मंगलवार, 3 मई 2011

जीवन का अर्थ

-- सत्येन्द्र झा

 

समाज सुधार के ठेकेदारों द्वारा आयोजित रैली में हुड़्दंग हो गया। नेतृत्वकर्त्ता सबसे पहले भागकर अपनी गाड़ी में जा बैठे। दो-चार लोग इस रेलम-पेल में कुचल कर यमलोक पहुँच गये और दर्जनों घायल हो गये। अगली सुबह अखबार में नेताजी का वक्तव्य छपा था, “हमें इस बात का अपार क्लेश है कि हमारे कुछ कार्यकर्त्ता इस पुनीत कार्य में शहीद हो गये। इससे तो अच्छा था कि भगवान मेरे प्राण ही ले लेते। अब मेरे लिये जीवन का कोई अर्थ नहीं है।”

नेताजी अखबार पढ़ रहे थे। सामने पत्नी मेवा की थाल और ग्लास भर फ़्रूट-जूस लिये खड़ी थीं।

 

(मूलकथा मैथिली में “अहींकेँ कहै छी” में संकलित “जीबाक अर्थ” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

19 टिप्‍पणियां:

  1. इसे कहते हैं घडियाली आँसू बहाना ...अच्छी लघु कथा

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  2. ऐसा ही हो रहा है आजकल.सटीक लघुकथा.

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  3. यही होता है, आम जनता की जान को किसे परवाह है ... फिर भी अपनी जान देने गरीब जनता इनके पास जाती है ...

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  4. ये सफेदपोश ही संमाज का असली नासूर हैं।

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  5. बहुत बड़ी बात कहती हुई लघुकथा ..!!
    बहुत अच्छी है .

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  6. वर्तमान युग मे नेताओं के जीवन का न कोई अर्थ होता है न उद्देश्य-वस लोगों को एक सहज भुलावा देकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकते रहते हैं। लघु कथा अच्छी लगी।

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  7. राजनेताओं की तो सच्ची तस्वीर यही है।

    ऐसा ही हो रहा है।

    बहुत सुन्दर।

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  8. एक सत्य कथा आज कल के जमाने की, धन्यवाद

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  9. कल 06/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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