बुधवार, 15 सितंबर 2010

देसिल बयना - 47 : छौरा-छौरी का राज हुआ...

देसिल बयना - 47

छौरा-छौरी का राज हुआ...

कवि कोकिल विद्यापति के लेखिनी की बानगी, "देसिल बयना सब जन मिट्ठा !"
दोस्तों हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतीम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रहे इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं ---

करण समस्तीपुरी

आज भोरे-भोर रेडी के कान घुमाए तो एकदम देसी सुर पकर लिया। ओह रे ओह.... झमकदार गीत बज रहा था, "मारा झुलनिया के धक्का, बलम कलकत्ता पहुँच गए.... !" बलम जाए भार में मगर हम तो डायरेक्ट अपने गाँव पहुँच गए। हमरे गाँव में लुखिया ताई टेप-रेकट पर ई गाना बराबर सुनती थी। मिठाई लाल कक्का शहर बनारस में रहते थे। वहीं से ई टुरनिंग - वन (टू-इन-वन) वाला टेप-रेकट लाये थे। एक तरफ से गिरामोफोन और दूसरे तरफ से टानजिस्टर बजता था।

लुखिया ताई थी बड़ी शौक़ीन। और हो भी काहे नहीं। भगवान कौनो चीज के कमी नहीं रखे थे। पुश्तानी घर-जायदाद के अलाबे कक्का भी बनारस कचहरी में करकरिया छापते थे। एगो बेटा बकरचन (वक्रचन्द्र) और बेटी बतसिया। कुल जमा तीन परानी। हलवाह-डेलवाह भी दहिये-घी पर पोसाता था।

ताई रत्ती भर भी गंवई औरत जैसी नहीं लगती थी। गोर दक-दक, सुतबा नाक, बिल्लौरी आँख औ15012010_i_topnagpurtherealkillersuparihinindia_archive_pमटर के छीमी जैसे छहरगर देह कि नामे पड़ गया लुखिया ताई। इतर-गुलाब से तो गलियारा ग़मगमाता था। जब देखिये बकोटा भर मोटा चोटी बाँध के कुर्सी पर बैठे सुपारी कतरते हुए मिल जाती थी।  मुँह में मगही पान के गिलौरी खिल्ली और मजफ्फरपुर वाला गमकौआ जर्दा। दुपहर में कलेऊ के बाद अक्सर बाबूजी कहते थे, "जाओ तानी लुखिया भौजी से गमकौआ जर्दा मांग लाओ। ताई बदले में पाने लगा के दे देती थी।

ताई पर मातबरी (अमीरी) का कौनो नशा नहीं था। गाँव-जवार का कौनो आदमी से दुराव, मन-मुटाव नहीं। सबसे दू बात परेम से बतियाती थी और बेर-बखत में किसी के मदद से पाछे नहीं हटती थी। मुखिया जी के दरबार छोड़े पर घपोचन बूढा तो ताईये का दरबाजा अगोरे रहता था। दुन्नु बखत नरम दना मिल जाता था। बुढौ को और का चाहिए, एगो कोना में अपना सिरकी (तम्बू) तान देता था। कौनो आदमी हो, जात कि परजात, काकी के हिरदय में हर इंसान के लिए परेम भरा हुआ था। भांट-भिखारी को भी बिना जिमाये नहीं लौटाती थी।

बतसिया दीदी के ब्याह के बाद ताई एकदम निचिंत हो गयी थी। बकरचन भाई लहेरियासराई से होमोपोथी का डाक्टरी पढ़ के आये थे। रेवा-खंड को तो छोड़िये अगल-बगल के गाँव में भी उनका पुड़िया उड़ने लगा। उनका भी घोड़ी चढ़ाए का बात चल रहा था। मगर उ कहिन कि उ कॉलेजे में लड़की देख आये हैं। एकदम गोरी मेम जैसी है, फर-फर इंगरेज़ी बोलने वाली। काकी भी डाक्टरनी पतोहू को परीछ के ले आई।

paan supari[3] कुछे दिन में सब राज-पाट से ताई का रिटायमेंट हो गया। अब सारा इन्तिजाम बात डाक्टरनी भौजी खुदे करती थी। ताई का तीने काम रह गया था, पान चबाना, सुपारी कतरना और टुरनिंग वन पर गाना सुनना। और कुछ से मतलब नहीं। मगर उ दिन ताई बहुत बिफरी थी, जब डाक्टरनी भौजी ने खजुरिया को कह कर घपोचन बूढा का बोरिया-बिस्तर बाँध दिया था। पतोहू को तो कुछ नहीं बोली मगर बकरचन भाई को कही, "देख लो बकरचन ! ई सब बढ़िया नहीं हो रहा है। अरे का लेता था बूढा आदमी.... एक पेट खाता था।"

बकरचन भाई को कुछ जवाब नहीं बना तो भौजी के तरफ देखे। त्रिभंगी भृकुटी-विलास देखिये के सारा जवाब सूझ गया, "अरे माई जाने दो ! काम के ना काज के ! सेर भर अनाज के ! दरबाजा के भार। सेर भर ढ़कोस के रात भर खो-खो कर दूरा घिनता था। न खुद सोये न सोने दे।"

ताई बोली, "अरे कम से कम घर-द्वार भी तो अगोरता था... !" उका बात ख़तम होए से पहिलही डाक्टरनी भौजी टपक पड़ीं, "हमें ऐसे अधमरे डर्टफुल वाचमेन की कौनो जरूरत नहीं है। पहरेदारी के लिए हम डावरमेन ले लेंगे।" आरे वाह हम तो खाली डाबर का चमनपरास सुने थे भौजी तो पकिया डाक्टर है। डाबरे का चौकीदार भी रखेगी।

2ymyvti_th अगला महीना नैहर से एगो नेंगरकट्टा (बिना पूंछ वाला) कुत्ता ले के आई। कहे लगी ई डावरमेन का नस्ल है। हम मने मन कहे, "धत तोरी के.... खोदा पहाड़ और निकली चुहिया। हम सोचे कि डाबर कंपनी का पहरेदार होगा ई मैडम ले के आयी नेंगरकट्टा कुक्कुर।"

उ दिन बाबूजी को भोरे पहर कहीं निकलना था। जलखई कर के हमें बोले, "जरा लुखिया भौजी से एगो पान मांग लाओ।" अरे बाप रे... ! उ दिन तो ताई के अंगना का महौले गरम था। अपने उमिर में हम पहिले बार देखे थे ताई को गुस्साए। बकरचन भई गप-गप सुन रहे थे और डाक्टरनी भौजी तो जैसे सुनियो नहीं रही थी। ताई फुल टेम्पर में थी। दूध देने आया बकतु जादव और भकोलिया माय हाँ-हाँ... हूँ-हूँ कर रहे थे।

हमें पान मांगने का साहस नहीं हुआ। ताई देखी कि नहीं देखी, हम पछिले पैर लौट के बाबू जी को बताये। बाबूजी को भी अचरज लगा। कहे, "का बकते हो... ? लुखिया भौजी भी गोसा रही है... चलो देखे तो जरा... !" दूरे पर से बाबूजी बोले, "का बात है भौजी ? अरे इन्नी गरमाए काहे रही हो... ?"

images (2) लुखिया ताई भीतरे से बोली, "का रहेगा ! जरा अन्दर आ के देखिये... !" "आही रे बा... !" एक्कहि बार बाबुओजी के मुँह से निकला और हमरो मुँह से। पछियारिया दिवार में डेग भर का सेंध फोरा हुआ था और कब्ज़ा उखरा पुश्तैनी संदूक कोना में दांत चियारे पड़ा था। बाबूजी का हाथ सीधे माथा पर चला गया। ताई एक हाथे अंचरा खीच के आंसू पोछती थी और दोसरे हाथ को चमका-चमका के न जाने कौन-कौन देवता-पित्तर को पुकार रही थी ?

दू मिनट बौक-बताह जैसे देखने के बाद बाबूजी बोले, "ई घपोचन दास कहाँ था जो ई सब हुआ.... ?" अब तो ताई का ज्वाला और लहक गया, "का बताएं बाबू साहेब ! ई लोग घपोचन दास को रहने दिया... ! बेचारा जब तक रहा, एगो खर-पतवार इधर से उधर नहीं हुआ। आज देखिये, सात पीढ़ी का मेहनत कहाँ गया.... ?" गोस्सा में भी ताई के सुर में जो उतार-चढ़ाव हो रहा था कि लगे कजरी-झूमर जैसा लोक-गीत चल रहा हो।

दाहिना हाथ से आंसू पोछते हुए बायाँ हाथ चमका के फिर बोली, "हम कहते रहे.... रहने दो बेचारा बूढा को ! मगर ई जवान जोड़ी को उ के खों-खों में रात भर नींद नहीं आती थी। ई का डाबरमेन पहरेदारी करेगा..... !" फिर दाहिना हाथ से माथा पीट कर बकरचन भाई के आगे लहराते हुए बोली, "ई छौरा-छौरी के राज हुआ ! कुत्ता कोतावाल हुआ !! कुकुरनारायण पहरेदारी करते हैं। एगो गोश का टुकड़ा फेक दिया और संदुकची साफ़।"

10thief-1_1236699932_m "खी...खी...खी...खी..... ! हम किसी तरह मुँह दाबे भागे अपने अंगना। ताई के जैसे ही हाथ चमका-चमका कर अपनी महतारी को सुना रहे थे, "छौरा-छौरी के राज हुआ ! कुत्ता कोतावाल हुआ !!" हा... हा... हा... हा... ! ताई गोस्सो में अलबत्त फकरा गढ़ देती है। हम वैसेही हाथ चमका के फिर दोहराए। 'हें...हें...हें...हें.... !' माँ भी हंसने लगी थी। तभिये बाबूजी आ गए। उका मन भारियाया हुआ था। हमरा मसखरी उन्हें पसनद नहीं आया, "का दुन्नु माई-बेटा खें..खें....खें...खें.... कर रहा है। अरे उधर लुखिया भौजी के घर में चोरी होय गया और इनको मजाक सूझता है.... ।"

हम बोले, "चोरी पर नहीं न... ! उ के कहावत पर हंसी आयी।" बाबू जी तरंगते हुए बोले, "तो का बेजाय बोली ऊ ? सच्चे तो कही। 'छौरा-छौरी के राज हुआ ! कुत्ता कोतावाल हुआ !!' आज कल के आदमी को आदमी का परख नहीं है। कोई कदर नहीं है। मानुस को लतियाता है और कुक्कुर को गोद में लेके घुमाता है ? आदमी का जो काम एक आदमी आ सकता है उ कुक्कुर आएगा का ? आज की पीढ़ी में इन्सान और इंसानियत के प्रति जो अविश्वास है उ पर लुखिया भौजी का कहावत सोलहो आना सही है, 'छौरा-छौरी के राज हुआ ! कुत्ता कोतावाल हुआ !!'

21jwsuw_th.jpgहम खाली हूँ कह के महतारी के तरफ देखे। रोकते-रोकते उ भी फिर से हिहिया दी। हम तो बाबूजी के डर के बावजूदो बतीसी निपोर दिए। मगर ई बार बाबूजी डांटे नहीं, हौले से मुस्किया के उधर मुँह घुमा लिए।

37 टिप्‍पणियां:

  1. जब स्वानों को मिलेगा दूध बस्त्र अऊर घपोचन चचा जईसा आदमी को भगा दिया जाएगा… त एही होगा... सैंया भए कोतवाल त सुने थे बाकी जब डी ओ जी साहब सैंया बन जाएँ त डी आई जी गिरी भुला जाते हैं... ई चोरी बकर्चन बाबू के परम्परा का चोरी था...जो उनकी माई बचा के रखी थी.. सच पूछिए त चोरी त ओही दि हो गया था जब घपोचन बूढा को भाइस था ऊ लोग.. बहुत मजेदार देसिल बयना अऊर सिच्छा त हइये है!!

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  2. बहुत रोचक कथा में ढाला है लोकोक्ति को। भाव सम्प्रेषण भी उत्तम है। बहुत सुन्दर।
    आभार।

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  3. अत्यंत सुन्दर भाव के साथ साथ बहुत रोचक और मज़ेदार लगा ! उम्दा पोस्ट !

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  4. बहुत बढ़िया रहा यह देसिल बयना ...रोचक और कहावत पहली बार पढ़ी ...:):)

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  5. @ चला बिहारी,
    हाँ चचा,
    आप सही कहें हैं. ई चोरी उ के परंपरा के था..... ! आपके आने से उत्साह तो अकास पर चढ़ जाता है, मगर मोसकिल ई है कि हम आपको धन्वादों नहीं दे सकते हैं !

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  6. @ हरीश प्रकाश गुप्त,
    धन्यवाद हरीश जी !

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  7. @ संगीता स्वरुप,
    का अम्मा,
    आप भी पहिले बार ई कहावत पढी ? लेकिन मजा आया कि नहीं.... ??

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  8. Hum to isko, kahawat ka vistar hi kahenge. Jo purn - paripurn hai. itna rochak, likhe hai aap ab hum ka kahe,hamko to hamke yug se parichit kara die.

    @ Karan Bhai,

    Desil Bayana, yadi tin din par post ho to humlogon ki khushi ka ganga me kabhi pani kam nahi hoga.

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  9. @ ज्योति प्रकाश लाल नारायण जी,
    ज्योति जी,
    अहाँ पहिल बेर एहि ब्लॉग पर अयेलौंह, अपनेक अभिनन्दन ! प्रोत्साहनक लेल धन्यवाद ! आस अछि जे आब अपनेक वर्चुअल दर्शन होएत रहत.

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  10. @ मनीष,
    मनीष जी,
    हम अपनेक टिपण्णी केर प्रतीक्षा करैत रहैत छी. बड़ अपनापन लागैत अछि अपनेक विचार सँ. एखन किछु व्यस्तता सेहो अछि आ ब्लॉग केर साप्ताहिक कार्यक्रम सेहो निश्चित छैक. तैं तीन दिन पर देसिल बयना के प्रकाशन त' नहि भ' सकैत अछि मुदा विश्वास अछि जे अपने हर सप्ताह देसिल बयना पढि हमर उत्साह जरूर बढायेब.
    धन्यवाद !!

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  11. करन जी आप पुराने फॉर्मेट में आपको देख अच्छा लगा. " "ई छौरा-छौरी के राज हुआ ! कुत्ता कोतावाल हुआ !!"... बहुत प्रसिद्द लोकोक्ति है जो पूरब, खास तौर पर मिथिलांचल और गंगा पार के इलाके में बदलाव को रेसिस्ट करता है... पूरा लेख का ताना बाना सुंदर और प्रभावशाली बना है... देसज शब्दों को खूब सुंदर उपयोग किया है... आंचलिकता बनाये रखें... ओरिगिनालिटी बरकरार रहेगी... हम तो नए "रेणु" को बनते हुए देख रहे हैं.. हफ्ता दर हफ्ता !

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  12. Desil Bayna t apne aap m adbhut chhai, e ker lekhak khud ahi mahabharat'k krishn aa arjun dunu thika.

    @ Karan Bhai, ekta sher chhaik-

    JO SAFAR KI SHURUWAT KARTE HAI,
    WO HAR MANJIL KO PAR KARTE HAI!
    BAS EK BAR CHALNE KA HAUSLA RAKHIYE,
    HUM JAISE MUSHAFIRON KA TO RASTE BHI INTZAR KARTE HAI!!

    @ ahan lel i aichh:-
    AAP SAFAR KI SHURUWAT KAR CHUKEHAI,
    AAP HAR MANJIL KO PAR KARENGE!
    BAS APNA KAM KARTE JAIYE,
    AAP JAISE LEKHAK KA TO SAHITY BHI INTZAR KARTA HAI!!

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  13. Desil Bayna t apne aap m adbhut chhai, e ker lekhak khud ahi mahabharat'k krishn aa arjun dunu thika.

    @ Karan Bhai, ekta sher chhaik-

    JO SAFAR KI SHURUWAT KARTE HAI,
    WO HAR MANJIL KO PAR KARTE HAI!
    BAS EK BAR CHALNE KA HAUSLA RAKHIYE,
    HUM JAISE MUSHAFIRON KA TO RASTE BHI INTZAR KARTE HAI!!

    @ ahan lel i aichh:-
    AAP SAFAR KI SHURUWAT KAR CHUKEHAI,
    AAP HAR MANJIL KO PAR KARENGE!
    BAS APNA KAM KARTE JAIYE,
    AAP JAISE LEKHAK KA TO SAHITY BHI INTZAR KARTA HAI!!

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  14. @ अरुण सी रॉय,
    अरुण जी,
    अब आप ऐसा न प्रतिमान सेट कर दें कि हमें नजरसार होने में भी शर्म आने लगे. लेकिन अब तो हर देसिल बयना पर आपकी प्रतीक्षा रहने लगी है. हौसलाफजाई के लिए, शुक्रिया !

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  15. @ मनीष,
    मनीष जी हम अपनेक उदगार नतमस्तक भ' स्वीकार करैत छी ! धन्यवाद !!

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  16. हमरा त बुझाता है कि ई नव-उपनिवेशवाद वाला बात है... अभी त कुक्कुर आया है... आब त मशीन लगा के दुनु प्राणी निश्चिंत हो जायेगा...
    अऊर जब मशीने ख़राब होता है त क्या सब होता है ,, सब बुझबे करते है...
    इस प्रकार के शिक्षाप्रद लेखनी के लिए करण जी को साधुवाद ..

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  17. @ सुभाष चन्द्र,
    धन्यवाद सुभाष जी! हाँ, कथा मौलिक सन्देश यही देना चाह रहा था मैं.... पता नहीं कहाँ तक सफल रहा.

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  18. Ram Ram Karan Ji...
    Wah ka bhigo kar mare hai..."छौरा-छौरी के राज हुआ ! कुत्ता कोतावाल हुआ
    Ajakl to bahute ghar me aisne hota hai....
    ek bar fir se desil bayna dwara hamara manoranjan karne ke liye apko hirday se dhanyawad hai...

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  19. का लिखे हैं करन बाबू...कमाल कर दिए हैं. आज टिपिया रहे त इसका मतलब ई नहीं है कि पहिले नहीं पढ़े हैं.

    हम बहुत बड़ा फैन हैं जी आपके.

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  20. @ रचना,
    का मनोरंजन करेंगे मैडम.... हम कौनो जोकर-उकार थोड़े हैं ? बस ऐसे ही जो देखते हैं सो लिखते हैं !! आपको मजा आया तो हमें भी ख़ुशी हुई. धन्यवाद !

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  21. @ शिव,
    सर जी,
    फैन का एसी कहिये. मगर आपको बिलोग पर देख कर हिरदय गदगद हो जाता है ! फेर आइयेगा !!!

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  22. देसिल बयना का यह अंक बहुत ही शानदार रहा। कहानी भी काफ़ी रोचक लगी और बयना का अर्थ पूरी तरह से समझ में आ गया।

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  23. डाबर मैन प्रसंग ने हंसा हंसा कर आँखों के कोर बहा दिए....लेकिन जो बात आपने कही ...मन बोझिल हो गया...

    लाजवाब...सिम्पली सिम्पली ग्रेट !!!

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  24. @ रंजना,
    का कीजियेगा रंजना जी, उ सनीमा देखे हैं न.... कभी ख़ुशी कभी गम.... यही है जिनगी की सचाई !! बांकी आपके टिपण्णी से हिरदय परसन हो गया. धनवाद !!

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  25. करन बाबू… हमको धनबाद देने के चक्कर में काहे परेसान रहते हैं..धनबाद त पहिलहीं बाँटकर झारखण्ड में चला गया. हा हा ह!! एगो आदमी को अमरता का दवाईदेकर साधु बाबा बोले इसको खा लो बाकी इयाद रहे कि खाते टाइम बंदरका बिचार नहींआना चाहिए दिमाग में. अब ऊ अदमी जब दवाई खाने चले त बंदर देखाई देने लगे.. ससुरा पगला गया मगर अमर नहीं हो सका.. ओइसहिं आप धन्यवाद का बिचार लाकर हमरा आज्ञा, आदेस, अनुरोध का उल्लंघन कर देते हैं... लगता है एकरो लागी मनाही ठोंके पडेगा..

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  26. @ चला बिहारी...
    आज से ई विचारे त्याग दिए... !

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  27. घपोचन चचा भी सबको कहां मिल पाते हैं। आजे पढ़ रहे थे कि रवीना टंडन के यहां का रखवाला सब ही संदूक साफ कर के चल दिया।

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  28. एकांत में खांस रहा बूढ़ा अपनी तकलीफ के बावजूद चोरों के लिए परेशानी का सबब बना रहता है। बुजुर्गों का साया घर के लिए हमेशा संरक्षणकारी है।

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  29. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  30. देसी भाषा मे बहुते मारक शक्ति होता है. कोई माई का लाल "नँगरकट्टा" का एक शब्दीय अँग्रेजी बता कर दिखाए, यदि मिलियो गया तो उससे उसी प्रकार का विकार पैदा करके दिखाए. दस मे से नौ अँक मिलता है आपको. एक अँक कहानी लम्बा करने के लिए काट लेता हूँ (काफी सोचने विचारने के बाद)

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