शनिवार, 14 मई 2011

फ़ुरसत में ..... ‘अरे! ये कैसे कर सकते हैं आप?’

फ़ुरसत में .....

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पिछले दिनों ऊटकमंडलम जाना पड़ा।

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‘ये कहां है!?’ के भाव चेहरे पर लाकर न तो चौंकिए और न ही नाक भौं सिकोड़िए ...! अंग्रेज़ जब इस नामाकरण को उच्चारण करने में कठिनाई महसूस करने लगे तो उन्होंने अपनी ज़ुबान की सुविधानुसार इसका नामाकरण ऊटी कर दिया। और हम तो उनके ग़ुलाम थे ही ... तब शरीर से थे, आज मन से और वचन से हैं। पर्वतों की रानी नीलगिरी की सुरम्य वादियों के 36 वर्ग किलो मीटर में बसे ऊटी पर्वतीय प्रदेश में एक खास काम से जाना था। अपने एक ब्लॉगर मित्र को बताया तो उन्होंने पूछ ही दिया, ‘अरे! ये कैसे कर सकते हैं आप?’

आप भले न समझ पाए हों उनके इस प्रश्न का आशय, पर मैं तो समझ ही गया था। इस निर्णय के पीछे जितनी और जिस हिम्मत की ज़रूरत होती है, उतनी और वह हिम्मत सामान्य दिनों में तो मैं ‘उनके’ समक्ष दिखा नहीं पाता, फिर इन दिनों तो न तो सिर्फ़ दिन असामान्य थे बल्कि ‘उनका’ स्वास्थ्य भी ठीक नहीं था। और … इस असामान्य अवस्था में मेरा इस तरह का इरादा खुले आम प्रकट करना ब्लॉगर-मित्र को न सिर्फ़ असामान्य से कुछ ज़्यादा ही लगा, बल्कि पगलाई हुई हरकत की श्रेणी वाला, लगा। बस उन्होंने यह - ‘पगला तो नहीं गए हो?!’ न कह कर अपनी बची-खुची शराफ़त का परिचय दिया, वरना आज की दुनिया में वह भी कहां बची है?

... खैर ब्लॉगर-मित्र के दिए गए प्रश्न का बैकग्राउंड आपको बताए बगैर आगे बढने का खतरा भी मुझे नहीं लेना चाहिए वरना आप भी कह ही देंगे अरे! ये कैसे कर सकते हैं आप?’ अब इन दिनों श्रीमती जी अपनी पैर से लाचार थीं। कुछ छोटी-मोटी परेशानियों ने बड़े रोग का रूप धारण करना शुरु कर दिया था और अपना कुछ रौद्र रूप दिखाता उसके पहले ही डॉक्टर ने उसकी छुट्टी कर देने का ऐलान कर दिया। यह सुन मेरे और मेरी श्रीमती जी के चेहरे पर से हंसी की ही छुट्टी हो गई। पहले ज़माने में, और पहले का मतलब पहले के सेंस में ही, सूई (इंजेक्शन) इतना बड़ा आफ़त होता था कि वह न सिर्फ़ हंसी ग़ायब कर देता था बल्कि ‘रुदन’ को अपने पूरे आवेग और गति के साथ हमारे चेहरे पर विराजमान कर दिया करता था। उन दिनों कॉलरा का टीका के नाम पर जो सूई देने वाला आता था, गांव-देहात में, तो लगता था साक्षात यमराज ही आ गया हो। हम तो ऐसे छुपे फिरते थे कि जे.जे. भी न खोज पाए। जे.जे. से भी आप चौंक गए और विस्फारित नेत्रों से मुझे देख रहे हैं कि ‘अब ये कौन आ गया?’

भाई आप लोग टीवी नहीं देखते तो इसमें मेरा क्या कसूर? जानकी वल्लभ जासूस! इसे न पहचानना आपके टीवी न देखने का ही तो सबूत है। आपका यह कहना लाजिमी है कि मुझे जेम्स बॉण्ड 007 आदि का नाम लेना चाहिए, पर आज के आधुनिक युग में उन पुराने दिनों के जासूस का नाम लेना उचित भी तो प्रतीत नहीं होता।

... तो मैं बता रहा था कि उन दिनों उस कॉलरा के टीका देने वाले के डर से हम ऐसे छुपते थे कि बड़े-बड़े भी न ढ़ूंढ़ पाएं, पर बूढ़े तो ढ़ूंढ़ ही लेते थे। बाबा दहारते हुए कहते थे अरे देखो उस ‘कोठी’ के पीछे छुपा होगा। अब ‘कोठी’ से कोई बंगला मत समझ जीजिए, उन दिनों ‘यह’ हुआ करता था, पर आजकल तो ‘यह’ भी वैसे ही ग़ायब हो गया जैसे कॉलरा का टीका देने वाले। जी हां! यह अनाज रखने का विशेष साधन होता था जो मिट्टी का बना होता था। तो उस कोठी के पीछे से हमें पकड़कर निकाला जाता था और जब हम छिड़ियाते थे तो दो-चार जने हाथ पांव पकड़कर कर हमें जब उसके पास लेते जाते थे, हम पूरे सप्तम्‌‌ सुर में अपने रौद्र आलाप का प्रदर्शन किया करते थे।

बात को शॉर्टकट में कहें तो श्रीमती जी के उपचार की प्रक्रिया शल्य चिकित्सा द्वारा होनी थी, हुई। ‘ऑपरेशन’ छोटा हो या बड़ा, शल्यक्रिया के लिए ले जाते वक़्त हर रोगी अपने रिश्तेदारों को ऐसे ही निहारता है जैसे यह उसकी अंतिम यात्रा हो और देखने वाले चाहे कितना भी हौसला देने का हिम्मत दिखाते हुए चेहरे पर तरह-तरह के भाव लाते रहे हों, उनकी भी धुक-धुकी कुछ उसी तरह की ही रहती है।

हमारी सारी कोशिशों के बावज़ूद भी ‘उनकी’ इच्छा के विपरीत ‘उनका’ ऑपरेशन हुआ और उन सारे कष्टों का एक-एक कर सामना करते हुए ‘वो’ अस्पताल से घर भी आ गईं। उन दिनों ‘उनकी’ आवाज़ एक दम से धीमी हो गई थी और शरीर कमज़ोर। कभी इतनी धीमी और कातर आवाज़ में ‘उन्हें’ सुना नहीं था। पर कुछ ‘एंटी बॉयोटिक’ औषधियों का असर और कुछ समय का, ‘वो’ स्वस्थ होती गईं और ‘उनका’ सुर भी ठीक-ठाक लगने लगा।

तो जब मैंने अपने ब्लॉगर-मित्र को बताया कि ऊटी जाना है तो उनका स्वभाविक प्रश्न आया ‘अरे! ये कैसे कर सकते हैं आप?’ मैंने कहा कि सरकारी आदेश की बाध्यता है। तो उन्होंने पूछ ही लिया, ‘आपकी वाइफ़ कैसी हैं अब?’

मैंने कहा, “ठीक होने के रास्ते पर ... बेहतर हैं।”

उनके चेहरे पर एक खुशी का प्रदर्शन करने वाला एक भाव और मुंह से स्वर आया, “दैट्स ग्रेट!”

मैंने भी पूरी विनम्रता का परिचय दिया, “सब आप लोगों की दुआओं और शुभकामनाओं का असर है।”

“… और आपकी सेवा का ….” ब्लॉगर-मित्र ने अपनी विनम्रता का परिचय दिया।

मैंने अपने ओर से अपनी स्थिति स्पष्ट करते और शिष्टता का परिचय देते हुए कहा, “उसकी तो कोई गिनती ही नहीं है।”

ब्लॉगर मित्र ने हंसते हुए कहा,  “है-है! बस जतलाई नहीं जाती …!”

उन दिनों जब ‘वह’ अपनी इस बीमारी के उपचार से गुज़र रही थीं, तो एक बात मैंने गौर किया था। .... ज्यों-ज्यों महिलाओं की बीमारी (अस्वथता) दूर होती जाती है, त्यों-त्यों उनका मध्यम सुर ... पंचम में तबदील होती जाता है! और जब मैंने मेरे आधिकारिक आदेश, यानी ऊटी जाने के आदेश का ऐलान घर में किया तो श्रीमती जी का सुर पंचम हो गया था। बस उस स्वर ने ही मुझे यह हौसला दिया कि अब अपने बॉस को कह ही दूं कि हां मैं जा सकता हूं और दूसरे दिन मैंने अपनी हामी भर दी थी। ... और इसीलिए उस ब्लॉगर मित्र को मैंने बताया था ‘पहले से बेहतर हैं।’

मेरे ब्लॉगर मित्र ने पूरी पृष्ठभूमि को समझने के उपरांत कहा, “सही बात है! सुर जब तार सप्तक में चला जाए तो समझ लीजिएगा कि पूरी ठीक हो गईं हैं।”

उनके इस ज्ञान पर मैंने अपनी सहमति के सुर लगाते हुए कहा, “हां, जब बेलन हाथ में (मुहावरे वाले अर्थ में भी ले सकते हैं) आ जाए तो समझिए कि अब पूर्ण स्वस्थ्य हैं।”

ब्लॉगर-मित्र की फिर हंसी छूटी। मैंने कुछ और स्पष्ट किया, “अभी तो किचन में जाकर खड़ा नहीं रह पाती ना ... इसीलिए कहा कि बेलन हाथ में नही आया है अभी!”

बेलन महिमा का असर हुआ कि सप्ताहांत में मैं ऊटी पहुंच ही गया।

झिंगूर दास 237अगली सुबह ऊटी के होटल होली डे इन के नाश्ता के टेबुल पर बैठा ब्लॉगर दृष्टि से वहां पर मौज़ूद लोगों को निहार रहा था कि कहीं से पोस्ट लिखने लायक़ कोई बात मिल जाए। वहां पर कई जोड़ी में थे, कुछ बिन जोड़े भी ...! उन्हें देख कल्पना की उड़ान भी भर रहा था। जो जोड़े थे उनमें से नया जोड़ा कौन है और पुराना जोड़ा कौन, का पता लगाने की चेष्टा भी कर रहा था। पर कोई निष्कर्ष पर पहुंच ही नहीं पा रहा था। समस्या यह थी कि आजकल के जोड़े पुराने हो जाने के बाद भी इतने युवा दिखते हैं कि उन्हें नया ही समझते रहने का भ्रम होता है। और आजकल जो नया जोड़ा बनता है, वह अंग्रेज़ी के ‘कपल्स’ की श्रेणी में जल्दी आता ही नहीं, पहले नौकरी करते हैं, फिर गाड़ी, फिर बैंक बैलेन्स, फिर और कुछ ... फिर ‘कुछ-कुछ’, मतलब उनकी ज़िन्दगी में जो ‘प्रायोरिटी’ की फ़हरिश्त होती है वह काफ़ी लंबी होती है, और उसमें शादी बहुत कुछ के बाद आती है। ... और जब वो जोड़ा बनते हैं तब तक वो व्यस्क दिखते हैं ... व्यस्क न कहूं तो ‘मैच्योर’ तो दिखने ही लगते हैं। उम्रदराज़ शब्द का प्रयोग जानबूझकर नहीं कर रहा क्योंकि अगर इन नए जोड़े के लिए ये शब्द कहे तो अपने आप को फिर कहां ले जाऊंगा --- २३ साल हुए शादी के .... दिल तो आज भी ... बच्चा है जी ... टाइप से …. खुद को उम्रदराज़ मानने देने को तैयार नहीं है।

मेरी निगाह एक जोड़े पर टिकी। काफ़ी युवा टाइप की उनकी हरकतें देख कर उसे नया जोड़ा मान बैठी मेरी निगाहों का भ्रम जल्द ही टूटा जब दोनों के बीच एक दसेक साल का छोटा बच्चा आकर चीखना शुरु कर दिया। अब मैंने उस “नैना-भुटका” की उम्र से जोड़े के विवाह हो गए वर्ष का अनुमान लगाना शुरु कर दिया। इस पद्धति और प्रक्रिया के दौर से गुज़रते हुए मैं ख़ुद को शोधकर्ता या वैज्ञानिक होने का अहसास दिलाता रहा। इन भटकते जोड़े में से नए झिंगूर दास 260पुराने की श्रेणी निर्धारित करने के लिए मैंने बैठे-बैठे हुए ही एक फॉर्मूला ईज़ाद कर लिया। चेहरे से पहले हाथों को देखो और उस पर चढ़ी मेहंदी और उसका रंग, रंग की गहराई, लम्बाई आदि को ध्यान से देखो और बच्चा साथ में है या नहीं इस फैक्टर को भी ‘ऑब्ज़रवेशन’ में लगा दो। मेरी जे.जे. टाइप आंखों को मेहंदी रचा हाथ कोई दिख नहीं रहा था। तभी एक पैर दिखा ... आज कल एक पैंट चला है जो न हाफ पैंट होता है न फुल पैंट ... दोनों के बीच की श्रेणी के इस पैंट से पैर का एक भाग ढ़ंका होता है और काफ़ी सारा भाग अनावृत्त भी। मुझे इनके बीच से दिख रहे भाग पर मेहंदी रची दिखी। निगाहों में जितना भी नज़र आया उतनी दूरी तक मेहंदी दिखी ... मन ने प्रश्न किया क्या आजकल शादी में पांव में मेहंदी रचाने का प्रचलन आ गया?

झिंगूर दास 262पर तभी शोधकर्ता के दायित्व बोध से अन्य कारक पर भी दृष्टिपात किया और पाया कि हाथ में भी मेहंदी रची हुई है और इसकी लम्बाई देख मन गद-गद हो गया। नाखून से शुरु हो कर स्लीवलेस बांहों पर केहुनी के ऊपर तक रची मेहंदी उस युवती के नवविवाहित होने का पूरा-पूरा प्रमाण दे रही थी। कुछ ही दिनों पहले करण से बात हो रही थी और बातों-बातों में मैंने उसे ऊटी में विवाहोपरान्त भ्रमण और दर्शन के लिए जाने का प्रस्ताव रख दिया। वह झिंगूर दास 260इसे ठुकराते हुए अपने दार्जिलिंग जाने की मंशा को अभिव्यक्त कर गया। बंगलोर प्रवासी करण जैसे दक्षिण के लोग, हो सकता है दक्षिण के पर्वतीय स्थल से ज़्यादा पूर्वोत्तर के पर्वतीय स्थल में आकर्षण पाते हों..!

नवविवाहित समझ उस दम्पत्ति को कुछ देर और देखता रहा और पाया कि आंखें उनिंदी, चेहरे पर गम्भीरता और चालें बोझिल है। अब इस जोड़ों में अगर विभाजन कर देखा जाए तो नए दूल्हों में एक दो प्रमुख बातें नोट करने लायक थीं। जैसे लड़का ‘डार्लिंग’, ‘जानू’, ‘स्वीट ..’ आदि जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए संबोधित करता रहा था ... जबकि लड़की नाम के संक्षिप्त संस्करण का .. जैसे ‘मैड’, ‘पैड’, ‘सैड’ आदि का।

लड़का बात बात में आदेश की प्रतीक्षारत आतुर निगाहों से लड़की को देखता रहता है और अगर आदेश मिलने में विलंब हो रहा हो तो आज्ञाकारी ‘...’ की ... तरह “जानू ... ये ले लूं ...?’ से आवेदन पत्र सामने रखता और लड़की कड़कदार बॉस की तरह ‘‘नो..ओ..ओ ..सैड ... दिस इज़ फैटी ... यू शुड ट्राई दिस ..!”

प्रसाद ग्रहण करने की भाव-भंगिमा से लड़का उपकृत होता हुआ बताए गए पदार्थ की तरफ़ हाथ बढ़ाकर जब किसी परिणाम की चिंता किए बगैर उचित परिमाण में भोज्यपदार्थ को लपकता कि तभी मीठे मध्यम सुर में संगीत बजता, “व्हाट सैड! वाच क्वान्टिटी...!”

लड़का प्रसाद की मात्रा, प्रसाद के अनुरूप ही रखता हुआ, ‘जो मिल गया उसे ही मुक़द्दर समझ लिया’ की भांति उसे ग्रहण करता है। पांचतारा होटल में नाश्ता के मेनू में फ़्रुट से लेकर पीज्जा तक बहुत कुछ खा लेने की संभावना के बीच कुछ नहीं खा पाने की मज़बूरी के साथ हिदायतों के अधिकार पूर्वक आदेश, देख और सुन कर मैंने अपने शोध का यह निष्कर्ष निकाला कि यह तो शादी के बाद … (हनीमून) … का साइड ईफ़ेक्ट है।

दोनों में किसने किसका हाथ पकड़ा हुआ था कहना मुश्किल लग रहा था, पर हाथ पकड़े, ही (अगर जकड़े शब्द के प्रयोग से बचा जाए तो) वहां से बैठने की टेबुल तक उनके क़दम बढ़ गए ... इस तरह जैसे ‘हम तुम एक जंगल से गुजरें और रास्ता भूल जाएं ...’ की पुनरावृत्ति न हो जाए ...! और अगर वे बिना हाथ पकड़े चलें तो देखने वाले कह न दें ... ‘अरे! ये कैसे कर सकते हैं आप?’

24 टिप्‍पणियां:

  1. हा हा , इत्ता मजेदार फुर्सत में पढ़कर हम तो ठठा के हसें . उम्मीद है आपनके लौटने के बाद भाभी जी ने आपका सप्तम स्वर में स्वागत ना किया हो . अब २३ साल बाद ऐसा होने की पूरी संभावना तो बनती है . उटक मंडलम जाने का अवसर २-बार मिला है . सुरम्य वादियाँ मन को मोह लेती है उम्मीद है जब आपने छोटे सुथान्ने से अनावृत मेहदी रचित पिंडलियों को कैमरे में कैद किया होगा तो किसी की नजर नहीं पड़ी होगी . मज़ा आ गया पढ़कर .

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  2. ऊटकमंडलम जाने की भूमिका और वहाँ जा कर आपकी जासूसी खोज दोनों ही मनमोहक है ...
    हमें तो लगा ही नहीं कि आप ऐसा भी कर सकते हैं ...

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  3. जनाब बच गए --वरना पिंडलियों के फोटू लेने के जुर्म में अच्छी खासी धुनाई हो जाती ही ही ही ...

    ऊटी के किस्से पढ़ कर हमे भी हनीमून के वो सुनहरे दिन याद आ गए ..वाह !

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  4. दिल कर रहा है मैं भी ऊंटी हो आता हूँ

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  5. बड़े भाग्यवान हैं आप...डी.पी. (धर्मपत्नी) के साथ दूसरों की जासूसी...वो भी फोटो समेत...जे.जे. को मात कर दिया...फुर्सत में कुछ भी किया जा सकता है...लगता है बेलन वाली बात ऐंवें ही लिख दी है...इस अस्त्र का असर देखने के बाद कोई नज़र इधर-उधर जा ही नहीं सकती...

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  6. अच्छा है। पर "टांग" को "पैर" लिखें। आदमी की है,मुर्गे की नहीं।

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  7. ऊंटी में अकेले होंगे आप तो यदि देखेंगे.. साहित्यकार तो कुछ भी कर सकता है.. बाकी करन से माफ़ी मांगने लायक भी नहीं हूँ... पत्नी के बीमार होने के साथ साथ दोनों बेटे को चिकेन पाक्स हो गया है... उसके दार्जलिंग से आने के बाद बंगलोरे में ही मिलकर शुभकामना दूंगा और माफ़ी भी मांग लूँगा... बाकी हम तो शादी के दस साल बाद भी हाथ जकड के ... लुस्फुसाते हुए... जानू.. डार्लिंग आदि शब्दों का इस्तेमाल करते हैं... अब अच्छों ने मम्मी का नया नाम रख लिया है.. जानू.. इर्ष्या होती है सुनकर... मज़ेदार रहा फुर्सत में...

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  8. हमें बुला लेते बंगलोर से, बैठकर बतियाते।

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  9. बढ़िया और मनोरंजक ....
    शुभकामनायें आपको !

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  10. @ प्रवीण जी
    ओह सॉरी!
    अगली बार, ज़रूर से!

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  11. "यदि" ... को "यही " पढ़ें

    "अच्छों" ... को "बच्चों" पढ़ें

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  12. @ दर्शन जी
    भीड़ और सिनरी के बीच उनके पैर और हाथ आ गए बाक़ी सब तकनीक का सहारा है।

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  13. बहुत मजेदार रही ऊटकमण्डलम यात्रा की प्रस्तुति।

    जे.जे. टाईप के खोजी रचनाधर्म ने ऐसा आकर्षक समां बांधा कि आखिर में जाकर ही चैन मिला। भई, मानना पड़ेगा आपके साहस को, आपकी लगन और निष्ठा को, जो उस बाला के मेहंदी रचे हाथ और पांव की तस्वीरों को कैमरे में कैद कर लाए। सुबूत साथ हो तो मानना ही पड़ेगा कि यह सब कोरी कल्पना की उड़ान नहीं थी। और हां, सच सच बताइए कि क्या जरा भी डर नहीं लगा तस्वीरें लेते समय, न वहां, न यहां का। खैर जो भी हो, आपका मन सच्चा है इसलिए कामना करता हूँ कि ईश्वर आपकी मदद करे।

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  14. व्यंग्य बहुत ही अच्छा है। साधुवाद।

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  15. ऊटी का टिकट कटवाना पड़ेगा लगता है. जल्द ही. :)

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  16. बहत अच्छे .... अब एक बार उटी फिर जाना पड़ेगा

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  17. बहुत बढिया विवरण .. पोस्‍ट पढते हुए मन प्रसन्‍न हो गया .. उम्‍मीद करती हूं भाभीजी अब बिल्‍कुल ठीक होंगी !!

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  18. हा हा हा ...बहुत ही फुर्सत में तल्लीनता से लिखा फुर्सत नामा है .मजा आ गया पढकर.
    उटकमडलम एक बार हम भी गए हैं पर आप जैसी दृष्टि कहाँ हमारे पास.
    बोल्ड में लिखे आपके " उनके , उन्हें ,वह , यह आदि गज़ब का माहोल बना रहे हैं.
    और यह मेहंदी शायद टैटू का भारतीयकरण है..
    कुल मिलाकर बेहद मनोरंजक और उत्कृष्ट लेखन.
    और हाँ आपके लिए केरियर ऑप्शन के तौर पर जासूसी भी बुरा नहीं :)

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  19. हमें भी यकीन नहीं हो रहा की आप ऐसे जासूसी कैसे कर सकते हैं ...रोचक वृतांत पढ़ते उटी की खूबसूरत वादियाँ याद आने लगी ...
    ब्लॉगर होने की यह अतितिक्त खूबी तो है की हर स्थान या वाकये ख़ास नजर से अवलोकन हो जाता है १
    रोचक प्रविष्टि !

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  20. क्या बात...क्या बात...इतना गहरा अवलोकन...:)
    कुछ भी आपकी नज़रों से नहीं बच सका....ऐसा कैसे कर सकते हैं आप :)

    अब दुबारा...प्लान कर ही लीजिये...भाभी जी के साथ....फेसबुक पे अपडेट करना ना भूलियेगा...(
    (फिर हमारी ब्लॉगर मंडली पहुँच जायेगी...और कुछ ऐसी ही पोस्ट हमारे ब्लोग्स पर दिखेंगी ...हाहा...लीजिये ये तो हमने ज़ाहिर कर दिया...).

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  21. मजा आ गया और आपके तेवर भी बदले बदले से लगे आज!! ये ऊटी ऊप्स उटकमंडलम का असर है.. और ये तस्वीरें क्या सचमुच उसी बाला की हैं??? अगर हाँ तो ये आपने किया कैसे?? या उसने कैसे अनुमति दी!!!

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