य पर हो रही है, जिसमें हम ध्वनि के दो भेद – 1. अविवक्षितवाच्य (लक्षणामूलध्वनि) और इसके दो भेद- अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य ध्वनि एवं 2. विवक्षितवाच्य ध्वनि के दो भेदों – असंलक्ष्यक्रम ध्वनि और संलक्ष्यक्रम ध्वनि में से असंलक्ष्यक्रम ध्वनि या रसादिध्वनि के आठ भाग- रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसंधि और भावशबलता पर चर्चा की जा चुकी है। इस अंक से संलक्ष्यक्रम ध्वनि और इसके भेदोपभेदों पर चर्चा आरम्भ हो रही है।

संलक्ष्यक्रमध्वनि का दूसरा नाम अनुस्वनाभ ध्वनि भी है। इसके तीन भेद होते हैं- 1. शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि (शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यंग्य), 2. अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि (अर्थशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यंग्य) और 3. उभयशक्त्युत्थ ध्वनि (उभयशक्तिमूल अनुरणनरूप व्यंग्य)। शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि के दो भेद- वस्तुध्वनि और अलंकारध्वनि- होते हैं।

अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के तीन भेद होते हैं- 1. स्वतःसम्भवी, 2. कविप्रौढोक्तिसिद्ध और 3. कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध। इन तीनों के चार-चार भेद होते हैं-

1. वस्तु से वस्तु व्यंग्य, 2. वस्तु से अलंकार व्यंग्य, 3. अलंकार से वस्तु व्यंग्य

और 4. अलंकार से अलंकार व्यंग्य।

अब एक-एक कर इनपर चर्चा करेंगे। सर्वप्रथम शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि पर चर्चा करते हैं। जहाँ काव्य में शब्द के कारण व्यंग्य पाया जाय वहाँ शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि होती है। इसके भेदों में से वस्तुध्वनि का उदाहरण लेते हैं-

पन्थिअ ण एत्थ सत्थरमत्थि मणं पत्थरत्थले गामे।

उण्णअ पओहरं पेक्खिऊण जइ वससि ता वससु।।

(पान्थ, नात्र स्रस्तरमस्ति मनाक् प्रस्तरस्थले ग्रामे।

उन्नतपयोधरं प्रेक्ष्य यदि वससि तद् वस।।)

यह श्लोक प्राकृत भाषा का है। इसकी संस्कृत छाया कोष्ठक में दी गयी है। यह एक पथिक के प्रति एक स्त्री की उक्ति है। वह कहती है कि हे पथिक, इस पहाड़ी गाँव में सत्थर (विस्तर अथवा शास्त्र) तो बिलकुल नहीं है। यदि तुम इन उन्नत पयोधरों (स्तनों अथवा बादलों) को देखकर ठहरना चाहते हो तो ठहर जाओ।

यहाँ प्रथम अर्थ जो दिखता है कि यहाँ विस्तर आदि तो है नहीं, यदि उमड़े बादलों को देखकर जैसे-तैसे रात बिताना चाहते हो तो ठहर जाओ। परन्तु यहाँ दो शब्दों सत्थर के बिस्तर और शास्त्र तथा पयोधर के बादल और स्तन दो-दो अर्थ (प्राकृत भाषा में सत्थर शब्द के विस्तर और शास्त्र) अर्थ होते हैं। अतएव इसका दूसरा अर्थ यह व्यंजित होता है कि हे पथिक, यह पहाड़ी गाँव है। यहाँ परस्त्री-गमन का निषेध करने वाले शास्त्रों का तो यहाँ कुछ चलता नहीं है। यदि उपभोग के योग्य हो और उन्नत स्तनों को देखकर रुकना चाहो तो रुक जाओ। यदि यहाँ सत्थर और पयोधर शब्दों के स्थान पर इनके पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग दिया जाय तो यह दूसरा अर्थ नहीं आ पाएगा। अतएव यहाँ शब्दशक्त्युत्थ ध्वनि है और अलंकार रहित होने के वस्तुध्वनि का उदाहरण है।

एक हिन्दी का उदाहरण लेते हैं-

जो पहाड़ को तोड़-फोड़कर राह बनाता।

जीवन निर्मल वही, सदा जो आगे बढ़ता।।

इसका वाच्यार्थ है कि जो पहाड़ों को तोड़कर रास्ता बनाते हुए सदा आगे बढ़ता रहता है, वही जीवन (पानी) निर्मल होता है। जीवन शब्द के कारण यहाँ व्यंग्यार्थ निकलता है कि जो मनुष्य पर्वत जैसी कठिनाइयों को पार कर अपने प्रशस्त मार्ग पर सदा चलता रहता है, उसी का जीवन पवित्र होता है।

जहाँ काव्य में किसी अलंकार का व्यंग्य हो तो वहाँ अलंकार ध्वनि होती है। जैसे-

निरुपादानसम्भारमभित्तावेव तन्वते।

जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाशलागघ्याय शूलिने।।

अर्थात् तूलिका आदि चित्र बनाने के सामान और आधार-भित्ति के बिना ही अनन्त आकारवाले जगत रूपी चित्र बनानेवाले प्रशंसनीय उस शिव को नमस्कार है।

उपमान (सामान्य चित्रकार) की अपेक्षा उपमेय (भगवान शिव) को में गुण की अधिकता का वर्णन होने के कारण व्यतिरेक अलंकार व्यंजित होने से यहाँ अलंकार-ध्वनि है।

निम्नलिखित हिन्दी की कविता में भी व्यतिरेक अलंकार की व्यंजना देखी जा सकती है-

चाहे फटा फटा हो मेरा अम्बर अशून्य है आली।

आकर किसी अनिल ने यहाँ धूल तो डाली।।

इसका वाच्यार्थ है कि हमारा फटा वस्त्र (अम्बर) अशून्य है, क्योंकि इसपर धूल तो है जो प्रिय के संदेश की याद दिलाता है। अतएव मुझे स्वच्छ वस्त्र नहीं चाहिए, जो बिलकुल शून्य हो। यहाँ व्यंग्यार्थ है कि मेरा वस्त्र उस सुनसान अम्बर (आकाश) से, जो न फटा है और न ही धूलयुक्त है, अच्छा है।

अगले अंक में अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि पर चर्चा की जायगी।

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6 टिप्‍पणियां:

  1. काव्यशात्र की जानकारी देने के लिए आभार

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  2. आचार्य परशुराम राय की इस चर्चा से कुछ सीखने को मिल रहा है।

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  3. भारतीय काव्य शास्त्र से परिचय कराने के लिे आपका आभार।
    निसन्देह आचार्य परशुराम राय जी काव्यशास्त्र के उद्भट विद्वानों में माने जाते हैं।

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  4. आभार जानकारी का....बहुत बढ़िया....

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  5. अच्छी जानकारी देता सुंदर आलेख हर बार की भाँति संग्रहणीय. आभार.

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