बुधवार, 8 सितंबर 2010

देसिल बयना - 46 : खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!

देसिल बयना - 46

खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!

करण समस्तीपुरी

एगो कहावत तो सुने ही होंगे, 'सब दिन होत न एक समाना !' सच्चे समय केतना बदल गया है। मोगलिया नवाब गया, अंगरेज़ गया, जमींदारी गया, मंदिर पर झूला के नाच और अनकूट का भोजो चला गया बूंट लादने। लोग यही सोच के संतोष करे कि अब न उ "देविये है न उ कराह !" मगर सुखाई ठाकुर का लाटसाहेबी अभियो कम नहीं हुआ था। केतना चास तो बिन देखे ही बेच दिए। हटिया-बजरिया कहिये देखे नहीं। ढहल हवेली से नीचा पैर रखते थे तो पंचैतिये में जाने के लिए।

"बो...अ....ई........ !" धत तोरी के... ! दुपहर में दलान पर से जो डकार मारते थे कि हमरे दूअरा तक आवाज़ पहुँच जाता था। अब नौकर-चाकर तो रहा नहीं जौन कौनो आदमी नजर आ कि फटसे हुकुम कर दिए, "अरे फलानमा हेरै... ! हे जरा इनार (कुआं) से एक डोल पानी खीच तो दो... ! इतना न खा लिए हैं कि पेट आफर रहा है... ! उठा नहीं जा रहा है... ।"

उ दिन हमहि धरा गए। हमहू तो वैसने डपोरशंख। बात बनाए में न तेज़ हैं, कौनो काम में तो जी लगता नहीं है। डोल भर पानी खीचे में बाल्टी भर पसीना निकल गया। मगर ई का एक डोल पानी में तो ठाकुर जी का हाथो नहीं धुला। बेचारे इनार से नीचा मट्टी पर हाथ घिसे जा रहे थे और हम ऊपर से जलढारी किये जा रहे थे। ठाकुर जी जलढारी का मंत्रो पढ़े जा रहे थे, "मार ससुरा के.... मार ससुराके.... !!"

जैसे-जैसे डोल औंधाय जा रहा था हमारा आँख का गोटी बहराया जा रहा था। ई मरदे फेर से पानी खिचवायेगा। सच्चे... जैसे ही पानी का धार रुका, ठाकुर जी दांत निपोर के बोले, "हे बौआ ! एक डोलऔर खीच दो ! ससुर ई बकेन (पुरानी ब्याई हुई) भैंस के दही का लट्ठा हाथ से छुटिये नहीं रहा है।

हम एक डोल पानी और खीच दिए। फिर ठाकुर जी का हाथ पखार का गमछी में पोछते हुए बोले, "अबरहे दो... ई छूटेगा नहीं.... "बो...अ....ई........ !"

तभी हमरा नजर उके ठुड्ढी पर गयी। हम कहे, "हौ ठाकुर बाबा ! हाथ तो पखारे, मुंहो पोछ लीजिये, उज्जर-उज्जर लगा हुआ है... !" ठाकुर जी पांचो अंगुरी से ठुड्ढी को दोबार सहला कर हाथ आगे कर के बोले, "ओह.... ! ई छूट जाएगा... दही नहीं न है.... । कलाकंद खाए थे वही लग गया है।”

उ रात घर में बैगन के तरकारी और रोटी देख के हमरे आँख से आंसू निकल गया। हमरी महतारी देख रही थी। बोली, "का हुआ रे... ! आगे में थाल पड़ी है और तोरे लोर काहे झहर रहा है ?"

हम से रहा नहीं गया, "का होगा माई ! बाबूजी दिन भर कहचरी में का पहाड़ तोड़ते रहते हैं ? का होता है इन्ना देह धुन के ? सुखी रोटी और पन-टिटोर तरकारी। गोरस-मिसरी तक परवे-त्यौहार जैसे आता है। ऊपर से तू भगवान को गोहराती है, जौन तोहरे घर में दूध का बर्तनों तक नहीं दिया और सुखाई ठाकुर को बैठे-बिठाए दूध-दही और मिठाई में तोलता है।" बात ख़तम कर के माई के तरफ देखे। ओह बेकारे बोल दिए। माई के भी दुन्नु आँख बह रहा था। तभी बाबूजी बोले, "भगवान जो दिहिन है वही अमृत है। खा लो ! उ ठाकुरबा का बोलेगा.... ! खाता कम और डकारता जादे है। हम चुप-चाप खा के उठ गए। मगर उ रात पहली बार बाबूजी के बात पर विश्वास नहीं हुआ।

अगली दुपहरिया में कटहा वाली और बेंगाई महतो का पंचायती था। हमको अनचैती-पंचैती से तो मतलब नहीं मगर उहाँ का रमण-चमन बड़ा अच्छा लगता था। सैय्याँ-खौका.... तो बप्पा-खौकी.... ! तोरे आग ढारेंगे तो तोहरे चुमान करेंगे.... !" रंग-बिरंग के आरती-भजन होता था। फिर पंच लोग का दहारना, "मार छिनरी के.... ! चुप रहता है कि नहीं... ! ससुर भरुआ बूझ लिया है का रे.... ? पंच को जुटा के मोजरा कर रहा है।", हा....हा... हा.... हा... सच्चे पंचायती में जो मधुर रस बरसता था कि पूछिये मत। हम चुकते नहीं थे।

उहो दिन वैसने अलबत्त डरामा चल रहा था कि बीचे में रंग में भंग पड़ गया। अहि तोरी के.... ई सुखाई ठाकुर को का हुआ.... ? अहि मरदे... ! ई तो बैठले-बैठले गिर गए। कटहा वाली झट से पंखा ले के आयी। बेंगाई महतो लोटा भर पानी ले के दौड़ा... ! ठाकुर जी को होश तो आया मगर पूरा देह घामे-पसीने तर। लोग सब जब तक पूछे का हुआ, का हुआ... ? तब तक.... धम्म....! ले बलैय्या.... ठाकुरजी फेर से गिर गए।

अब तो चारो दिश हंगामा मच गया।  कोई कहे भूत-पिरेत है। झींगुर भगत को बुलाओ। एकाध आदमी बोला, बिलड पिरसर हो गया है.... लुढकन डाक्टर को बुलाओ। ओन्ने से ठकुराइन भी कलेजा पीटती हुई आ गयी। झींगुर भगत के मंतर में बड़ा शकती है। ठाकुर जी फुरफुरा के उठ के बैठ गए। मगर ई का... हे...हे... ठाकुर जी बगली गिर गए। ई बार तो मुँह से गाज और नाक से पोंटा निकलगया। ठकुराइन का कलेजा दहल गया। चीत्कार कर उठी, "अरे कोई इनका डाक्टर कने ले चलो... !"

तब तक घोंघबा लुढकन डाक्टर को भी साईकिल पर चढ़ा लाया था। डाक्टर साहेब सबको हटो-हटो करते हुए ठाकुर जी का पहिले नाड़ी जांच किये। पता नहीं का बुझाया.... फिर मन के अन्दर का बात जाने वाला मशीन निकाले। दुन्नु टोंटी को कान में लगा के करेजा-पीठ-पेट का जांच करे लगे। फिर दाहिना बाँही में कपड़ा बाँध के लगे एगो छोटकी फुक्का को दबा-दबा के फुलाए। हमका फिरंगिया बताया कि देखो यही बिलड पिरसर का लच्छन है।

पांच मिनट तक जांच किये। फिर बोले, "स्टार्विंग का केस है। ई को बहुत वीकनेस है ! तुरत गुलकोज चढ़ाना पड़ेगा।" सब लोग सोच में पड़ गया। भाई टाईफर-मलेरिया तो सुने रहे ई 'इस्टारभिन' का होता है। गुलकोज तो हमहु पिए रहे डब्बा भर के। एकदम शीतल और बहुत मीठा... मजा आ गया। मगर ई लुढकन डाक्टर तो घोला हुआ गुलकोज ही निकला है अपने थैली में से उ भी लीटरिया बोतल में।

फकीरचन फारबिसगंज में कमाता था। उ समझ गया। बोला, 'मगर डाक्टर साहेब... ! ठाकुर जी को 'इस्टारभिन' काहे होगा... ई तो खाता-पीता घर के हैं।

"तो का... खाता-पीता घर के आदमी को ईबीमारी नहीं होता है... ?"

हम अपने मन में ई बात सोचिये रहे थे कि डाक्टर साहेब बोले, 'खान-पान पौष्टिक रहे तो ई काहे होगा....!"

हम बात काट के बोले, "का बात करते हैं डाक्टर साहेब ! पूरे गाँव में एक्कहि तो नवाब बचे हैं अब... ! ठाकुर जी के खान-पान का बराबरी जबार भर में कोई करेगा का.... ? देखिये मोछ पर अभिये मिठाई का गरदी सटा हुआ है।"

लुढकन डाक्टर बोतल को हिलाते हुए कुहक पड़े, "हूँ ! खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई !"

हम बोले का कहे...? डाक्टर साहेब फिर दोहराए, "कहे तो... खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!" अरे मरदे ई के पेट में छटाक भर भी अनाज नहीं है। और मोछ पर मिठाई रहता है। हम बोले कि अगर आपको झूठ लगता है तो खुदे चाट कर देख लिजीइए। डाक्टर साहेब ठाकुर जी के मोछ पर उज्जर-उज्जर रबा उठा कर जी पर रखे। हूँ... उनका आँख भी चौरा होने लगा। फिर ठकुराइन के तरफ देखे, "इनका बरत-उपवास भी था का... !"

ठकुराइन कलेजा पीट-पीट के बोले लगी, "नहीं डाक्टर साहेब.... ! कौनो बरत नहीं था.... ! गए साल धान दहा गया... मकई-गेहूं भी जवाब दे रहा है। केतना दिन से एक साँझा ही चलता है। परसों से मकई के भूजा से काम चला रहे थे.... मगर इनको रुचता भी नहीं है और दांत से टूटता भी नहीं है... !"

अब डाक्टर सहित सब का आँख अचरज से फटने लगा। "का बात करती हैं ठकुराइन ? अरे ठाकुर जी के मोछ पर तो अभियो मिठाई का गरदी झूल रहा है।", फकीरचन बोला था।

ठकुराइन का कलेजा फिर फट गया, "नहीं रे बाबू.... ! उ तो उनका सुभाव है। एक दना भी न खाए मगर सरिसो तेल लगा कर हाथ जरूर धोते हैं रे बाबू... और वही को दही का लट्ठा बताते हैं। कभी कहीं मिठाई मिल गया तो महीनो जुगा कर रखते हैं। लोग ठकुराई का मान रखे इसलिए भूजा-भर्री फांकने के बाद थोड़ा सा गरदी जान-बूझ कर मुँह में चिपका लेते थे।"

"अहि रे बा.... ! तो ई बात था.... । ओह.... ! सब का जीभ एकदम से हल्लक में धंस गया था। डाक्टरे साहेब चुप्पी तोड़े, "लो देख लो.... ! हम एक्कहि बेर में बीमारी पकड़ लिए न.... ! कहे न "खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई... ! झूठा शान बघारने का शौक। चलिए आप लोग हवा का रास्ता छोड़िये.... और गुलकोज चढ़ाने दीजिये।” कह के बोतल को बनेरी में बाँध कर ठाकुर जी के बांहिये में सुइया भोंक दिए।

हमरे मन में कल वाले चौधरी जी के दही वाला हाथ, रात में माई की रोटी तरकारी और अभी वाला दिरिस एक के बाद एक चल रहा था। फिर बाबूजी की बात याद आयी। फिर डाक्टर की, "खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई !" मतलब झूठी शान दिखाना ! लेकिन ऐसन मिठाई कौन काम के... ? झूठे गौरव काहे दिखाएँ।

"खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई !"

मतलब झूठी शान दिखाना ! लेकिन ऐसन मिठाई कौन काम के... ? झूठे गौरव काहे दिखाएँ।

51 टिप्‍पणियां:

  1. करन बाबू...देसिल बयना त बेजोड़ था बाकी कथा मार्मिक.. अफसोस आता है जब लोग अईसा काम करता है, खाली ई बताने के लिए कि खण्डहरे नहीं इमारतो बुलंद था कभी... एक हाली पहिलहूँ आप एगो देसिल बयना लिखे थे, ओही याद आ गया..आजो ओही बात कहेंगे कि अमीरी के कबर पर जमने वाला दुबियो जहरीला होता है.
    पंचायत का सब्द्कोस पढला के बात त हमरा हँसिए नहीं रुका..
    झूठा शान बघारने का शौक। चलिए आप लोग हवा का रास्ता छोड़िये.... और गुलकोज चढ़ाने दीजिये।” कह के बोतल को बनेरी में बाँध कर ठाकुर जी के बांहिये में सुइया भोंक दिए। एक बार हमहूँ ऐसने काण्ड में घेरा गए थे त डॉक्टर बोलिस कि “ चलिए हवा छोड़िए. एतना सुनकर बेहोस आदमी उठ गया बोलिस, हम ठीक हैं, ई सब लोग हवा छोड़ेगा, त हम ऐसहीं बेहोस हो जाएंगे.
    करन जी बहुत नीमन!!

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  2. अच्छी कथा है। देसिल बयना के माध्यम से लोकोक्तियों का अच्छा ज्ञान मिल रहा है।
    धन्यवाद।

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  3. इसे पढ़ कर फणीश्वर रेणु की याद आ गई वही आँचलिकता भाषा और लोक-जीवन में जीवन्त हो उठी है .साधु !

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  4. इसे पढ़ कर फणीश्वर रेणु की याद आ गई वही आँचलिकता भाषा और लोक-जीवन में जीवन्त हो उठी है .साधु !

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  5. वाह क्या बात है-हकीकत बयान करके धर दी।
    फ़सल न हुई तो क्या हुआ रौब और रुतबा तो बरकरार रखना जरुरी है।

    इज्जत बचाने के लिए पता नहीं कहां कहां इज्जत गंवानी पड़ती है।

    साधुवाद

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  6. @ चला बिहारी,
    चचा,
    आह भोरे-भोर आपका हजारी देख के मोन परसन्न हो गया. पछिला हफ्ता साँझ धर इन्तिजारी करना पड़ा था. और का कहें.... ई धरफरी वाला देसिल बयना है !

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  7. @ हरीश प्रकाश गुप्त
    हरीश जी,
    आप बड़ी शाट-काट में निपटा देते हैं.... अरे भई कुछ मार्गदर्शन भी कीजिये !

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  8. @ प्रतिभा सक्सेना,
    प्रतिभा जी,
    आप पहली बार हमारे ब्लॉग पर आयी हैं, आपका हार्दिक अभिनन्दन ! सात समुन्दर पार आपको रेणुजी की याद आई, यह जान कर मेरा हौसला तो आकाश छोने लगा है मगर सच्चाई तो यही है कि, कहाँ उ राजा भोज और कहाँ हम गंगू............. !! उम्मीद है आप इस ब्लॉग पर आती रहेंगी !! धन्यवाद !!!

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  9. @ललित शर्मा,
    ललित जी,
    बहुत-बहुत धन्यवाद !

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  10. करण जी, आपके देसिल बयना के क्या कहने । इसके हर अंक में बिहार की मिट्टी की सुगंध आती है । हमें तो सप्ताह भर इंतजार रहता है आपकी देसिल बयना का। शुरुआत तो बड़ी अच्छी रही । गालियां भी चुन-चुन के भरी हैं आपने। पर अंत में ठाकुर जी की परिस्थिति से अवगत होने पर अत्यंत दुख हुआ । सच ही है, झूठी शान के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते पर अंत में उन्हें पछताना पड़ता है, यह भी सच है। एक मार्मिक कथा को बड़े खूबसूरत अंदाज में पेश किया है आपने ।

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  11. करण जी , शानदार प्रस्तुति । मुझे तो देसिल बयना शुरू से ही पसन्द है ।

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  12. आप ने तो आज के समय की सब की पोल खोल दी,आज यही हाल है चारो ओर. धन्यवाद

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  13. Ka ho karan ji ap kaise etna acha likh lete hai..es bar to hasa b diye rula b diye...solah aane sacho bat kah diye ap to..bahute log esne hote hai dikhawa par zada viswas karte hai...humko to bahute gussa aata hai esan logan par..
    har bar ki tarah e desil bayna padhkar dil garden garden ho gaya..

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  14. आपके लेखन में खांटी आंचलिक वैभव झलकता है. बढिया प्रस्तुति

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  15. @ रीता,
    रीता जी,
    अब का करें... वही मट्टी में न देह और दिमाग दुन्नु पोसाया है.... सुगंध तो आएगा ही. हाँ ख़ुशी तब बढ़ जाती है जब आप जैसे सुधि शुभचिंतकों को ई माटी का महक पसंद अत है. बहुत-बहुत धन्यवाद !

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  16. @शमीम,
    शमीम भाई,
    कहाँ रहते हो आज कल ? रमजान मुबारक !

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  18. @ राज भाटिया,
    भाटिया जी,
    नमस्कार ! कनाडा में भी देसी माटी की खुशबु पहुंचा दिए न... !!!

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  19. @ रचना जी,
    प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद !

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  20. @ दीपक बाबा,
    दीपक जी,
    उ तो होगा ही न... काहे कि हम हैये हैं ठेठ गंवई.... ! बांकी देसिल बयना आपको अच्छा लगा कि नहि सो न बताइये.... !!! लेकिन अभी पहिले धनवाद ले लीजिये !!!!

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  21. अरे करण जी बहुते बढिया लगा........ अब का बताये.........

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  22. @ दीपक बाबा,
    है देखिये... ई हुआ मरद वाला न बात !

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  23. माटी की सुगंध लेकर आया है आपका देसिल बयना । ऐसे ही लिखते रहिए और हमें हँसाते रहिए ।

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  24. करण जी, गालियों का और स्टॉक है क्या ? आपकी गालियाँ भी बड़ी प्यारी है ।

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  25. @ जुगल किशोर,
    जुगल बाबू,
    अब का करें.... ? हम तो बस ऐसाही लिखते रहते हैं.... अब आपको हंसी आ जाती है तो हमरा का दोष ई में... ! बंकिये आप आये तो हमको ऐसा लगा जैसे, "सुबह का भूला सांझ को मंजिल पर पहुँच जाए तो उसे भूला नहीं कहते ! धन्यवाद !!!

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  26. @ रीता,
    अरे रीता जी,
    गाली का कौन कमी है ? उ तो हम देना छोड़ा दिए हैं बंकिये कौनो भूल थोड़े गए हैं.... ? आपको पसंद है तो बस अपना हाल मोकाम लिख भेजिए न.... ट्रक-के-ट्रक उतरबा देंगे !!!!

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  27. आंचलिक भाषा में पढ़कर अच्छा लगा. माटी की भीनी भीनी खुशबू के संग ऐसी हकीकत बयानी.

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  28. Kahawat ke anukool anchalik bhasha ki sugandh bikherti badi hi akarshak rachna hai.....Sadhuvad...

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  29. हकीकत बयां करती शानदार पोस्ट... कभी कभी इज़त बचने के लिए क्या क्या नहीं करना पड़ता है.... सच में झूठी शान काहे दिखाएँ... शीर्षक देख कर हमारे यहाँ की कहावत भी याद गयी... जैसे:---

    १. खाने को लाइ नहीं और पादे मलाई...
    २. बाप चमार, बेटा दिलीप कुमार
    ३. बाप पदै ना जाने.. पूत शंख बजावे...

    ऐसे ही और भी देसी मुहावरे हैं...

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  30. बहुत ही सुन्दर लेख है| दिखावे पर बहुत सटीक कटाक्ष किया है |

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  31. समग्र प्रकरण से,लालकिले के म्यूजियम में रखा बहादुरशाह जफर का तोसक-तकिया याद आया। लगता ही नहीं है कि राजा को कभी ऐसा दिन भी देखना पड़ा होगा। मगर,समय किसी को नहीं छोड़ता है।

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  32. अरे बाप रे ई तो महा फुलटॉस मार दिए हैं आप...ई तो बहुते मन लाईक लेखन भेटाया है भाई...का लिख दिए हैं आप...पढ़े तो मन डेग रहा है एन्ने-उन्ने.. चलिए लिखते रहिएगा...और हमरा जैसा पढ़वैया लोग पढबे करेगा...हाँ नहीं तो..!!

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  33. करण जी देखिये पिछले हफ्ते मैंने कहा था कि रेणु की याद ताज़ी हो जाती है आके देसिर बयना से... इस बार ऊपर कई लोग कह रहे हैं यही बात... आंचलिक भाषा पर जो आपकी पकड़ है और सूक्ष्म दृष्टी है.. भाषा में जो विविधता लाते हैं आप अदभुद है.. अभी तो आसपास मेनस्ट्रीम में भी ऐसा रचनाकार नहीं दिख रहा... हमरी शुभकामना.. लोकोक्ति के बहाने अच्छी कथा कह रहे हैं आप...

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  34. बेहतरीन कहानी, न केवल कहानी बल्कि एक चेतना. धन्यवाद् इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिए.

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  35. देसिल बयना पढने में हमेशा थोड़ा समय ज्यादा लगता है ...भाषा को समझने में कभी कभी फिर से पढ़ना पडता है ...पर भाषा का जो आनन्द आता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता ...आज की कहावत के लिए बहुत संवेदनशील कथा ली है ...बहुत सुन्दर ...

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  36. are karan bhai hamar comment k seho sthan dijie o,

    Ham t pahle se hi aapke kalam ko naman karte hai, phir rahi is desil bayana ka, uper itna comment padke t hum Speechless ho gaye.

    Ek ta baat hamaro kah d, ka ho - agla comment m kahab

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  37. " दुपहर में दलान पर से जो डकार मारते थे कि हमरे दूअरा तक आवाज़ पहुँच जाता था। "

    ये स्टार्विंग का केस तो नहीं :)

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  38. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  39. आपकी यह रचना मुझे लखनऊ की उस घटना की याद दिलाती है जहाँ बीते दिनों के नवाब लोगों को यह विश्वाश दिलाने के लिए कि वे नवाब थे और आज भी हैं,सरकार से मिले प्रमाण लेकर चलते थे जबकि उनके कपड़ों में पैबंद साफ दिखाई देता था .बेहतरीन रचना , देशी शब्द के स्वाद की गम-गमाहट साथ लिए.समाज में व्याप्त पाखंड पर सटीक पर सुमधुर प्रहार का एक सुंदर नमूना है आपकी रचना.

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  40. अरे-रे-रे इ जुलुम मत करिए करण जी, ऐसे ही हल्का-फुल्का शरीर है, गालियों के बोझ से दब जाएंगे हम तो ।

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  41. मुझे ये भाषा बहुत अच्छी लगती है.पोस्ट को दो बार पढ़ा. आपने शानदार लिखा है.इसके लिए आपको बधाई.

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  42. इस बयना के लिए धन्यवाद ......बहुत ही मीठा था !!

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  43. मनोज जी आपकी कहानियां बहुत अच्छी है इस कहानी में आपके लेखन में रेणु जी की झलक दिखायी पडती है काफी समय से कहानी नही पढी थी इसे पढ सारी कसर निकल गयी। सच ही है झूठी शान तो झूठी ही होती है।

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  44. विलम्ब से पहुंचे पाठकों का भी हृदय से अभिनन्दन एवं कोटिशः साधुवाद !!

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।