सोमवार, 27 सितंबर 2010

खामोश यूँ लेटे हुए….

खामोश यूँ लेटे  हुए….

मनोज कुमार

तेरे अक्‍स 

ख़्वाबों में समेटे हुए

खामोश यूँ लेटे  हुए 

यादों में सोचता हूँ

उस गुलशन में

तेरे साथ

गुज़रे पल

और

झर रहे फूलों के बीच

दबे पांव तेरा आना।

कभी

देखा  था ख़ाब

कि तमाम उम्र

इसी बगिया में हम

साथ चलते रहेंगे.....

पर हाथ छुड़ा कर

जो गुम हुए तुम

तबसे

थम से गए हैं कदम।

बिस्तर पर

तन्‍हां से हम

लेटे ज़रूर

पर

तुम्हारी यादों की सरसराहट

बन्द पलकों को खोल देती है

या मानों तेरी यादें

आंखों में अंटक-सी गईं हैं!!

58 टिप्‍पणियां:

  1. ये अदा बड़ी अच्छी है ...चलो आशिक सा हो जाता हूं

    दिल को छू गई आपकी ये रचना...बेहतरीन

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  2. इस उमर में ये एह्सास..लगता है दर्द ने करवट ली है!!

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  3. आँखों में अटकी यादों की सुन्दर कविता ...!

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  4. सुन्दर भाव निकल रहे हैं आपकी लेखनी से।

    आभार।

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  5. लेटे लेटे कभी कभी कितने आसमां नाप डालते हैं हम।

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  6. बहुत कोमल से भावों को संजोये है यह नज़्म ...
    सच यही लग रहा है कि किसी दर्द ने करवट ली है ...कुछ यादों में अटकी अटकी ..और यादों को भटकाती सी नज़्म

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  7. कई बार सोचती हूँ कि आँखें चेहरे या होठों की तरह सूखी क्यों नही होती? लगता है पलकें बिना बरसे चली गयी घटाओं की कुछ नमी खुद मे समेटे रहती हैं। ये मेरी अगली पोस्ट का विषय है।बहुत अच्छी लगी रचना शुभकामनायें।

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  8. बहुत खूबसूरती के साथ शब्दों को पिरोया है इन पंक्तिया में आपने .......

    पढ़िए और मुस्कुराइए :-
    आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

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  9. प्रसाद की पंक्तियाँ याद आ गईं -
    जो घनीभूत पीड़ा थी .मस्तक में स्मृति सी छाई ...

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  10. या मानों तेरी यादें आंखों में अंटक-सी गईं हैं!!

    वाह्………………जज़्बातों को बखूबी पिरोया है।

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  11. वाह...वाह!
    आपने तो बहुत ही हसीन ख्वाब देखा है!
    --
    और इस ख्वाब से भी ज्यादा
    हसीन रचना को जन्म दे दिया!
    --
    इस कलाम को सलाम!

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  12. तुम्हारी यादों की सरसराहट

    बन्द पलकों को खोल देती है

    या मानों तेरी यादें

    आंखों में अंटक-सी गईं हैं!!

    ये पंक्तियाँ जैसे सब अनकहा बयान करती हैं ...बहुत सुन्दर

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  13. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 28 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. कोमल भावों की मोहक अभिव्यक्ति....
    बहुत सुन्दर रचना...

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  15. तुम्हारी यादों की सरसराहट

    बन्द पलकों को खोल देती है

    या मानों तेरी यादें

    आंखों में अंटक-सी गईं हैं!!

    बहुत सुंदर

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  16. वाह , क्या अभिव्यक्ति है , खूबसूरत रचना और भाव .

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  17. वाजी वाह, आज तो आपने क़त्ल कर दिया मनोज जी !

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  18. @ संजय जी,
    ज़रूर हो जाइए आशिक़-सा! ज़िन्दगी को फिर से जीने के लिए बहुत ज़रूरी है।

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  19. @ अपनत्व जी,
    कभी-कभी मेरे दिल में भी ख़्याल आता है, तो बस यह सब निकल आता है।

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  20. @ अजय कुमार जी,वाणी जी, हरीश जी,
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूं।

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  21. @ सलिल जी,
    आपतो बड़े भाई हैं, आपसे क्या कहें? एक शे’र अर्ज़ कर देते हैं,
    बिछुड़े हुओं की याद कहीं आस-पास है
    बारिश की पहली शाम का मंज़र उदास है
    ---"सायों के साये में" -- शीन काफ़ निज़ाम, इन्हीं का ज़िक्र किया था आज जब आपके दफ़्तर में मिले थे।

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  22. @ प्रवीण जी,
    एक शे’र में कहूं तो ये लेटे-लेटे आसमां मापने के ख़्यालात इसलिए कि
    जब से गई है छोड़कर आवारगी मुझे
    मैं ज़िन्दगी को ढूंढता हूं ज़िन्दगी मुझे

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  23. @ समीर जी, राज जी, गजेन्द्र जी,
    बहुत बहुत धन्यवाद।

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  24. @ प्रतिभा जी,
    प्रोत्साहन की इन पंक्तियों के लिए आभार।

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  25. तन्‍हां से हम
    लेटे ज़रूर
    पर
    तुम्हारी यादों की सरसराहट
    बन्द पलकों को खोल देती है

    यादें तो ऐसी ही होती हैं जी...लगता है पहली बार अनुभव हुआ है...:)

    सुंदर रचना.यादो में लिपटी सी.

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  26. कभी

    देखा था ख़ाब

    कि तमाम उम्र

    इसी बगिया में हम

    साथ चलते रहेंगे.....

    sunder panktiyan!

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  27. @ संगीता जी
    चर्चा मंच पर सम्मान देने के लिए आभार।
    बाक़ी दर्द की करवट पर अर्ज़ है
    उन को हमारे वास्ते फ़ुर्सत नहीं रही
    यानी उन्हें हमारी ज़रूरत नही रही
    सन्नाटे शोर करते हैं जाएं कहीं पे हम
    अब ख़्वाब में भी हम को तो ख़िल्वत नहीं रही

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  28. @ अनामिका जी

    आभार आपका। बस आख़री बार है.. पहली का तो नहीं कह सकता
    अब कोई दोस्त नया क्या करना
    भर गया ज़ख़्म हरा क्या करना

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  29. मनोज जी… होता है , होता है!
    न हाथ थाम सके, ना पकड़ सके दामन,
    बहुत क़रीब से उठकर चला गया कोई.
    समेट कर रखिए इन यादों को, ये ख़ज़ाने तुम्हें मुमकिन है ख़राबोंमें मिलें!!!

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  30. @ उदय जी, दिव्या जी, गुडिया जी,
    प्रोत्साहन के लिए आभार।

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  31. @ संवेदना के स्वर
    आभार आपका,
    इस तरह से जीते हैं इस दौर में डरते डरते
    ज़िन्दगी करना भी अब एक ख़ता हो जैसे

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  32. @ राय जी,
    आशीष और स्नेह बनाए रखें
    आभार आपका।

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  33. @ वीना जी, प्रेम नारायण जी, रंजना जी, शिखा जी
    प्रोत्साहन के लिए आभार।

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  34. @ निर्मला दीदी,
    आशीष बनाए रखें।

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  35. @ वंदना जी, राज भाटिया जी, रचना जी,शास्त्री जी
    प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद।
    आभार आपका।

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  36. बहुत सुंदर कल्‍पना .. अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

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  37. पुरानी यादें समेटे यह रचना दिल को छूने में कामयाब रही है भाई जी ! शुभकामनायें !

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  38. वाह! बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति। दिल को छू गई आपकी ये रचना..!

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  39. मानों तेरी यादें

    आंखों में अंटक-सी गईं हैं!!
    WAH, MANOJ JI behatareen.

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  40. बड़ी ही सुन्दर व स्मृतियों को झकझोर देने वाली कविता!!

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  41. कई भावों को एक साथ समेटा है आपने कविता में ..किसी के होने और न होने के अहसास की सुन्दर अभिव्यक्ति

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  42. यादें ..... अक्सर यादें पलकों में अटकी रहती हैं ... प्रेम के गहरे एहसास लिए लिखा है आपने इसे ...

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  43. बिस्तर पर तन्‍हां से हम लेटे ज़रूर पर तुम्हारी यादों की सरसराहट बन्द पलकों को खोल देती है.....
    beeti yaadon ka bahut sundar safar..dil ko chhoo liya..bahut sundar..aabhar.

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  44. Bahut khoobsurati se bhavon ko prakat kiya hai aapne iss kavita ke zariye...bahut sundar rachna...sadhuwaad.

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