-- सत्येन्द्र झा
समाज सुधार के ठेकेदारों द्वारा आयोजित रैली में हुड़्दंग हो गया। नेतृत्वकर्त्ता सबसे पहले भागकर अपनी गाड़ी में जा बैठे। दो-चार लोग इस रेलम-पेल में कुचल कर यमलोक पहुँच गये और दर्जनों घायल हो गये। अगली सुबह अखबार में नेताजी का वक्तव्य छपा था, “हमें इस बात का अपार क्लेश है कि हमारे कुछ कार्यकर्त्ता इस पुनीत कार्य में शहीद हो गये। इससे तो अच्छा था कि भगवान मेरे प्राण ही ले लेते। अब मेरे लिये जीवन का कोई अर्थ नहीं है।”
नेताजी अखबार पढ़ रहे थे। सामने पत्नी मेवा की थाल और ग्लास भर फ़्रूट-जूस लिये खड़ी थीं।
(मूलकथा मैथिली में “अहींकेँ कहै छी” में संकलित “जीबाक अर्थ” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

“सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचय हमेशा देना चाहिये।” प्रोफेसर साहब कक्षा में कह रहे थे, “एक ग्लास में आधा पानी भरा है... सकारात्मक दृष्टिकोण वाले इस ग्लास को आधा भरा कहेंगे और जिनकी सोच नकारात्मक है वे कहेंगे कि ग्लास आधी खाली है।” 


नाटक चल रहा था। नायक नायिका से कहता है, "मेरा और तुम्हारा साथ तो जन्म-जन्मों का है। तुम्हारे प्यार के बिना तो अब एक पल भी जीना मुमकिन नहीं.... !" 
दो व्यक्ति कारागार के एक ही कोठरी में बंद थे। साथ रहते-रहते परिचय बढ़ा। फिर शुरू हुई आपस की राम कहानी। एक ने कहा, "भाई! क्या कहूं ? लोभ जो न करा दे। पता नहीं.... वो कैसा अशुभ मुहूर्त था जब लोभ के वशीभूत हमने अपनी ही पुत्रवधू की हत्या कर दी। जहर दे कर मार डाला हम ने उस अबला को..... । शायद यही मेरा प्रायश्चित हो।" फिर डबडबा आयी आँखों को पोछ कर बोला, "लेकिन आप यहाँ कैसे.... ? 
