रविवार, 24 अप्रैल 2011

भारतीय काव्यशास्त्र-63

भारतीय काव्यशास्त्र-63

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में स्वतःसम्भवी अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि, कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि और कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के विवेचन के साथ-साथ स्वतःसम्भवी अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के चार भेदों पर विचार किया गया था। इस अंक में कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के भेदों पर सोदाहरण चर्चा की जाएगी। पिछले अंक में यह भी चर्चा की गयी थी कि कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के भी चार भेद- वस्तु से वस्तु व्यंग्य, वस्तु से अलंकार व्यंग्य, अलंकार से वस्तु व्यंग्य और अलंकार से अलंकार व्यंग्य होते हैं।

यहाँ सर्वप्रथम कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के प्रथम भेद वस्तु से वस्तु व्यंग्य के लिए निम्नलिखित उदाहरण दिया जा रहा है-

कैलासस्य प्रथमशिखरे वेणुसम्मूर्च्छनाभि:

श्रुत्वा कीर्ति विबुधरमणीगीयमानां यदीयाम्।

स्रस्तापाङ्गाः सरसबिसिनीकाण्डसञ्जातशङ्का

दिङ्मातङ्गा: श्रवणपुलिने हस्तमावर्त्तयन्ति।।

अर्थात् कैलास पर्वत की पहली चोटी पर वंशी की मूर्च्छनाओं पर अलौकिक अप्सराओं द्वार गाई जानेवाली जिस राजा की कीर्ति को (अत्यन्त उज्ज्वल के कारण) सुनकर दिग्गज (दिक्पाल हाथी) अपनी आँखें तिरछी करके सरस मृणाल-खंड की समझकर (कानों की ओर देखने का प्रयास करते हुए से) मृणाल-खंड को पकड़ने के लिए अपने कानों की ओर अपने सूँड़ों को घुमा रहे हैं।

यहाँ श्लोक में कवि द्वारा कल्पित वस्तु से जिन हाथियों को गीत के अर्थ का ज्ञान लोक में सम्भव नहीं है उनमें भी इस प्रकार की बुद्धि (कीर्ति के अतिशय धवल होने के कारण मृणाल समझना) उत्पन्न करके राजा का यश चमत्कारपूर्ण है, यह वस्तु ध्वनित होती है। अतएव इसमें कविप्रौढोक्तिसिद्ध वस्तु से वस्तु व्यंग्य है।

अब वस्तु से अलंकार व्यंग्य का उदाहरण लेते हैं। यहाँ मूल श्लोक प्राकृत भाषा में है। अतएव यहाँ मूल के साथ-साथ उसकी संस्कृत छाया भी दी जा रही है-

केसेसु बलामोडिअ तेण अ समरम्मि जअसिरी गहिआ।

जह कन्दराहिं बिहुरा तस्स दढं कंठअम्मि संठविआ॥

(केशेषु वलात्कारेण तेन च समरे जयश्रीर्गृहीता।

यथा कन्दराभिर्विधुरास्तस्य दृढं कण्ठे संस्थापिता:॥ इति संस्कृतम्)

अर्थात् उसने (राजा ने) युद्धक्षेत्र में (सुरत-भूमि में) जबरदस्ती बालों को पकड़कर जयश्री का ऐसा आलिंगन किया कि उसे देखकर (रतिक्रीड़ा को देखकर) मदनोन्मत्त कन्दराओं ने उसके शत्रुओं को जोर से गले से लिपटकर रोक लिया।

यहाँ राजा के द्वारा विजयश्री का केश-ग्रहण को देखने (वस्तु-रूप) से मदनोन्मत्त सी हुई कन्दराएँ (मानो) उसके शत्रुओं के गले से लिपट रही हैं। इसमें उपमान की उपमेय में सम्भावना के कारण उत्प्रेक्षालंकार व्यंग्य है। पुनः एक स्थान पर युद्ध में उस राजा की विजय (रूप वस्तु) देखकर उसके शत्रु भागकर कन्दराओं में रहने लगे (वस्तु से) काव्यलिंग अलंकार व्यंग्य है (जहाँ विशेष युक्ति द्वारा कारण देकर पद या वाक्य के अर्थ का समर्थन किया जाता है, वहाँ काव्यलिंग अलंकार होता है)। यदि थोड़ा और आगे बढ़ें तो पाएँगे कि यहाँ अपह्नुति अलंकार भी व्यंग्य है- क्योंकि शत्रु भागकर गुफाओं में नहीं गये, बल्कि उस राजा से हार जाने के डर से पहले से ही गुफाओं में रह रहे शत्रुओं को गुफाएँ जाने नहीं देती, यह व्यंग्य है (जहाँ प्रस्तुत अर्थात् उपमेय का प्रतिषेध कर अप्रस्तुत अर्थात् उपमान की स्थापना की जाय, वहाँ अपह्नुति अलंकार होता है)।

अब कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के तीसरे भेद- अलंकार से वस्तु व्यंग्य का उदाहरण लेते हैं। मूल श्लोक प्राकृत भाषा में है, अतएव संस्कृत छाया के साथ यहाँ उद्धृत किया जा रहा है-

गाढालिंगणरहसुज्जुअम्मि दइए लहुं समोसरइ।

मणंसिणीण माणो पीलणभीअ व्व हिअआहि॥

(गाढालिङ्गनरभसोद्यते दयिते लघु समपसरति।

मानस्विन्या मान: पीडनभीत इव हृदयात् ॥इति संस्कृतम्)

अर्थात् इसका (नायिका का) गाढालिंगन करने के लिए प्रियतम के उद्यत होते ही दोनों के बीच में दब जाने के डर से मानो मानिनी का मान उसके हृदय से तुरन्त दूर हो गया।

यहाँ उत्प्रेक्षालंकार से प्रत्यालिंगन आदि वस्तु ध्वनित हो रही है, अतएव इसे अलंकार से वस्तु व्यंग्य माना जाएगा।

अब कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के चौथे और अंतिम भेद- अलंकार से अलंकार व्यंग्य का उदाहरण लेते हैं। यहाँ भी मूल श्लोक प्राकृत भाषा में है, अतएव संस्कृत छाया के साथ यहाँ उद्धृत किया जा रहा है-

जा ठेरं व हसन्ती कइवअणंबुरुहबद्धविणिवेसा।

दावेइ भुअणमंडलमण्णं विअ जअइ सा वाणी॥

(या स्थविरमिव हसन्ती कविवदनाम्बुरुहबद्धविनिवेशा।

दर्शयति भुवनमण्डलमन्यदिव जयति सा वाणी॥ इति संस्कृतम्)

अर्थात् वृद्ध (बह्मा) का उपहास करती हुई सी कवि के मुख-कमल पर बैठी हुई वह वाणी समस्त भुवन-मंडल को अन्य प्रकार सा अर्थात् अलौकिक रूप दिखलाती है, अतएव वह ब्रह्मा की अपेक्षा सब तरह से उत्कृष्ट है।

यहाँ कमल के आसन पर बैठकर जगत की सृष्टि करनेवाले स्थविर (वृद्ध अर्थात् ब्रह्मा) पर कवि के मुख-कमल पर बैठी वाणी हँसती हुई सी में उत्प्रेक्षालंकार है और ब्रहमा द्वारा सृष्ट जगत छः रसों से युक्त है, जबकि कवि की वाणी नौ रसों से युक्त है। अर्थात् कवि की वाणी (सृष्टि) ब्रह्मा की सृष्टि से उत्कृष्ट है, यह यहाँ व्यंग्य है। कवि की वाणी (उपमेय) की ब्रह्मा की सृष्टि (उपमान) से उत्कृष्टता व्यंजित होने के कारण व्यतिरेक अलंकार होगा। अतएव यहाँ उत्प्रेक्षालंकार से व्यतिरेकालंकार की व्यंजना है।

अगले अंक में कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के भेदों पर चर्चा की जाएगी।

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11 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी ब्लागों के नीरस कंटकाकीर्ण वनपथ पर यह रस-रमणीय ब्लाग ..धन्यवाद मनोज भाई...

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  2. काव्यशास्त्र पर बहुत उपयोगी शृंखला प्र्सतुत कर रहे हैं आप।
    आभार!

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  3. बेहतरीन जानकारियों से भरी अभूतपूर्व श्रंखला। आभार।

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  4. काव्यशःस्त्र पर बहुत उपयोगी चर्चा ...आभार।

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  5. काव्यशःस्त्र पर अच्छी चर्चा| धन्यवाद|

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  6. हमेशा की तरह से अति सुंदर, धन्यवाद

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  7. एक बार फिर बहुत ही उपयोगी जानकारी मिली।

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  8. काव्यशास्त्र पर अच्छी जानकारी मिलती जा रही है...

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  9. काव्यशास्त्र के ज्ञान के इच्छुक लोगों के लिए बहुत ही उपयोगी जानकारी। आभार

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  10. काव्यशास्त्र पर बहुत उपयोगी शृंखला प्र्सतुत कर रहे हैं आप।
    आभार

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