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खेल-खिलौनों में डूबे शिशुखो देते सारी दुनिया केवल अपने खिलवाड़ों से भर देते सब में ख़ुशियां। अंगूठे को चूस-चूस करकरते तुम अमृत का पान रो-रो, मचल-मचल कर रखते सदा सुरक्षित अपनी आन। ![]() निर्भयता का पिए रसायन चलते गति स्वच्छंद लिए दुख में स्वागत करती आंखें आंसू का जयमाल लिए। मृदु भावों में जीवन तेरा क्रूर जगत की जहां न धूप ऊँचे-ऊँचे तूफानों के बनते नहीं जहां स्तूप। ![]() एक बार हे शिशु तू मुझको दे-दे अपना यह शैशव भेद-भाव में डूबे जग को दे-दूँ तेरा यह वैभव। |
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सोमवार, 13 सितंबर 2010
शैशव
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खेल-खिलौनों में डूबे शिशु
अंगूठे को चूस-चूस कर
