सोमवार, 13 सितंबर 2010

शैशव

शैशव

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

खेल-खिलौनों   में    डूबे शिशु
खो     देते     सारी      दुनिया
केवल     अपने  खिलवाड़ों  से
भर  देते     सब  में   ख़ुशियां।

अंगूठे  को       चूस-चूस   कर
करते  तुम  अमृत     का पान
रो-रो, मचल-मचल कर रखते
सदा   सुरक्षित   अपनी  आन।


निर्भयता   का   पिए   रसायन
चलते   गति   स्वच्छंद   लिए
दुख में   स्वागत करती आंखें
आंसू   का   जयमाल    लिए।

मृदु   भावों   में    जीवन तेरा
क्रूर   जगत   की जहां न धूप
ऊँचे-ऊँचे      तूफानों        के
बनते    नहीं    जहां    स्तूप।

एक बार   हे शिशु तू मुझको
दे-दे    अपना    यह    शैशव
भेद-भाव    में डूबे   जग को
दे-दूँ    तेरा    यह      वैभव।

38 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी कविता । बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

    एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर शब्दों में शैशव को ढाला है आपने। बाल-गीत अच्छा लगा। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अच्छी पंक्तिया लिखी है आपने ....

    मुस्कुराना चाहते है तो यहाँ आये :-
    (क्या आपने भी कभी ऐसा प्रेमपत्र लिखा है ..)
    (क्या आप के कंप्यूटर में भी ये खराबी है .... )
    http://thodamuskurakardekho.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. काश ! वो शैशव वापस आ सकता …………………हर दिल की बात कह दी।

    उत्तर देंहटाएं
  5. ई-मेल से प्राप्त मंजु जी की टिप्पणी
    Manju to me
    show details 9:39 AM (1 hour ago)
    खेल-खिलौनों में डूबे शिशु
    खो देते सारी दुनिया
    केवल अपने खिलवाड़ों से
    भर देते सब में ख़ुशियां।

    एक बार हे शिशु तू मुझको
    दे-दे अपना यह शैशव
    भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव।


    काश हम बड़े समझ पाते यह निश्छल प्रेम की भाषा तो आज जग का कुछ और ही रूप होता!

    मनोज जी मैं आपके ब्लॉग पर यह टिप्पणी भेजना चाहती थी लेकिन पता नहीं क्यों, शायद किसी तकनीकी समस्या की वजह से नहीं कर सकी. कृपया इसे स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  6. निर्मल, कोमल, चंचल, प्राणपूर्ण ! सुभद्रा कुमारी चौहान याद आ गयीं, 'बार-बार आती है मुझे याद बचपन तेरी !' आचार्य की लेखनी को नमन !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत प्यारी कविता ..और चित्र तो कमाल के ..बस देखते रहने का मन कर रहा है ...

    शैशव अवस्था कितनी अच्छी निष्फिक्र वाली होती है ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. सभी चित्र बहुत सुंदर लगे ओर कविता भी अति सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  9. हाँ सब चाहते हैं काश हमारा शैशव कोई लौटा दे...
    बहुत सुन्दर गीत और अतिसुन्दर चित्र.

    उत्तर देंहटाएं
  10. राय जी, मुझे तो लगता है वर्ड्सवर्थ ने सही ही कहा था कि स्वर्ग बचपन के आस-पास रहता है।
    आपकी यह पोस्ट देख कर तो यह धारणा और पक्की हो गई है। सुंदर चित्रों से सजी पोस्ट ने स्वार्गिक आनंद तो दिया ही साथ ही अगर मिल्टन के शब्दों में कहूं तो ... जिस प्रकार प्रभात दिन का आभास कराता है, उसी प्रकार शैशव युवावस्था का।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
    शैशव, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की कविता पढिए!

    उत्तर देंहटाएं
  11. "एक बार हे शिशु तू मुझको
    दे-दे अपना यह शैशव
    भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव।"

    शैशव पर इस प्रकार की कविता इनदिनों नहीं पढ़ी कहीं भी.. इतने कोमल भाव शायद साहित्य से लुप्त हो रहे हैं लेकिन आपने शिशुओं के शैशाव्पन को लेकर बढ़िया रचना रच डाली है.. मुझे तो तुलसीदास जी का पद याद आ रहा है...
    "ठुमक चलत रामचंद्र
    ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनियां ..

    किलकि किलकि उठत धाय गिरत भूमि लटपटाय .
    धाय मात गोद लेत दशरथ की रनियां ..

    अंचल रज अंग झारि विविध भांति सो दुलारि .
    तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियां .."

    सुंदर रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  12. bachpan hriday ki kandaraon mein aajiwan jeewit rahe to kitna accha ho....!!!!!
    badi sahajta se saishav ka vaibhav srijit ho chala hai kavita mein!!!
    subhkamnayen:)

    उत्तर देंहटाएं
  13. एक बार हे शिशु तू मुझको
    दे-दे अपना यह शैशव
    भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव।
    BADHIYAA SANDESH MANOJ JI.

    उत्तर देंहटाएं
  14. भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव।

    ....प्रेरणा देता सुन्दर बाल-गीत ..बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  15. एक बार हे शिशु तू मुझको
    दे-दे अपना यह शैशव
    भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव।.....
    shaishav hamare jiwan ka swarnim samay hota hai jise bina kisi chinta ya jimmedari ke bharpoor jiya ja sakta hai. aman aur shanti ka sandesh deti rachna.... badhai...

    उत्तर देंहटाएं
  16. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 14 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  17. केवल शिशु ही है,जिसे देखकर जाति और धर्म का ख़्याल नहीं आता। हममें से हर कोई अपनी मौलिकता खो जाने की कसक लिए है।

    उत्तर देंहटाएं
  18. मृदु भावों में जीवन तेरा
    क्रूर जगत की जहां न धूप
    ऊँचे-ऊँचे तूफानों के
    बनते नहीं जहां स्तूप।
    सच ही है, बचपन कितना कोमल और निश्छल होता है जहां न कोई भेद-भाव है, न कोई बनावट और न ही कोई कड़वाहट । काश! बचपन से जवानी की दहलीज पर आते-आते दुनिया के लोगों की सोच में परिवर्तन न हुआ होता तो ये धरती स्वर्ग बन जाती ।

    उत्तर देंहटाएं
  19. इतने खूबसूरत और मासूम बच्चों की तस्वीरें लगा रखी है कि मैं फिर से आपके ब्लॉग में अपने दिल एक बात कहने आ गई -
    इनमें से एक बच्ची मेरी भी होती ।

    उत्तर देंहटाएं
  20. Sangita ji,
    Sadar Namaskar, Charcha Manch par samman dene ke liye sadhuvad.

    उत्तर देंहटाएं
  21. एक बार हे शिशु तू मुझको
    दे-दे अपना यह शैशव
    भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव ...

    सुंदर .... बचपन को बहुत ही सुंदरता से लिखा है ....

    उत्तर देंहटाएं
  22. आचार्य जी..काव्य शास्त्र की विवेचना से शिशु गीत तक.. आपका विस्तार अनंत है और शायद यही आपको सही अर्थों में साहित्य स्रष्टा बनाता है... चरण वंदना स्वेकार करें..
    इस कविता को पढने के बाद ठुमक चलत रामचंद्र का आधुनिक स्वरूप या फिर सुभद्रा कुमारी चौहान की बार बार आती है मुझको का स्मरण हो आया..यह जीवन का वह स्वर्णिम काल है जिसे प्रकृति ने भी हमें दो बार जीने का अवसर प्रदान किया है... बालपन में जिसका आपने वर्णन किया है और वृद्धावस्था में, जब यह पुनः लौटकर आता है..
    एक बहुत ही प्यारी रचना!!

    उत्तर देंहटाएं
  23. एक बार हे शिशु तू मुझको
    दे-दे अपना यह शैशव
    भेद-भाव में डूबे जग को
    दे-दूँ तेरा यह वैभव।

    Kaash ... ki yah ho pata...

    Kitni sundar baat kahi aapne...

    उत्तर देंहटाएं
  24. काश ! वो सब वापस आ सकता बचपन की याद आ गयीं, बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  25. बेहतरीन रचना!!


    हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

    उत्तर देंहटाएं
  26. शैशव का वर्णन कितना सुंदर किया है आपने । सचमुच बचपन कितना सरल कितना निर्मल और कितना चपल होता है । सुंदर रचना और तस्वीरें ।

    उत्तर देंहटाएं
  27. ये दौलत भी ले लो, ये सोहरत भी ले लो,
    भले छीन लो मुझसे, मेरी जवानी !
    मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
    वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी !!

    आचार्यवर ! रात में जगजीत सिंघ को सुना.... और फिर आपकी यह कविता याद आयी.

    उत्तर देंहटाएं
  28. @Harish Prakash Gupta,Vandana,Sangeeta Swaroop: Protsahan ke liye saadhuvad....

    उत्तर देंहटाएं
  29. @Manoj Kumar: Manju ji Ke comment ke liye dhanyavaad aur protsahan ke liye aapko bhi saadhuwaad....

    उत्तर देंहटाएं
  30. @Raajbhasha Hindi,Ravidra Prabhat,gajendra singh,uday: Protsaan ke liye saadhuwaad....

    उत्तर देंहटाएं
  31. वाह...वाह...वाह...

    मनमोहक अतिसुन्दर गीत...

    सचमुच यह शैशव यदि ठहर जाता जीवन में...

    उत्तर देंहटाएं
  32. सर्वप्रथम नवरात्रि पर्व पर माँ आदि शक्ति नव-दुर्गा से सबकी खुशहाली की प्रार्थना करते हुए इस पावन पर्व की बहुत बहुत बधाई व हार्दिक शुभकामनायें। शिशु होता ही है निश्छल निष्कपट…बहुत ही सुंदर भावपूर्ण रचना…।

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।