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बुधवार, 3 अगस्त 2011

देसिल बयना – 92 : पिया गये परदेश अब डर काहे के...

देसिल बयना 92

पिया गये परदेश अब डर काहे के...

मेरा फोटोकरण समस्तीपुरी

images (54)“सखि हे सावन आए सुहावन, वन में बोलन लागे मोर !

अमुआ के डारि कोयलिया कुहके, जियरा मारे हिलोर !!

वन में बोलन लागे मोर............. !!”

 

हिलोर तो इलैची भौजी के जियरा में भी मारता होगा। सावन का पहिल पक्ख बीत रहा था। झिहिर-झिहिर पुरबैय्या में ठहर-ठहर बारिस हो रही थी। कभी झीसी तो कभी मुसलाधार। अलमस्त रेवाखंड में अल्हड़ कजरी और नव-विवाहिताओं के पर्व ’मधुश्रावनी’ के मधुर गीत गुंज रहे थे। “कैसे खेलन जाऊँ सावन में कजरिया, बदरिया घिरि आई ननदी....!”

मान का पत्तागये साल अघहन से असाढ़ तक जिनकी शादी हुई थी, वे सभी बेटियाँ पीहर आ गई थीं। कुछ के संग पाहुने भी आये थे, कुछ के देवर। कुछ के भाई-काका लिवा लाए थे। लगपांचे (नाग-पंचमी) से प्रारंभ हुआ मधुश्रावनी का व्रत। तेरह दिन तक गौरी पूजन। मिथिलांचल के इस महाव्रत में वैसे तो नव-बधुएं अखंड सौभाग्य के लिये “शिव-पार्वती” की पूजा करती हैं मगर असल में यह है प्रकृति-पूजन। पूजा के सभी उपादान प्राकृतिक। मान का पत्ता, गोबर के नाग, फूल, बांस की दौरी-मौनी, बेनिया... मौसमी फ़लों के प्रसाद।

“हे गौरी मैय्या ! जिस तरह सावन में प्रकृति रानी पर हरियाली छाई रहती है, उसी तरह हमरा सुहाग भी सब दिन हरियाय रहे।”

इलैची भौजी भी रोज दुपहरिया में नहा-धोकर गौरी पूजती थी। कुंजा मौसी से बिन्नी का फ़करा भी सुनती थी, “अद-कद, वरन-वद, महा-नाग, सिरि नाग...!” बिरजू भैय्या अकेले थे। इसीलिये डाउनलोड करें (2)इलैची भौजी का अपना तो कौनो देवर था नहीं सो गौरीजी को भोग लगाया ललका अमरुद के प्रसाद का बाँया हिस्सा हमैं बुलाके देती थी और दहिना हिस्सा माथा से लगा कर खुदे खाती थी। कनिक देर के लिये ही सही भौजी के मुख-मंडल पर भी मधुश्रावनी का उल्लास झलक जाता था। बांकी उनका कचोट हम कैय्येक दिन भोर में देखे थे।

मधुश्रावनी में सबसे जादे महात्म्य है भोरे-भोर फूल-पत्ती तोड़ने का। चम्पा दीदी, सोन दीदी, बैजंती फ़ुआ, रसवंती दाय, लाली, हेमिया, कुसुमी, छोटकी, बिजुरिया और टोले-मोहल्ले की अन्य लड़कियां अकाश में सुरुज भगवान के लाली छोड़ने से पहिले ही फुलडलिया लेके चल देती थीं बाग-बगीचे। मैं और बटिया छोट-नाट थे, साथ हो लेते थे। हरी-हरी चुड़ियों की खन-खन, पायलों की छम-छम, कजरी और बटगवनी के कलरव से पगदंडियां निनादित हो जाती थी।

रेवाखंड पर प्रकृति रानी भी मेहरबान रहती थी। दिन में भले उम्मस हो मगर भोरका पहर चार बुंद जरूर झहर जाता था। बूंदो के ताल पर छलकते थे फ़ुलहारिन युवतियों के गीत,

“सावन के बरसे बदरिया हो...

फूल तोड़े ला गोरिया... !

धनिया के भीजे धानी चुनरिया...

बलमा लगावे छतरिया हो....

फूल तोड़े ला गोरिया... ।”

बिरजू भैय्या के घर के ठीक सामने था गवरू ठाकुर का बगीचा। चम्पा, चमेली, बेला, गुलाब, उड़हुल, कनैल, कामनी, धतुर, अकवन जैसे देसी-विदेसी फूलों के दर्जनों पेड़-पौधे थे। खास कर भींगे कनैल की पतीली डालियों को पकड़-लपक कर, लिवा-झुका कर हिलते-डुलते कजरी-झूमर गाते फूल तोड़ती सखी-सहेलियों को देखकर भौजी का कलेजा जरूर कचोटता होगा। बेचारी बहरिया खिड़की से ऐसे चिपकी रहती थी जैसे सुग्गा पिंजरा के फ़ांर से चिपक रहता है। तनिक और दौर मिले तो फ़ुर्र हो जाएं। लेकिन करेला बिरजू भैय्या का सख्त पहड़ा.... उपर से नीम चढ़ाए वाली शिकायती देवी कुंजा मौसी।

डाउनलोड करें“एगो खुशखबरी है...!” गये हफ़्ते खाँ साहेब का मनेजर मुलुकचंद रेवाखंड में समाचार बाँट रहा था, “बोरा छपैय्या का फ़ेक्टरी अगिला हफ़्ता से चालू हो जाएगा। जौन कोई चलना चाहे अपना नाम-उमिर लिखबा दे। खाना-पीना-कपड़ा--कोठरी पर से साढ़े तीन सौ रुपैय्या महीना।”

बिरजू भैय्या भी कुंजा मौसी से राय-विचार कर हमरे दलान पर मुलुकचंद की डायरी में अपना नाम लिखबा गये थे। बाबूजी पूछे भी थे, “इहां धनरोपनी...?” बिरजू भैय्या बोले थे, “बारह अना रोपनी तो होइये गया है कक्का...! बांकी मौसी देख लेगी। वैसे फ़कीरिया को बोल दिये हैं और आप लोग भी तो हैय्ये हैं। अब खर्चा भी तो बढ़ा...।”

डाउनलोड करें (1)पछिला एतबार के दुपहरिया में बिरजू भैय्या सतुआ और चिउरा का मोटरी बांध रहे थे। इलैची भौजी खजुर और निमकी भी तल दी थी। कुंजा मौसी वहीं खटिया पर बीड़ी सुलगाती हुई भैय्या को सीख दे रही थी, “बबुआ ! रस्ता में केहु का तम्बाकुओ मत चबैय्यो... समान पर धियान रखिओ और पहुंच के तार जरूर करियो... ! परदेस में केहु से न जादा मेल-मिलाप रखियो और न बैर...! और हाँ... जरा अपनी महरानीजी को भी समझाय दियो... सारा दिन झरोखा चढ़ के ना बैठे... घर-द्वार भी देखे..! उउ........फ़ू........!” मौसी मुँह से चिमनी के तरह धुआँ फ़ेकी थी। भैया भौजी के तरफ़ देखे थे। भौजी आँख झुका के सहमति दे दी थी। सांझे मुलुकचंद के साथे पुरबी मुलुक जाए वाला हांज में बिरजू भैय्या भी शामिल हो गये।

मधुश्रावनी में अब सिरिफ़ दो दिन बचे थे। लाल काकी ने बेटी-बहू सभी नव-विवाहिताओं के हाथों में मेंहदी लगवाए थे। टोला-मोहल्ला में कोई बांकी ना रहे। इलैची भौजी कने भी करोसिया माय को ले जाकर खुदे लगवा दी थी।

बेरिया में कुशेसरा बेगार को बोल रही थी, “अरे कुशेसरा ! अब तो दिन लगचा गया... ठाकुरजी के बगैचा वला वरगद पर झूला डाल न दो... दुइयो दिन त सखी-सजनियां झूल ले... फिर तो किशन कन्हैया को झुलाएंगे ही...!” कुशेसरा पता नहीं सुना कि नहीं मगर बाबूजी भी डपटे तो रस्सी-डोला लेके बढ़ा। हम, बटेसर, मसुआ, चौबनिया, पकौरीलाल तो उसी के साथ चल पड़े।

कुशेसरा मिनिट भर में वरगद के जुड़ुआ डाली पर दोनों हिड़ोला डाल दिया था। महिला मंडल जब तक कजरा-गजरा, सिंगार पटार करके बहराय तब तक हम लोग खूब छककर झूले।

पहर बाद ठाकुरजी की फुलबाड़ी गुलजार हो गयी। लालकाकी सच्चे में मौडन विचार वाली थी। बेटी-बहू सबको हंकार लाई थी। संग में सुमितरा आजी, बैगनी काकी और छबीली मामी भी थी। छबीली मामी और लालकाकी का हंसी-मजाक इलाका फ़ेमस था। हा...हा... हा... हा....! जहाँ दोनों जुटीं कि हरि-गंगा।

इधर झूला-झुलौव्वल शुरु हुआ और उधर भंडारकोन से घटाटोप बदरिया। लगले पुरबा भी हांक दिया। हवा के साथ-साथ हिड़ोला की गति भी तेज होती जा रही थी। देखते-देखते झिहिर-झिहिर भी शुरु हो गया तब जाके लालकाकी और छबीली मामी का ध्यान टूटा। छबीली मामी टहकार छोड़ी थी, “आई सावन बहार, बूंद पड़त फ़ुहार.... झूला लागे डारे-डार... घिरि आई बदरी...!!” अरे उधर से भी कोई स्वर लगा रही है...! ओ... इलैची भौजी अपनी खिड़की पर बैठी गीत का अगला लाइन पकड़ ली है, “बुंद पड़त फ़ुहारी, घटा घिर आई कारी, बगुला चले धारी-धारी... घिरि आई बदरी...!” ओह... सच्चे ! भौजी के सुर में पपीहे सी पीड़ा थी। जुबती-वृंद भी झूला छोड़कर बिरजू भैय्या के घर तरफ़ ताकने लगी थी। बदरी और वर्षा के कारण कुछ साफ़ दिख नहीं रहा था।

सहसा सब लोग चौंक गये। “दुल्हिन... तू...!” सामने इलैची भौजी को देख लालकाकी बोली थी। “हाँ काकी!” भौजी लालकाकी और मामी और सुमित्रा आजी के पैर लगकर बोली थी, “घर के उम्मस में रहा नहीं गया... और मामी कजरी में ऐसन जोर कि पैर रोक नहीं सकी...!” काकी का बायाँ हाथ ठुड्ढी पर चला गया था और आँखें कोनिया गयी थी, “मगर दुल्हिन... केहु देख लिया तो...?”

“अरे काकी...!” भौजी खिलखिलाई तो गुलाबी होंठों के बीच सफ़ेद दांत ऐसे चमक उठे जैसे फ़टे अनार अनार के दाने हों। “अब जौन चाहे देखे... का फ़रक पड़ता है...! पिया गये परदेस अब डर काहे के...?” हमरे दिश हाथ दिखाते हुए जारी रही, “इके भैय्या गए कलकत्ता अब आगे-पीछे और कौन है जिस से डर...?” भौजी को पहली बार इतना खुलकर हंसते-बोलते देख मुझे अच्छा लगा था।

“हा.... हा... हा.... हा... ही... ही... ही..... ! एं... “पिया गये परदेस अब डर काहे के...?” का हो भौजी....? अन्य युवतियाँ भी भौजी की टांगे खिंचने का मौका गंवाना नहीं चाहती थी। “वाह री बहुरिया...! ’पिया गये परदेस अब डर काहे के...?’ तू तो जुग जीत ली....! चलो अब एहि बात पर एगो लहरदार कजरी हो जाए” छबीली मामी टिहुंकी थी। “हाँ मामी..!” भौजी की चंचल अदाओं में आज गजब की शोखी थी। जुबतियों के बीच से हमें धकियाते हुए झूला पर चढ़ा एक जोर का झटका दी और गाने लगीं, “कि आहो रामा झूला पड़ा मतवाला.... देवरजी वाला ए हरि....!” हम भी झूले पर पींगे लगाते हुए सोच रहे थे,

“सच में जब कोई निगरानी-निरिक्षन करने वाला न हो तो आदमी कितना निर्भिक हो जाता है। तभी उसका नैसर्गिक चरित्र बाहर आ पाता है। इलैची भौजी ही कितनी सकपकाई रहती थी...? बिरजू भैय्या गये कि आ गई सावन बहार। सच्चे कही है, “पिया गये परदेस अब डर काहे के....?”

मंगलवार, 3 मई 2011

जीवन का अर्थ

-- सत्येन्द्र झा

 

समाज सुधार के ठेकेदारों द्वारा आयोजित रैली में हुड़्दंग हो गया। नेतृत्वकर्त्ता सबसे पहले भागकर अपनी गाड़ी में जा बैठे। दो-चार लोग इस रेलम-पेल में कुचल कर यमलोक पहुँच गये और दर्जनों घायल हो गये। अगली सुबह अखबार में नेताजी का वक्तव्य छपा था, “हमें इस बात का अपार क्लेश है कि हमारे कुछ कार्यकर्त्ता इस पुनीत कार्य में शहीद हो गये। इससे तो अच्छा था कि भगवान मेरे प्राण ही ले लेते। अब मेरे लिये जीवन का कोई अर्थ नहीं है।”

नेताजी अखबार पढ़ रहे थे। सामने पत्नी मेवा की थाल और ग्लास भर फ़्रूट-जूस लिये खड़ी थीं।

 

(मूलकथा मैथिली में “अहींकेँ कहै छी” में संकलित “जीबाक अर्थ” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

लघुकथा : खाली ग्लास

लघुकथा : खाली ग्लास

सत्येन्द्र झा

“सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचय हमेशा देना चाहिये।” प्रोफेसर साहब कक्षा में कह रहे थे, “एक ग्लास में आधा पानी भरा है... सकारात्मक दृष्टिकोण वाले इस ग्लास को आधा भरा कहेंगे और जिनकी सोच नकारात्मक है वे कहेंगे कि ग्लास आधी खाली है।”

एक क्षात्र उठकर जोर से बोला, “लेकिन सर ! यह आदर्श और एक हद तक असंभव दृष्टि है। अब तो गरीबों को ऐसा चश्मा पहना दिया गया है कि उनके सामने पूरी भरी गलास भी हो तो भी उन्हे खाली ही लगती है। क्योंकि उन्हे पता है कि उस भरे ग्लास से एक बूंद पानी भी उन्हे मिलने वाला नहीं है।”

(मूलकथा मैथिली में “अहींकें कहै छी” में संकलित “खाली गिलास” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

निरपेक्षता

-- सत्येन्द्र झा


दो लोगों के बीच शुरू हुई बाताबाती दो गुटों के बीच लड़ाई और मार-पीत में तब्दील हो गयी। दोनों तरफ से गरमी बढ़ती गयी और नौबत लाठी, भला, फरसा और बन्दूक तक पहुँच गयी। सामने एक विशाल वृक्ष पर एक कौव्वे का परिवार यह दृश्य देख रहा था।


व्यस्क कौव्वे ने अपने बच्चों की आँखें अपने पंख से ढांप कर बोला, "बेटे ! यह मनुष्य की लड़ाई है। यह कभी नहीं ख़त्म होगी। ये एक दिन इसी तरह लड़ते-लड़ते मर जायेंगे। तुमलोग ये सब मत सीखो। हाँ ! जब इनमें से कोई मर जाएगा तो हमलोग जी भर के उनका मांस खायेंगे।"


(मूल कथा "अहींकें कहै छी" में संकलित 'मनुक्खक माँउस' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

सोमवार, 28 मार्च 2011

चमत्कार


--सत्येन्द्र झा



टेलीविजन की उपयोगिता पर बात-विवाद चल रहा था। अधिकांश वक्ता इसे विग्यान का चमत्कार मान रहे थे परन्तु एक वक्ता ने कहा, “यह एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से पृथक करने वाला यन्त्र है। यह सबकुछ भुला देता है – अपनी मर्यादा, अपनी परम्परा, मूल्यबोध, संस्कृति... यहाँ तक कि अपना देश भी। इसे विग्यान का चमत्कार वही लोग मानते हैं जो टेलीविजन नहीं देखते। यदि कोई व्यक्ति देखकर भी अपनी मर्यादा, अपनी परम्परा, मूल्यबोध, संस्कृति और अपने देश को नहीं भूलते हैं तो उन्हे प्रकृति का चमत्कार समझना चाहिये।”

अगले दिन स्वयं को प्रकृति का चमत्कार घोषित करने के लिये टेलीविजन की दूकान पर भारी भीड़ लगी हुई थी।

(मूलकथा “अहींकें कहै छी” में संकलित 'चमत्कार' से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 15 मार्च 2011

दृष्टिभेद

दृष्टिभेद
-- सत्येन्द्र झा

अमीर बाप की बेटी एक गरीब के साथ भाग जाती है। सिनेमा-हाल तालियों की गरगराहट से गूंज जाता है। जमींदार साहब के तेजोमय मुखमण्डल पर प्रसन्नता की रेखा सुस्पष्ट थी।


सिनेमा समाप्त हुआ। जमींदार साहब के घर घुसते ही पत्नी सविलाप कहने लगी, “बेटी दोपहर से ही नहीं मिल रही। लोग कह रहे हैं कि हलवाहे के बेटा के साथ भाग गयी।“

जमींदार साहब की आँखों से ज्वाला फूटने लगी और हाथ दीवार पर टंगी बन्दूक की ओर बढ़ गये।

(मूल कथा मैथिली में “अहींकें कहै छी” में संकलित ’दृष्टिभेद’ से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

कोई बात जरूर होगी

नमस्कार !

आज मंगलवार है। ब्लॉग के माध्यम से पाठकों को 'कथांजलि' अर्पित करने का दिन। पिछले कुछ दिनों से मैं श्री सत्येन्द्र झा जी की मैथिली लघुकथाओं का अनुदित रूप आपके नजर कर रहा था। अब पता नहीं ये संक्रमण है या कुछ और आज अंतस में घुमरते कुछ विचारों को 'लघुकथा' कहने की जुर्रत कर रहा हूँ। प्रयास अच्छा लगे तो सराहना कीजियेगा और नहीं तो प्रोत्साहन.... ! हा...हा....हा...हा.... हा..... !! -- करण समस्तीपुरी

कोई बात जरूर होगी
शर्माजी घर में घुसते ही निढाल होकर सोफे पर पसर गए। मिसेज शर्मा के सवालों की श्रृंखला जारी थी। कैसी रही बरात ? रामदीन भैय्या कैसे हैं ? उन्होंने हमारे नहीं आने पर शिकायत को किया होगा ? नयी बहू कैसी है ? रामदीन का एकलौता बेटा है न... ? शादी तो खूब धूम-धाम से हुई होगी ?

थके-थके से शर्माजी ने झल्ला कर कहा, "ख़ाक धूम-धाम से होगी.... ! उस से ज्यादा धूम-धाम से तो अपने मोहल्ले के धनेसर बाबू का श्राद्ध हुआ था।"

मिसेज शर्मा, "शिव-शिव... ऐसे क्यूँ बोल रहे हैं.... सब-कुछ अच्छे से हुआ न... ? क्या सब लिया है रामदीन ने ?"
शर्माजी, "कुछ नहीं।"
मिसेज शर्मा, "क्या बात करते हैं ? उनका बेटा करता क्या है ?"
शर्माजी, "सुना है किसी बहु-राष्ट्रीय कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर है।"
मिसेज शर्मा आश्चर्य से आँखे नचाते हुए बोली, "फिर भी कुछ नहीं लिया...?"

शर्माजी, "लेने के लिए अक्ल होनी चाहिए। तुम तो जानती ही हो, रामदीन कैसा पोंगापंथी है....! अक्ल का दुश्मन एम ए पास कर के आजतक वही किरानीगिरी कर रहा है। आखिर सोना का जूता पहनने के लिए चांदी के जूते मारने पड़ते हैं। आदर्शवादी.... रिश्वत नहीं लेता-देता है। दहेज़ से परहेज है..... पता नहीं और कितने ऊंचे-ऊंचे उसूल हैं.... !"

मिसेज शर्मा कुछ सोच में पड़ गयी। बाईं तर्जनी को ठुड्ढी पर अड़ा कर बोली, "बहू कैसी है...?"
शर्माजी, "ठीक-ठाक है। वह भी उसी शहर में नौकरी करती है।"
सहसा मिसेज शर्मा की आँखें चमक उठी, "तो ये कहिये न.... ! वही तो मैं कहूं। कोई बात जरूर होगी वरना इतने पढ़े-लिखे और अच्छे कैरियर वाले लड़के की शादी फ्री में क्यों करेंगे ?"

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

हत्यारा कौन ?

-- सत्येन्द्र झा
उसकी हत्या की सनसनी खबर पूरे शहर में फैल गयी थी। पुलिस हत्यारे की तलाश में जुटी हुई थी लेकिन चार महीने तक सघन खोज-बीन के बावजूद अपराधी पकड़ में नहीं आ सका।
आक्रोशित लोगों ने शहर में चक्का जाम कर दिया। मिडिया को भी एक सनसनीखेज खबर मिल गयी। पुलिस कप्तान का रातो-रात तबादला हो गया। नए पुलिस कप्तान से लोगों की उम्मीदें कुछ बड़ी थी।
नए कप्तान साहब ने कार्य भार संभाला। अधीनस्थ अधिकारी ने मृतक के सभी दुश्मनों की सूची साहब के सामने हाज़िर कर दिया। एसपी साहब गुस्सा गए, "आप लोग निहायत ही समयखोर हैं। अगर इसे दुश्मनों ने मारा होता तो आज तक पकड़ा नहीं जाता क्या.... ? फटाफट इसके सभी दोस्तों की सूची बना कर तफ्तीश शुरू कीजिये।"
सच में, उस के सबसे करीबी दोस्तों में से एक आज उसकी हत्या के अभियोग में जेल में बंद है। सुनने में तो यहाँ तक आया है कि पिछले साल उसने अपनी एक किडनी देकर अपने दोस्त की जान बचाई थी।
(मूल कथा मैथिली में 'अहीं कें कहै छी' में संकलित 'जाति-अजाति' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

कथांजलि : योगदान

योगदान
- सत्येन्द्र झा
पुरुष नाम-यश के लिए परेशान था और स्त्री घर के आर्थिक संकट के निवारण के लिए बेहाल। रचनाएं मष्तिष्क में ही दम तोड़ देती थी। घर में कागज़ का भी घोर अभाव था।
स्त्री सड़क और गलियों से रद्दी कागज़ और पुराने अखबारों को बीन कर घर लाने लगी। पुरुष उन्ही कागजों पर अपनी रचनाधर्मिता का निर्वाह कर लेता था। स्त्री पुनः उन कागजों को कवारी वाले के हाथों बेच आती थी। घर में कुछ पैसे आने लगे। दोनों संतुष्ट थे.... आखिर योगदान तो दोनों का था।
(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'तालमेल' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

शौक


शौक



सत्येन्द्र झा

tension[7] वो नियमित समय से कार्यालय पहुँचते थे। सभी कार्य नियमानुकूल करते थे। हाकिम को उन्होंने कभी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। लेकिन वही रमण बाबू जब घर पहुँचते थे तो पता नहीं उन्हें क्या हो जाता था...? पत्नी पर कड़क के बोलना... बच्चों से ऐसा व्यवहार मानो वे इनके आदेशपाल हों। उस पर से पचासों प्रश्न.... ! हमेशा तमतमाए हुए।
उस दिन रमण बाबू संयमित थे। अवसर जान पत्नी ने मधुर स्वर में पूछा, "आपको घर आते ही क्या हो जाता है? ऐसे खिसियाये हुए और खिन्न क्यूँ रहते हैं?”
रमण बाबू उस दिन सच में प्रसन्न थे। बोले, "असल में साहेब के साथ रहते-रहते मुझे भी कभी-कभी साहेब बनने का शौख चढ़ जाता है।" बोलते हुए रमण बाबू की मुख-मुद्रा फिर से तनावग्रस्त हो गयी थी।
(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'शौख' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

पोस्टर

पोस्टर


सत्येन्द्र झा

हॉल में सिनेमा बदल गया था। सिनेमा हॉल के कर्मचारी शहर की दीवारों पर नए पोस्टर चिपकाने आये थे। वे पुराने पोस्टरों को फार-फार कर गिराने लगे और उनकी जगह नए पोस्टर चस्पा करने लगे। वह बूढा यह सब देख रहा था। सहसा बढ़ा और और उन फटे-पुराने पोस्टरों को संजोने लगा।

एक कर्मचारी, "बाबा ! इस पोस्टर का क्या करेंगे ? यह तो पुराना हो गया है।"

बूढा, "कोई बात नहीं। अपने घर में लगाऊंगा।"

दूसरा कर्मचारी, "मगर यह तो पुराना है। अब तो नया सिनेमा आ गया है।"

बूढा, "तो क्या हुआ ? पुराने के लिए बाजार मे कोई जगह नहीं है। घर में अभी भी 'पुरानी चीजों' का कुछ महत्व है।"

बूढा पोस्टर को लेकर आगे बढ़ गया। कर्मचारी अबाक थे।

(मूल कृति मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'पोस्टर' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

लघुकथा - इज़्ज़त

लघुकथा

इज़्ज़त

हरीश प्रकाश गुप्त

‘तुम्हारा नाम ?

‘सुरसतिया’

‘बाप का नाम ?

‘धनेसर’

‘वो जो सामने खड़ा है, उसे जानती है ?

‘हाँ।’ उसने अपने अंदर साहस भरते हुए उत्तर दिया। फिर थोड़ा सकुचाते हुए, लोगों से नजरें चुराते हुए कहा – ‘उससे हमने फेरा लिया है।’

निर्भीकता से दिया गया उत्तर सभी को बहुत अखरा लेकिन उन्होंने इसे प्रकट नहीं होने दिया। गनेशी की जात पूछने पर सुरसतिया के मौन से पंच परमेश्वर की त्यौरियाँ चढ़ गईं। पहचानने से इनकार कर देती तो शायद इज़्ज़त पर आँच न आती और गाँव-घर की बहू-बेटी पर नजर डालने का ठीकरा गनेशी के सिर फोड़ दिया जाता। लेकिन सुरसतिया का सबके सामने सम्बन्ध स्वीकार करना फाँस की तरह फंस कर रह गया।

उन्हें अपनी इज़्ज़त का बहुत ख़याल था। पीढ़ियों से चली आ रही ठसक परम्परा के रूप में बरकरार भी रखनी थी। इज़्ज़त की रक्षा के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। हाँ, कुछ भी, ताकि भविष्य में कोई भी समाज की इज़्ज़त के साथ इस प्रकार खिलवाड़ न कर सके। फैसला सुना दिया गया।

निष्ठा के मद से परिपूरित कर्मठ एवं उत्साही क़दम आगे बढ़े। उन्होंने सुरसतिया को अधिकार में किया। दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, फिर उसे पूरी तरह विवस्त्र कर दिया।

आगे-आगे सुरसतिया। पीछे-पीछे जनसमूह। इज़्ज़त की रक्षा कर लेने का अभिमान ढोल-नगाड़े की थाप के रूप में सस्वर हो रहा था। बेबस और निरुपाय सुरसतिया को कुछ न सूझा। आत्मग्लानि से भर उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसे निर्वस्त्र घुमाने की सज़ा देकर समाज की मर्यादा और उसकी इज़्ज़त को तार-तार करके अपनी इज़्ज़त बचा लेने की परिभाषा उसके मन मस्तिष्क को आहत किए जा रही थी और असीम वेदना ज्वार बन अन्दर ही अन्दर उफन रही थी।

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

मेरे छाता की यात्रा कथा, और ... सौ जोड़ी घूरती आंखें!!! (भाग-5 : साहब की कोठी)

मेरे छाता की यात्रा कथा, और ...  सौ जोड़ी घूरती आंखें!!!

 

 

मनोज कुमार

लिंक – भाग-१ (बरसात का एक दिन) , भाग-२ (बदनसीब) , भाग-३ (नकारा) ४. नज़रिया

imageआज सुबह की सैर से वापस आते समय पहले तो धीरे-धीरे फिर ज़ोर से वर्षा होने लगी। तेज हो चुकी बारिश से बचने के लिए मैं छाता ताने अपनी रफ्तार तेज करता घर की तरफ वापस जा रहा था। तभी काफी तेज रफ्तार से पुलिस की गाड़ी मेरे बगल से गुजरी।

छपाक ...!!!

... और सड़क पर जम आए पानी से मेरा वह शरीर, जिसे अब तक मेरे छाते ने इंद्र देवता से बचाकर रखा था, भींग गया और साथ ही छोड़ गया कीचड़ से सना वस्‍त्र। अब तो मैं अपना छाता मोड़ने में ही सुख मान रहा था, बारिश की बौछार से कुछ तो कीचड़ धुल जाए! छाता मोड़ते हुए मैं बाई ओर अपनी गरदन घुमाता हूँ। जेल की ऊँची दीवारों पर उग आए पौधों पर मेरी नज़र जाती है। मन की भावनाओं को बाहर आने से रोकता हूँ।

चर्र-चर्र ...!!! चों...चों!!!! ... की आवाज़ के साथ आगे पुलिस की गाड़ी रूकती है। एक पुलिसवाला कूद कर बाहर आता है। वह चीखता है –“एई! ... की कोरछिस रे?”

जहां मैं खड़ा हूँ वहां बाई ओर जेल है दांई ओर बस स्टॉप और सामने पुलिस के सबसे बड़े साहब की कोठी।

बड़े साहब का बंगला हो और पुलिसवाला रौब न दिखाए, ....ऐसा हो सकता है क्या? सैर से आते-जाते  समय कई बार हमें फुटपाथ छोड़ नीचे तेज जाती वाहनों के बीच सड़क से होकर जाना पड़ता है। गेट उनका फ़ुटपाथ पर खुलता है और गेट पर ड्यूटी दे रहा दरवान भी सामने की फुटपाथ की हिफाजत के प्रति चौकस, सजग और कर्तव्‍य निष्‍ठा से ओत-प्रोत रहता है। हर ... पल!!!

खैर, इस पुलिसवाले की उस फटकार “एई! ... की कोरछिस रे?” से जेल की दीवार और फुटपाथ के बीच की झाडि़यों में हलचल हुई और देखता हूँ कि एक व्‍यक्ति निकल कर भय से थर थर कांपता हुआ भागने की चेष्‍टा करता है।

सटाक....!!!

“साला। पालाच्छिस?”

पुलिसवाले का सोटा उसके घुटनों के पीछे वाले हिस्‍से पर पड़ता है। उसके मुंह से आर्तनाद और ये शब्‍द ... “मोरे गेलाम गो !” ... निकलता है।

वह औंधे मूंह फुटपाथ पर गिर पड़ता है। पुलिसिया अपने कर्तव्‍य के प्रति अत्‍यधिक सचेष्‍ट है, वहां झट से पहुंचता है। अभी उसका सोंटा हवा में लहरा ही रहा होता है कि वह व्‍यक्ति बाएं हाथ में पड़े झोले को उलटाता है और दाएं हाथ को खोलता है।

कई सारे घोंघे इधर-उधर छितरा जाते है। वह बोलता है,

....“खेताम!!!”

 

पुलिसवाला मुंह से भद्दी गाली निकालते हुए कहता है – “साला देखछिस ना, साहेबेर बाड़ी आछे!!!”  .... और मुड़कर गाड़ी में सवार हो आगे बढ़ जाता है।

मैं अपना छाता खोल उसके ऊपर तान देता हूँ। वह बोलता है, “बाबू! बेथा कोरछे।”

सामने बस स्‍टॉप है। वहां कुछ बस पकड़ने और कुछ वर्षा से बचने के लिए आश्रय लिए हुए सौ जोड़ी आंखे पुलिसिए प्रकोप से डरी-सहमी है। आज कोई भी आंखे घूरती नहीं दिखी मेरे छाते को।

 

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

लघुकथा -- दोष किसका..... ?

दोष किसका..... ?


लघुकथा -- सत्येन्द्र झा

युवावस्था में प्रेम-विवाह के आन्दोलनकारी समर्थक। प्रेम-विवाह किये। माँ-बाप से अनबन और घोर निराशा।

वक़्त-बेवक्त सास-ससुर से भी तल्खी। "प्रेम-विवाह का मतलब यह तो नहीं कि दामाद के हर अरमान में आग ही लगा दें।" तिलक-दहेज़ नहीं देना पड़ा... कम से कम 'अन्य आवश्यक सामग्री' के साथ ससम्मान विदाई तो करते।

वृद्धावस्था में प्रेम-विवाह के कट्टर विरोधी।

इच्छा के प्रतिकूल सामाजिक क्रांतिकारी पुत्र ने एक युवती का हाथ थाम लिया।  न पंडित न बारात, ना ही दहेज़। कोर्ट-मैरिज।

अब पुत्र से भी अनबन।

पहले से भी अधिक निराशा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि दोष किसका था और गलती कहाँ हो गयी ?

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहैं छी" में संकलित "तीन चित्र" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)चित्र : आभार गूगल सर्च

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

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सत्येन्द्र झा

नए हाकिम के पदभार ग्रहण करते ही विभाग में हडकंप मच गया था। फ़ाइल पर आपत्तियां दर्ज होने लगी,बिल-भुगतान का प्रवाह रुक गया। क्रय-दर कम करने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। अखबारों ने नए पदाधिकारी कीकार्य-कुशलता और इमानदारी का खूब प्रशस्ति-गायन किया।

विभाग के अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी दुखी थे। हाकिम के आने से उनकी उपरी आय पर पॉवर-ब्रेक लगगया था। खैर समय अपनी गति से बीतता रहा।

एक दिन, "सर, वैसे तो आप जो कहेंगे वही होगा... मगर पुराने साहब तो दस परसेंट..... ।"

"पहले साहब की बात मैं नहीं सुनना चाहता हूँ। वो तो कार्यालयी मर्यादा को मिट्टी में मिला कर चले गए।", नएसाहब धाराप्रवाह बोलते चले जा रहे थे, "मेरी कलम बीस परसेंट से कम पर नहीं चलेगी।"

पूरे कार्यालय में खुशी की लहर दौड़ गयी। मीडिया में नए हाकिम का पुराना इमेज बरकरार रहा।

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी"  से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित। )

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

केंद्र (लघुकथा-सत्येन्द्र झा)

केंद्र

लघुकथा -सत्येन्द्र झा

उसकी माँ और पत्नी में छत्तीस का आंकड़ा था। बेचारा थका-मांदा जब शाम को घर आये तो पत्नी दरवाज़े पर से ही माँ के प्रति विषवमन आरम्भ कर देती थी। माँ भी एकांत पा कर उसके सामने बहू का गुणगान कर ही लेती थी। उसका मन तिक्त हो जाता था।

आज भी वही हुआ। वह शिव की तरह दोनों का कालकूट चुप-चाप पी गया। तभी उसका बेटे ने उसके पास बैठ कर पूछा, "पापा ! एक प्रश्न का उत्तर देंगे ?"

उसने रुखाई से बोला, "पूछो।"

बच्चे ने मासूमियत से पूछा, "एक केंद्र से अनेक वृत्त खीचे जा सकते हैं ?"

इस बार भी उसका जवाब संक्षिप्त ही था, "हाँ।"

लड़के का सवाल जारी था, "लेकिन पापा ! जितनी बार वृत्त खीचा जाता होगा, उतनी बार उसके केंद्र पर प्रकाल की नोक पड़ती होगी ?"

आदमी ने सपाट जवाब दिया, "हाँ। बिना केंद्र पर प्रकाल की नोक लगाए वृत्त कैसे बनेगा ?"

लेकिन लड़के का सवाल तो कुछ और ही था, "हाँ तो पापा ! बार-बार प्रकाल की नोक चुभने पर केंद्र को दर्द भी होता होगा.... ?"

इस बार उसके पास कोई जवाब नहीं था। वह बस उसका मुँह देखता रह गया था।

मूल रचना मैथिली में "अहीं के कहै छी में संकलित 'केंद्र' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।

(चित्र साभार : गूगल सर्च)

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

तेरा जूता तेरे सर (लघुकथा)

तेरा जूता तेरे सर      (लघुकथा)

-- सत्येन्द्र झा

उस गाँव में सभी लोग धोती कुरता पहनते थे। एक दिन एक पैंट-शर्ट वाला आदमी आया। वो उसी गाँव में सभ्य की तरह रहने लगा। अब सभी लोग पैंट शर्ट पहने लगे।

नए आदमी ने कुछ दिनों बाद धोती-कुरता पहनना आरम्भ कर दिया। ग्रामीणों ने पुनः धोती-कुरता धारण करने का निश्चय किया।

लेकिन ये क्या? ये सभी तो धोती पहनना ही भूल चुके थे।

नए आदमी ने एक साइनबोर्ड लगा दिया,

image…. और दूकान चलने लगी!!

 (मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'त्वदीयं वस्तु' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित। )

सोमवार, 26 जुलाई 2010

बड़ा अपराध ? (लघुकथा) -- -हरीश प्रकाश गुप्त

बड़ा अपराध ?

मेरा फोटोहरीश प्रकाश गुप्त

पूर्ण आकार की छवि देखेंशाम धुआँ सी चारो ओर फैल चुकी थी। रोज की तरह आज भी शहर की बत्ती गुल थी। छोटे शहरों की नियति भी यही होती है कि जरूरत के समय चीज नदारत होती है।

बदहवास रामसजीवन ने अस्पताल के गेट पर पहुँचकर हड़बड़ी में स्कूटर स्टैण्ड पर लगाने की कोशिश की। बैलेंस कुछ बिगड़ा लेकिन उसने उसे सँभाल लिया। भीतर जेनरेटर की रोशनी थी, पर चेहरा पहचानना मुश्किल था। उसने स्कूटर से बंधी रस्सी ढीलीकर दोनों हाथों से गठरी सँभाली, भीतर भागा और डाक्टर के कमरे के बाहर गठरी खोल दी।

चारो तरफ भीड़ इकट्ठी हो गई। सबकी जुबान पर प्रश्न चिपक गए।

पूर्ण आकार की छवि देखें‘डाक्टर साहब, इसे बचा लो ! ये मेरी बहन है। ह.....हर....र....राम.....जादों ने इसे आग लगा दी। ......किसी ने मेरी मदद तक नहीं की। जल्दी में ऐसे ही उठा लाया हूँ, अकेले।’ आहत रामसजीवन की करुण चीत्कार पर सन्नाटा छा गया।

‘यह तो जिन्दा है......’

‘श्च...श्च.......। बताओ, ऐसी हालत में भी किसी ने मदद नहीं की। बहुत हिम्मत की है इसने।’

‘बेचारे गरीब के घर परिवार में कोई न था तो अड़ोस-पड़ोस वाले तो कुछ साथ दे सकते थे।’

‘हुँ..ह...। आज के जमाने में तो सबको अपनी पड़ी है। किसी को दूसरे की पीर- पीड़ा से वास्ता ही कहाँ है?’

खुसर-पुसर ने सन्नाटे को चीरना आरम्भ किया।

‘अरे ! यह तो यह तो एक्सीडेन्टल केस है....... ।’ डाक्टर बुदबुदाया।

पूर्ण आकार की छवि देखेंऔपचारिकताएं पूरी की जाने लगीं।......नाम, .....पति का नाम.......? ......थाना......चौकी...? लोग दो-दो कदम पीछे खिसक गए। बेसुध-सा रामसजीवन कभी डाक्टर की ओर देखकर चिल्लाता तो कभी अचेत शरीर का हाथ पकड़ खून की गर्मी देखता, नाक-मुँह पर हाथ रखकर साँसे महसूस करता। उपचार में पल-पल की देरी उसे हलकान किए दे रही थी। उसके बस में होता तो वह किसी की परवाह किए बिना उसकी साँसों को गति दिए रहता।

एकाएक उसने महसूस किया की बहन की साँसें थम रही हैं। उसने और तेजी से अपने हाथ-पैर चलाए ताकि डाक्टर के इलाज शुरू करने तक वह उसे जिलाए रख सके। वह बहुत चीखा-चिल्लाया लेकिन उसकी एक न चली। सहसा उसका शरीर ठहर गया। केवल ऊपर से शांत लेकिन भीतर से नहीं।

पूर्ण आकार की छवि देखेंवह जड़वत चादर समेटने लगा। एक मोटी सी गाली उसके मुँह से निकली और सूख चुके हलक में आकर फँस गई। एक भारी भरकम आक्रोश बाहर निकलकर फट पड़ना चाहता था। उसने चाहा कि वहाँ मौजूद एक-एक आदमी का हलक पकड़कर कसकर भींच दे। खड़े-खड़े खोखली बातें करने वालों का भी और उनका भी जो यंत्रवत अपना काम निबटा रहे थे। उन्हें दिखाए कि अपनी मौत का दर्द क्या होता है। एक-एक साँस जब तमाम कोशिशों के बावजूद रुकती चली जाती है तो उसकी पीड़ा क्या होती है। अपने सामने अपनों की असमय मौत होते हुए देखने की लाचारी लहू को भी आँसू बनने नहीं देती। लेकिन, उसका पूर्ण आकार की छवि देखेंअन्तर्मन इस द्वन्द्व में उलझकर रह गया कि इस हत्या में बड़ा अपराध किसका है। उनका, जिन्होंने और पाने की हवस में आग लगाकर जघन्य पाप किया और मौत की दहलीज पर लाकर छोड़ दिया या फिर उनका, जिन्हें उसे मौत के मुँह से वापस खींच लाना चाहिए था, वे मानवीय संवेदना पर कु़ण्डली मारे बैठे रहे। उन्होंने औपचारिकताओं के रूप में कर्तव्य भर निभाया और अपनी उदासीनता से मौत की ओर एक धक्का और दे दिया।

अमानवीयता और पाप में स्वयं को एक दूसरे से छोटा साबित न होने देने की होड़ के बीच उसे नृशंसता और उदासीनता एक ही पंथ की सहगामिनी लगीं।

सोमवार, 19 जुलाई 2010

मूलवासी –(लघुकथा) --- सत्येन्द्र झा

 

मूलवासी

(लघुकथा) -- सत्येन्द्र झा

J0145810

"आपका नाम ?"

"संतोष।"

"पिता का नाम ?"

"जी आत्मबल"

"घर का पता ?"

"घर नहीं है, साहब ! किराए के मकान में रहता हूँ।  पता उसी दिन बदल जाता है, जिस दिन घर का किराया नहीं दे पाता हूँ।"

"कोई बात नहीं। स्थाई पता बताइये।"

"कुछ स्थाई नहीं है सर ! इंच भर भी जमीं नहीं है, जिसे अपनी कह सकें।"

"आप तो अलबत्त हैं महाराज ! आपके जैसा तो आज तक कोई नहीं मिला मुझे.... !"

"मिलेंगे क्यूँ नहीं... लाखों मिलेंगे मेरे जैसे.... ! कभी-कभार नीचे भी तो देखा कीजिये.... । अजी... ! हमारे बिना आप कहाँ रह सकेंगे... ?आखिर भारत का मूलवासी तो मैं ही हूँ।"  

मूल कथा मैथिली पुस्तक 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'मूलवासी' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

धर्म

धर्म        (लघुकथा)

-- सत्येन्द्र झा

सप्ताह भर दिन-रात जी तोड़ मेहनत करने के बाद बिल्टू बाबू ने जब जोगिया को महज पचास रूपये दिए तो वह अड़ गया। बोला, "यह क्याहै मालिक? सात दिनों के सात सौ रूपये तो सीधा बनते हैं।  ऊपर से दिन-रात काम किया है। यह पचास रुपया किस हिसाब से दे रहे हैं ?"

"क्या बात करते हो ? तुम से भला मैं हिसाब करूँगा ? अरे, जो दिया उसे आशीर्वाद समझ कर रख लो।", बिल्टू बाबू पान चबाते हुए बोले।

कुछ ख्वाब उड़ जाने दो

जोगिया नाक-भौंह सिकोड़ कर बोला, "नहीं मालिक ! अब आशीर्वाद का ज़माना चला गया। अब हम लोग भी जग गए हैं, मालिक! सत्ता में भी हमारी हिस्सेदारी बढ़ गयी है.... !"

बिल्टू बाबू बीच में ही बात कटते हुए बोले, "धर्र... बुरबक ! सब कुछ ठीक है मगर धर्म क्या कहता है ? क्या धर्म तुम्हे अपने से श्रेष्ठों को अपमानित करने की आज्ञा देता है ? कहो! तुम्हें पाप लगेगा कि नहीं ?"

जोगिया चुप हो गया। पचास टके के नोट को मोर कर पॉकेट में रख वह अपने घर की ओर बढ़ गया। धर्म का नशा उसके सर चढ़ कर बोल रहा था।

(मूल कथा  'अहीं कें कहै छी' में संकलित "निशाँ" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)