शुक्रवार, 13 मई 2011

आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे

समीक्षा

आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे

- हरीश प्रकाश गुप्त

जब से बाबा रामदेव और उनके समूह ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध अलख जाई है और अन्ना हजारे जी के अभियान ने भ्रष्टाचार को आन्दोलन का मुद्दा बनाया है, जनता ने बढ़-चढ़ कर उनके अभियान में भाग लिया है। व्यवस्था में अपनी ईमानदारी के कारण हासिये पर सरक गए लोगों की आँखों में भी आशा की एक किरण चमक उठी है क्योंकि व्यवस्था को भ्रष्टाचार ने इस कदर खोखला बना दिया है कि उसमें वही फिट हो पाते हैं जो उसके अनुरूप ढल जाते हैं। जो नहीं ढल पाते हैं उन्हें यह सिस्टम अंग्रेजी की कहावत “आड मैन आउट” की तर्ज पर उखाड़कर बाहर फेंक देता है। जो प्रतिरोध नहीं करते वे गुमनाम सा जीवन जीते हुए मात्र सांसे भरा करते हैं। व्यवस्था में भी ईमानदार लोग मौजूद हैं लेकिन भ्रष्ट तंत्र का विरोध करने पर उनकी कैसी दुर्गति होती है, उन्हें किस प्रकार पीड़ा और प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है, जिससे कि अधिकांश लोग न चाहते हुए भी समझौता कर लेते हैं। इसी भावभूमि पर प्रस्तुत कथा लिखी गई है।

कथाकार वाणभट्ट ने अपनी कहानी “सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे” में इसी विषय को उठाया है कि जब कोई व्यक्ति इस सिस्टम में ईमानदारी से, बिना किसी दबाव के, अपना कार्य करना चाहता है तो यह सिस्टम उसके सामने कितनी मुश्किलें खड़ी करता है और अंततः वह अकेला व्यक्ति इस सिस्टम से हार सा जाता है। पीछे उसकी प्रशंसा तो लोग करते हैं लेकिन इस सिस्टम का विरोध करते हुए उसके हाथ मजबूत करने के लिए समय पर सामने कोई नहीं आता। यह कहानी विगत 12 अप्रैल को उनके ब्लाग “वाणभट्ट” पर प्रकाशित हुई थी। कहानी का विषय ज्वलंत है। इसमें सन्देह नहीं कि यह कहानी अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान व अनशन से प्रेरित है। उनका अनशन विगत 5 अप्रैल को प्रारम्भ हुआ था और यह कहानी उसके ठीक एक सप्ताह के अंतराल में लिखे जाने के पश्चात प्रकाशित भी हो गई। जाहिर है, कहानी शीघ्रता में लिखी गई है। समय की दृष्टि से देखें तो कहानी की बुनावट पर्याप्त कसी दिखती है, तथापि टंकण त्रुटियाँ अत्यधिक हैं, जो शायद समय कम होने के कारण छूट गईं हैं।

कथानक में प्रमुख पात्र मिश्र जी हैं जिनके संस्कारों में उच्च नैतिक मूल्यों का समावेश हैं और ये उन्हें अपने पारिवारिक सामाजिक परिवेश से प्राप्त हुए हैं। हमें अपने परिवेश में मिश्र जी जैसे एक-दो चरित्र आसपास अवश्य दिख जाते हैं। मिश्र जी की ईमानदारी, आदर्शों और मूल्यों को देखते हुए उनके माता-पिता को उन्हें शिक्षक की नौकरी अधिक उपयुक्त लगी। मिश्र जी की भी लालसा धन, पद और प्रतिष्ठा अर्जित करने की कम अपने आदर्शों के अनुरूप छात्रों को प्रेरणा दे पाने में अपना जीवन सफल होते देखने में अधिक थी। वैसे भी मान्यता रही है कि शिक्षक की नौकरी में सम्मान अधिक मिलता है और व्यक्ति ईमानदारी से अपना कार्य करना चाहे तो औरों के प्रभाव में आए बिना कर भी सकता है। सरकारी नौकरी होते हुए भी यह नौकरी भ्रष्ट सिस्टम से थोड़ा अलग लगती है। इसमें अपने आदर्शों का प्रसार करने की सम्भावनाएं भी विद्यमान हैं। लेकिन इस भ्रष्टाचार ने सिस्टम का कोई कोना नहीं छोडा है। यह विभाग भी इससे कहीं अलग नही है। यह उन्हें बाद में समझ में आता है। अन्य अध्यापक अध्यापन में शार्टकट अपनाते हैं, पर मिश्र जी नहीं। मिश्र जी को तमाम सुविधाओं में भी प्रिन्सीपल से असहयोग का सामना करना पड़ता है। जितना सम्भव होता है वे छात्रों के हित के लिए अपने वेतन से उन्हें सुविधाएं दिलाते हैं। यहां तक कि प्रिन्सीपल स्वयं मिश्र जी के शोध कर्म में अपना नाम लिखवाने की आकांक्षा रखते हैं और उसमें सफल न होने पर वे मिश्र जी से कुपित रहते हैं तथा उन्हें असहयोग करते हैं। हाँ, आज के समय में हर कोई अपने वेतन का एक हिस्सा तो जन सेवा में खर्च नहीं करता, अतः मिश्र जी अपने आदर्शों के प्रति एक सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक निष्ठावान साबित होते हैं। लेकिन ईमानदारी को कुछ इसी प्रकार की ही स्थितियों का सामना करना पड़ता है। मिश्र जी की ईमानदार छवि के कारण जब एक विदेशी संस्थान से एक करोड़ रुपए का अनुदान उनके नाम से स्वीकृत होता है, तो प्रिन्सीपल के नेतृत्व में यह भ्रष्टाचारी तंत्र उन्हें अनुदान का नियंत्रण न मिल पाए इसके के लिए वह दिल्ली से लखनऊ तक हर हथकंडे अपनाता है। उसमें सफल न होने पर आहत भ्रष्टाचारियों का रैकेट उन्हें बदनाम करते हुए अन्ततोगत्वा उन्हें उनके ईमानदार कृत्यों को नियमों के अन्तर्गत न होने, अर्थात नियमों के प्रतिकूल होने पर उन्हें सस्पेन्ड करवा देता है। जाँच चलती है। पत्रों का आवागमन उसी सिस्टम के प्रापर चैनल से होता है। फिर भी, मिश्र जी सोचते हैं कि यदि जांच ईमानदारी से हो तो उनकी निष्पक्षता प्रमाणित हो सकती है। इसके लिए वे लखनऊ, दिल्ली लिखा-पढ़ी करते हैं, लेकिन इस सिस्टम में उनकी आवाज नहीं सुनी जाती। अपने हश्र को देखते हुए मिश्र जी भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई की तुलना आजादी की लड़ाई से करते हैं तो पाते हैं कि अंग्रेजों के फिर भी कुछ नैतिक मूल्य थे, नियम थे, जिनका वे पालन करते थे, वरना उनके विरुद्ध आजादी का बिगुल फूँकने वालों को वे मरवा भी सकते थे, लेकिन उन्होंन ऐसा नहीं किया। परन्तु आज के सत्तासीन हमारे बीच के ही हैं। दुर्भाग्य से इनके कोई नैतिक मूल्य नहीं हैं। ये अपने हित के लिए किसी को भी फंसा सकते है, उसकी जान भी ले सकते हैं। सिस्टम को पूरी तरह अनुभव कर लेने के पश्चात मिश्र जी को अब कोई सम्भावना नजर नहीं आती। इस भ्रष्ट सिस्टम में ईमानदार और आदर्शवादी व्यक्तित्व को लोग सनकी और पागल कहते हैं जबकि साथ वाले बेवकूफ और ये व्यंग्य बाण मिश्र जी को आहत करते हैं।

कहानी के प्रमुख पात्र मिश्र जी हैं जिनके इर्द गिर्द कहानी की समपूर्ण संरचना हुई है। सहायक पात्रों में प्रिन्सिपल हैं। अन्य पात्र अप्रत्यक्ष हैं और प्रसंगवश कथानक में बुने गए हैं तथा सर्वथा उपयुक्त हैं। कहानी का शिल्प सामान्य है। सीधे संवाद प्रयोग में नहीं आए हैं। कहानी वर्णनात्मक ढंग से आगे बढती है। इसके बावजूद कहानी सम्प्रेषणीय है। कहानी का मूल संदेश पाठकों तक बहुत सहजता से पहुंचता है। इस कहानी की रचना यथार्थ के धरातल पर हुई है। इसलिए यह कहानी बिलकुल सजीव सी लगती है। यह कथाकार की कुशलता है। कहानी में विषयगत सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक पहलू भी प्रकाशित हुए हैं जो वास्तविक जीवन में बिलकुल सटीक बैठते हैं। यथा – “हर कोई इससे परेशान है, पर जब अपना मौका आता है इसे रोकने और इससे लड़ने का तो लोग शोर्टकट ही अपनाते हैं”। सच है कि लोग भ्रष्टाचार से पीड़ित होते हैं तभी परेशान होते हैं। लेकिन जब इसका मुकाबला करने की बात होती है, तो वे इससे बचते हैं या फिर शार्टकट अपनाते हैं। “अधिकतर लोग उनको सनकी या झक्की समझते और उनके खैरख्वाह उन्हें बेवक़ूफ़”। समाज की यही तो विडम्बना है कि लोग भ्रष्टाचार से तंग तो हैं, लेकिन जो लोग इसके विरुद्ध खड़े होते हैं, उनका साथ देने के बजाय उन्हें सनकी और पागल आदि विशेषणों से विभूषित कर उनका मजाक उड़ाते हैं, उन्हें हतोत्साहित करते हैं और अपनी राह ले लेते हैं। “प्रिंसिपल जो खुद भी केमिस्ट्री के क्षेत्र से था, अपना नाम घुसेडने के लिय मिश्र जी पर जोर आजमाने की कोशिश की, पर मिश्र जी ने एक न सुनी और कभी उसका नाम अपने पत्रों में शामिल नहीं किया” प्रायः यही देखा जाता है कि जो लोग स्वयं कार्य करके उपलब्धियां हासिल नहीं कर पाते, वे ही दूसरे के कार्य की समीक्षा करते हैं, उसे हड़पने, उसका श्रेय लेने की जुगत करते रहते हैं। इसी प्रकार “मिश्र जी अपनी दुनिया में मगन थे और दुनिया अपने में”। ये छोटे-छोटे वाक्यांश हैं लेकिन बहुत सूक्ष्मता से वास्तविक अभिव्यक्ति करते हैं।

यह कथा केवल इतनी ही उक्ति भर नहीं है। कथाकार का संदेश इससे कहीं आगे है। कथाकार जब कहानी का शीर्षक “सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे” तय करता है तो उसके कुछ मायने और भी होते हैं। सिस्टम के बाहर अन्ना हजारे को हमने जंतर मंतर पर देखा। जैसे-जैसे दिन बीतते गए अन्ना हजारे के समर्थन में लोगों का सैलाब बढ़ता गया। सिस्टम के अन्दर की स्थिति इसके सर्वथा विपरीत होती है। सिस्टम के अन्दर रहकर सिस्टम से लड़ना बहुत मुश्किल कार्य है। यहाँ जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, वैसे-वैसे लोग आपका साथ छोड़ते रहते हैं। एक दिन आता है जब सिस्टम का विरोध करने के कारण आपके साथ कोई नहीं होता। सत्ता कहीं उनका नुकसान न कर दे इसलिए लोग सिस्टम के अन्दर वाले अन्ना हजारे से दूरी बना लेते हैं। इस प्रकार सिस्टम के अन्दर वाले अन्ना हजारे की राह अधिक कठिन हो जाती है। कथाकार का संदेश इस दिशा की ओर भी जाता है।

वैसे तो कहानी में कथा के मूल अंगभूत तत्वों का निर्वाह हुआ है और मिश्र जी को फंसाकर जांच बिठा दिए जाने के साथ यह कथा अपने उत्कर्ष पर पहुंचती है लेकिन समाप्ति तक आते-आते कहानी नरैटिव अधिक हो जाती है। समापन विन्दु पर मुख्य पात्र के मस्तिष्क में विभ्रम कहानी को तार्किक अंत नहीं देता। साथ ही कहानी का अंतिम पैरा, जिसमें सुझाव दिए गए हैं वह कहानी का अंग नहीं लगता। कहानी में घटना नाटकीयता के साथ प्रस्तुत होनी चाहिए न कि स्थिति स्पष्ट करने वाले सुझाव के रूप में। अतः यह भाग शैक्षणिक पुस्तक के लिए तो उपयुक्त हो सकता है लेकिन कथा के लिए नहीं।

27 टिप्‍पणियां:

  1. अन्ना हजारे ने राह बना दी है!
    अभी तो इस पर रहजन भी आयेंगे!

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  2. जब कोई व्यक्ति इस सिस्टम में ईमानदारी से, बिना किसी दबाव के, अपना कार्य करना चाहता है तो यह सिस्टम उसके सामने कितनी मुश्किलें खड़ी करता है और अंततः वह अकेला व्यक्ति इस सिस्टम से हार सा जाता है। पीछे उसकी प्रशंसा तो लोग करते हैं लेकिन इस सिस्टम का विरोध करते हुए उसके हाथ मजबूत करने के लिए समय पर सामने कोई नहीं आता।

    ...ekdam sateek baat...system ka hi to rona hai...
    saarthak chintan aur manan...

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  3. आंच पर "सिस्टम..." को लेने के लिए धन्यवाद...अच्छा लगा ये समझ कर कि समीक्षक अपने कार्य को कितनी बारीकी से करते हैं...लिखते समय हम लोग...कम से कम मै...सिर्फ विचारों को जल्दी से जल्दी टाइप करने में लगा रहता हूँ...हरीश जी और पूरी मनोज टीम को मेरा सादर, सस्नेह धन्यवाद...
    वाणभट्ट

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  4. हरीश जी ने कहानी के गुण-दोषों का अच्छा विवेचन किया है। साधुवाद।

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  5. सिस्टम के अन्दर..... पसंद आई। समीक्षा में कथा के कई और पहलू प्रकाशित हुए। आकर्षक।

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  6. बहुत अच्छी समीक्षा ..अभी यह कहानी पढ़ कर आई हूँ .. आभार

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  7. भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुत कुछ लिखा जाना शेष है. साहित्यकार अभी भी लिख रहे है. कथा की निष्पक्ष समीक्षा अच्छी लगी.

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  8. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी आज के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. इस विषय पर बहुत चर्चा की जा सकती है। पर मुझे लगता है कि हर आदमी अपनी इमानदारी पर कंसंट्रेट करे, तब भी काम चल जाये!

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  10. कथा की निष्पक्ष समीक्षा अच्छी लगी.
    ....हार्दिक शुभकामनायें

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  11. @ दर्शन कौर धनोए जी,

    आलेख को चर्चा मंच पर स्थान देकर सम्मान प्रदान करने के लिए आपका बहुत आभारी हूँ।

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  12. पिछले कुछ दिनों से ब्लागर के सर्वर में कठिनाई आ रही थी। जिससे इस ब्लाग की भी कई पोस्ट पाठकों की टिप्पणियों सहित गुम हो गईं। यद्यपि इन पोस्टों को पुनः लगा दिया गया है लेकिन इन पर लगीं टिप्पणियां सहेजी न जा सकीं। इससे पाठकों को हो रही असुविधा के लिए खेद है।

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  13. डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) to me
    show details May 12 (3 days ago)
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    अन्ना हजारे ने राह बना दी है!
    अभी तो इस पर रहजन भी आयेंगे!

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  14. Sunil Kumar ने आपकी पोस्ट " रखवाला " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    aaj ke shravan kumar !!!! sarthak post abhar

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  15. Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने आपकी पोस्ट " रखवाला " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    कठिन वक़्त में अपने काम नहीं आयेंगे तो कौन आयेगा?

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  16. vandana ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    सटीक समीक्षा।

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  17. ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    हमेशा की तरह स्पष्ट और सटीक !

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  18. Vaanbhatt ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    आंच पर "सिस्टम..." को लेने के लिए धन्यवाद...अच्छा लगा ये समझ कर कि समीक्षक अपने कार्य को कितनी बारीकी से करते हैं...लिखते समय हम लोग...कम से कम मै...सिर्फ विचारों को जल्दी से जल्दी टाइप करने में लगा रहता हूँ...हरीश जी और पूरी मनोज टीम को मेरा सादर, सस्नेह धन्यवाद...
    वाणभट्ट

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  19. आचार्य परशुराम राय ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    हरीश जी ने कहानी के गुण-दोषों का अच्छा विवेचन किया है। साधुवाद।

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  20. संगीता स्वरुप ( गीत ) ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    बहुत अच्छी समीक्षा ..अभी यह कहानी पढ़ कर आई हूँ .. आभार

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  21. good_done ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    सिस्टम के अन्दर..... पसंद आई। समीक्षा में कथा के कई और पहलू प्रकाशित हुए। आकर्षक।

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  22. कविता रावत ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    जब कोई व्यक्ति इस सिस्टम में ईमानदारी से, बिना किसी दबाव के, अपना कार्य करना चाहता है तो यह सिस्टम उसके सामने कितनी मुश्किलें खड़ी करता है और अंततः वह अकेला व्यक्ति इस सिस्टम से हार सा जाता है। पीछे उसकी प्रशंसा तो लोग करते हैं लेकिन इस सिस्टम का विरोध करते हुए उसके हाथ मजबूत करने के लिए समय पर सामने कोई नहीं आता।

    ...ekdam sateek baat...system ka hi to rona hai...
    saarthak chintan aur manan...

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  23. shikha varshney ने आपकी पोस्ट " आँच-68- सिस्टम के अन्दरः अन्ना हजारे " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    वाह बेहतरीन समीक्षा.

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  24. आंच पर 'सिस्टम...' को लेने के लिए हार्दिक धन्यवाद...मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई हरीश जी बेबाक ख्यालों को पढ़ कर...ब्लॉग लिखते समय मै अपने विचारों को जल्दी से जल्दी टंकित करने की फिराक में रहता हूँ...इसलिए तारतम्य का निर्वाह नहीं हो पाता है...पर मुझे ये उम्मीद भी ना थी की कोई इतनी बारीकी से पढता भी होगा...वाणभट्ट पर आपकी कृपा दृष्टि ऐसे ही बनी रहे...लेखो, कविताओं और कहानियों पर अपने सुझाव से अवश्य अवगत कराया करें...हरीश जी और पूरी मनोज टीम को मेरा सादर, सप्रेम धन्यवाद...

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