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मंगलवार, 3 मई 2011

जीवन का अर्थ

-- सत्येन्द्र झा

 

समाज सुधार के ठेकेदारों द्वारा आयोजित रैली में हुड़्दंग हो गया। नेतृत्वकर्त्ता सबसे पहले भागकर अपनी गाड़ी में जा बैठे। दो-चार लोग इस रेलम-पेल में कुचल कर यमलोक पहुँच गये और दर्जनों घायल हो गये। अगली सुबह अखबार में नेताजी का वक्तव्य छपा था, “हमें इस बात का अपार क्लेश है कि हमारे कुछ कार्यकर्त्ता इस पुनीत कार्य में शहीद हो गये। इससे तो अच्छा था कि भगवान मेरे प्राण ही ले लेते। अब मेरे लिये जीवन का कोई अर्थ नहीं है।”

नेताजी अखबार पढ़ रहे थे। सामने पत्नी मेवा की थाल और ग्लास भर फ़्रूट-जूस लिये खड़ी थीं।

 

(मूलकथा मैथिली में “अहींकेँ कहै छी” में संकलित “जीबाक अर्थ” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

डायवोर्स

-- सत्येन्द्र झा

 

“बड़े दु:ख की बात है। मेरे पड़ोसी ने अपनी पतनी को डायवोर्स दे दिया।”

“डायवोर्स…. मतलब?”

“डायवोर्स मतलब तलाक…. पति-पत्नी के मध्य किसी प्रकार का संबंध नहीं। न शारीरिक ना ही वैचारिक। डायवोर्स में पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।”

“यह तो अच्छी बात है….!”

“दूर्र…. तुम पगली हो क्या?”

“हाँ, मैं पगली हूँ… क्योंकि मैं वर्षों से देखती आ रही हूँ कि मेरा बाप सवेरे उठ कर कहीं चला जाता है। आधी रात को दारू के नशे में टुन्न होके आता है। माँ को गाली देता है। आये दिन मारता-पीटता भी है। माँ भीख-दुख से हम पाँचो भाई-बहनों का पेट भरती है लेकिन कभी अपनी माँग में सिन्दूर लगाना नहीं भूलती।

“…………………..”

आंसुओं की कई बूंदे जमीन को गीली कर देती हैं। किसके आँसू पता नहीं।

 

(मूल कथा मैथिली में ’अहींकेँ कहै छी’ में संकलित डायवोर्स से हिन्दी में केशव कर्ण द्वरा अनुदित।)

 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लघुकथा

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सत्येन्द्र झा

व्यख्याता पद केलिये साक्षात्कार चल रहा था।

“सबसे छोटी लघुकथा क्या हो सकती है ?” एक साक्षात्कार में विशेषज्ञ ने आवेदक से पूछा।

“सब कुछ मर गया।” आवेदक ने कुछ सोचते हुए उत्तर दिया।

“कैसे...? यह कैसे हुई लघुकथा?”

“श्रीमान इसमें आपको लघुकथा के सभी आवश्यक अवयव मिल जायेंगे। यह अपने आप में सम्पूर्ण है।”

“ट्रीन-ट्रीन......” तभी टेबल पर रखा सरकारी फोन खनखना उठा। फोन पर हुए वार्तालाप का मतलब आवेदक अच्छी तरह समझ चुका था।

“मैं समझा नहीं... जरा आप इसे विस्तार से समझायेंगे?”

विशेषज्ञ की बदली हुई मुख-मुद्रा को आवेदक ने परिलच्छित कर लिया था। “छोड़िये न सर.... ! विस्तार से कहने लगे तो वो लघुकथा ही क्या? तब तो यह दीर्घकथा हो जायेगी।”

इतना कहते हुए वह आवेदक गेट खोल बाहर निकल गया। वहां अभी भी प्रत्याशियों की भीड़ उमर रही थी।

(मूलकथा मैथिली में “अहींकेँ कहै छी” में संकलित ’लघुकथा’ से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

लघुकथा : खाली ग्लास

लघुकथा : खाली ग्लास

सत्येन्द्र झा

“सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचय हमेशा देना चाहिये।” प्रोफेसर साहब कक्षा में कह रहे थे, “एक ग्लास में आधा पानी भरा है... सकारात्मक दृष्टिकोण वाले इस ग्लास को आधा भरा कहेंगे और जिनकी सोच नकारात्मक है वे कहेंगे कि ग्लास आधी खाली है।”

एक क्षात्र उठकर जोर से बोला, “लेकिन सर ! यह आदर्श और एक हद तक असंभव दृष्टि है। अब तो गरीबों को ऐसा चश्मा पहना दिया गया है कि उनके सामने पूरी भरी गलास भी हो तो भी उन्हे खाली ही लगती है। क्योंकि उन्हे पता है कि उस भरे ग्लास से एक बूंद पानी भी उन्हे मिलने वाला नहीं है।”

(मूलकथा मैथिली में “अहींकें कहै छी” में संकलित “खाली गिलास” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

निरपेक्षता

-- सत्येन्द्र झा


दो लोगों के बीच शुरू हुई बाताबाती दो गुटों के बीच लड़ाई और मार-पीत में तब्दील हो गयी। दोनों तरफ से गरमी बढ़ती गयी और नौबत लाठी, भला, फरसा और बन्दूक तक पहुँच गयी। सामने एक विशाल वृक्ष पर एक कौव्वे का परिवार यह दृश्य देख रहा था।


व्यस्क कौव्वे ने अपने बच्चों की आँखें अपने पंख से ढांप कर बोला, "बेटे ! यह मनुष्य की लड़ाई है। यह कभी नहीं ख़त्म होगी। ये एक दिन इसी तरह लड़ते-लड़ते मर जायेंगे। तुमलोग ये सब मत सीखो। हाँ ! जब इनमें से कोई मर जाएगा तो हमलोग जी भर के उनका मांस खायेंगे।"


(मूल कथा "अहींकें कहै छी" में संकलित 'मनुक्खक माँउस' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

सोमवार, 28 मार्च 2011

चमत्कार


--सत्येन्द्र झा



टेलीविजन की उपयोगिता पर बात-विवाद चल रहा था। अधिकांश वक्ता इसे विग्यान का चमत्कार मान रहे थे परन्तु एक वक्ता ने कहा, “यह एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से पृथक करने वाला यन्त्र है। यह सबकुछ भुला देता है – अपनी मर्यादा, अपनी परम्परा, मूल्यबोध, संस्कृति... यहाँ तक कि अपना देश भी। इसे विग्यान का चमत्कार वही लोग मानते हैं जो टेलीविजन नहीं देखते। यदि कोई व्यक्ति देखकर भी अपनी मर्यादा, अपनी परम्परा, मूल्यबोध, संस्कृति और अपने देश को नहीं भूलते हैं तो उन्हे प्रकृति का चमत्कार समझना चाहिये।”

अगले दिन स्वयं को प्रकृति का चमत्कार घोषित करने के लिये टेलीविजन की दूकान पर भारी भीड़ लगी हुई थी।

(मूलकथा “अहींकें कहै छी” में संकलित 'चमत्कार' से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

सोमवार, 21 मार्च 2011

लघु कथा : दूसरी गलती

लघुकथा : दूसरी गलती

-- सत्येन्द्र झा


साइकिल कार से सट गयी थी। कार को तो कुछ नहीं हुआ मगर साइकिल के परखच्चे उड़ गए थे। साइकिल की यह पहली गलती थी कि उसे उसकी औकात याद नहीं रही।


टूटी हुई साइकिल जाने लगी न्याय के लिए। यह उसकी दूसरी गलती थी।


(मूल कथा मैथिली में "अहींकें कहै छी" में संकलित 'दोसर गलती' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 15 मार्च 2011

दृष्टिभेद

दृष्टिभेद
-- सत्येन्द्र झा

अमीर बाप की बेटी एक गरीब के साथ भाग जाती है। सिनेमा-हाल तालियों की गरगराहट से गूंज जाता है। जमींदार साहब के तेजोमय मुखमण्डल पर प्रसन्नता की रेखा सुस्पष्ट थी।


सिनेमा समाप्त हुआ। जमींदार साहब के घर घुसते ही पत्नी सविलाप कहने लगी, “बेटी दोपहर से ही नहीं मिल रही। लोग कह रहे हैं कि हलवाहे के बेटा के साथ भाग गयी।“

जमींदार साहब की आँखों से ज्वाला फूटने लगी और हाथ दीवार पर टंगी बन्दूक की ओर बढ़ गये।

(मूल कथा मैथिली में “अहींकें कहै छी” में संकलित ’दृष्टिभेद’ से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

प्रमाण

श्री सत्येन्द्र झा मैथिली साहित्य की जेठ के दुपहरी में छाँव की तरह वतरित हुए हैं। मैथिली और यदा-कदा हिंदी में कविता, कहानी और व्यंग्य लिखने वाले श्री झाजी की लोकप्रीय विधा है, 'लघुकथा'। वे अब तक शताधिक लघुकथाओं की रचना कर चुके हैं जिनमे से इक्यावन कथाएं 'अहीं के कहै छी' (आपही को कहते हैं) नामक संकलन में प्रकाशित है और दूसरा संकलन भी प्रकाशन की राह देख रहा है। झाजी की शैली देख कर एक बार पुनः यह विश्वास पुष्ट होता है कि लोकतंत्र में भले ही संख्याबल और आकर्बल माने रखते हों परन्तु साहित्य में अभी भी गुणबल ही प्रधान है। श्री झाजी सम्प्रति आकाशवाणी के दरभंगा केंद्र में बतौर लेखापाल कार्यरत हैं। उनकी वाणिज्य शिक्षा का प्रभाव उनके लेखन में भी झलकता है कि झाजी कितने नाप-तोल और गिन कर शब्दों का उपयोग करते हैं। -- करण समस्तीपुरी

प्रमाण

-- सत्येन्द्र झा



"आपका नाम क्या है ?" बड़े से कोठानुमा मकान के आदमकद फाटक पड़ खड़े वृद्ध से नौवर्षीय बालक ने पूछा।

"देवचन्द्र।" मैं आपका दादा हूँ..... आपके पिताजी का पिता।"

"आप एक मिनट इध ही रुको। मैं डैडी से पूछ कर आता हूँ।" बालक अन्दर की ओर जाने लगा कि अचानक वृद्ध ने पूछा, "डैडी से क्या पूछेंगे आप ?"

"यही कि आप सच में डैडी के पिताजी हैं क्या ?" कह कर बालक अन्दर चला गाया किन्तु वृद्ध के म्लान मुखमंडल पर छोड़ गाया अनेक प्रश्न और उलझन.... आखिर एक पुत्र कैसे प्रमाणित करेगा कि उसका पिता कौन है ?

(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'प्रमाण' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

मार्केटिंग

श्री सत्येन्द्र झा मैथिली साहित्य की जेठ के दुपहरी में छाँव की तरह अवतरित हु हैं। मैथिली और यदा-कदा हिंदी में कविता, कहानी और व्यंग्य लिखने वाले श्री झाजी की लोकप्रीय विधा है, 'लघुकथा'। वे अब तक शताधिक लघुकथाओं की रचना कर चुके हैं जिनमे से इक्यावन कथाएं 'अहीं के कहै छी' (आपही को कहते हैं) नामक संकलन में प्रकाशित है और दूसरा संकलन भी प्रकाशन की राह देख रहा है। झाजी की शैली देख कर एक बार पुनः यह विश्वास पुष्ट होता है कि लोकतंत्र में भले ही संख्याबल और आकर्बल माने रखते हों परन्तु साहित्य में अभी भी गुणबल ही प्रधान है। श्री झाजी सम्प्रति आकाशवाणी के दरभंगा केंद्र में बतौर लेखापाल कार्यरत हैं। उनकी वाणिज्य शिक्षा का प्रभाव उनके लेखन में भी झलकता है कि झाजी कितने नाप-तोल और गिन कर शब्दों का उपयोग करते हैं।
बसंत-पंचंमी की शुभ-कामनाओं के साथ -- करण समस्तीपुरी


मार्केटिंग
-- सत्येन्द्र झा
एक ही शहर में दो जगह आध्यात्म एवं योग शिविर चल रहे थे। एक जगह भारी भीड़ और दूसरे जगह मुश्किल से इतने लोग कि आसानी से अंगुली पर गीने जा सकें। अधिक भीड़ वाले शिविर में प्रवचन चल रहा था। भाव-विभोर महात्मा जी कह रहे थे, "आप अपने सब दुःख, संताप, चिंता, शोक हमें दे दीजिये। बदले में मैं आपको स्वस्थ्य तन, शांत मन, अपार धन, आध्यात्मिक उन्नयन का उपहार दूंगा। महज पांच सौर रूपये दान कीजिये। कीमत न लगाइए.... सिर्फ पांच सौ रूपये में इतनी सारी दैविक सिद्धियाँ.... !" भीड़ तो लगता था कि सामियाना तोड़ देगी।

दुसरे शिविर में भी साधु बाबा बोल रहे थे, "हमने जो उपाय और मार्ग आपको बताया.... सिर्फ उसे सुनने से कल्याण नहीं होगा। उसके लिए आवश्यक है कि आप अपनी व्यस्ततम दिनचर्या में से थोड़ा सा समय निकाल कर इसके लिए प्रयास भी करें। आध्यात्म और योग अभ्यास से ही सिद्ध होता है। इसके लिए पैसे नहीं बल्कि कर्म की आवश्यकता है।" हा...हा...हा.... हा.... जो भी लोग बैठे थे एक-एक कर उठने लगे।
(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'धन-धर्म' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

लघुकथा :: चित भी मेरी पट भी मेरी

लघुकथा

चित भी मेरी पट भी मेरी

सत्येन्द्र झा

उसका बैल बीमार था। पशु चिकित्सक को बुलाया गया। मोटे-मोटे इंजेक्शन और ढेर सारी दबाइयां चली.... मगर बैल बच नहीं पाया।लोग कह रहे थे कि डॉक्टर बीमारी नहीं पहचान सका। डॉक्टर साहब झुंझला गए, "दवा तो मैंने सही ही दिया था मगर... पशु की जातकुछ बोलता तो है नहीं.... अब ऐसे बीमारी कभी-कभार पहचान में ना आये तो क्या कर सकते हैं....?"

उफ़... इस बार उसका सबसे छोटा बेटा बीमार पड़ गया। शहर के सबसे बड़े डॉक्टर से इलाज करवाया मगर.... वह बच नहीं पाया।लोगों की जुबाँ पर फिर से एक ही शिकायत थी, "उफ़... डॉक्टर बीमारी नहीं पहचान पाया।" यह डॉक्टर साहब कुछ ज्यादा ही झुंझलागए, "तुम्हारा बेटा इतना बोलता था कि ठीक से इलाज करना मुश्किल। तुरत ये हो रहा है... तुरत वो हो रहा है.... तुरत ये होगया....... ! अगर कुछ नहीं बोलता तो मैं अपने ढंग से इलाज करता... ! वो तो मैं ही था जो इतने दिनों तक भी खीच पाया.... ।

बैल...?  बेटा.... ?? वह अबाक था.... ! उसे यह भी समझ में नहीं आ रही थी कि मन में चीत्कार करे या कलेजा फार के चिल्लाए.... !

(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'मूक वाचाल' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सजा की कीमत

-- सत्येन्द्र झा


"तमाम सबूत गबाहों के बयानात के मद्देनजर.... अदालत उम्रकैद की सजा मुक़र्रर करती है।" ्यायाधीश महोदय ने फैसला सुनाया। वह मुस्कुरा उठा। उस पर हत्या का अभियोग लगा थालेकिन फिर से अदालत में दूसरा व्यक्ति उसी अपराध की स्वीकारोक्ति दे रहा हैन्यायधीश महोदय भी सन्नएक हत्या और कुल मिलाकर पांच अभियुक्त और हरेक का दावा कि हत्या उसी ने किया हैपहला व्यक्ति रिहा हो गया। उसे कुछ समझ नहीं रहा था


"लेकिन वकील साहब, बाहर जाकर मैं खाऊंगा क्या... ? रहूँगा कहाँ... ? जेल में तो कम से एक छत और और दोनों टाइम भोजन तो मिलता.... ! अरे माना कि वह हत्या मैं ने नहीं की थी मगर सजा पाकर मैं खुश थाआपने यह क्या कर दिया.... पांच-पांच लोगों को..... !", वह अधिवक्ता से गुहार कर रहा थावकील साहब ने हिकारत भरे लहजे में कहा, "अबे चुप कर.... ! ज्यादा सयाना बनने की कोशिश मर करोसजा उतनी ही मिलती है जितना वो खर्च-वर्च करता हैआखिर मुफ्त में चौदह साल रोटी तोड़ने को नहीं मिलती।"


वकील साहब के पान चबाने से काले दांत चमक उठे थे जबकि उसकी आँखों के आगे अँधेरा गया था।


मूल कथा मैथिली में "अहीं कें कहै छी" में संकलित "सजायक मूल्य" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

भगवान कभी नहीं मरते हैं..!

भगवान कभी नहीं मरते हैं..!

-- सत्येन्द्र झा

बारह वर्षीय लड़की अचानक अपनी माँ से पूछ बैठी, "माँ... माँ.... ! भगवान कैसे होते हैं ?"

नख-शिख स्वर्णाभूषण से लदी माँ बोली, "भगवान.... उम्म्म्म.... अब मैं तुझे कैसे समझाऊं.... ? बेटी, भगवान वैसे ही होते हैं जैसे तुम्हारे पापा।" 

लड़की चुप हो गयी। उसके बाल मस्तिष्क में कोलाहल चल रहा था कि उसके पापा को तो सभी बेईमान कहते हैं... फिर वो भगवान कैसे ? उसी दिन तो वह पंडित काका के घर गयी थी सत्यनारायण कथा में। वहाँ भी तो दो महिलायें उसके पापा की बेईमानी का नया किस्सा बतिया रही थीं। उस ने अनदेखे में सब सुन लिया था।

कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, "माँ ! मगर पापा तो एक दिन मर जायेंगे.... मगर भगवान तो.... । "

माँ का शरीर किसी अप्रत्याशित भय से सिहर उठा था। बेटी को डांटते हुए बोली, "शुभ-शुभ बोलो.... भगवान कभी नहीं मरते हैं।"

लड़की फिर चुप हो गयी। उसके अंतर में भारी द्वन्द चल रहा था। सहसा आँखों के आगे दो तस्वीरें झिलमिला उठीं। एक दिव्य तस्वीर सस्त्राभूषनधारी भगवान की है और एक में उसके पापा हैं।  फिर दोनों तस्वीर मिल कर एक हो गए। लड़की की आँखें चौंधिया गयीं। वह उठकर चुप चाप अपनी कोठरी में चली गयी।  फिर कलम निकाल कर एक बड़े से पन्ने  पर लिखा, "बेईमान कभी नहीं मरते हैं।"

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'निर्णय' से हिंदी में केशव कर्णद्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

लघुकथा:: वास्तव में…..!

लघुकथा:: वास्तव में…..!

सत्येन्द्र झा

नाटक चल रहा था। नायक नायिका से कहता है, "मेरा और तुम्हारा साथ तो जन्म-जन्मों का है। तुम्हारे प्यार के बिना तो अब एक पल भी जीना मुमकिन नहीं.... !"

नाटक समाप्त हुआ।

एक घर में उसी दृश्य की पुनरावृति चल रही है। युवक युवती से वैसा ही प्रणय-निवेदन कर रहा है। किन्तु नाटक में नायक सदा के लिए युवती का हाथ पकड़ता है जबकि घर वाला युवक विवाह के प्रसंग में। वह युवती से कहता है, "मुझे कुछ याद नहीं आ रहा कि मैं ने तुम से कभी ऐसा कुछ कहा था.... !"

अभिनय और वास्तविकता एक दूसरे में उलझ गए थे। वास्तव में अभिनय का चरित्र उलट गया था।

(मूल कथा मैथिली में 'अहीं कें कहै छी' में संकलित 'जाति-अजाति' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

हत्यारा कौन ?

-- सत्येन्द्र झा
उसकी हत्या की सनसनी खबर पूरे शहर में फैल गयी थी। पुलिस हत्यारे की तलाश में जुटी हुई थी लेकिन चार महीने तक सघन खोज-बीन के बावजूद अपराधी पकड़ में नहीं आ सका।
आक्रोशित लोगों ने शहर में चक्का जाम कर दिया। मिडिया को भी एक सनसनीखेज खबर मिल गयी। पुलिस कप्तान का रातो-रात तबादला हो गया। नए पुलिस कप्तान से लोगों की उम्मीदें कुछ बड़ी थी।
नए कप्तान साहब ने कार्य भार संभाला। अधीनस्थ अधिकारी ने मृतक के सभी दुश्मनों की सूची साहब के सामने हाज़िर कर दिया। एसपी साहब गुस्सा गए, "आप लोग निहायत ही समयखोर हैं। अगर इसे दुश्मनों ने मारा होता तो आज तक पकड़ा नहीं जाता क्या.... ? फटाफट इसके सभी दोस्तों की सूची बना कर तफ्तीश शुरू कीजिये।"
सच में, उस के सबसे करीबी दोस्तों में से एक आज उसकी हत्या के अभियोग में जेल में बंद है। सुनने में तो यहाँ तक आया है कि पिछले साल उसने अपनी एक किडनी देकर अपने दोस्त की जान बचाई थी।
(मूल कथा मैथिली में 'अहीं कें कहै छी' में संकलित 'जाति-अजाति' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

लघुकथा :: बड़ा अपराधी

लघुकथा

बड़ा अपराधी

सत्येन्द्र झा

                                दो व्यक्ति कारागार के एक ही कोठरी में बंद थे। साथ रहते-रहते परिचय बढ़ा। फिर शुरू हुई आपस की राम कहानी। एक ने कहा, "भाई! क्या कहूं ? लोभ जो न करा दे। पता नहीं.... वो कैसा अशुभ मुहूर्त था जब लोभ के वशीभूत हमने अपनी ही पुत्रवधू की हत्या कर दी। जहर दे कर मार डाला हम ने उस अबला को..... । शायद यही मेरा प्रायश्चित हो।" फिर डबडबा आयी आँखों को पोछ कर बोला, "लेकिन आप यहाँ कैसे.... ?

"मैं बाप होने का प्रायश्चित कर रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मेरी बड़ी इच्छा थी कि बुढापे में एकलौते बेटे के साथ रहूँ। शहर आ गया। मगर बहू को अपने सजे घर में गंवार बूढा गंवारा नहीं था। बेटे-बहू में ठन गयी। मेरे रहने से झगड़ा बढ़ता ही गया। एक रात बहू ने जहर खा कर अपने प्राण दे दिये। बहू के पिता ने दहेज़ हत्या के आरोप में मुझे अपने बेटे के घर के बदले आजीवन इस काल-कोठरी में पहुंचा दिया।" दूसरे व्यक्ति की आँखें शून्य में गडी़ थी।

पहले व्यक्ति ने कहा, "भाई ! बुरा मत मानना... ! मगर आप तो मुझ से भी बड़े अपराधी निकले.... !"

(मूल कथा मैथिली पुस्तक 'अहीं कें कहै छी' में संकलित 'अपराधी' से केशव कर्ण द्वारा हिंदी में अनुदित।)

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

लघुकथा :: अपराध

-- सत्येन्द्र झा

"सर ! आप जो कहेंगे मैं वह सब करूंगी।" मेरे सामने बैठी स्टेनो मुझ से कह रही थी।

वह कृषकाया रूपसी युवती मेरे ही अधीन कार्यरत थी। उसके द्वारा कहे गए "वह सब" शब्द मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। जिस्म में एक गर्म लहर सी दौड़ गयी। लेकिन अगले ही पल  किसी संस्कार ने संभाल लिया। मैं ने गंभीर स्वर में कहा, "आज तुमने जो गलती की है वह काबिलेमाफी नहीं है, लेकिन तुम भविष्य में इसे ना दुहराने की कसम खाओ तो मैं तुम्हे माफ़ करसकता हूँ।

उसके होठों पर हृदयभेदी मुस्कराहट तैर गए थे। उसकी अदाओं में अभी भी शोखी थी। मुस्कराकर ही कहा था, "सर आप के पूर्ववर्ती अधिकारी तो ऐसी राहत नहीं देते थे। उन्हें 'मैं' चाहिए थीऔर मुझे 'पैसे' जो कंपनी के टेंडर दूसरे के हाथों बेचने से मुझे मिल जाते थे।" हाथों को जोड़ करउसने कहना जारी रखा, "सर ! आप से निवेदन है कि आप यह परम्परा पूर्ववत चलने दीजिये।इस से मेरा भी उपकार होगा और आपको भी कुछ 'सुख' मिल जाएगा।"

उसकी झुकी हुई निगाहें उसके खुद के देह पर अटक गयी थी।  होंठ यंत्रवत हिल रहे थे, "सर ! मैंविवाहित हूँ। घर में तीन बच्चे और एक विकलांग पति.... ! इतने बड़े परिवार का निर्वाह तीनहज़ार की मासिक तनख्वाह में नहीं हो पता है सर.... ! वैसे भी मैं उतनी बदसूरत भी तो नहीं हूँ।"

बहुत हिम्मत कर के मैं नजरें उठा पाया था। उसकी आँखों से आंसुओं की क्षीण सी धाराएंप्रवाहित हो रही थी। मुझे लगा जैसे मैं ने उसे राहत देकर कोई गंभीर अपराध कर दिया हो..... ।

(मूल कथा मैथिली में "अहीं कें कहै छी" में संकलित 'मोहलति' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

लघुकथा :: वसुधैव कुटुम्बकम्

लघुकथा

वसुधैव कुटुम्बकम्

सत्येन्द्र झा

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एक पत्रिका के प्रकाशन की योजना बन रही थी। प्रकाशक और सम्पादक विचार-विमर्श कर रहे थे।

"राजनितिक चर्चा कौन लिखेगा?"

"मेरा छोटा पुत्र। उसे राजनीति में गहरी दिलचस्पी है।"

"और महिला कॉलम?"

"मेरी पत्नी। दिन भर मोहल्ले की औरतों को ज्ञान बांटती रहती है।"

"सिनेमा का पन्ना?"

"मेरा मंझला पुत्र। इस पद के लिए उस से अच्छा उम्मीदवार कौन हो सकता है? वह तो एक दिन में तीन-तीन सिनेमा देखता है।"

"खेल-जगत?"

"अरे.... मेरा बड़ा बेटा। खेलों से उसे इतनी अभिरूचि है कि वह इसके चक्कर में अपनी पढाई-लिखाई भी चौपट कर चुका है।"

"बहुत बढ़िया। किन्तु आवरण चित्र?"

"मेरी बेटी है न।  वह तो बात-बात में आपका चित्र खींच दे।”

पत्रिका प्रकाशित हुई। शीर्षक के नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, "आपके लिए, आपके द्वारा, आपकी पत्रिका!”

(मूलकथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित "बन्न कोठली" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

कथांजलि : योगदान

योगदान
- सत्येन्द्र झा
पुरुष नाम-यश के लिए परेशान था और स्त्री घर के आर्थिक संकट के निवारण के लिए बेहाल। रचनाएं मष्तिष्क में ही दम तोड़ देती थी। घर में कागज़ का भी घोर अभाव था।
स्त्री सड़क और गलियों से रद्दी कागज़ और पुराने अखबारों को बीन कर घर लाने लगी। पुरुष उन्ही कागजों पर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वाह कर लेता था। स्त्री पुनः उन कागजों को कवारी वाले के हाथों बेच आती थी। घर में कुछ पैसे आने लगे। दोनों संतुष्ट थे.... आखिर योगदान तो दोनों का था।
(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'तालमेल' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

शौक


शौक



सत्येन्द्र झा

tension[7] वो नियमित समय से कार्यालय पहुँचते थे। सभी कार्य नियमानुकूल करते थे। हाकिम को उन्होंने कभी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। लेकिन वही रमण बाबू जब घर पहुँचते थे तो पता नहीं उन्हें क्या हो जाता था...? पत्नी पर कड़क के बोलना... बच्चों से ऐसा व्यवहार मानो वे इनके आदेशपाल हों। उस पर से पचासों प्रश्न.... ! हमेशा तमतमाए हुए।
उस दिन रमण बाबू संयमित थे। अवसर जान पत्नी ने मधुर स्वर में पूछा, "आपको घर आते ही क्या हो जाता है? ऐसे खिसियाये हुए और खिन्न क्यूँ रहते हैं?”
रमण बाबू उस दिन सच में प्रसन्न थे। बोले, "असल में साहेब के साथ रहते-रहते मुझे भी कभी-कभी साहेब बनने का शौख चढ़ जाता है।" बोलते हुए रमण बाबू की मुख-मुद्रा फिर से तनावग्रस्त हो गयी थी।
(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'शौख' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)