सोमवार, 6 सितंबर 2010

गीली मिट्टी पर पैरों के निशान

गीली   मिट्टी   पर   पैरों   के निशान!!

 

मनोज कुमार

गीली मिट्टी पर पैरों के निशान

गुजरा है कोई इस राह से

कल शाम घिरे थे बादल

बारिश भी हुई

आज निकली है हल्‍की धूप

पर कच्‍चा रास्‍ता

गीला

मेरे मन की तरह!

 

मुहब्‍बत का पैगाम लिए

कोई आया क्या? …

पेड़ो की सरसराहट
तेरे आने का
दे जाती भ्रम।

काश!
मेरी ख़ामोशी का गीत
सुन लेतीं
एक बार ...

... शब्‍द बनकर 
नज़्म बहे
यह    
ज़रूरी तो नहीं !

 

इसी कच्चे रास्ते से
ले आया
थोड़ी-सी मिट्टी
जहां क़दमों के निशान थे

रख दी है
डिब्बी में बंद कर
अपने पूजा घर में
अब चन्दन की
मुझे कोई
ज़रुरत नहीं!

 

 

87 टिप्‍पणियां:

  1. काश!
    मेरी ख़ामोशी का गीत
    सुन लेतीं तुम
    एक बार .सुंदर अतिसुन्दर बधाई

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  2. gili mitti par pairon ke nissan-----
    saheb, mujhe yAH mahsoos hota hai ki koi yah sandeseh de gaya hai ki--RAAH CHALTE HUYE KUCHH SOCH KAR RUK JATA HUN MAIN,
    HAAR KADAM PAR TERI KOI BHULI. SI BAAT YAAD AA JATI HAI-SAHI HAI

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  3. गुजरा है कोई इस राह से

    कल शाम घिरे थे बादल

    बारिश भी हुई

    आज निकली है हल्‍की धूप

    कच्‍चा रास्‍ता,

    रात के बरसे पानी से गीला

    मेरे मन की तरह !

    वाह, बहुत ही सुन्दर भाव, मनोज जी, यो भी बारिश अप्ने पूरे सबाब पर है

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  4. अच्छा गीत है। मन को छूता हुआ। गहरे भाव लिए हुए।
    आभार।

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  5. मनोज बाबू,
    आप यूँ फ़ासलों से गुज़रते रहे,
    दिल से क़दमों की आवाज़ आती रही

    या फिर
    अपने आप रातों में चिलमनें सरकती हैं,
    चौंकते हैं दरवाज़े, सीढियाँ धड़कती हैं.

    या
    कोई चुपके से आके, सपने सजा के,
    मुझको जगा के बोले

    या
    मुहब्‍बत का पैगाम लिए
    कोई आया क्या?
    पेड़ो की सरसराहट
    तेरे आने का
    दे जाता है भ्रम ।

    गजब ख़ूबसुरत बयान है और अंतिम पंक्ति में तो बस दूसरा दुनिया का खेला देखा दिए आप...प्रेम का पराकाष्ठा, भक्ति का आरम्भ!!
    मनोज बाबू... चंदन का सुगंध फैला दिए आप इस कबिता के माध्यम से!! साधुवाद!!

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  6. बहुत सुन्दर और शानदार प्रस्तुती!
    शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

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  7. तीनो ही रचनायें दिल को छू गयी। बहुत सुन्दर । शुभकामनायें।

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  8. @ सुनिल जी
    आपके प्रोत्साहन के लिए आभार!

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  9. @ प्रेमसरोवर जी,
    बहुत उम्दा शे’र कहा है।
    राह चलते हुए कुछ सोच कर रुक जाता हूं मैं,
    हर क़दम पर तेरी कोई भूली-सी बात याद आ जाती है!

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  10. @ गोदियाल साहब,
    सच में पूरी नमी के साथ बारिश अपने सबाब है। बाहर ही नहीं, भीतर भी।

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  11. @ शास्त्री जी, हरीश जी,
    आपने रचना पसंद किया, आपका आभार!

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  12. @ सलिल जी
    आप त पूरा खजाना ही लुटा दिए हैं।
    आब का कहें, बरा भाई हैं, दौलत चाहे अपना पास रखते चाहे भाई के पास, एक्के बात है।
    ऐसहिए आसीरबाद बनए रखिएगा, और का कहें।

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  13. @ प्रवीण जी, बबली जी
    प्रोत्साह्न के लिए आभार।

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  14. आह..... सच में प्रेम की पराकाष्ठ है ! तीनो पद ऐसी अनुभूति दे रहे हैं मानो कोई हिरन तीर लगने पर घाव को ढांपे चीत्कार कर रहा हो.... दर्द है मगर उपचार की आवश्यकता नहीं क्योंकि यह घाव ही तो अब उनकी आखरी निशानी है !

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  15. रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं !

    बस यही तो प्रेम की पराकाष्ठा है …………………अन्त की पंक्तियो ने दिल को छू लिया………………यूँ तो पूरी रचना ही दिल मे उतर गयी………………।एक भीने भीने अहसास के साथ्।

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  16. अंतिम पंक्तियाँ को मन को छु गयी. बहुत सुंदर! मैं तो भाव बिह्वल हो गया !

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  17. ... शब्‍द बन नज़्म बहे
    यह ज़रूरी तो नहीं !
    वाह , ख़ूबसूरत

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  18. इसी कच्चे रास्ते से
    ले आया
    धूल थोड़ी-सी
    जहां कदमों के निशान थे

    रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं

    आह कितना कुछ कह जाती हैं ये पंक्तियाँ ..बहुत बहुत सुन्दर.

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  19. @ अमरेन्द्र जी,
    आपकी संक्षिप्त टिप्पणी ने शब्दकोश खोलने पर मज़बूर कर दिया और तब "तोष धर्मी" के भाव समझ पाया।
    -- एक शब्द में -- क्या नहीं कह दिया आपने!
    आपका बहुत-बहुत आभार!

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  20. @ निर्मला दीदी,
    आपका आशीर्वाद पाकर धन्य हुआ।

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  21. @ सोनल जी, कोरल जी, शारदा जी
    आपकी उपस्थिति ने मनोबल बढाया है।

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  22. @ करण जी,
    वाह! क्या व्याख्या है!! बहुत सुंदर!!!
    आभार।

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  23. @ वन्दना जी,
    आपके प्रोत्साहन के लिए आभारी हूं।

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  24. @ अरुण जी,
    बहुत छोटे में निपटा गए।

    उत्तर देंहटाएं
  25. @ शिखा जी,
    प्रेरक पंक्तियों के लिए धन्यवाद।

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  26. manoj aaj holland pahuch kar jab tumahara blogwa khola to bus bahut anand aaya. kya bhaav shabdo mai piroye hai.itne sundar bhaav wohi nirupit kar sakta hai jo swaymb man aur vicharo se bahut sundar ho.aur mujhe maloom hai tum woh ho.keep going. best wishes

    उत्तर देंहटाएं
  27. @ नीरज जी,
    अच्छा तो श्रीमान जी हौलैण्ड में हैं। शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  28. रात के बरसे
    पानी से गीला
    मेरे मन की तरह

    वाह ...बहुत सुन्दर ...भीगा भीगा स एहसास लिए ...

    शब्‍द बन
    नज़्म बहे
    यह
    ज़रूरी तो नहीं .

    सच , कभी कभी मौन मुखरित हो उठता है ...बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ ..

    रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं ..

    इसको वर्णित करना कठिन है ...हर्फ़ दर हर्फ़ प्रेम मय हो उठा है ...बहुत सुन्दर नज्में हैं ...भावनाओं से ओत - प्रोत ..

    चन्दन समझ
    उस धूल को
    लगाया था
    मैंने माथे पर
    तेरी याद की
    चांदनी में
    सारी रात
    नहाता रहा ...

    :):):) यह आपकी तरफ से ही है ...

    उत्तर देंहटाएं
  29. शब्‍द बन
    नज़्म बहे
    यह
    ज़रूरी तो नहीं !

    -क्या बात कह गये..बहुत शानदार रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  30. वाह निर्मल प्रेम की पराकाष्ठा ... बहुत सुंदर रचना ... जो प्रेम के रस में डूबा रहता है ... उसकी खुश्बू मे न्हाया रहता है उसे चंदन की क्या ज़रूरत है ....

    उत्तर देंहटाएं
  31. सब ने सब कह दिया, अब हम का कहें.. पढ़ लिए.. आँख बंद कर सर हिला लिए और चले..

    उत्तर देंहटाएं
  32. प्रेमाभिव्यक्ति का अच्छा अंदाज़ ,भावनाएं बखूबी शब्दों में पिरोई हैं. नमी का अहसास देती प्रस्तुति आभार

    उत्तर देंहटाएं
  33. प्रेम ही पूजा है, इस बात को चरितार्थ करती हुई आपकी रचना अत्यंत मार्मिक बन पड़ी है । जिस प्रेम में दर्द न हो, पीड़ा का एहसास न हो वह प्रेम प्रेम नहीं होता । प्रेम की असली अनुभूति तो उसके चुभन में है । कुछ ऐसा ही एहसास कराती है आपकी कविता ।

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  34. जिस प्रकार गीली मिट्टी पर पैरों के निशान बन जाते है वैसे ही आपकी कविता ने भी मेरे दिल पर
    खूबसूरत छाप छोड़ा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  35. रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं !

    ....Barish ke mausam ka sunhara ahsas.... bahut sundar abhivykati...

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  36. तीनों रचनाएं एक से बढकर एक .. बहुत अच्‍छी अभिव्‍यक्ति !!

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  37. Prem pidaon ko bhi kaise anandamay kar deta hai, isako abhivyakt karane men kavi ne koi kasar nahin chhodi hai. Sadhuvad.

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  38. तीनों कवितायें बहुत सुन्दर हैं ...
    भावनाओं से ओत-प्रोत, अभिव्यक्ति मनमोहक है..!

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  39. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 7- 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  40. बहुत लाजवाब बात कही. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  41. रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं!
    Aah!

    उत्तर देंहटाएं
  42. पैरों के निशान, रास्ता गीला मन की तरह, पैगाम का इंतज़ार, भ्रम, ख़ामोशी के गीत, शब्दों का नज़्म बन कर बहना, निशानों की मिटटी उठा कर ले आना, और डिबिया में बंद कर पूजा घर में रख देना.....

    ये एक एक शब्द दिल मे बसी किसी की यादो के टिमटिमाते दीयों से रोशन होते दिख रहे हैं....बहुत सुंदर वर्णन किया है दिल के गीले पन का ...भाव पूर्ण शब्दों से परिपूर्ण एक खूबसूरत रचना.

    बधाई.

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  43. प्रेम की व्याकुलता,सान्निध्य और उसकी अनुभूति महत्वपूर्ण है,चाहे वह जिस भी स्वरूप में हो। उच्चतर ऊर्जा का मार्ग वहीं से खुलता है।

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  44. शब्द बनकर नज़्म बहे यह ज़रूरी तो नहीं......

    अब चंदन की कोई ज़रूरत नहीं........



    बहुत खुब। पृष्ठ सज्जा भी अति सुंदर और आकर्षक।

    उत्तर देंहटाएं
  45. शब्द बनकर नज़्म बहे यह ज़रूरी तो नहीं......

    अब चंदन की कोई ज़रूरत नहीं........



    बहुत खुब। पृष्ठ सज्जा भी अति सुंदर और आकर्षक।

    उत्तर देंहटाएं
  46. ब्लॉगजगत में इन दिनों चल रहे विघ्नसंतोष के बीच प्रेम का यह संदेश स्वागत योग्य है।

    उत्तर देंहटाएं
  47. कविता अच्छी है। बहुत अच्छेभाव हैं।
    बधाई है।

    लेकिन जैसा बताया कि बातचीत के दौरान कि ये सब अच्छे लक्षण नहीं है कि प्रेम को पूजा बना दिया जाये। जैसे कर्म को पूजा बनाने वाले कभी कर्म नहीं करते वैसे ही ......। समझिये और फ़िर से प्रेम के नये अंदाज टटोलिये। :)

    उत्तर देंहटाएं
  48. गीली मिट्टी पर पैरों के निशान

    गुजरा है कोई इस राह से

    कल शाम घिरे थे बादल

    बारिश भी हुई

    आज निकली है हल्‍की धूप

    पर कच्‍चा रास्‍ता

    गीला

    मेरे मन की तरह!
    Qudrat ke qaanoon ko zindagee se kitnee sahajta se jod diya hai! Wah!

    उत्तर देंहटाएं
  49. .
    इसी कच्चे रास्ते से
    ले आया
    थोड़ी-सी मिट्टी
    जहां क़दमों के निशान थे

    रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं!

    अति सुन्दर भावों के लिए आपको नमन ।

    zealzen.blogspot.com

    ZEAL

    उत्तर देंहटाएं
  50. .
    इसी कच्चे रास्ते से
    ले आया
    थोड़ी-सी मिट्टी
    जहां क़दमों के निशान थे

    रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं!

    अति सुन्दर भावों के लिए आपको नमन ।

    zealzen.blogspot.com

    ZEAL

    उत्तर देंहटाएं
  51. Manoj Ji..Ye kavita to rula gai...Bahot he achi, dil ko chhune wali kavita likh dala apne....Sacha prem sayad yahi hai....
    Is kavita k liye tin shabd hai mere pass...
    Satyam Shivam Sundaram

    Dhanyawad

    उत्तर देंहटाएं
  52. मनोज जी नमस्कार! वास्तव मेँ चन्दन की कोई आवश्यकता ही नहीँ। आपके शब्दोँ से ही प्रेम मयी भीनी-भीनी खूश्बु आ रही हैँ। बड़ी ही शिद्दत से महसूस कराया हैँ प्रेम। लाजबाव रचना। आभार! -: VISIT MY BLOG :- जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ। ............. गजल को पढ़ने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकते हैँ।

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  53. @ संगीता जी,
    बहुत विस्तार से आपने नज़्म की व्याख्या की है। साथ ही छुटकी नज़्म तो ... माशाअल्लाह! पूरी नज़्म की शान में चार चांद लगा देता है}
    आभार आपका।

    उत्तर देंहटाएं
  54. @ समीर जी,
    आभार आपके आशीर्वचनों के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  55. @ दिगम्बर जी,
    आपकी संवेदना से अभिभूत हुआ।

    उत्तर देंहटाएं
  56. @ दीपक जी, रचना जी, रीता जी, जुगल जी, कविता जी, संगीता पुरी जी,
    प्रोत्साहन के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  57. @ परशुराम राय जी,
    आपका स्नेह और आशीर्वाद बना रहे, यही आकांक्षा है।

    उत्तर देंहटाएं
  58. @ अदा जी,
    आपने तो लगभग आना ही बंद कर दिया था। पर कोलकाता की पृष्ठभूमि से जुड़ा होना शायद आपको खींच लाया। सच! आपके दो शब्द मनोबल बढाते हैं। यह स्नेह बनाए रखिएगा।

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  59. @ ताऊ जी, क्षामा जी,
    आभार आपका प्रोत्साहन के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  60. @ अनामिका जी,
    आपके शब्द उत्साहवर्धन करते हैं। ये मेरा स्टाइल नहीं है। पर आपलोगों की नज़्में देख-पढ कर ख़्याल आया कि इस विधा में भी लिखूं।

    उत्तर देंहटाएं
  61. @ राधारमण जी,
    बस उच्चतर ऊर्जा के मार्ग की ओर ही क़दमों के निशान हैं। आभार आपका।

    उत्तर देंहटाएं
  62. @ नीलम जी, शिक्षामित्र जी, शमा जी, मधुछन्दा जी, अनुपमा जी,
    प्रोत्साहन के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  63. @ अनूप जी,
    लक्षण तो .. बस .. यूं ही ...! प्रेम का पुराना अंदाज़ ही रास आता है। अब तो जो हो रहा है ... वह ... तो ... छोड़िए भी। मुझे मालूम है आपको नज़्म और पुराना अंदाज़ और चंदन, सब अच्छा लगा है।

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  64. @ दिव्या जी,
    शायद पहली बार आपका आगमन हुआ है इस ब्लॉग पर। स्वागत है। प्रोत्साहन के लिए आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  65. @ रचना जी,
    मुझे मालूम है आप के ये तीन शब्द "सत्यम्‌", "शिवम्‌" और "सुन्दरम्‌" सब कुछ कह जाते हैं। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  66. @ डॉ. अशोक जी,
    बहुत ख़ूब कहा है आपने! आभार आपका!

    उत्तर देंहटाएं
  67. गीली मिट्टी पर पैरों के निशान
    गुजरा है कोई इस राह से
    कल शाम घिरे थे बादल
    बारिश भी हुई
    आज निकली है हल्‍की धूप
    पर कच्‍चा रास्‍ता
    गीला
    मेरे मन की तरह!

    ..मासूम अभिव्यक्ति।

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  68. गीली मिट्टी पर पैरों के निशान
    गुजरा है कोई इस राह से
    कल शाम घिरे थे बादल
    बारिश भी हुई
    आज निकली है हल्‍की धूप
    पर कच्‍चा रास्‍ता
    गीला
    मेरे मन की तरह!

    ..मासूम अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  69. मनोज जी,

    आज कल मैंने पढ़ना बन्द किया हुआ है ताकि पढ़े हुए का प्रभाव धारावाहिक रचना में न आ जाय। बीते दिनों की घटनाओं से खिन्न हो आज पढ़ा हूँ और अपार संतोष हुआ है। शब्दों के पीछे की आहटों का अनुभव कर तृप्त हो रहा हूँ।
    जिस मन:स्थिति को आप ने चित्रित किया है, वह मेरे अति निकट है।
    प्रेम का लांछ्न :) नहीं लगाऊँगा। सच्चा कवि तो परकायाप्रवेशी होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  70. आदरणीय मनोज जी.. आपने ठीक ही कहा कि छोटे में निपटा गए.. लेकिन "गीली मिटटी पर पैरों के निशान" कविता दिल के इतनी करीब आ गई कि उस समय शब्द ही नहीं निकले कुछ कहने को.. ठीक वैसे ही जैसे आपको उनका उन्हें कहना तो बहुत कुछ था. लेकिन जब आयीं तो आप कुछ कह ना सके ... इस कविता को वही समझ सकता है.. जी सकता है जो काली सड़क पर नहीं.. कच्ची सड़क पर चला हो... चिकनी मिटटी वाली सड़क पर.. जहाँ बरसात ख़त्म होने पर कदम पड़ने पर पैरों के निशान उँगलियों के साथ छाप जाते हैं... याद आ गया हमे भी आम के मौसम में वर्सिः के बाद उसका आना .. जैसे खिली हुई धूप हो.. और आम के गाछी में हम उसके पैरों के निशान पर अपने पैरों को रख कर चलते थे... मानो ए़क दुसरे से चिपक कर चले हो हम.... फिर जब वो भाग जाती थी... हम ए़क टक उन्हें निहारते रहते थे.... अब आप ही कहिये... कैसे कर पाते प्रतिक्रिया... सो छोटे में निपटाना पड़ा... लेकिन ए़क बात कहूँगा... सबसे अधिक मैंने ही आपकी कविता को जिया है .... ऊपर के टिप्पणीकारों से पूछ सकते हैं आप ....

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  71. अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं!

    vah! vaise hum sabhi ka dil bhi gili mitti jaisa hi hota hai, bahut jaldi nishan bante hai us par. bahar se hum chahe jitna bhi dikha de ki hum thos hai, par hote narm hi hai...

    sundar prastutu...

    www.kavyalok.com

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  72. दिनांक 30/12/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  73. रख दी है
    डिब्बी में बंद कर
    अपने पूजा घर में
    अब चन्दन की
    मुझे कोई
    ज़रुरत नहीं!

    भावभीनी रचना ........ बहुत सुन्दर

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