गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

आँच-66 - प्रायोजित है

आँच-66 प्रायोजित है

आचार्य परशुराम राय

मेरा फोटोपिछले दिनों विचार ब्लाग पर श्री मनोज कुमार जी की एक कहानी सब प्रायोजित है प्रकाशित हुई थी। वैसे इस कहानी में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो स्पष्ट न हो। फिर भी लगा कि इसकी समीक्षा की जाय। इसकी अनुमति भी मिल गयी है। अतएव यही कहानी आज की समीक्षा की विषय-वस्तु है।

कहानी के पात्र, संवाद, कथा-वस्तु आदि को स्पष्ट करने के लिए एक बात पर चर्चा करना चाहूँगा। हमलोगों ने पढ़ा था कि विद्या प्राप्त करने के तीन तरीके हैं। पहला धनेन विद्या, दूसरा सेवया विद्या और तीसरा विद्यया विद्या, अर्थात् धन देकर या सेवा करके अथवा अपनी विद्या देकर दूसरे की विद्या सीखना। इसी प्रकार आजकल लगभग सभी कार्यालयों में हमें अपना काम करवाने के लिए या तो धन देना पड़ता है अथवा किसी अन्य प्रकार से सेवा करनी पड़ती है या उनका कोई काम करना पड़ता है। और यह पूर्णरूपेण स्थापित मान्यता बन चुकी है। चाहे आपका काम नियमानुसार हो या नियम के प्रतिकूल हो, यह कोई अर्थ नहीं रखता। कुछ ऐसी ही व्यस्था पर व्यंग्य करती और संदेश देती यह कहानी है।

images (29)कथा-वस्तु कुछ इस प्रकार है- एक सरकारी अधिकारी कविताएँ लिखने का शौकीन है। हालाँकि कवि पूरी तरह अपनी कविता की गुणवत्ता के बारे में निश्चित नहीं है। पर इसे नियत करने के लिए या तो कोई काव्यमर्मज्ञ हो अथवा कोई श्रोता, जो कविता सुनकर कह सके कि आखिर कविता है कैसी? जो कवि हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि अपनी कविता दूसरों को सुनाना और उसपर उनकी वाहवाही सुनना कितना सुखद क्षण होता है। यह अधिकारी कवि भी इस प्रवृत्ति का शिकार है। वही क्यों, आर्षकवि संत तुलसीदास जी जब कहते हैं- निज कवित्त केहि लाग न नीका। सरस होहिं अथवा अति फीका, तो हम जैसे कवि की मानसिकता का क्या कहना। कुल मिलाकर इस कहानी का अधिकारी कवि, जिसे कहानी में मैं से संबोधित किया गया है, इसी मानसिकता में जीता है और प्रसिद्ध कवि के रूप में यश पाने का स्वप्न देखता है। यही उसकी कमजोरी है। सरकारी अधिकारी और कर्मचारी एक-दूसरे की कमजोरियों का लाभ उठाने से नहीं चूकते। शिवकुमार भी बेचारा क्यों चूकता। वह आकर अपने अधिकारी कवि की कविता सुनता है और इतनी प्रशंसा करता है कि राष्ट्र कवि की उपाधि को छोड़कर लगभग सभी उपाधियाँ दे देता है। अधिकारी कवि भी शिवकुमार को समीक्षकों की सारी उपाधियाँ देने में नहीं चूकता। वह उनकी कविता को आकाशवाणी पर प्रसारित कराने का पूरा उद्योग करता है और एक दिन वह संदेश लेकर आता है कि आकाशवाणी के किसी प्रफुल्ल बाबू से बात हो गयी है और रविवार को उनकी कविताओं की रिकार्डिंग होनी है। कविताओं को आकाशवाणी पर प्रसारित करने के लिए नियत समय पर रिकार्डिंग होती है और उनका प्रसारण भी। अधिकारी ने, जैसा कि सभी रचनाकारों के साथ होता है, अपने सभी परिचितों को प्रसारण सुनने का आग्रह कर देता है। प्रसारण के तुरन्त बाद प्रफुल्ल बाबू का फोन आता है यह जानने के लिए कि प्रसारण कैसा लगा। अधिकारी प्रसारण की प्रशंसा करता है। पर प्रफुल्ल बाबू यह जानना चाहते हैं कि प्रस्तुत करनेवाली लड़की संगीता शर्मा की प्रस्तुति कैसी लगी। अधिकारी उसकी भी प्रशंसा करता है। अधिकारी के कार्यालय में चार कनिष्ठ हिन्दी अनुवादक के पदों की भरती होनी है और वह लड़की संगीता शर्मा भी उसके लिए एक अभ्यर्थी है। प्रफुल्ल बाबू उसकी नियुक्ति के लिए अनरोध करते हैं। जैसा सभी अधिकारी कहते हैं- देखता हूँ मैं क्या कर सकता हूँ, इस बेचारे अधिकारी के पास भी ऐसा कहने के अलावा कोई चारा नहीं था। कुछ सप्ताह बाद शिवकुमार अधिकारी के कार्यालय में आकर कहता है- सर, काफी दिनों से कुछ सुनाया नहीं, क्या कुछ नया लिखा नहीं क्या, चलते हैं प्रफुल्ल बाबू से बात भी हो जाएगी, रिकार्डिंग का प्रोग्राम भी तय हो जाएगा आदि-आदि। कहानी का यहीं से विकास होता है। फिर शिवकुमार द्वारा आयोजित एवं नियत रेस्तराँ में समय पर अधिकारी पहुँचता है, जहाँ दोनों अर्थात् शिवकुमार और प्रफुल्ल बाबू पहले से ही पहुँचे रहते हैं। चर्चा को सुखद बनाने के लिए जूस और पकौड़े मँगाए जाते हैं। कविता पर चर्चा करने के पहले ही प्रफुल्ल बाबू अपने प्वाइंट पर आ जाते हैं और कनिष्ठ हिन्दी अनुवादक की नियुक्ति के परिणाम की बात पूछ बैठते हैं। अधिकारी उन्हें बताता है कि मेरिट लिस्ट बन गयी है और उनकी कैंडिडेट मेरिट में नहीं आ पायी है। प्रफुल्ल बाबू बताते हैं कि उसकी कविता भी मेरिट पर प्रसारित नही हुई थी। यही बिन्दु कहानी का चरमोत्कर्ष और अन्त दोनों है। कहानी कहीं भी स्वाभाविकता और सरसता से विचलित नहीं हुई है।

पात्रों की बात करें तो अधिकारी कवि, शिवकुमार और प्रफुल्ल बाबू कहानी के कुल तीन प्रत्यक्ष और संगीता शर्मा अप्रत्यक्ष पात्र हैं। सभी पात्र बड़े ही स्वाभाविक रूप से आए हैं। न ही कोई पात्र अनावश्यक लगता है और न ही किसी पात्र की कमी खलती है। सभी पात्रों की भूमिका अत्यन्त कुशलता से निश्चित की गयी है और वे उसमें पूरी तरह खरे उतरते हैं।

संवाद की दृष्टि से भी कहानी काफी सशक्त है। इसके संवाद जितने सरल, चुस्त और स्वाभाविक हैं उतने ही पैने। दूसरे शब्दों में संवाद की सरलता, स्वाभाविकता और चुस्ती ही उसका पैनापन है। यह एक विरल संयोग है। शब्द-संयम की चुस्ती भी संवाद और कथानक दोनों में आद्यन्त बनी हुई है।

लेखक अपने सभी पात्रों की मानसिकता के प्रति पूरी तरह सजग है। कहानी का मनोवैज्ञानिक पक्ष बहुत ही सशक्त और आकर्षक है, जिससे कथानक आद्यन्त रोचक लगता है, कहीं भी शिथिलता नहीं है। कथानक का मनोवैज्ञानिक पक्ष ही इसके पूरे सन्देश की भाव-भूमि है, मसलन अधिकारी और कर्मचारी किस प्रकार एक-दूसरे की कमजोरियों का लाभ लेने का प्रयास करते हैं या उसके कारण कैसे वे बेवकूफी और गलतफहमियों आदि के शिकार बनते हैं। उनकी दिखायी जाने वाली उदारता या दरियादिली स्वाभाविक नहीं, बल्कि फँसाने के लिए चारा होती है।

थोड़ी सूक्ष्म दृष्टि डालने पर इस कहानी में कुछ कमियाँ ऐसी हैं कि पढ़ने में सहसा सामने नहीं पड़तीं। सर्वप्रथम जो प्रत्यक्ष होता है, वह है शिवकुमार, प्रफुल्ल बाबू और संगीता शर्मा का आपसी सम्बन्ध। कहानी के पात्रों का परिचय पूरी तरह नहीं हो पाया है। वैसे इसके कारण कहानी या उसके संदेश को समझने में पाठकों को कोई कठिनाई नहीँ आती। इसी प्रकार कहानी के प्रारम्भ दी गयी भूमिका इस ढंग से आयी है जैसे किसी निबंध का भाग हो। इसमें आए तथ्यों को कुछ नाटकीय ढंग से लाया जाता तो अच्छा रहता। कमियों के प्रति मेरी अपनी दृष्टि है। कथाकार या पाठकों का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

यदि उक्त बातों को छोड़ दिया जाय, तो यह कहानी लघुकथा के लगभग सभी मानकों पर पूरी तरह खरी उतरती है और एक उत्तम लघुकथा है।

*****

17 टिप्‍पणियां:

  1. कहानी पढ़ चुका था.
    समीक्षा पढ़ी.
    मनोज जी का साहित्यिक योगदान अविस्मर्णीय है.

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  2. ‘सब प्रायोजित है’ की सटीक समीक्षा के लिए हार्दिक बधाई...

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  3. कहानी पढ़ी....अच्छी लगी

    समीक्षा और भी अच्छी लगी

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  4. कहानी भी ज़ोरदार और समीक्षा भी उपयुक्त है ...

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  5. मनोज जी कि यह कहानी जब पढ़ी थी तो यही मन में आया था कि वाह एकदम सही.
    उसपर चुस्त संवाद और रोचक लेखन शैली ने उसे और प्रभावी बना दिया.और अब आपकी समीक्षा ने उसमें चार चाँद और लगा दिए.

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  6. संक्षिप्त कलेवर में जितने प्रभावशाली ढंग से उद्देश्य को रखा गया है इस कथा में ,मुझे अतिशय प्रभावित कर गयी..

    समीक्षा तो सदैव ही बेजोड़ हुआ करती है आपकी..आज भी है...
    आभार...

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  7. कहानी पहले ही पढ़ चुका हूं। समीक्षक महोदय की समीक्षा अच्छी लगी। मनोज कुमार जी का साहित्यक योगदान हम सब के लिए प्रेरणा का कार्य करता है।समीक्षक महोदय, आपका बहुत-बहुत आभार।

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  8. एक अच्छी लघुकथा की सार्थक और सटीक समीक्षा ..

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  9. बेहतरीन लघुकथा के गुण दोषों का सम्यक विवेचन। अतिसुन्दर।

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  10. सुन्दर समीक्षा-कर्म !
    कहानी पढ़ कर आ रहा हूँ, सरल भाषा और अंत ने सबसे ढेर खींचा।

    और जिसे आप लेख के अंत में सीमा कह रहे वह सहसा धयान में नहीं आती क्योंकि शुरुआत की पृष्ठभूमि एक अलग प्रवाह रच रही है, थोड़ा कहानियों से हटकर भी।

    सुन्दर ! आभार !

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  11. समीक्षा विधा की जानकारी भी मिल रही है ...
    आभार !

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