लघुकथाइज़्ज़त
|
| ‘तुम्हारा नाम ?’ ‘सुरसतिया’ ‘बाप का नाम ?’ ‘धनेसर’ ‘वो जो सामने खड़ा है, उसे जानती है ?’ ‘हाँ।’ उसने अपने अंदर साहस भरते हुए उत्तर दिया। फिर थोड़ा सकुचाते हुए, लोगों से नजरें चुराते हुए कहा – ‘उससे हमने फेरा लिया है।’
उन्हें अपनी इज़्ज़त का बहुत ख़याल था। पीढ़ियों से चली आ रही ठसक परम्परा के रूप में बरकरार भी रखनी थी। इज़्ज़त की रक्षा के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। हाँ, कुछ भी, ताकि भविष्य में कोई भी समाज की इज़्ज़त के साथ इस प्रकार खिलवाड़ न कर सके। फैसला सुना दिया गया।
आगे-आगे सुरसतिया। पीछे-पीछे जनसमूह। इज़्ज़त की रक्षा कर लेने का अभिमान ढोल-नगाड़े की थाप के रूप में सस्वर हो रहा था। बेबस और निरुपाय सुरसतिया को कुछ न सूझा। आत्मग्लानि से भर उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसे निर्वस्त्र घुमाने की सज़ा देकर समाज की मर्यादा और उसकी इज़्ज़त को तार-तार करके अपनी इज़्ज़त बचा लेने की परिभाषा उसके मन मस्तिष्क को आहत किए जा रही थी और असीम वेदना ज्वार बन अन्दर ही अन्दर उफन रही थी। |
लघुकाथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लघुकाथा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंगलवार, 7 सितंबर 2010
लघुकथा - इज़्ज़त
बुधवार, 23 सितंबर 2009
हर हाल में - मनोज कुमार
उस दिन दफ़्तर में पेपर कटिंग की एक छाया प्रति ख़ूब वितरित हो रही थी। किन्हीं विश्वस्त सूत्रों का हवाला देकर यह बताया गया था कि सरकार सेवानिवृत्ति की सीमा 60 वर्ष की जगह 62 वर्ष करने पर विचार कर रही है। अनुमान यह भी लगाया जा रहा था कि प्रधानमंत्री 15 अगस्त को लालक़िले से देश को संबोधित करते वक़्त इसकी घोषणा भी कर देंगे। अनुभागों में कर्मचारियों के बीच इसकी मिश्रित प्रतिक्रिया थी। पर ज़्यादातर काफी ख़ुश थे। शाम को घर जाते वक़्त श्यामली और रूपसी लिफ्ट में मिलीं। अलग-अलग अनुभागों में कार्यरत होने के कारण दिनभर उनका मिलना हो नहीं पाया था। वे पक्की सहेली हैं। श्यामली बोली, “सुना है सरकार 62 करने जा रही है।”
रूपसी बोली, “हाँ, आज सब पेपर कटिंग लेकर घूम रहे थे।”
“अब तो मर ही जाऊँगी। ये जोड़ों का दर्द, उसपर बढ़ती उम्र। सोच रही थी कि इस महीने रिटायर हो जाऊँगी, तो घर पर बैठकर आराम करूँगी। अब तो दो साल और काम करना पड़ेगा। उफ! अब नहीं होगा हमसे।”
“हां, री” रूपसी बोली, “ सरकार का कौन सा नियम है यह, जो बूढ़े हैं, रोगग्रस्त हैं, उनसे और काम लेना चाहती है। इससे तो अच्छा होता जवान लड़कों से काम लेती, जो बिना काम के इधर-उधर घूमते रहते हैं।”
पंद्रह अगस्त को श्यामली और रूपसी ऑफिस के ध्वजारोहण कार्यक्रम में नहीं जाती हैं। अपने-अपने घर में टीवी पर आ रहे स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम का लालक़िले से सीधा प्रसारण देख रहीं हैं।
प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हो गया, पर उस तरह की कोई घोषणा नहीं हुई। श्यामली काफी दुखी एवं उदास हो गई। उसे इसी महीने सेवानिवृत्त होना पड़ेगा। तभी मोबाइल पर रूपसी का फोन आया। “श्यामली, अगले महीने से हम ऑफिस नहीं जा रहें हैं। हमें घर में ही बैठना होगा।”
*** *** ***
रूपसी बोली, “हाँ, आज सब पेपर कटिंग लेकर घूम रहे थे।”
“अब तो मर ही जाऊँगी। ये जोड़ों का दर्द, उसपर बढ़ती उम्र। सोच रही थी कि इस महीने रिटायर हो जाऊँगी, तो घर पर बैठकर आराम करूँगी। अब तो दो साल और काम करना पड़ेगा। उफ! अब नहीं होगा हमसे।”
“हां, री” रूपसी बोली, “ सरकार का कौन सा नियम है यह, जो बूढ़े हैं, रोगग्रस्त हैं, उनसे और काम लेना चाहती है। इससे तो अच्छा होता जवान लड़कों से काम लेती, जो बिना काम के इधर-उधर घूमते रहते हैं।”
पंद्रह अगस्त को श्यामली और रूपसी ऑफिस के ध्वजारोहण कार्यक्रम में नहीं जाती हैं। अपने-अपने घर में टीवी पर आ रहे स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम का लालक़िले से सीधा प्रसारण देख रहीं हैं।
प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त हो गया, पर उस तरह की कोई घोषणा नहीं हुई। श्यामली काफी दुखी एवं उदास हो गई। उसे इसी महीने सेवानिवृत्त होना पड़ेगा। तभी मोबाइल पर रूपसी का फोन आया। “श्यामली, अगले महीने से हम ऑफिस नहीं जा रहें हैं। हमें घर में ही बैठना होगा।”
*** *** ***
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
हरीश प्रकाश गुप्त
निर्भीकता से दिया गया उत्तर सभी को बहुत अखरा लेकिन उन्होंने इसे प्रकट नहीं होने दिया। गनेशी की जात पूछने पर सुरसतिया के मौन से पंच परमेश्वर की त्यौरियाँ चढ़ गईं। पहचानने से इनकार कर देती तो शायद इज़्ज़त पर आँच न आती और गाँव-घर की बहू-बेटी पर नजर डालने का ठीकरा गनेशी के सिर फोड़ दिया जाता। लेकिन सुरसतिया का सबके सामने सम्बन्ध स्वीकार करना फाँस की तरह फंस कर रह गया।
निष्ठा के मद से परिपूरित कर्मठ एवं उत्साही क़दम आगे बढ़े। उन्होंने सुरसतिया को अधिकार में किया। दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, फिर उसे पूरी तरह विवस्त्र कर दिया।