शनिवार, 25 सितंबर 2010

फ़ुरसत में …. बड़ा छछलोल बाड़ऽ नऽ

फ़ुरसत में ….


बड़ा छछलोल बाड़ऽ नऽ

  

आचार्य परशुराम राय

दरवाजे पर मेरा और उक्त वाक्य का मेरी श्रवणेन्द्रिय में एक साथ ही प्रवेश हुआ करीब चार-पाँच साल पहले जब मैं वाराणसी से अपने गाँव गया था। सन्-संवत तो सटीक याद नहीं। खैर, जन्मकुण्डली तो बनानी नहीं हैं। अतएव चार साल पहले की बात हो या पाँच साल पहले की, कोई अर्थ नहीं रखती।

वाक्य माँ के ही थे। वह भी शायद छोटे भाई के प्रति। यह स्मरणीय वाक्य उपेक्षा में ही कहा गया जान पड़ता था। जो भी हो, मुझे आकर्षित किया 'छदलोल' शब्द ने। दो साल के बाद घर पहुँचा था। अतएव जल्दी-जल्दी में जो कुछ बन पड़ा, माँ ने जलपान कराया और साथ ही मेरे स्वास्थ्य का मीन-मेख (मेष) निकालती रही। थोड़ी देर में समाचार पर्व समाप्त हुआ, पर 'छछलोल' शब्द मेरे कण्ठ से लगा रहा।

भोजपुरी से आठ-दस वर्षों से सम्पर्क टूट जाने से मैं इस शब्द के गर्भ में निहित अर्थ को खोजने में तत्काल तो असमर्थ रहा। पर इसने भी स्मृति-पट पर अंगद की तरह पाँव जमा दिया। पर ग्राम्य पहेली की भाँति ‘चार चिरइया चार रंग पिजड़े में एक रंग’ - पहेली बन गया। हारकर मैंने भी इसे भाषा-विज्ञान की लेबोरेटरी में खड़ा किया। पर इसके मूल का संकेत न प्राप्त कर सका। इसमें बाधक पड़ती थी मेरे अज्ञान की रस्सी। जिसे भाषा विज्ञान का 'अक: स्वर्णेदीर्घ:' भी ज्ञात न हो, वह लैबोरेटरी का उपयोग ही क्या जाने। अचानक तुलसी की पंक्ति - घुँघरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर सुन्दर लोल कपोलन की - ने लोल शब्द को भटक कर अलग कर दिया। 'छछलोल' शब्द के उत्तरार्ध ने अपने को सम्मुख उपस्थित किया। वह तो अपने 'चंचलता' के साँचे में समा गया पर पूर्वार्द्ध 'छछ' की हड़ताल जारी रही। मित्र के साथ छोड़ देने से भी उसके रहस्य का उद्घाटन न हो सका। उद्धाटित हुआ एक संस्मरण से - किसी पत्रिका में पढ़ा था क किसी वैयाकरण ने बंगला के प्रसिद्ध मसीहा साहित्यकार शरत बाबू को लिखे अपने पत्र के ऊपर उनका नाम - श्रीमच्छरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय लिखा था। जिससे डाकिये को काफी डाकना पड़ा था। अर्थात् श-छ भी बन जाता है। निरक्षर ग्रामीण के स्वर-तन्त्री का गर्भ व्याकरण के विधाता का विधान नहीं मानता। वहाँ प्राय: शब्दों का पुनर्जन्म हो जाता है। व्यञ्जन जुड़वे हो जाते हैं। कहीं स्वर की 'वृद्धि' हो जाती है तो कहीं 'गुण' संज्ञा और कहीं इत् संज्ञा भी। हम साक्षरों को उन्हें अपने दिव्य चक्षु से पहचानना पड़ता है। कहीं-कहीं कठिनाई भी उत्पन्न हो जाती है। लेकिन ग्रामीण इन सबसे अपरिचित बने इनका प्रयोग सदियों/सहस्त्राब्दियों से कर रहे हैं।

इससे 'छछ' 'शष' में परिवर्तित तो हुआ, किन्तु सूक्ष्म शरीरी की भाँति आत्मा से माया का पूरा पर्दा उठा नहीं। चिन्तन-चर्वण चलता रहा। तब तक पश्चिम में सूर्य विसर्जन का शंख फूंक चुके थे। नीली चादर ओढ़े चन्द्रदेव का गगनांगन में स्वागत हुआ। सूर्य ग्रह के योग में चन्द्र ग्रह के आ जाने से मेरे नवोदित 'शश' की दशा सुधर गयी। चाहे वह ज्योतिर्विदों के विचार से इन ग्रहों का योग भले ही शुभ न हो। वह शशक बनने के बजाय शशिमुख हो गया।

बेचारा गाँव की माटी से सना नंगा विशेषण 'छछलोल' पूनम की स्निग्ध चाँदनी में स्नान करके पावन हुआ और 'शशिलोल' का रेशमी परिधान धारण किया।

गाँव में मैं अधिक दिन ठहरता नहीं। दो दिन रुका। वह भी अपने परम मित्र सुरेन्द्र जी के साथ ही गपशप में बीता। तीसरे दिन प्रात: सात बजे ही बक्सर-वाराणसी शटल पकड़ने के लिए घर से निकल पड़ा। मेरे गाँव का काम गंगा नदी के किनारे ही गड़ा है। मेरे घर से नदी की दूरी करीबन एक फर्लांग होगी। रास्ते में एक महिला एक बच्चे का कान उमेठे डाँट रहीं थी। बात क्या थी, समझने का प्रयास नहीं किया या यों कहिए कि मेरे शहरी बेदर्द कानों ने बच्चे की दर्द जानने में निष्क्रियता बरती। आप चाहें तो उन्हें ‘प्रसाद’ जी के शब्दों में उलाहना दे सकते हैं:-

मुख कमल समीप सजे थे

दो किसलय दल पुरइन के

जल बिन्दु सदृश कब ठहरे

इन कानों में दु:ख तिनके।

किन्तु वे 'तुम सुमन नोचते रहते, करते जानी अनजानी।' की भाँति भी न रह सके। वह महिला एक शबद पर काफी जोर दे-दे कर डाँट रही थी। शब्द था ' 'बकलोलऊ'। इसका विकास 'बकलोल' शब्द से हुआ है। कर्णेन्द्रिय ने इस शब्द को मानस-सागर में बेहिचक झोंक दिया। बेचारा छपाक से गिरा और मानस-सागर में विक्षोभ उत्पन्न हो गया। पर बुद्धि ने उसे अव-चेतन की तली में डूबने न दिया। चेतन के उथले जल से ही चील-झपट्टा मार कर बचा लिया। आश्रय देने के लिए नाम, पता पूछा। किन्तु ठोस उत्तर न पाकर जाँच पड़ताल करने के लिए उसे भी भाषा विज्ञान की प्रयोगशाला में पकड़ ले गयी। भाषा वैज्ञानिक रसायन डालते ही 'बकलोल' तिलमिलाता हुआ 'बक' और 'लोल' बन गया। 'बक' के पूर्वजन्म का निवास खोजने में कठिनाई होने लगी क्योंकि 'बक' कभी 'वक' = बगुला की ओर उंगली उठाता तो कभी उसका क किर्र से वक्र की ओर संकेत करता। अस्तु 'वक' और 'वक्र' का सूक्ष्म निरीक्षण प्रारम्भ हुआ। पहले बुद्धि ने लोल शब्द का शोध कर लेना उचित समझा। इतने में देखा कि मल्लाह डोंगी खोल चुका है। चेतना ने विलासिनी बुद्धि को झटका दिया। बुद्धि ने 'बकलोल' को 'बक' और 'लोल' बनाकर तथा 'बक' के मस्तिष्क परिवर्तन के लिए 'वक' और 'वक्र' के इन्जेक्शन की शीशी भाषा विज्ञान के ऑपरेशन थियेटर में स्मृतिपट की ऑपरेशन टेबुल पर छोड़ चेतना के साथ हो लीं। नाव का छूटने का मतलब था शटल का छूटना और शटल के छूटने का अर्थ था कुवारी धूप का कोप भाजन होना। एक आपतित समस्या की किरण परावर्तन का नियम भूलकर अनेक समस्याओं की दिशा में परावर्तित होती दिखाई देने लगी। मैंने दौड़ते हुए आवाज लगायी। किन्तु नाव में बैठे कर्णधारों ने मेरी ध्वनि का ऐसा विरोध किया जैसे ध्वनि सम्प्रदाय के विरोधियों ने 'ध्वनि' का। पर आचार्य मम्मट जैसे सहृदयों ने स्वागत किया और उस नाव में बैठने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पुन: बुद्धि ने अपना कार्यभार संभालना चाहा पर लोगों के वार्तालाप से 'कमस्चटका' प्रायद्वीप के चट-चट की ध्यान चटक जाया करता था। धीरे-धीरे ध्यान ने बुद्धि को सहयोग देना प्रारम्भ किया।

और फिर 'लोल' से 'वक' और 'वक्र' की संगति बैठाने में 'लोल' शब्द की शोध शुरू हुई। 'लोल' का सामान्यतया में हिन्दी 'चंचल' अर्थ लिया जाता है। किन्तु भोजपुरी में लोला बैठना गाल बैठना, लोला घूरना = मुँह पर मारना आदि प्रयोग प्रचलित हैं। यहाँ लोला का अर्थ गाल और मुँह से है। अब 'बकलोल' का अर्थ चाहे 'वगुले जैसा चंचल' लें या बगुले जैसा मुखवाला लें अथवा टेढ़े गाल वाला लें या टेढ़े मुख वाला। भोजपुरी भाइयों को इससे कोई शिकवा-शिकायत नहीं। उनकी भाषा और और उनके शब्दों पर किसी व्याकरण का आधिपत्य नहीं। वे मुक्त पवन में तिरते हैं बिना किसी शब्दकोष में विश्राम लिए। वे उन्हीं के मानस तट पर विश्राम करते हैं और उनकी जिह्वा की किक् से उछलते हैं। उन्हें आपकी 'शशिमुख' अथवा वकचंचल या वक्रमुख से कुछ लेना देना नहीं। उनके लिए 'छछलोल' और 'बकलोल' ही सुन्दर है। उन्हें कबीर की खिचड़ी ही प्रिय है।

26 टिप्‍पणियां:

  1. घर बाहर हिंदी का ही ज्यादा प्रयोग होने के कारण कई शब्द (मारवाड़ी या भोजपुरी ) जाने पहचाने होने के बावजूद नए लगते हैं ...
    शब्द चिंतन बढ़िया रहा ...ऐसे कई और शब्दों का विश्लेषण होगा आपकी कलम से ..!

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  2. सुन्दर, रोचक और शब्द निर्माण के मूल को प्रकाशित करती पोस्ट। भाषिक स्तर सराहनीय है। साधुवाद।

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  3. सुन्दर, रोचक और शब्द निर्माण के मूल को प्रकाशित करती पोस्ट। भाषिक स्तर सराहनीय है। साधुवाद।

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  4. इस मंथन से जो मोती निकले हैं उन्हें चुनने का प्रयास कर रहे हैं। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    साहित्यकार-बाबा नागार्जुन, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  5. मनोज भाई, आज आपका नया रूप देखा, इसी बहाने भाषा के बारे में काफी कुछ जानने को मिला, शुक्रिया तो कहना ही पडेगा।
    --------
    प्यार का तावीज..
    सर्प दंश से कैसे बचा जा सकता है?

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  6. काफ़ी अच्छी जानकारी मिली………………आभार्।

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  7. ओह...क्या विवेचना है....
    सच्ची कहूँ...लगा जैसे गंगा जी की तेज धार में धार संग डोंगी पर बैठे तेज बहती जा रही हूँ और आँखों के आगे जो भी मनोहारी दृश्य आ रहे हैं,मुग्ध भाव से उनमे डूबी हुई हूँ...

    मुक्त रूप में 'लोल' हमारे तरफ होंठ या मुंह को कहते हैं,इसलिए इसका तो पता था,पर बकलोल शब्द का इतना अधिक प्रयोग करने के बाद भी कभी ध्यान न दिया था कि इसमें से से 'बक' , "वक्र" का अपभ्रंश होगा....

    और छछ्लोल से शशिमुख तक तो सचमुच ही ध्यान नहीं कभी नहीं जाता...

    अतिशय आनंददायी इस सुन्दर पोस्ट के लिए आपका बहुत बहुत आभार...

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  8. एकदम छ्छ्लोल आलेख , इतनी सम्पूर्ण की बकलोल भी समझ जायेंगे .

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  9. बड़े जुदा अंदाज में प्रस्तुत पोस्ट...अच्छी लगी.
    ______________
    'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

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  10. बहुत बढ़िया प्रस्तुति .... बहुत कुछ जानने का मौका मिला .... आभार मिश्रजी

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  11. चलिए आज मुझे भी इन शब्दों का सही अर्थ मिल गया नहीं तो बचपन में सिर्फ सुना था कभी इतनी गंम्भीरता से इसके अर्थो के बारे में नहीं सोचा था |

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  12. शब्दों का अच्छा विश्लेषण ...बकलोल शब्द को बकलोल की तरह ही प्रयोग करते रहे :):)

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  13. बहुत अच्छी प्रस्तुति.धन्यवाद

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  14. बहुत ही कमाल की पोस्ट है मनोज भाई ..और शब्दों से तो गहरा ही परिचय करवाया है आपने

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  15. ये तो वाकई गजब की और अनूठी जानकारी दी आपने, बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  16. बहुत ही वैयाकरणिक पोस्ट लगाई है आज तो!
    --
    इससे सचमुच ज्ञान में वृद्धि होगी!

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  17. शब्द निर्माण कितना कठिन कार्य है,यह इस पोस्ट से समझा जा सकता है। क्यों कई देसज शब्दों का समतुल्य ढूंढ पाना संभव नहीं हुआ है,यह भी।

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  18. देसज शब्द मूल अर्थ की अभिव्यक्ति में इतने सक्षम रहे हैं कि प्रायः अनुवाद में उनके टक्कर का शब्द ढूंढना असंभव सा रहा है।

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  19. बंगाल में रहते हुए भोजपुरी के भी नजदीक रहने का मौका मिला था। तब बकलोल शब्द बेवकूफ या बौड़म के संदर्भ में सुनने में आता था। पोस्ट के शिर्षक को देख जो बात सबसे पहले दिमाग में आयी वह बकलोल को ले कर ही थी।

    बहुत सुंदर विश्लेषण।

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