मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

डायवोर्स

-- सत्येन्द्र झा

 

“बड़े दु:ख की बात है। मेरे पड़ोसी ने अपनी पतनी को डायवोर्स दे दिया।”

“डायवोर्स…. मतलब?”

“डायवोर्स मतलब तलाक…. पति-पत्नी के मध्य किसी प्रकार का संबंध नहीं। न शारीरिक ना ही वैचारिक। डायवोर्स में पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।”

“यह तो अच्छी बात है….!”

“दूर्र…. तुम पगली हो क्या?”

“हाँ, मैं पगली हूँ… क्योंकि मैं वर्षों से देखती आ रही हूँ कि मेरा बाप सवेरे उठ कर कहीं चला जाता है। आधी रात को दारू के नशे में टुन्न होके आता है। माँ को गाली देता है। आये दिन मारता-पीटता भी है। माँ भीख-दुख से हम पाँचो भाई-बहनों का पेट भरती है लेकिन कभी अपनी माँग में सिन्दूर लगाना नहीं भूलती।

“…………………..”

आंसुओं की कई बूंदे जमीन को गीली कर देती हैं। किसके आँसू पता नहीं।

 

(मूल कथा मैथिली में ’अहींकेँ कहै छी’ में संकलित डायवोर्स से हिन्दी में केशव कर्ण द्वरा अनुदित।)

 

27 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक लघु कथा ....समाज के सच को सामने लाती हुई ...आपका आभार

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  2. बहुत ही सुंदर लघु कथा।धन्यवाद।

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  3. विचारोत्तेजक लघुकथा ... दासत्व से अच्छा है तलाक ...

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  4. ससक्त लघुकथा... देश की आधी से अधिक गृहस्थी ऐसे ही चल रही है... लेकिन कथा में दो अलग अलग सामाजिक पृष्ठभूमि की चर्चा है जिसके बीच थोडा साम्य नहीं है.. अटपटा लग रहा है..

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  5. सार्थक कथा, छोटे से शब्दों में गभीर विषय को छुआ गया है.

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  6. हालातों पर बहुत कुछ निर्भर करता है.अच्छी लघुकथा.

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  7. सुन्दर सी लघुकथा..बधाई.
    ________________________
    'पाखी की दुनिया' में 'पाखी बनी क्लास-मानीटर' !!

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  8. सार्थक लघु कथा ...ऐसे विवाह का क्या लाभ ?

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  9. ऐसे सम्बन्ध से तो तलाक ही अच्छा.
    सच्ची लघुकथा.

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  10. jahan kahin koi samadhaan na ho to is kadve sach ko mazbooran apnana hi padega.
    acchhi laghukatha.

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  11. तीखा सच…… ! सार्थक और संवेदनशील लघुकथा।

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  12. मिलते हे ऎसे भी जोडे जो ऎसे ही जिन्दगी भी गुजार देते हे, किसी का पति निकम्मा तो किसी की बीबी तेज, भगवान बचाये,

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. यही देशज संस्कार हैं। आम भारत का मार्मिक सच। बेहतरीन कथानक।

    अरुण राय जी के प्रश्न से सहमति रखता हूँ साथ ही बिलकुल अंतिम पंक्ति से सहमत नहीं।

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  15. अलग अलग पृष्ठभूमि में अलग अलग प्रक्रिया तलाक़ की!!परम्पराएं अदालत की कलम की नोक से भी टूट जाती हैं और सिन्दूर की रेखा से जुडी भी रहती हैं.. समाज का अनोखा कोंट्रास्ट!!

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  16. बहुत अच्छी लघु कथा. विचारोत्तेजक.

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