मंगलवार, 7 सितंबर 2010

लघुकथा - इज़्ज़त

लघुकथा

इज़्ज़त

हरीश प्रकाश गुप्त

‘तुम्हारा नाम ?

‘सुरसतिया’

‘बाप का नाम ?

‘धनेसर’

‘वो जो सामने खड़ा है, उसे जानती है ?

‘हाँ।’ उसने अपने अंदर साहस भरते हुए उत्तर दिया। फिर थोड़ा सकुचाते हुए, लोगों से नजरें चुराते हुए कहा – ‘उससे हमने फेरा लिया है।’

निर्भीकता से दिया गया उत्तर सभी को बहुत अखरा लेकिन उन्होंने इसे प्रकट नहीं होने दिया। गनेशी की जात पूछने पर सुरसतिया के मौन से पंच परमेश्वर की त्यौरियाँ चढ़ गईं। पहचानने से इनकार कर देती तो शायद इज़्ज़त पर आँच न आती और गाँव-घर की बहू-बेटी पर नजर डालने का ठीकरा गनेशी के सिर फोड़ दिया जाता। लेकिन सुरसतिया का सबके सामने सम्बन्ध स्वीकार करना फाँस की तरह फंस कर रह गया।

उन्हें अपनी इज़्ज़त का बहुत ख़याल था। पीढ़ियों से चली आ रही ठसक परम्परा के रूप में बरकरार भी रखनी थी। इज़्ज़त की रक्षा के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। हाँ, कुछ भी, ताकि भविष्य में कोई भी समाज की इज़्ज़त के साथ इस प्रकार खिलवाड़ न कर सके। फैसला सुना दिया गया।

निष्ठा के मद से परिपूरित कर्मठ एवं उत्साही क़दम आगे बढ़े। उन्होंने सुरसतिया को अधिकार में किया। दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, फिर उसे पूरी तरह विवस्त्र कर दिया।

आगे-आगे सुरसतिया। पीछे-पीछे जनसमूह। इज़्ज़त की रक्षा कर लेने का अभिमान ढोल-नगाड़े की थाप के रूप में सस्वर हो रहा था। बेबस और निरुपाय सुरसतिया को कुछ न सूझा। आत्मग्लानि से भर उसने अपनी आँखें मूँद लीं। उसे निर्वस्त्र घुमाने की सज़ा देकर समाज की मर्यादा और उसकी इज़्ज़त को तार-तार करके अपनी इज़्ज़त बचा लेने की परिभाषा उसके मन मस्तिष्क को आहत किए जा रही थी और असीम वेदना ज्वार बन अन्दर ही अन्दर उफन रही थी।

63 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक कथा..क्या हालत है!

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  2. कब तक ऐसे ही चलता रहेगा हमारे देश में? क्या कानूनन ऐसे लोगों को सज़ा नहीं मिल सकती?

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  3. हरीस जी… ई लघुकथा दिल को छूता है... पृस्ठभूमि भले आप गाँव का बताते हैं, लेकिन पटना सहर का सबसे ब्यस्त माना जाना जाने वाला एक्जीबिसन रोड पर दुपहरिया में ई काण्ड हुआ... बाद में लोग बोला कि औरत खराब थी... मगर भाई जी, औरत पतुरिया सही, उसका भी त कोनो इज्जत है… ऐसे सड़क पर खुले आम उसका चीर हरन कहाँ से उचित है...
    करेजा को छू जाने वाला कथा है ई, कथा का सत्यकथा...
    सलिल

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  4. सलिल जी की बात से सहमत। बहुत ही मार्मिक लघु कथा और बहुत दुखद स्थिति।

    हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।

    हिंदी और अर्थव्यवस्था, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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  5. समाज के संकीर्ण मानसिकता वाले वर्ग में क्रूर सत्य के रूप में आज भी विद्यमान हैं इस तरह की घटनाएं। समाज का यह विद्रूप और घिनौना चेहरा शेष वर्ग को भी मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ता। बहुत ही संवेदनशील और मार्मिक लघुकथा है। हृदय को दुखाती हुई लेकिन सोचने को मजबूर करती हुई।
    आभार।

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  6. बहुत मार्मिक चित्रण ...किसी की इज्ज़त उतार कर अपनी इज्ज़त बचने का ढोंग ...कब अक्ल आएगी समाज को ..

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  7. आज के समाज का कडवा और वीभत्स चित्रण्………

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  8. अज के समाज की सही तस्वीर। अच्छी लगी लघु कथा। धन्यवाद।

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  9. क्रूर सत्य का मार्मिक चित्रण ! धन्यवाद !!

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  10. हमारे समाज मै आज भी वेबकुफ़ो की कमी नही.....

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  11. @ समीर जी,
    हालात वास्तव में गम्भीर हैं। हमारे समाज में आज भी ऐसी बर्बर घटनाएं घट रही हैं। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  12. @ अंजना जी,
    कानून जब तक वहाँ पहुँचता है तब तक घटना घट चुकी होती है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  13. @ सलिल जी,
    सही कहा आपने। अपनी इज्जत की सबको फिकर है। क्या गाँव क्या शहर, सभी जगह इस तरह के विकार मिलेंगे। यह तो एक मानसिकता है, जिसे उपचार की आवश्यकता है। घन्यवाद।

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  14. @ राजभाषा हिन्दी,
    आपका सदा ही आभारी रहा हूँ। आपने ही मेरे भावों को शब्द दिए हैं। पुनः आभार।

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  15. @ निशांत,
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  16. @ संगीता पुरी जी,
    समाज का एक घिनौना चेहरा ऐसा भी है। जब इस तरह का कुछ दिख जाता है तो शब्दें में फूट पड़ता है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  17. @ संगीता जी,
    ज्यादातर लोग ऐसा ही सोचते हैं। उन्हें दूसरों की इज्जत उतारने में ही अपना मान बढ़ा हुआ नजर आता है। ठिप्पणी के लिए घन्यवाद।

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  18. @ कौशल जी,
    आपकी भावनाओं को समझ सकता हूँ। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  19. @ प्रवीण जी,
    ऐसा आज भी हो रहा है। सोचिए, इस आधुनिक युग में भी हम कहाँ जा रहे हैं।
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  20. @ हास्यफुहार जी,
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  21. @ वंदना जी,
    यह सच है। हमारे समाज में आज भी ऐसी बर्बर घटनाएं घट रही हैं।
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  22. @निर्मला जी,
    टिप्पणी के लिए आपका आभारी हूँ।

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  23. @ गोदियाल जी,
    टिप्पणी के लिए आपका आभारी हूँ।

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  24. @ करण जी,
    सही कहा आपने। यह समाज का कड़वा सच है।
    टिप्पणी के लिए आपका आभारी हूँ।

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  25. @ जमीर भाई,
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  26. @राज भटिया जी,
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  27. Kahin ham vikas itana kar gaye hain ki adami thoda ashwat sa lagata hai, par kahin itana pichhe hain ki kahate huye lajja ati hai ki yah tasveer JAGADGURU kahalane wale Bharat ki hai. Bahut hi sajiv chitran. Sadhuvad.

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  28. क्या कहें .... एक महिला की आन से खिलवाड़ कर ढोल नगाड़े पीटना हैवान असभ्य इंसानियत की निशानी है ... समाज में इस तरह के अनेकों प्रकरण समाचार पत्रों में पढ़ता हूँ तो बहुत दुःख होता है ... कहानी बहुत मार्मिक और सटीक है .

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  29. निष्ठा के मद से परिपूरित कर्मठ एवं उत्साही क़दम आगे बढ़े। उन्होंने सुरसतिया को अधिकार में किया। दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, फिर उसे पूरी तरह विवस्त्र कर दिया।
    ...... और हम इसी समाज में रहते हैं। आज और कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं।

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  30. उफ़....क्या ऐसा वाकई होता है हमारे समाज में ? वैसे हम खुद को ऋषि मुनियों का वंशज कहते हैं ..बेहद दुखद और निंदनीय..

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  31. उफ़....क्या ऐसा वाकई होता है हमारे समाज में ? वैसे हम खुद को ऋषि मुनियों का वंशज कहते हैं ..बेहद दुखद और निंदनीय..

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  32. खाप पंचायतों को जाना होगा। प्रेम से ही जाति खत्म होगी।

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  33. स्त्री "प्रेम" है। समाज में प्रेम की स्थिति हम देख ही रहे हैं।

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  34. बहुत मार्मिक कथा है अपने आपको इन्सान कहते हुए भी शर्म आती है इसी विषय पर मेरी एक कविताएक कविता अपने ही ब्लॉग से आपको लिख रही हूँ
    "प्रपंच"
    दर्द की दीवार हैं,
    सुधियों के रौशनदान.
    वेदना के द्वार पर,
    सिसकी के बंदनवार.
    स्मृतियों के स्वस्तिक रचे हैं.
    अश्रु के गणेश.
    आज मेरे गेह आना,
    इक प्रसंग है विशेष.
    द्वेष के मलिन टाट पर,
    दंभ की पंगत सजेगी.
    अहम् के हवन कुन्ड में,
    आशा की आहुति जलेगी.
    दूर बैठ तुम सब यहाँ
    गाना अमंगल गीत,
    यातना और टीस की,
    जब होगी यहाँ पर प्रीत.
    पोर पोर पुरवाई पहुंचाएगी पीर.
    होंगे बलिदान यहाँ इक राँझा औ हीर.
    खाप पंचायत बदलेगी,
    आज दो माँओं की तकदीर.

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  35. बहुत ही दर्द भरी कहानी । किसी औरत की इज्जत लेकर इनकी इज्जत में कैसे इजाफा होता है ? खाप में ही होता होगा ये सब ।

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  36. हरीश जी,
    इस लघुकथा को उपन्यास में ढालने की पूरी सम्भावना है । यह समाज में हो रहा है सब जानते हैं ।शुभकामनाएं...

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  37. dukh to ye hai ki ye laghukatha sirf ek kalpana nahin.. aise samachaar aaj bhi akhbaaron ki surkhiyaan rahte hain..

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  38. बहुत मार्मिक,और सच !बधाई मनोज जी !
    ऐसे ही मैंने भी एक 'दुर्गम्या' लिखी थी(कुछ अंश) -

    कोई तोहमत जड़ दो औरत पर ,
    हटा दो रास्ते से !
    वे दौड़ा रहे हैं सड़क पर
    'टोनही है यह '......,
    नीचे झुकी, उठा लिया वही पत्थर....
    धज्जियां कर डालीं थीं वस्त्रों की
    उन लोगों ने ,
    नारी-तन बेग़ैरत करने को !
    सारी लज्जा दे मारी उन्हीं पर !
    पशुओं से क्या लाज ?...
    श्लथ ,वेदना - विकृत,
    रक्त ओढ़े दिगंबरी ,
    बैठ गई वहीं धरती पर !
    अगले दिन खोज पड़ी
    कहां गई चण्डी ?
    उधऱ कुयें में उतरा आया मृत शरीर !
    दिगंबरा चण्डी को वहन कर सक जो
    वहां कोई शिव नहीं था !
    सब शव थे !

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  39. @ आचार्य राय जी,
    विकास तो हमने भौतिक किए हैं। वैचारिक और सैद्धांतिक दृष्टिकोण से आज भी हम बहुत पिछड़े है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  40. @ महेन्द्र जी,
    समाज में जब इस तरह की घटनाएं घटती हैं तो हमें अपना चेहरा शर्म से छिपाना पड़ता है और कुछ लोगों के कृत्यों से ऐसा एक बार नहीं बार-बार घटता है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  41. @ मनोज जी,
    ऐसे बहुत से लोग मिलेंगे जो अनैतिक कृत्यों में ही अपनी कर्मठता और निष्ठा का परिचय देते हैं। यह दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  42. @ शिखा जी,
    हाँ । तथाकथित आधुनिक समाज में आज भी कहीं कहीं ऐसा ही होता है। यह सच है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  43. @ रचना जी,
    आपकी कविता ने इस लघुकथा का वजन बढ़ा दिया। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  44. @ शिक्षामित्र जी,
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  45. @ कुमार राधारमण जी,
    लघुकथा पर टिप्पणी के लिए घन्यवाद।

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  46. गुप्त जी, देर हो गई पढने में. लेकिन बहुत ही मार्मिक चित्रण. ए़क लघुकथा में आपने पूरे सामाजिक परिस्थिति का चित्रण कर दिया है. ए़क सुगठित लघुकथा.

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  47. जो हाथ ऐसी शर्मनाक हरकत के लिए उठते है वो ये क्यों भूल जाते हैं कि उसे इस धरती पर लाने वाली भी एक औरत ही है । जो हाथ पूजा करते वक्त देवी मां के चरणों तक जाते है वहीं हाथ औरत को बेइज्जत करते वक्त कांपते तक नहीं । कैसी विडम्बना है ? ऐसे लोगो को चुल्लु भर पानी में डूब मरना चाहिए ।

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  48. जो हाथ ऐसी शर्मनाक हरकत के लिए उठते है वो ये क्यों भूल जाते हैं कि उसे इस धरती पर लाने वाली भी एक औरत ही है । जो हाथ पूजा करते वक्त देवी मां के चरणों तक जाते है वहीं हाथ औरत को बेइज्जत करते वक्त कांपते तक नहीं । कैसी विडम्बना है ? ऐसे लोगो को चुल्लु भर पानी में डूब मरना चाहिए ।

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  49. @आशा जोगलेकर जी,
    यह दर्द की पराकाष्ठा है जिसे उसने सहा होगा। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  50. @ डा0 दिव्या जी,
    अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  51. @ त्रिपुरारी शर्मा जी,
    सही कहा आपने। कथानक को बड़ी कहानी में ढाला जा सकता था। घन्यवाद।

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  52. @ दीपक जी,
    आज भी ऐसी घटनाएं घट रही हैं, यह हमारा दुर्भाग्य है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए घन्यवाद।

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  53. @ प्रतिभा जी,
    आपकी कविता से लघुकथा का वजन बढ़ गया है। धन्यवाद।

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  54. @ अरुण जी,
    देरी की कोई बात नहीं अरुण जी। लघुकथा आपको पसंद आई। धन्यवाद।

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  55. @ रीता जी,
    ऐसे हाथों को शर्म और नैतिकता से कोई वास्ता ही नहीं है। उनको जब अपने पर आती है तभी इसका ज्ञान होता है। अपनी भावनाओं से अवगत कराने के लिए धन्यवाद।

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  56. समूह के जोर और उसकी इज्जत के सामने और किसी चीज का मोल रह जाए...यह हो सकता है ???
    क्या सचमुच समाज सभ्य हो रहा है ???
    मन आक्रोश घृणा क्षोभ के बोझ से दब गया !!!

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