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सोमवार, 13 सितंबर 2010

शैशव

शैशव

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

खेल-खिलौनों   में    डूबे शिशु
खो     देते     सारी      दुनिया
केवल     अपने  खिलवाड़ों  से
भर  देते     सब  में   ख़ुशियां।

अंगूठे  को       चूस-चूस   कर
करते  तुम  अमृत     का पान
रो-रो, मचल-मचल कर रखते
सदा   सुरक्षित   अपनी  आन।


निर्भयता   का   पिए   रसायन
चलते   गति   स्वच्छंद   लिए
दुख में   स्वागत करती आंखें
आंसू   का   जयमाल    लिए।

मृदु   भावों   में    जीवन तेरा
क्रूर   जगत   की जहां न धूप
ऊँचे-ऊँचे      तूफानों        के
बनते    नहीं    जहां    स्तूप।

एक बार   हे शिशु तू मुझको
दे-दे    अपना    यह    शैशव
भेद-भाव    में डूबे   जग को
दे-दूँ    तेरा    यह      वैभव।